आसान नहीं होगी यह पारी

 
Nov 02, 10:58 pm

हरियाणा ने अपनी कमान फिर से भूपेंद्र सिंह हुड्डा के हाथों में सौंप दी है। पांच साल के शासन के बाद अगर कोई राज्य या देश किसी राजनेता को दोबारा सत्ता में आने का मौका देता है तो यह ऐसे ही नहीं होता है। जाहिर है, हरियाणा की जनता ने हुड्डा के काम करने का तरीका पसंद किया है और वह उन्हें इस योग्य मानती है। तभी उसने उन्हें दोबारा सत्ता में आने का मौका दिया है। हालांकि यह तथ्य भी नजरअंदाज किए जाने लायक नहीं है कि इस बार विधानसभा में उनकी पार्टी का आकार सिमट गया है। हुड्डा ने सरकार जरूर बना ली है, लेकिन विपक्ष ज्यादा मजबूत होकर उभरा है। ऐसी स्थिति में यह पारी उनके लिए पिछली बार की तरह आसान नहीं होगी। हालांकि लोकतांत्रिक मूल्यों के हिसाब से देखें तो यह एक अच्छी स्थिति है। लोकतांत्रिक व्यवस्था सही ढंग से तभी चलती है जब विपक्ष मजबूत होता है। विपक्ष कमजोर होने की स्थिति में लोकतांत्रिक ढंग से सत्ता में आया शासक भी कई बार तानाशाहीपूर्ण रवैया अपना लेता है। भारतीय लोकतंत्र का तो यह अपना अनुभव भी है। सच तो यह है कि ऐसे ही अनुभवों ने भारतीय लोकतंत्र को परिपक्व बनाया है और उसकी परिपक्वता का यही असर अब चुनाव बाद के परिणामों पर दिखाई दे रहा है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि हुड्डा ने अपने पिछले कार्यकाल में हरियाणा के बहुमुखी विकास के लिए पूरे मनोयोग से प्रयास किए हैं। शिक्षा हो या चिकित्सा, कृषि हो या उद्योग हर क्षेत्र के लिए उन्होंने सुविधाएं जुटाने और हर क्षेत्र को आगे बढ़ाने के लिए सारी कोशिशें की हैं। हुड्डा ने जबसे हरियाणा की कमान संभाली है तब से लेकर अब तक उनका पूरा ध्यान सिर्फ विकास को गति देने पर ही रहा है। उनका यह कहना गलत नहीं है कि राज्य के लोगों ने विकास और शांति के लिए ही कांग्रेस को जनादेश दिया है। वे ऐसा भी मानते हैं कि विकास के लिए वे अभी भी पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। मुख्यमंत्री का पदभार दूसरी बार संभालने के बाद उन्होंने जनता से फिर कुछ वादे किए हैं। इन वादों में सबसे पहले तो उन्होंने शिक्षा को ही तरजीह दी है। उन्होंने मेवात में मेडिकल कॉलेज, महेंद्रगढ़ में सेंट्रल यूनिवर्सिटी और गुड़गांव में डिफेंस यूनिवर्सिटी बनाने का वादा किया है। हालांकि ये वादे कोई नए नहीं हैं, पर यह भी सही है कि ये दो-चार दिन में होने वाले काम भी नहीं हैं। ऐसे बड़े कार्यो में वक्त तो लगता ही है और वह लगेगा भी।

हालांकि हुड्डा ने अभी भी इस कार्य के लिए कोई अवधि निश्चित नहीं की है, पर अगर वे इस कार्य में सफल होते हैं तो यह वास्तव में राज्य के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। हरियाणा ही नहीं, दूसरे राज्यों के छात्रों को भी इससे लाभ मिलेगा और देश तो इनसे निकली प्रतिभाओं से लाभान्वित होगा ही। लेकिन उन्हें इस बात का खयाल भी रखना चाहिए कि किसी भी काम को अनंतकाल तक के लिए टाला नहीं जा सकता। जनता सिर्फ इतना जानकर संतुष्ट नहीं हो जाती कि आप उसे क्या देंगे। वह यह भी जानना चाहती है कि जो कुछ भी देंगे वह कब तक दे देंगे। आपकी सरकार की एक डेडलाइन तय है। यह सही है कि बहुत सारे कार्य ऐसे हैं जो उस डेडलाइन के भीतर नहीं हो सकते हैं, लेकिन यह इतना बड़ा काम भी नहीं है जो उसके भीतर न हो सके। साथ ही, यह बात वह पिछली सरकार के दौर से ही सुनती आ रही है। जाहिर है, जनता चाहती है कि सरकार जो सपना उसे दिखा रही है, उसे अपने इसी कार्यकाल में साकार भी कर दे। अगर इस कार्यकाल में सरकार उसे साकार न कर सकी तो जनता की याद्दाश्त इतनी कमजोर भी नहीं है कि उसे वह अगले कार्यकाल तक भूल जाए।

मुख्यमंत्री यह भी कह रहे हैं कि सन् 2011 तक राज्य में बिजली की कमी दूर हो जाएगी। हालांकि इस बात में कुछ नया नहीं है। वे पहले भी यह बात कह चुके हैं और अब फिर कह रहे हैं। फिर भी यह एक अच्छी बात है कि वे एक निश्चित समय बता रहे हैं। यह जनता के लिए संतोषजनक बात है। दूसरी तरफ, किसानों के संदर्भ में मामला फिर वही अनिश्चितता का ही है। दादूपुर-नहर का काम तो चल ही रहा है, लेकिन इसमें पानी आना कब तक शुरू होगा, इस बारे में अभी कुछ भी तय नहीं है। साथ ही, यह बात भी ध्यान रखने की है कि इसका एक सीमित दायरा होगा, जबकि हरियाणा में सिंचाई की समस्या कई इलाकों में है। आखिर उन इलाकों का क्या होगा, जो इस नहर के दायरे से बाहर होंगे? इसमें कोई दो राय नहीं है कि किसानों की स्थिति हरियाणा में भी देश के बाकी हिस्सों से कुछ खास बेहतर नहीं है। हुड्डा से यह उम्मीद की जाती है कि वे किसानों की बेहतरी की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाएं।

समझा जाता है कि भूपेंद्र सिंह हुड्डा एक शरीफ राजनेता हैं। हालांकि पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद शुरुआती दौर में उनकी शराफत कुछ दिनों तक उन पर भारी पड़ी थी। सच तो यह है कि उनकी शराफत का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ा था और इसका पूरा लाभ उठाया था अफसरशाही ने। लेकिन यह बात हुड्डा ने बहुत जल्दी समझी और उसी हिसाब से उन्होंने खुद को बदला भी। बाद में इसका असर भी दिखा। यही वजह है कि राज्य में वे दोबारा सत्ता हासिल कर सके।

अब फिर उन्हें अपने वादों के लिए कृतसंकल्प होना पड़ेगा और साथ ही इस बात के लिए भी कि वादे समय से पूरे किए जा सकें। इसके लिए उन्हें कई बार कड़ा रुख अपनाना पड़ सकता है। इसके अलावा एक बहुत बड़ी समस्या महंगाई भी है। भले ही यह समस्या अकेले हरियाणा की नहीं, पूरे देश की है। इसके बावजूद जनता यह तो चाहती ही है कि उसके राज्य की सरकार उसका खयाल रखे। सभी जरूरी चीजों के दाम जिस तरह से बढ़ रहे हैं और जिस तरह चीजें जनता की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं, उसके लिए सरकार को कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा।

सच तो यह है कि हुड्डा के लिए यह नई पारी उतनी आसान नहीं है जैसी कि पिछली पारी थी। पिछली बार उनके सामने एक कमजोर विपक्ष था, जबकि इस बार एक मजबूत विपक्ष है और सामने ओमप्रकाश चौटाला जैसा मंजा हुआ राजनेता है। मामूली चूक भी सरकार के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। अगर इन खतरों से बचना है तो इस बार उन्हें सभी मोर्चो पर सफल होना होगा। यह अच्छी बात है कि ये वही मोर्चे हैं जिन पर वे पहले से ही जूझ रहे हैं। पर अब सिर्फ जूझने से काम नहीं चलेगा। सरकारों को जूझते हुए तो जनता पिछले साठ वर्षो से देख रही है। अब तक जितनी सरकारें आई सबका यही कहना रहा है कि वे सभी तरह की समस्याओं के समाधान के लिए पूरे जी-जान से जुटी हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि बहुत समस्याओं का समाधान हुआ भी है, लेकिन इसके बावजूद आम आदमी की स्थिति में आज भी बहुत फर्क नहीं आया है। अगर सचमुच ईमानदारी से ये प्रयास किए गए होते तो शायद स्थितियां दूसरी होतीं। आम आदमी अब स्थितियों में बदलाव चाहता है, राजनेताओं को इस बात का खयाल रखना पड़ेगा।

[निशिकान्त ठाकुर : लेखक दैनिक जागरण के स्थानीय संपादक है]




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