
गत वर्ष वैश्विक मंदी के गहराने के साथ-साथ रिजर्व बैंक ने सरल मुद्रा नीति लागू की थी। बैंकों के लिए अपनी जमा पूंजी के एक हिस्से को सरकारी बांड में जमा कराना अनिवार्य होता है। उन्हें कुछ रकम रिजर्व बैंक के पास नकद भी जमा करानी होती है। इस रकम में कटौती से उनके पास ग्राहकों को ऋण देने के लिए उपलब्ध रकम में वृद्धि हुई थी। उद्यमियों तथा निवेशकों को ऋण आसानी से उपलब्ध होने लगा था। साथ-साथ केंद्र सरकार ने खर्च बढ़ाए, जैसे छठे वेतन आयोग के तहत सरकारी कर्मियों को अधिक वेतन दिए गए और हाईवे एवं सार्वजनिक इकाइयों को निवेश के लिए अधिक रकम उपलब्ध कराई गई। इसके अलावा रोजगार गारंटी में खर्च बढ़ाया गया। रिजर्व बैंक की सरल मुद्रा नीति एवं केंद्र सरकार के सरल खचरें के सम्मिलित प्रभाव से वैश्विक मंदी के दौरान हमारी आर्थिक विकास की दर 5-6 प्रतिशत पर सम्मानजनक बनी रही। गत सप्ताह घोषित मुद्रा नीति में रिजर्व बैंक ने इस सरल नीति के अंत के संकेत दिए हैं। बैंकों द्वारा सरकारी बांड में जमा कराई जाने वाली रकम को 24 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है। इस वृद्धि का बैंकों पर तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा, क्योंकि बैंकों द्वारा वर्तमान में पूंजी का 27.6 प्रतिशत पहले ही सरकारी बांड में जमा कराया जा चुका है। तथापि इस वृद्धि का महत्व है। रिजर्व बैंक ने बैंकों को संकेत दिया है कि आने वाले समय में इस रकम में और वृद्धि होने को है। इससे भविष्य में बैंकों द्वारा ऋण देने में कुछ कटौती की संभावना बन रही है।
केंद्र सरकार द्वारा खर्चों में की जाने वाली वृद्धि बरकरार है। सरकार ने आय से अधिक खर्च करने के लिए बांड जारी किए हैं। आने वाले समय में सरकार को इन बांडों का निस्तारण करना होगा। यदि उस समय अर्थव्यवस्था चल निकलती है और सरकार की आय में सहज ही वृद्धि हो जाती है तब तो ठीक है। बढ़ी आय से इन बांडों का निस्तारण हो जाएगा, परंतु किन्हीं कारणों से अर्थव्यवस्था मंद बनी रहती है तो सरकार को अतिरिक्त टैक्स लगाकर इन बांडों को निपटाने के लिए आय बढ़ानी होगी। तब घरेलू उद्यमों पर दोहरी मार पड़ेगी। उन्हें बैंकों से ऋण कम मिलेगा। साथ-साथ उन्हें अतिरिक्त टैक्स भी अदा करना होगा। इस परिस्थिति को रिजर्व बैंक ने दबी जबान से स्वीकार किया है। रिजर्व बैंक समेत दूसरे विश्लेषकों ने आर्थिक विकास दर के 5 से 6 प्रतिशत के वर्तमान स्तर पर बने रहने का अनुमान लगाया है। जाहिर है कि सरकार की आय में वृद्धि होने की संभावना कम है। अत: सरकार को राजस्व जुटाने के लिए टैक्स में वृद्धि करनी होगी। यह हमारे उद्योगों के लिए संकट पैदा कर सकती है।
वैश्विक परिस्थितिया हमारे अनुकूल बन सकती हैं। आसार है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था दबाव में बनी रहेगी और डालर की टूटन जारी रहेगी। परिणामस्वरूप रुपया चढ़ेगा और विदेशी पूंजी का बहाव भारत की ओर मुड़ने की संभावना बनेगी। संभव है कि घरेलू उद्योगों के संकट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था टिकी रहे, क्योंकि दूसरे देशों की तुलना में हमारी स्थिति फिर भी ठीक रहेगी। घरेलू कमजोरी की भरपाई विदेशी निवेश से हो जाएगी, परंतु इस आरामदेह स्थिति से रिजर्व बैंक एवं सरकार की नीतियों का दुष्प्रभाव समाप्त नहीं होता। उसे केवल विदेशी पूंजी की चादर से ढक दिया जाता है, जैसे गोबर के गड्ढे पर प्लास्टिक लगाकर उसे ढक दिया जाता है। अत: सरकारी नीतियों के इस दुष्प्रभाव के प्रति हमें सजग रहना चाहिए।
रिजर्व बैंक द्वारा सख्त मुद्रा नीति अपनाने का मुख्य कारण महंगाई की आशका है। रिजर्व बैंक का आकलन है कि सरकारी खर्र्चो में वृद्धि से महंगाई बढ़ेगी। सरकार द्वारा खर्च बढ़ाने से बाजार में उपलब्ध माल का उपयोग सरकारी जरूरतों की पूर्ति के लिए हो जाता है, जैसे यदि सरकार हाईवे बनाने की बड़ी योजना पर काम शुरू करती है तो बाजार में उपलब्ध सीमेंट हाईवे बनाने में लग जाएगा। बाजार में सीमेंट की कमी हो जाएगी और दाम बढ़ेंगे। महंगाई बढ़ने की इस संभावना को काटने के लिए रिजर्व बैंक ने सख्त मुद्रा नीति लागू की है। उद्यमी और निवेशकों को ऋण कम उपलब्ध होने से वे फैक्ट्रियों आदि में निवेश कम करेंगे। बाजार में सीमेंट की माग कम हो जाएगी। जैसे पड़ोसी द्वारा तेज लाउडस्पीकर बजाने पर घरवाले अपनी खिड़की बंद करके अंदर ही अंदर घुटते हैं उसी प्रकार सरकार के खचरें से आतंकित होकर निजी निवेशक भी दुबक जाएंगे।
फिर भी सरकारी खर्चो में वृद्धि सार्थक हो सकती है, यदि उनमें गुणवत्ता हो। सरकार द्वारा सीमेंट कारपोरेशन में निवेश किया जाए और सीमेंट का उत्पादन बढ़ाया जाए तो बाजार में सीमेंट की आपूर्ति बनी रहेगी और मूल्य वृद्धि नहीं होगी। ऐसे सरकारी खर्च लाभप्रद होते हैं। इनसे देश को हाईवे भी मिल जाते हैं और सीमेंट का दाम भी नहीं बढ़ता, परंतु यदि सरकारी खर्र्चो में घपलेबाजी करके अवैध रूप से धन विदेश भेज दिया जाए अथवा नेताओं द्वारा सोना खरीद लिया जाए तो प्रभाव विपरीत पड़ता है। सरकारी खर्च की रकम विदेश चली जाती है और घरेलू जनता को ऊंचे टैक्स अदा करने पड़ते हैं। सरकार द्वारा बांड जारी करके खर्च बढ़ाना उसी प्रकार होता है जैसे निजी कंपनी द्वारा ऋण लेकर खर्च करना। यदि कंपनी ऋण लेकर फैक्ट्री लगाती है तो भविष्य में लाभ कमाती है और ऋण की अदायगी करती है। यदि कंपनी ऋण लेकर आलीशान दफ्तर बनाती है तो डूबती है। अत: मुख्य मुद्दा रिजर्व बैंक द्वारा सख्त मौद्रिक नीति अथवा केंद्र सरकार द्वारा खचरें में वृद्धि का नहीं है। मुख्य मुद्दा तो सरकारी खचरें की गुणवत्ता का है। यदि सरकारी खर्च विकासोन्मुख हैं तो इनसे न तो महंगाई बढ़ेगी और न ही रिजर्व बैंक को सख्त मुद्रा नीति लागू करनी पड़ेगी। रिजर्व बैंक द्वारा सख्त मुद्रा नीति का अपनाया जाना इस बात का प्रमाण है कि सरकारी खचरें की गुणवत्ता कमजोर है।
देश के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने कुछ वर्ष पूर्व कहा था कि सरकारी खचरें की खराब गुणवत्ता ही वित्तीय घाटे का कारण है। इसी प्रकार वित्तीय विश्लेषक एवं तमाम सरकारी समितियों के अध्यक्ष तारापोरे लिखते हैं, ''सरकारी खर्च की गुणवत्ता में भारी सुधार की आवश्यकता है। रिसाव रोकने के गंभीर प्रयास करने चाहिए।'' तात्पर्य यह कि सरकार द्वारा किए जा रहे खर्र्चो की गुणवत्ता सुधार दी जाए तो समस्या समाप्त हो जाएगी। इसके विपरीत यदि सरकारी खचरें की गुणवत्ता में सुधार नहीं किया गया तो महंगाई बढ़ेगी और अर्थव्यवस्था सुस्त होगी। सरकारी खर्र्चो में से रिसाव का प्रभाव उसी तरह होता है जैसे स्वस्थ व्यक्ति के शरीर से लगातार खून निकलते रहने का होता है। साराश यह है कि रिजर्व बैंक द्वारा सख्त मौद्रिक नीति को लागू करना शुभ समाचार नहीं है। यह प्रमाणित करता है कि सरकारी खर्र्चो की गुणवत्ता घटिया है। इससे महंगाई बढ़ रही है। इस महंगाई को नियंत्रित करने के लिए रिजर्व बैंक सख्त मुद्रा नीति को देश पर थोप रहा है। इस समस्या का हल रिजर्व बैंक के पास नहीं है, बल्कि इसका हल वित्त मंत्री के पास है। उन्हें सरकारी खर्र्चो की गुणवत्ता बनाने लिए तत्काल सख्त कदम उठाने चाहिए।
[डा. भरत झुनझुनवाला : लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं]