
कोठारी आयोग (1964-66) ने सभी के लिए माध्यमिक शिक्षा की संस्तुति की थी। उस समय देश प्रारंभिक शिक्षा के सर्वव्यापीकरण से बहुत दूर था। अनेक लोगों को वह विचार क्रांतिकारी लगा था जबकि कुछ ने इसे असंभव बताया था। प्रोफेसर कोठारी तथा जेपी नायक जैसे उनके वरिष्ठ सहयोगी पैनी दूरदृष्टि रखने वाले उच्च स्तर के शिक्षाविद थे। प्रोफेसर कोठारी जैसा वैज्ञानिक ही अधिकारपूर्वक कह सका कि कक्षा 10 तक सभी लड़के और लड़किया विज्ञान तथा गणित पढ़ें। आज उसके सुखद परिणाम हमारे सामने हैं। पचास साल पहले तक यह माना जाता था कि लड़किया विज्ञान और गणित में प्रवीण नहीं हो सकतीं। ये विषय उनके लिए कठिन हैं।
माध्यमिक स्तर तक 'कार्य अनुभव' की संस्तुति भी कोठारी आयोग ने की थी। दुर्भाग्य से अनुभव की यह संस्तुति अंक आधारित परीक्षा प्रणाली में खो गई या केवल रस्म निबाहने तक सिमट गई। अपेक्षा यह थी कि शिक्षा बच्चों के सर्वागीण विकास में सहायक हो। मस्तिष्क, हाथ तथा हृदय तीनों को समेकित रूप से परिष्कृत किया जाए। पूरे विश्व में शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन कभी भी आसान नहीं रहा है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। जो देश गांव-गांव घर-घर हस्तकला-दस्तकारी की परंपरागत प्रवीणता तथा कुटीर उत्पादों के लिए विश्व में विख्यात था, आज उसी के युवा हाथ पर हाथ धरे काम यानी 'नौकरी' पाने की प्रतीक्षा करते हैं। यह संख्या करोड़ों में है। प्रति वर्ष भारत की 'कार्यकारी जनसंख्या' में एक करोड़ बीस लाख नए लोग जुड़ते हैं। इनमें से केवल तीन प्रतिशत ऐसे हैं, जिन्हें कार्य अनुभव का उपयुक्त तथा उपयोगी प्रशिक्षण मिला होता है। विकसित देशों में यह प्रतिशत 60 से 80 तक है। वहां ऐसे लोग भी हस्तशिल्प में प्रशिक्षित होते हैं, जो भले ही कोई ऐसा कार्य कर रहे हों जहां कार्य अनुभव का सीधा उपयोग न हो, मगर आवश्यकता पड़ने पर वह उनके काम आता है। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है। कक्षा 11 तथा 12 में व्यावसायिक प्रशिक्षण देने पर अकसर चर्चा होती है। 1968 की शिक्षा नीति में इसे बड़े पैमाने पर लागू करने का निर्णय लिया गया था। दस वषरें में उच्चतर माध्यमिक स्तर के 25 प्रतिशत स्कूलों को वोकेशनल स्कूलों में बदला जाना था। आज भी यह संख्या पांच प्रतिशत के आस-पास ही है। इधर, पिछले 2-3 वषरें से इस समस्या को पुन: निरखा-परखा जा रहा है। सन 2008 में 'नेशनल काउंसिल फार स्किल डेवलपमेंट' स्थापित करने की घोषणा हुई थी।
इसके अतिरिक्त भारत सरकार ने माध्यमिक शिक्षा का सार्वजनीकरण करने का निर्णय भी लिया था। इसका सीधा प्रभाव उच्चतर माध्यमिक शिक्षा के व्यावसायीकरण पर भी पड़ेगा। इस समय स्कूलों के बाहर कौशल सीखने के अवसर आईटीआई तथा पोलीटेक्नीक संस्थाओं में उपलब्ध हैं। पिछले दो दशकों से इन दोनों स्तरों के संस्थानों के आधुनिकीकरण के प्रयास होते रहे हैं। 