उदारता

उदारता एक दैवीय गुण है। जो देव देने में जितना ही अधिक उदार है वह उतना ही पूज्य है। शिवजी की सहज उदारता कभी-कभी स्वयं उनके लिए ही विकट समस्या का कारण बनी है, फिर भी इसके लिए न तो वे कभी चिंतित दिखे और न ही पछताते। यह उनकी महानता का महान कारक है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम की उदारता किसे नहीं लुभाती है। अपनी उदार प्रकृति के कारण ही वे भक्तों के भगवान हैं, निर्बल के बल, दीनों के बंधु और नाथ हैं। देने की साम‌र्थ्य और निष्काम भावना ही व्यक्ति को सुदेव बनाती है।

देवोपासना इसीलिए की जाती है, क्योंकि वे अपने उपासकों को मनवांक्षित वरदान देते रहते हैं। वरदान के कारण ही लोग आराधक देवों एवं देवियों की आराधना करते हैं। सारी मनौतियां देवों की उदारता का ही परिणाम हैं। अर्चक गण अपनी छोटी से छोटी समस्याओं के समाधान, रोगों के निदान, संकटों से छुटकारा व मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए देवों को प्रसन्न करने के लिए मनौतियां मानते, पूजा एवं अनुष्ठान करवाते हैं। उन्हें अपने देवताओं की उदारता पर विश्वास रहता है। उदारता आधारित यह विश्वास ही पाषाण-प्रतिमाओं को निर्वाक् एवं निस्पंद होते हुए भी उपासकों की दृष्टि में प्राणवान एवं सर्वशक्तिमान बनाता है। लोकाचार में वही मूर्तियां एवं देव सिद्ध मानकर पूजे जाते हैं जो अपने द्वार पर आने वाले हर अभिलाषी की इच्छा पूर्ण करने में उदारता दिखलाते हैं। अनुदारों की पूजा कहीं नहीं होती है। प्रत्येक युग का इतिहास साक्षी है कि उदार मना ही पूज्य हुए हैं। उदारता एवं दान में देह और प्राण जैसा पारस्परिक संबंध है। प्राण के अभाव में देह शव होती है। उसी प्रकार उदारता के न होने पर दान के लिए हाथ उठ नहीं सकते और दान की भावना न होने पर उदारता के भ्रूण की हत्या हो जाती है। उदार व्यक्ति ही दानी हो सकता है और दानार्थ उसके हाथ सदैव तत्पर रहते हैं। दान के भाव उदार व्यक्ति के ही हृदय में जन्म लेते हैं। महापुरुषों ने उदारता को बहुमूल्य मानवीय आभूषण एवं अनुकरणीय आचरण बताया है। दान, क्षमा, सेवा आदि सद्गुणों की जननी उदारता ही है।

[वेदप्रकाश मिश्र]

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