नई दिल्ली। वीरेंद्र सहवाग या महेंद्र सिंह धौनी की बेफिक्र बल्लेबाजी किसी और से नहीं बल्कि पूर्व भारतीय कप्तान और महान आलराउंडर कपिल देव से प्रभावित रही है जिन्हें भारत में इस तरह की बल्लेबाजी का जनक कहा जाता है।
जिम्बाब्वे के खिलाफ विश्व कप 1983 में टांटन में खेली गई उनकी 175 रन की पारी या फिर 1990 में एडी हेमिंग्स पर लगातार चार छक्के जमाकर फालोआन बचाने का कारनामा हो कपिल की अमूमन पारियों में यह बेफिक्र अंदाज दिखता रहा जिसके कारण उन्हें कई बार सस्ते में अपना विकेट भी गंवाना पड़ा। उन्होंने 131 टेस्ट मैच में 5248 रन बनाए और 434 विकेट लिए जबकि 225 वनडे में 3783 रन और 253 विकेट हासिल किए। बल्लेबाजी में उत्साह और उमंग भरने वाले कपिल छह जनवरी को अपने जीवन का अर्धशतक पूरा कर रहे है लेकिन उन्होंने पूरी सादगी के साथ 50वां जन्मदिन मनाने की योजना बनाई है। भारत के विश्व विजेता कप्तान ने कहा, 'कल मेरा कोई खास कार्यक्रम नहीं है। हमेशा की तरह इस बार भी सादगी के साथ ही जन्मदिन मनाऊंगा। जन्मदिन मनाना बच्चों का काम होता है।'
सदी के सर्वश्रेष्ठ भारतीय क्रिकेटर चुने गए कपिल इसके साथ ही जन्मदिन पर मीडिया को एक नेक सलाह भी दी। उन्होंने कहा, 'मेरा मानना है कि आप लोगों को बीते जमाने के क्रिकेटरों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय युवा प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को आगे बढ़ाना चाहिए।' कपिल का जन्म छह जनवरी 1959 को चंडीगढ़ में एक खत्री परिवार में हुआ। उन्होंने मशहूर कोच देशप्रेम आजाद से क्रिकेट के गुर सीखे और जब 1975-76 में हरियाणा की तरफ से पंजाब के खिलाफ रणजी ट्राफी में पदार्पण किया तो पहली पारी में ही 39 रन पर छह विकेट चटका दिए। इसके बाद उन्होंने बंगाल के खिलाफ 20 रन पर सात विकेट लिए।
तब तक कपिल की बल्लेबाजी को लेकर कोई भी गंभीर नहीं था लेकिन पाकिस्तान में टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण करने के बाद कराची में उन्होंने 48 गेंद पर 59 रन बनाकर जतला दिया था कि भारत को एक अदद आलराउंडर मिल चुका है। उन्होंने भारत में तेज गेंदबाजी को नया स्वरूप दिया। इसी के बाद देश में तेजी गेंदबाजी को गंभीरता से लिया जाने लगा और आज जहीर खान, ईशांत शर्मा, मुनफ पटेल, आरपी सिंह, एस श्रीसंथ और इरफान पठान जैसे गेंदबाजों की मौजूदगी में भारत इस विभाग में पहले की तरह कमजोर नहीं रहा।
कपिल के दौर में इयान बाथम, इमरान खान और रिचर्ड हैडली जैसे आलराउंडर भी खेला करते थे। अधिकतर विशेषज्ञों का मानना है कि इनमें से कपिल और बाथम ऐसे थे जो अपनी बल्लेबाजी के दम पर भी किसी एकादश में जगह बना सकते थे। उन्होंने अपने शुरुआती दौर में ही वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरीज में 65.80 की औसत से 329 रन बनाए थे जिसमें दिल्ली में बनाए गए नाबाद 126 रन भी शामिल हैं। उन्होंने सबसे कम उम्र 21 साल 27 दिन में 100 विकेट और 1000 रन का डबल बनाया था। यही नहीं टेस्ट क्रिकेट में 5000 रन और 400 विकेट लेने वाले वह अकेले खिलाड़ी हैं।
मशहूर क्रिकेट लेखक सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी के अनुसार 'कपिल की बल्लेबाजी में हमेशा बेफिक्री झलकती थी। किसी तरह का कोई तनाव, दबाव, डर या हिचकिचाहट कभी उनके चेहरे पर नजर नहीं आई।' कपिल ने अपनी बल्लेबाजी का जलवा 1982 में इंग्लैंड के खिलाफ भी दिखाया जबकि उन्होंने सीरीज में सुनील गावस्कर से भी अधिक 318 रन बनाए। जिसमें कानपुर में बनाया गया शतक [116] भी शामिल है। इस सीरीज में उन्होंने 22 विकेट भी लिए। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड दौरे में 41, 89, 65 और 97 रन बनाए।
विश्व कप में जिम्बाब्वे के खिलाफ 175 रन की उनकी पारी को भला कौन भूल सकता है। उन्होंने यह पारी तब खेली थी जब भारत ने पांच विकेट 17 रन पर गंवा दिए थे। उन्होंने इसके बाद भी टेस्ट और एक दिवसीय मैचों में कई बेहतरीन पारियां खेली। क्रिकेट का मक्का लार्ड्स कपिल के लिए हमेशा यादगार मैदान रहा। उन्होंने 1983 में इसी मैदान पर भारत को विश्व चैंपियन बनाया था। इसी मैदान पर 1986 में उनकी कप्तानी में भारत ने इंग्लैंड को हराया था और इसी मैदान पर उन्होंने हेमिंग्स पर लगातार चार छक्के जड़ने का रिकार्ड बनाया था। उन्होंने टेस्ट कैरियर में 61 छक्के लगाए। सहवाग ने हाल में उनका यह भारतीय रिकार्ड तोड़ा।
कपिल में खेल भावना भी कूट-कूट कर भरी थी। विश्व कप 1987 में आस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच में विरोधी टीम का स्कोर 268 रन था लेकिन बाद में अंपायरों ने कहा कि एक छक्के को चौका दिया गया था। कपिल मान गए और स्कोर 270 रन हो गया। भारत ने मैच में 269 रन बनाए। तब रिपोर्टो में कहा गया था कि कपिल की खेल भावना करीबी मैच में निर्णायक साबित हुई।