
अक्टूबर में बाबासाहेब अंबेडकर के अनुयायियों ने दुनियाभर में धम्मचकपावतन पर्व धूमधाम से मनाया। धम्मचकपावतन शब्द पाली भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है धर्म के चक्र को गतिशील करना। इससे पहले अशोक विजय दशमी के अवसर पर लाखों बौद्धों ने दीक्षा भूमि मेले में हिस्सा लिया। बाबासाहेब के अनुयायियों का मानना है कि 1956 में अशोक विजय दशमी के दिन अंबेडकर ने दूसरी बार धम्म के चक्र को गतिमान किया। 2250 साल पहले गौतम बुद्ध ने धम्म चक्र को पहली बार गतिशील किया था। यह भी कहा जाता है कि बाबासाहेब अंबेडकर ने जानबूझकर इस दिन को चुना था, जब महान अशोक ने हथियारों का त्याग कर बौद्ध दर्शन को जीवन पद्धति के रूप में अपनाया था। इसके बाद से उनके अनुयायी हर साल धम्मचकपावतन मनाते हैं।
बुद्ध का पथ दिखाने वाले अपने नेता को श्रद्धासुमन अर्पित करने के लिए देश के कोने-कोने से लाखों लोगों ने दीक्षा भूमि मेले में भाग लिया। भारत में करीब-करीब मृतप्राय बुद्ध की विरासत को पुनर्जीवित करने वाले अंबेडकर ही थे। दीक्षा भूमि पर धम्मचकपावतन पर्व का आयोजन दो दिनों तक चला। आयोजन से एक-दो दिन पहले ही लोगों का तांता लगने लगा था, जो कार्यक्रम संपन्न होने तक वहां डटे रहे। इसमें मुख्य आयोजन बुद्ध वंदना, त्रिसरन और पंच-शील थे। जिस स्थान पर बाबासाहेब ने दीक्षा ली थी उसी स्थान पर रखे उनके स्मृतिचिह्नंों का लोग फेरा लगाते हैं। यह भवन बौद्ध वास्तुशिल्प के अनुसार बना है। चारो तरफ स्टाल सजे हुए थे, जिनमें विभिन्न वस्तुएं बेची जा रही थीं। इनमें बुद्ध और अंबेडकर की प्रतिमाएं और दलित आंदोलन से संबंधित किताबें, सीडी, कैसेट शामिल हैं। इसके अलावा बाबासाहेब की तस्वीर वाले चाबी के गुच्छे, पोस्टर, लाकेट आदि भी स्टालों पर बिक रहे थे। अपने दोस्तों और प्रियजनों को तोहफे देने के लिए लोग मेले से इन सामानों की बड़ी संख्या में खरीदारी कर रहे थे। इन वस्तुओं की तुलना तीर्थयात्रियों के प्रसाद से की जा सकती है। हालांकि तीर्थयात्रियों के प्रसाद में फूल, सूखे मेवे और मिठाई होती हैं, जबकि इसमें किताबें और मूर्तियां थीं।
यह एक तथ्य है कि बुद्ध की प्रतिमाएं दुनिया भर में बेची जा रही हैं। हालांकि जिस प्रकार श्रीलंका में बौद्ध विहार एक तीर्थ का स्थान ग्रहण कर रहे हैं वैसा भारत में नहीं हो रहा है। श्रीलंका के एक बड़े बौद्ध केंद्र कैंडी में भ्रमण के दौरान मैंने बौद्ध विहारों में संचालकों को भारी धनराशि की मांग करते हुए देखा। यहां तक कि प्रसिद्ध टूथ रेलिक टेंपल, जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि यहां गौतम बुद्ध का दांत रखा हुआ है, में बौद्ध महंत खुलकर दान-दक्षिणा मांग रहे थे। एक और स्थल जहां बुद्ध की साठ फुट ऊंची प्रतिमा एक पहाड़ी पर लगी हुई है, उसमें चढ़ने के लिए पचास रुपये का भुगतान करना पड़ता है। शहर में जगह-जगह बुद्ध की प्रतिमाएं बौद्ध पंथ के व्यवसायीकरण की कहानी कह रही हैं।
नागपुर में दीक्षा भूमि पर आयोजित इस मेले में विभिन्न संगठनों ने भी भाग लिया। इन संगठनों ने अनेक जनसभाएं कीं। उनके विमर्श का मुख्य बिंदु बौद्ध चिंतन और अनुसूचित जातियों की वर्तमान दशा था। आजकल देखने में आ रहा है कि अनुसूचित जातियां खुद अपने संसाधनों से इस प्रकार के आयोजन करती हैं। इसी प्रकार दुनिया भर में फैले दलित धम्मचकपावतन पर्व मना रहे हैं। खासतौर से इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा आदि देशों में काफी संख्या में बौद्ध विहारों की स्थापना की जा चुकी है। उन्होंने भारत में बौद्ध विहार की स्थापना के लिए भी धन भेजना शुरू कर दिया है। पंजाब और महाराष्ट्र इस प्रकार की भारी सहायता प्राप्त कर रहे हैं, क्योंकि इन दोनों राज्यों से ही भारी संख्या में दलित दुनिया के अलग-अलग भागों में गए हैं। मेले के समापन पर युवा स्वयंसेवकों ने अनोखा आयोजन किया। उन्होंने ताबीज, धागे जैसे वाह्यं पंथिक स्मृति चिह्नंों को जलाया। स्वयंसेवकों ने मेले में शामिल लोगों को समझा-बुझा कर उनसे ये चिह्नं एकत्र किए। उन्होंने बताया कि इन प्रतीक चिह्नंों से अंधविश्वास फैलता है। जिन लोगों ने उनके कहने पर ये चिह्नं उन्हें नहीं सौंपे उनके चिह्नं जबरन छीन लिए गए। स्वयंसेवकों का मानना था कि ताबीज जैसी चीजें गौतम बुद्ध की शिक्षा के खिलाफ हैं। बुद्ध ने आप: दीपो भव: की शिक्षा दी थी, जिसका अर्थ है खुद ही दीपक बनो यानी अपने अंदर ज्ञान का संचार करो। बाबासाहेब का मानना था कि समाज में सामाजिक नियंत्रण के लिए कानून ही काफी नहीं है। सामाजिक नियंत्रण के लिए कानून से परे जाना होगा और उन्हें इसका जवाब बौद्ध दर्शन में मिला। यह हैरत की बात है कि अंबडेकर के अनुयायियों की इस पूरी कवायद की राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया में चर्चा नहींहुई।
[विवेक कुमार : लेखक जेएनयू में प्राध्यापक हैं]