मधु कोड़ा दो हजार करोड़ रुपये की काली कमाई करने में सक्षम रहे तो इसके लिए उन्हें और उनके साथियों को केंद्र सरकार को खास तौर पर साधुवाद देना चाहिए, क्योंकि बगैर उसके सहयोग के वह 23 माह में करीब 24 खदानों को पट्टे पर देने का काम मनमाने तरीके से नहीं कर सकते थे। यह रहस्यमय है कि जब कोड़ा कोयला और लौह खदानों को पट्टे पर देने की दनादन सिफारिश कर रहे थे तब केंद्र सरकार उन पर आंख मूंदकर मोहर क्यों लगा रही थी? क्या इसलिए कि कोड़ा की काली कमाई का एक हिस्सा कांग्रेसजनों की जेब में भी पहुंच रहा था? कांग्रेसजन ऐसे किसी आरोप से इनकार करेंगे, लेकिन यह मानने के पर्याप्त परिस्थितिजन्य कारण हैं कि निर्दलीय होते हुए भी कोड़ा 23 महीने तक सिर्फ इसलिए सरकार चलाते रहे, क्योंकि उनकी काली कमाई से उन्हें समर्थन देने वाले राजनीतिक दल-कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल और झारखंड मुक्तिमोर्चा भी लाभान्वित हो रहे थे। कोड़ा ने एक बार कहा भी था कि पैसे का खेल नहीं होता तो वह एक दिन के लिए भी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नहीं बैठे रह सकते थे। स्पष्ट है कि कोड़ा की ओर से की गई लूट-खसोट के लिए अकेले वही दोषी नहीं हैं, लेकिन मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में भारत की कोई भी सरकारी एजेंसी इसके सबूत नहीं जुटा सकती। यह भी समय बताएगा कि कोड़ा को उनके किए की सजा मिल पाती है या नहीं, क्योंकि वह एक राजनेता हैं और अब तक का अनुभव यही बताता है कि भारत में राजनेताओं के खिलाफ जांच-पड़ताल तो होती है और वे अदालतों के चक्कर भी काटते हैं, लेकिन उन्हें सजा नहीं मिलती। झारखंड में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। यदि कोड़ा अपने दो-तीन साथियों समेत जीत जाते हैं और त्रिशंकु सदन की स्थिति बनती है तो वह सरकार गठित करने वाले दल के लिए फिर से आदरणीय-प्रात: स्मरणीय बन सकते हैं।
यदि झारखंड में किसी तरह कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हो जाए और उसे मधु कोड़ा के भीतरी या बाहरी समर्थन की जरूरत पड़े तो आयकर विभाग, केंद्रीय जांच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय आदि को सांप सूंघ सकता है। यकीन न हो तो केंद्र सरकार के उस रवैये पर गौर करें जो उसने 60 हजार करोड़ रुपये का चूना लगाने वाले दूरसंचार मंत्री ए. राजा के प्रति अपना रखा है। इस पर खास तौर पर गौर करना चाहिए कि उन्हें कोई और नहीं खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह क्लीनचिट देने की कोशिश कर रहे हैं। क्या इससे अधिक शर्मनाक और कुछ हो सकता है कि राजा का जो कृत्य स्वत: घोटाला होने के प्रमाण दे रहा है उसका बचाव खुद प्रधानमंत्री कर रहे हैं? माना कि कांग्रेस को अपने नेतृत्व वाली केंद्रीय सत्ता चलानी है और इसके लिए द्रमुक का सहयोग जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि देश जीती मक्खी निगल ले। यद्यपि प्रधानमंत्री सीबीआई को बड़ी मछलियां पकड़ने की सलाह दे चुके हैं और भ्रष्टाचार को एक गंभीर समस्या बता चुके हैं, लेकिन कोई नहीं जानता कि वह बिहार सरकार के उस विधेयक के प्रति गंभीर क्यों नहीं जो केंद्र सरकार की हरी झंडी का इंतजार कर रहा है और जिसमें भ्रष्ट सेवकों की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान है? मधु कोड़ा और ए.राजा के कारनामे यह भी बताते हैं कि ठगी-गबन करने वालों अथवा खुले आम डाका डालने वालों को अब राजनीति में प्रवेश कर मंत्री-मुख्यमंत्री पद पाने की कोशिश करनी चाहिए। इसके बाद वह राजा जैसी हरकत भी कर सकते हैं और मधु कोड़ा जैसी भी। गठबंधन राजनीति के इस दौर में वे इसके प्रति आश्वस्त रह सकते हैं कि उनके भ्रष्ट आचरण के बावजूद उन्हें कोई न कोई समर्थन देने के लिए उठ खड़ा होगा। आश्चर्य नहीं कि ऐसा करने वालों में खुद प्रधानमंत्री भी हों।
देश के नीति-नियंताओं को यह देखकर चुल्लू भर पानी की तलाश करनी चाहिए कि कोई दो हजार करोड़ के वारे-न्यारे कर रहा है और कोई 60 हजार करोड़ के। एक ऐसे देश में जहां करोड़ों लोग महज 30-40 रुपये प्रतिदिन पर गुजर-बसर करने के लिए विवश हैं वहां हजारों करोड़ की हेराफेरी एक झटके में हो रही है और सत्ता के शीर्ष केंद्र में एक पत्ता तक नहीं खड़कता। जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसा होता हो उसे धिक्कार, लेकिन जो शासक यह सब होते हुए भी मौन धारण किए हों उन्हें धिक्कारने से कोई लाभ नहीं, क्योंकि वे या तो संवेदनहीन हो चुके हैं या फिर भ्रष्ट तत्वों के संरक्षक-समर्थक। सवाल सिर्फ कोड़ा और राजा की कारगुजारियों का ही नहीं है, सत्ता के गलियारों में उनके जैसे लोगों का ही बोलबाला है। अब इसमें संदेह नहीं कि खोटे सिक्कों ने अच्छे सिक्कों को निष्प्रभावी बना दिया है। ए. राजा का बचाव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ही नहीं, कांग्रेस के अन्य अनेक नेता भी कर रहे हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार के आरोप का यह मतलब नहीं कि भ्रष्टाचार हुआ है। आखिर क्या मतलब है इस कथन का? कहते हैं कि कोड़ा खदानों का पट्टा देने के एवज में 150-200 करोड़ वसूलते थे। चूंकि कोड़ा दो हजार करोड़ रुपये की संपत्ति इकट्ठा करने में सफल रहे इसलिए यह स्वत: सिद्ध हो जाता है कि देशी-विदेशी कंपनियों ने उन्हें खुशी-खुशी भारी भरकम रिश्वत दी। इसका एक अर्थ यह भी है कि उन्हें खदानों के पट्टे कौडि़यों के मोल मिल गए? ये वे स्थितियां हैं जिनमें नक्सलियों को अपने समर्थक जुटाने के लिए जहमत उठाने की जरूरत ही नहीं। नि:संदेह हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती, जो कि नक्सलियों की रणनीति का प्रमुख अंग बन गई है, लेकिन क्या सत्ता के शिखरों पर बैठे लोगों के पास इसका कोई जवाब है कि देश में कुछ लोग रातों-रात करोड़ों रुपये क्यों बटोर ले रहे हैं? ऐसा करने वालों में कोड़ा एवं राजा तो उदाहरण भर हैं, क्योंकि न जाने कितने लोग ऐसे हैं जो अनुचित-अनैतिक तरीके से तिजोरियां भर रहे हैं और हमें-आपको पता नहीं।
[राजीव सचान : लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं]