अमेरिका में 2008 से जिस आर्थिक संकट की शुरुआत हुई थी, वह 1930 की महामंदी के बाद सबसे बड़ा आर्थिक संकट है। इस संकट ने वैश्विक स्तर पर बाजारों पर प्रतिकूल प्रभाव तो डाला ही, बैंकों व वित्तीय संस्थाओं को भी आघात पहुंचाया। अमेरिका से शुरू हुए इस आर्थिक संकट ने पूरे विश्व को प्रभावित किया है। विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में अमेरिका का 25 प्रतिशत योगदान है। वैश्विक आर्थिक संकट के बारे में भारत के प्रधानमंत्री का विचार है कि विकासशील देश इससे ज्यादा प्रभावित हुए हैं जबकि इस संकट के लिए वे ज्यादा जिम्मेदार नहीं हैं। इसका सीधा प्रभाव उनकी विकास दर पर पड़ा है। इससे 4 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं। सरकारों के राजस्व में भी भारी कमी आई है, जिससे मूलभूत ढांचा, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में निवेश के लिए धन जुटाना कठिन हो रहा है। अर्थव्यवस्था में सुधार जारी रखने के लिए चार तरह की रणनीतियों का सुझाव दिया गया है। इनमें प्रोत्साहन पैकेज को जारी रखना, गिरते निर्यात के दुष्प्रभाव की भरपाई के लिए मूलभूत ढांचा क्षेत्र में निवेश बढ़ाना, विश्व बैंक का पुनर्पंजीकरण करना और संरक्षणवादी नीतियों को पूरी तरह समाप्त करना शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुख्य अर्थशास्त्री ओलिवियर ब्लान का कहना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार के जो संकेत दिखाई पड़ रहे हैं, उन्हें परिणाम में बदलने के लिए आवश्यक है कि संतुलन और संवर्द्धन नीतियों में समन्वय स्थापित किया जाए। उन्होंने कहा है कि प्रोत्साहन पैकेज को अभी वापस न लिया जाए, वरना सुधार की गाड़ी पटरी से उतर सकती है। इस बात की भी चर्चा की गई कि नीतिगत हस्तक्षेप द्वारा मांग में वृद्धि हुई है और अनिश्चितता का दौर समाप्त हुआ है। उन्होने इस बात पर भी बल दिया कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुन: पटरी पर लाने के लिए कुछ एशियाई मुद्राओं का मूल्य बढ़ाना आवश्यकता है। इस बारे में चीन पर दबाव है कि वह अपने पूर्ण नियंत्रित युवान का मूल्य बढ़ाए। परंतु चीन ऐसा नहीं कर रहा है क्योंकि इस कदम से उसका विदेशी व्यापार लाभ कम हो जाएगा।
विश्व बैंक के अध्यक्ष राबर्ट जोलिक ने संतोष प्रकट किया है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के ध्वस्त होने की संभावना टल गई है, किंतु इससे पूरी तरह उबरने में अभी समय लगेगा। जहां तक भारत में मंदी के प्रभाव का प्रश्न है, उसमें सुधार के स्पष्ट संकेत दिखाई दे रहे हैं। उदाहरण के लिए अगस्त 2009 में औद्योगिक उत्पादन में 10.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं निर्माण क्षेत्र में अपेक्षा से अधिक विकास हुआ है।
भारत जर्मन ट्रेड ग्रुप के मुख्य प्रतिनिधि बनाई स्टिनरूकी के अनुसार चीन की तुलना में भारत मंदी का मुकाबला अच्छी तरह से इसलिए कर पाया है क्योंकि भारत के कुल जीडीपी में निर्यात क्षेत्र का योगदान कम है जबकि चीन एक निर्यात प्रमुख देश है। फिच रेटिंग्स के ब्रिडान काल्टन के अनुसार वैश्विक आर्थिक संकट में सुधार के स्पष्ट संकेत दिखाई पड़ रहे हैं, चाहे वित्तीय बाजार हों या स्टाक मार्केट। वर्तमान मंदी की तुलना 1930 की महामंदी से नहीं की जा सकती। इस मंदी से निपटने के लिए अनेक उपाय किए जा रहे हैं, जिनके सार्थक परिणाम सामने आ रहे हैं। महामंदी के समय दो बड़ी चूक हुई थीं- बैंकिंग प्रणाली का असफल होना और मुद्रा आपूर्ति पर रोक लगाना। इसके विपरीत वर्तमान मंदी में ऐसे उपाय किए जा रहे हैं, जिनसे वित्तीय प्रणाली को कोई चोट न पहुंचे और साथ ही अर्थव्यवस्था के विकास की गति को पुन: वापस लाया जा सके। भारत में मंदी में सुधार को अर्थवान तभी कहा जा सकता है जब नौकरियां बहाल की जाएं, वेतन में कटौती समाप्त की जाए और नई भर्तियां शुरू की जाएं। अमेरिका में पिछली चार तिमाही से नकारात्मक चल रही वार्षिक वृद्धि दर में जुलाई-सितंबर 2009 तिमाही में 3.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसके बावजूद चिंता के स्वर सुनाई पड़ रहे हैं। कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि जब रोजगार घट रहे हैं तो यह वृद्धि दर बढ़ती उत्पादकता का ही परिणाम है। बैंक आफ टोक्यो के अर्थशास्त्री क्रिस रूपकी के अनुसार यह प्रोत्साहन पैकेजों के कारण संभव हुआ है। परंतु सबसे बड़ी चुनौती लगभग एक करोड़ पचास लाख बेकार बैठे अमेरिकी लोगों को रोजगार देना है।
विकसित देशों जैसे अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान का भारत के निर्यात में योगदान 62 प्रतिशत है। इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी आउटसोर्सिग के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। इसलिए इन देशों में आर्थिक सुधार का सकारात्मक प्रभाव भारत पर पड़ेगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सुधार के संकेत तो अच्छे हैं, परंतु किसी प्रकार की शिथिलता की गुंजाइश नहीं है।
[राजेंद्र सिंह: लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं]