
भारत दुनिया भर में छिड़ी बहस के केंद्र में आ गया है कि कानून के शासन की रक्षा के लिए किसी राष्ट्र को किस हद तक बल प्रयोग का सहारा लेना चाहिए। यह सवाल इसलिए उठा है कि नक्सली देश के लगभग छठवें भाग पर अपना नियंत्रण स्थापित कर चुके हैं और वहां नागरिक प्रशासन विफल हो चुका है। उनके नियंत्रण वाले क्षेत्र को लाल गलियारे की संज्ञा दी जा रही है। केंद्र सरकार अपनी सत्ता को मिली चुनौती के बारे में देर से सजग हुई है। नक्सलियों ने साठ के दशक के अंत में अपना एक राजनीतिक दल भी गठित किया था। उसी समय चीन के साथ समस्याओं की शुरुआत हुई थी।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने औपचारिक तौर पर 2004 में राज्य के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी थी। तब से यह हिंसा की छिटपुट घटनाओं को अंजाम दे रही थी। आज पश्चिम बंगाल, झारखंड, उड़ीसा और किसी हद तक आंध्र प्रदेश में छापामार युद्ध इतना सशक्त हो चुका है कि नक्सलियों ने राज्य से खुलेआम दो-दो हाथ करने का मन बना लिया है। उन्होंने इसी सप्ताह पश्चिम बंगाल में राजधानी एक्सप्रेस को कई घंटे रोके रखा। कुछ दिन पूर्व नक्सलियों ने पश्चिम बंगाल पुलिस के एक प्रभारी अधिकारी को अपनी पकड़ से रिहा किया तो उसकी छाती पर बड़े अक्षरों से अंकित एक कागज चिपका दिया था। ये अक्षर थे पीओडब्लू अर्थात युद्धबंदी की रिहाई। यह उनका केंद्र सरकार को जवाब था, जिसने उनसे हथियार डाले बिना, हिंसा त्यागकर बातचीत आरंभ करने का आह्वान किया था। लोकतांत्रिक समाज माओवादियों के तरीकों का घोर विरोधी है, जो अहिंसा के विचार को नकारते हैं, किंतु समाज उनकी इस मांग से सहमत है कि देश के बहुसंख्यक लोगों की जीवन स्थितियों में सुधार होना चाहिए। देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद के 22 प्रतिशत पर 20 प्रतिशत औद्योगिक घरानों का नियंत्रण है। आर्थिक मामलों में समाज का समर्थन नक्सलियों की ताकत में बदल रहा है। अपहृत ट्रेन में सफर कर रहे ज्यादातर लोग नक्सलियों के विरोध प्रदर्शन से प्रभावित हुए और उन्होंने ऐसा कहा भी। शांतिपूर्ण तरीकों का यह प्रयोग एक तरह से उनके द्वारा दिया गया संदेश ही था कि वे हिंसा का अंधाधुंध इस्तेमाल नहीं करते। देश को सशस्त्र क्रांति द्वारा मुक्त कराना और निर्धनता का उन्मूलन करना, दोनों मुद्दे सर्वथा भिन्न हैं। नक्सलियों ने दोनों मुद्दों को मिला दिया है। इनमें से एक बंदूक के इस्तेमाल से संबद्ध है और दूसरा विकास से। यह कहना बिल्कुल सही है कि विभिन्न सत्तारुढ़ दल संविधान में निर्दिष्ट सिद्धांतों के क्रियान्वयन में असफल रहे हैं। साथ ही यह भी समान रूप से सही है कि लोकतंत्र लोगों को कानून-व्यवस्था के पालन को कहता है, हिंसा के लिए नहीं। यह नक्सली विचारधारा बार-बार नकारी जा चुकी है कि सत्ता बंदूक की गोली से निकलती है। सशस्त्र क्रांति राष्ट्र के लोकाचार के अनुरूप नहीं है, भले ही लोकतांत्रिक उपाय कितने भी निराशाजनक क्यों न हों।
नक्सलियों की यह सोच गलत है कि वे देश के छठे भाग को मुक्त करा चुके हैं। नि:संदेह उन्होंने आदिवासियों से बेहतर व्यवहार किया है, परंतु इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि आदिवासी नक्सलियों की बंदूकों से भयभीत हैं। राज्य का तंत्र आदिवासियों को न तो आजीविका सुलभ करा पाता है और न ही उनके राष्ट्रीय संसाधनों को बचा पा रहा है, जिन्हें सेज सृजित कर बेचा जा रहा है।
दरअसल, नक्सली जो संदेश देने का प्रयास कर रहे हैं उससे बुद्धिजीवियों का अभिमत उनके विरुद्ध होता जा रहा है। गोली मतपेटी का स्थान नहीं ले सकती। यदि ऐसा है तो राज्य के पास असीमित गोलियां हैं और वे ही युद्ध का फैसला करेंगी और मात्र राज्य ही क्यों? अन्य लोग भी बंदूकें थाम सकते हैं। वस्तुत: छोटे पैमाने पर देश के कुछ भागों में तो ऐसा हो भी रहा है। नक्सली इस सिद्धांत को ही पुष्ट कर रहे हैं कि ताकतवर ही अस्तित्व बचा सकते हैं। पूंजीवाद भी तो यही प्रवचन देता है कि आर्थिक क्षेत्र में कमजोर को समाप्त होना पड़ता है।
नक्सलियों से लड़ रही केंद्र सरकार खुद ही ज्यादतियां कर रही है। इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं। पूर्वाेत्तर तो ऐसे उदाहरणों से अटा पड़ा है। आदिवासियों के विरुद्ध एक लाख मामलों को वापस लेने से पता चलता है कि पुलिस ने मामूली चोरी तथा लकड़ी की कटाई जैसे मामलों में किस कदर सख्त रुख अपनाया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने नक्सलियों को रिझाने के लिए जिन महिलाओं के खिलाफ केस वापस किए हैं उनकी संख्या मात्र 75 है।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान हंगरी में हुई क्रांति में हल्की-फुल्की हिंसा ही हुई थी। राष्ट्रवाद ने उस आंदोलन का नक्शा ही बदल दिया था। भारत में महात्मा गांधी ने क्रांतिकारियों की वीरता की प्रशंसा की और फांसी के फंदे पर झूलने वाले भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को सराहा था, किंतु उनके तरीकों से वह सहमत नहीं थे। हमारे समक्ष सिख उग्रवाद का इतिहास भी है जो एक दशक तक चला। यह तब खत्म हुआ जब लोग उनके खिलाफ खड़े हो गए जो निर्दोषों की हत्या कर रहे थे।
कुछ खास क्षेत्रों में नक्सलियों ने आदिवासियों और अन्य लोगों का समर्थन जुटा लिया है, क्योंकि उन पर अत्याचार हो रहे हैं और उन्हें उनकी भूमि से जबरन बेदखल किया जा रहा है। वे लोग असहाय हैं। नक्सलियों के अलावा किसी ने भी उनकी सुधि नहीं ली। जब आदिवासियों की पत्िनयों को जमींदार उठा ले जाते हैं, उनके साथ दुष्कर्म करते हैं और आदिवासियों द्वारा उन्हें छोड़ने की गुहार अनसुनी कर दी जाती है तो इसके बाद क्या अपेक्षा रखी जा सकती है!
अधिकांश आदिवासी इलाकों में ऐसे ही हालात हैं। ऐसे अत्याचारों के विरुद्ध नक्सलियों द्वारा आवाज उठाने पर तो किसी को आपत्ति नहीं हो सकती, किंतु उनके द्वारा जो तरीका अपनाया जाता है उस पर एतराज है। हिंसा के इस्तेमाल से उन्हें एक सीमित क्षेत्र में अस्थायी विजय मिल सकती है, किंतु यह क्रांति तो नहीं है और न ही यह मार्क्सवादी विचारधारा के आसपास है, जो न्याय के लिए खोज है। दो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने भी कहा है कि नक्सली वामपंथी नहीं हैं यद्यपि ये दोनों पार्टियां स्टालिन की प्रशंसक हैं, जिसने लाखों निरीह लोगों की हत्या कराई थी। विचारधारा से तात्पर्य ताकत से अथवा बिना चुनावों के सत्ता में आने की आकांक्षा से नहीं लिया जाना चाहिए। इसके लिए जनसमर्थन जुटाना अपेक्षित है। जब हिंसा का सहारा लिया जाता है तो न्याय का उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
भारत में हिंसा के कारण हालात बेकाबू हो सकते हैं। इसका परिणाम दक्षिणपंथी तानाशाही या भारत के विखंडन के रूप में सामने आ सकता है। प्रणाली में बदलाव का अतिरेक नहीं होना चाहिए। जब स्वतंत्रता के 62 वर्षो के बाद भी दो-तिहाई लोग गरीब हैं तो राज्य व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन अपरिहार्य हो गया है। प्रश्न यही है कि यह बदलाव बैलेट बाक्स से आए या बुलेट से। सच है कि बैलट बाक्स से कुछ खास नहीं हो पाया, परंतु इसके लिए दोषी उदारवादी हैं। उन्हें 1977 में एक अवसर मिला था, जब जयप्रकाश ने परिवर्तन के उद्घोष पर कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में हराया था। यह वास्तविक क्रांति थी। जो इसे करने में सफल रहे थे उन्होंने ही उस अवसर को गंवा दिया।
[कुलदीप नैयर: लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं]