सदा-सदा से मनुष्य चाहता है कि जीवन में सहजता, आनंद एवं निश्िचतता बनी रहे। वह जीवन की निरंतरता चाहता है, अमरता का वरदान चाहता है। पुरातन काल से ही मनुष्य इसी खोज में लगा है। इसके लिए हमारे ऋषियों, मनीषियों एवं संतों ने जाना कि चिरआनंद पाने का एकमात्र उपाय है परमात्म-प्राप्ति। परमात्मा ही है सच्चिदानंद अर्थात् सत-चित् एवं आनंद स्वरूप। अत: परमात्म-प्राप्ति ही मानव जीवन का एकमात्र लक्ष्य बताया गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य में सर्वप्रथम दृढ़ लगन होनी चाहिए। उसे जिज्ञासु होना चाहिए। अब इस मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए आवश्यकता है एक सद्गुरु की। सद्गुरु ऐसा जो स्वयं परमात्मा को पाए हो एवं शिष्य को उसके लक्ष्य तक पहुंचाने की क्षमता रखता हो। साधना में आगे बढ़ने के लिए साधक को चाहिए गुरु कृपा एवं परमात्म कृपा।
परमात्मा की कृपा से सद्गुरु मिलते है एवं सद्गुरु की कृपा से परमात्मा का ज्ञान होता है। सद्गुरु की शरण में पहुंच जाने पर वे साधक को उसकी रुचि अनुसार भक्ति, योग अथवा ज्ञान मार्ग से साधना का मार्गदर्शन करते है। भक्ति में प्रभु के नाम व रूप का स्मरण एवं प्रभु से प्रेम पर विशेष बल देना है। प्रभु की भक्ति व अनन्य प्रेम से कण-कण में प्रभु ही दिखाई देते है, जिससे साधक सभी जीवों से प्रेम करने लगता है। प्रभु प्रेम में मगन भक्त प्रभु को पा लेता है। ज्ञानमार्ग है प्रभु को जानना, प्रभु के स्वरूप को जानकर उनकी प्राप्ति। ज्ञानमार्ग के मुख्य साधन हैं हमारे वेदांत। वेदांत का स्वाध्याय एवं वेदांती गुरु के वचनों का श्रवण-मनन एवं निधिध्यासन द्वारा प्रभु का साक्षात्कार। इन तीनों मार्गो का समन्वय ही साधक के लिए श्रेयस्कर है। वस्तुत: तीनों मार्ग एक ही है एवं उस एक परमात्मा की प्राप्ति कराते है। ज्ञान का फल है वह स्थिति जब 'जानत तुम्हहिं, तुम्हहिं होई जाई' मात्र चेतन। अत: हमें वर्तमान जीवन में ही आत्मज्ञान द्वारा परमात्मा की प्राप्ति कर जीवन सफल बनाना चाहिए। परमात्मा की प्राप्ति के पूर्व स्वयं को जानना अति आवश्यक है कि हम क्यों जन्मे है। साथ ही कुछ ऐसा कर जाएं जिससे हमारा जीवन सार्थक हो सके। अर्थात मानव होने का अर्थ जानना होगा, तभी हममें प्रभु प्राप्ति की पात्रता अर्जित होगी।
[आचार्य दिनेश कुमार]