
नई दिल्ली। अंतिम गेंद तक हार न मानने का जज्बा चोट और दर्द को दरकिनार करके मैदान पर उतरने की हिम्मत और अकेले मैच का रुख बदलने की कुव्वत के दम पर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्पिनरों में शुमार अनिल कुंबले के संन्यास के साथ ही भारतीय क्रिकेट के इतिहास के एक सुनहरे अध्याय का अंत हो गया।
जिस फिरोजशाह कोटला में 1992 में ईरानी ट्राफी मैच में शानदार प्रदर्शन करके कुंबले ने भारतीय टीम में अपनी जगह पक्की की और जिस मैदान पर 1999 [पाकिस्तान के खिलाफ] में उन्होंने परफेक्ट टेन का कारनामा दिखाया उसी मैदान पर इस महान लेग स्पिनर ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ तीसरे टेस्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट को अलविदा कहने की घोषणा करके स्टेडियम में मौजूद प्रत्येक व्यक्ति को भावुक कर दिया।
वीवीएस लक्ष्मण ने मैच के पांचवें दिन जब अर्धशतक पूरा किया तो पवेलियन की तरफ इशारा करके अपना दायां हाथ घुमाया। उनका संकेत साफ था कि पारी समाप्त घोषित करके कुंबले कुछ ओवर गेंदबाजी करने के लिए आएं और कुछ देर बाद जब वह मैदान में उतरे तो सभी भारतीय खिलाड़ियों ने कतार बनाकर उनका स्वागत और दर्शकों ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया।
जंबो के नाम से मशहूर कुंबले ने 18 साल के अपने अंतरराष्ट्रीय कैरियर में शायद ही कभी मैदान पर आपा खोया हो। टीम मुश्किल में हो तो उनके मजबूत जबडे़ जरूर भिंच जाते हैं। मगर मैदान की हर गुत्थी को उन्होंने हमेशा हौसले और ठंडे दिमाग से सुलझाने की कोशिश की। गजब की जीवट के मालिक रहे हैं कुंबले। पिछले शुक्रवार को अपने आखिरी टेस्ट के तीसरे दिन उनके बाएं हाथ में चोट लग गई और पूरे 11 टांके लगवाने पड़े लेकिन अगले दिन कुंबले पट्टी बांधे मुस्कराते हुए मैदान पर हाजिर थे और उन्होंने तीन विकेट भी लिए। 2002 में एंटीगुआ में जबडे़ में फ्रैक्चर की वजह से पट्टी लगी होने के बावजूद उन्होंने वेस्टइंडीज के बल्लेबाजों को जिस तरह घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया उसे भुलाना मुमकिन नहीं है।
बेशक पिछले कुछ अरसे में श्रीलंका, दक्षिण अफ्रीका और अब आस्ट्रेलिया के खिलाफ कुंबले की धार बुझती नजर आई लेकिन लग रहा था कि कुंबले अपने जीवट के सहारे इस खराब दौर से बाहर निकल आएंगे और उन क्रिकेट पंडितों को करारा जवाब देंगे जो उनके संन्यास की मांग करने लगे थे। अपने आदर्श भागवत चंद्रशेखर की तरह ही दाहिने हाथ के स्पिनर कुंबले भी गेंद को हवा में लहराने के बजाए उसे पिच से रफ्तार देने में माहिर माने जाते हैं। उन्होंने गुगली को अपना मुख्य हथियार बनाया और श्रीलंका के मुथैया मुरलीधरन और आस्ट्रेलिया के शेन वार्न के बाद दुनिया के सबसे कामयाब टेस्ट गेंदबाज बन गए।
किसी बल्लेबाज के लिए टूटती हुई पिच पर कुंबले का सामना करने से ज्यादा मुश्किल कुछ भी नहीं है। वह 132 टेस्टों के अपने कैरियर में 619 विकेट लेते हुए कई ऐतिहासिक जीतों के नायक बने। कुंबले ने 271 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैचों में 337 विकेट लिए। उन्होंने कई मौकों पर सफल नाइटवाचमैन के रूप में अपनी भूमिका निभाने के साथ-साथ उपयोगी बल्लेबाजी भी की और 2506 टेस्ट और 938 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय रन भी बनाए। जंबो को भारतीय टेस्ट टीम की कमान पिछले साल पाकिस्तान के खिलाफ सीरीज में राहुल द्रविड़ की जगह सौंपी गई थी। उनके नाम एक टेस्ट शतक भी दर्ज है जो उन्होंने ओवल में इंग्लैंड के खिलाफ बनाया था। यह शतक इस मायने में भी खास है क्योंकि इस टेस्ट सीरीज में शतक लगाने वाले वे एकमात्र भारतीय बल्लेबाज भी थे।
गेंदबाजी का लगभग हर भारतीय रिकार्ड अपने नाम दर्ज करा चुके कुंबले टीम के सबसे अनुशासित खिलाड़ियों में रहे। कुंबले ने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास का फैसला उस ऐतिहासिक फीरोजशाह कोटला में किया जहां उन्होंने 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ टेस्ट में एक पारी के सभी 10 विकेट लिए थे। इस मैदान पर कुंबले का प्रदर्शन खास तौर से शानदार रहा है और यहां उन्होंने सात टेस्ट खेलते हुए 58 विकेट लिए हैं।
मैच समाप्त होने के बाद कुंबले के बचपन के दोस्त राहुल द्रविड़ समेत टीम इंडिया के अन्य साथियों ने उन्हें कंधे पर उठाकर पूरे स्टेडियम का चक्कर लगाया। कुंबले इसके बाद ड्रेसिग रूम में चले गए और जब पुरस्कार समारोह के लिए लौटे तो उनकी पत्नी और बच्चे भी साथ में थे।
सौरव गांगुली के बाद कुंबले की संन्यास की घोषणा के साथ ही भारतीय क्रिकेट टीम बदलाव के एक नए दौर में कदम रख रही है। गांगुली नागपुर में आस्ट्रेलिया के खिलाफ मौजूदा सीरीज के आखिरी टेस्ट के बाद टीम से हटेंगे मगर कुंबले इस मैच में नहीं होंगे। कुंबले भले ही अब मैदान में नजर नहीं आएंगे लेकिन उनकी जीवटता और संघर्ष करने का बेमिसाल जज्बा क्रिकेटप्रेमियों के ह्दय में निरंतर बने रहेंगे।