2007 में केंद्र सरकार ने कुल 1900 आईटीआई में से 1400 को उच्चस्तरीय बनाने का निर्णय लिया। यह कार्य 'पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप' के अंतर्गत होना था किंतु इस योजना का भी प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हुआ। सरकारी आकड़ों तथा दस्तावेजों में तो हर तरफ प्रगति दिखाई देती है किंतु सरकारी तंत्र से सहयोग कर उसे गतिशीलता देना प्राइवेट सेक्टर को भी लोहे के चने चबाने के समान लगता है। हमारी शिक्षा व्यवस्था में गुणवत्ता का अभाव चिंता का विषय बना हुआ है। कार्य अनुभव प्रशिक्षण में अनेक पक्ष अतिरिक्त रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उत्पादन केंद्रों से संपर्क, आसपास के इलाकों में कार्य अनुभव में निपुण छात्रों की उपलब्धता, परंपरागत कौशलों का सर्वेक्षण तथा उनके उपयोग की संभावनाएं, प्रशिक्षकों की उपलब्धता आदि घटक महत्वपूर्ण हैं। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है कि कोई एक कौशल सीखकर जीवनपर्यंत उसी पर निर्भर बने रहने का समय समाप्त हो गया है।
देश में जब एसटीडी टेलीफोन बूथ खुले तो लाखों युवाओं को जीवनयापन का सम्मानजनक उपाय मिला। आज मोबाइल की सर्वसुलभता ने स्थिति बदल दी है। अत: लगातार नए कौशल सीखने या सीखे गए कौशल को समयानुकूल नवीनीकरण की व्यवस्था आवश्यक है और युवाओं को इसके लिए तैयार करना भी जरूरी है। कई बार विकासशील देश अपने देश की जानकारी भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रतिवेदनों से लेते हैं। उन्हें अधिक विश्वसनीय माना जाता है। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के अनुसार जो बच्चे भारत में कक्षा एक में प्रवेश लेते हैं, उनमें से साठ प्रतिशत से कम ही कक्षा आठ तक की शिक्षा पूरी करते हैं। स्कूलों के हालात सब जानते हैं। माध्यमिक शिक्षा में नामाकन लेने वालों का प्रतिशत केवल 52 के आसपास है। यानी केवल आधे बच्चे ही माध्यमिक शिक्षा में प्रवेश लेते हैं। इसे बढ़ाना तथा साथ ही गुणवत्ता और कौशल सीखने का प्रबंध करना सरल कार्य नहीं है।
पड़ोसी देश चीन में कक्षा नौ में 91 प्रतिशत नामाकन है। वहा व्यवस्था ने ग्राम समितियों को उत्तरदायित्व दिए, अधिकार दिए तथा स्थानीय कौशलों को सीखना प्रारंभ से अनिवार्य कर दिया। सिखाने के लिए स्थानीय विशेषज्ञों की सेवाएं ली गईं। ऐसा करने के अधिकार भी स्थानीय स्तर पर विकेंद्रित किए गए। प्रारंभिक शिक्षा का मौलिक अधिकार बनने के बाद यदि कक्षा एक से आठ तक कार्य अनुभव को महत्ता दी जा सके और स्थानीय जानकारी का उपयोग किया जाए तो माध्यमिक तथा उच्चतर माध्यमिक स्तर पर शिक्षा के व्यावसायीकरण के लिए उचित पृष्ठभूमि तथा माहौल बन सकता है। ऐसा अवसर आगे शायद ही उपलब्ध हो सके। इस समय बड़े परिवर्तन की संभावना स्पष्ट दिखाई दे रही है। शिक्षा में किसी भी बड़े तथा उपयोगी सुधार की आधारभूमि तो स्कूलों में ही बनेगी। कार्य अनुभव तथा व्यवसायिक शिक्षा को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
[जगमोहन सिंह राजपूत: लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं]