शेरा की खुराक से सरकार अवाक

 
Nov 06, 10:50 pm

नई दिल्ली। महज 331 दिन बाकी, तैयारियां आधी-अधूरी मगर आयोजन पर खर्च में ढाई साल के भीतर लगभग तीन गुना वृद्धि! शेरा की खुराक से सरकार अवाक है। दिल्ली कामनवेल्थ खेल अभी एक साल दूर हैं, मगर खर्च का आंकड़ा मेलबर्न कामनवेल्थ खेलों पर हुए कुल खर्च को पार कर रहा है।

स्टेडियमों, सड़कों के निर्माण से लेकर आयोजन समिति के खर्च तक लगभग हर जगह बढ़ता बजट सरकार के गले में फंस गया है। केंद्र सरकार को डर है कि इस आयोजन का बजट 15,000 करोड़ रुपये से ऊपर निकल सकता है। यानी अगले साल अक्टूबर में जब दिल्ली, ग्लासगो को कामनवेल्थ का झंडा सौंप रही होगी तब खेलों के इस दस दिनी उत्सव का प्रत्येक दिन करीब 1500 करोड़ रुपये की कीमत का होगा। आयोजन के खर्च पर केंद्रीय मंत्रिमंडल यूं ही असहज नहीं हुआ है।

आयोजन का बजट ढाई साल में करीब 3600 करोड़ रुपये से बढ़ कर 12,888 करोड़ रुपये पर जा पहुंचा है और बढ़ना जारी है। 2006 की कतर एशियाड समिति के आंकड़ों के मुताबिक आयोजन पर 2.8 अरब डालर [करीब 13000 करोड़ रुपये] खर्च हुए थे और मेलबर्न खेल फाइनेंस कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक आयोजन पर कुल खर्च 2.9 अरब डालर था। ध्यान रहे कि कामनवेल्थ खेल, एशियाई खेलों से छोटा आयोजन है। इसके बावजूद दिल्ली कामनवेल्थ खेल के बजट का ताजा आंकड़ा 2006 के कतर एशियाड और मेलबर्न कामनवेल्थ पर हुए खर्च को टक्कर दे रहा है।

संसद का सत्र सामने है और केंद्रीय मंत्रियों को यह सवाल उभरते दिख रहे हैं कि इतने खर्च के बावजूद स्टेडियम तैयार होने की तारीख मार्च तक क्यों बढ़ा दी गई और हर काम समय से बहुत-बहुत पीछे क्यों है। पिछले दो माह में सरकार खेलों के लिए करीब 1300 करोड़ रुपये का बजट मंजूर कर चुकी है। उलझन यह है कि खेलों का कुल बजट 2009-10 में केंद्र सरकार के योजना खर्च के पांच फीसदी के बराबर हो गया है। केंद्र सरकार को चिंता है बजट बढ़ाने का यह सिलसिला आगे जाएगा और नाक व साख बचाने के लिए उसे आवंटन बढ़ाने पड़ेंगे। संकेत हैं आने वाले कुछ माह में सरकार को स्टेडियमों के निर्माण के लिए आवंटन बढ़ाना पड़ सकता है। कुल बजट का 40 फीसदी हिस्सा स्टेडियमों के निर्माण पर जा रहा है। दिल्ली सरकार व दिल्ली के बुनियादी ढांचे से जुड़ी एजेंसियों के लिए खजाना खुलने में देर नहीं है।

दिल्ली सरकार ने इसके लिए मांग शुरू कर दी है। इधर आयोजन समिति का खर्च बढ़ाने पर मोहर लग ही चुकी है। ध्यान रहे कि खेलों के बजट का जो आंकड़ा दिया जा रहा है उसमें दिल्ली मेट्रो, एयरपोर्ट अथारिटी, आईटीडीसी और कई दूसरी एजेंसियों का खर्च शामिल नहीं है। इसे जोड़ने के बाद सरकार की उलझन दोगुनी हो जाती है।

देरी क्यों हुई? खर्च क्यों बढ़ा?

नई दिल्ली। खर्च जितना बढ़ रहा है, तैयारियों में देरी को लेकर सरकार उतने ही पेचीदा सवालों में घिर रही है। सरकार के लिए देरी को जायज ठहराना मुश्किल है क्योंकि मेजबानी नवंबर 2003 में मिल गई थी। इसलिए गुरुवार को कैबिनेट बैठक में जब बजट में वृद्धि का प्रस्ताव आया तो कई मंत्रियों को बात हजम नहीं हुई।

दरअसल ओलंपिक, एशियाड और कामनवेल्थ जैसे आयोजनों की तैयारी की योजना सात साल की होती है। इसलिए मेजबानों का चुनाव काफी पहले हो जाता है। सीजीएफ की समिति 2018 के कामनवेल्थ खेलों के मेजबान का चुनाव अगले साल कर कर लेगी। दिल्ली में हाल में हुई बैठक में इसकी निविदाएं आ गई हैं।

भारत ने खेल के लिए समझौते पर दस्तखत नवंबर 2003 में किए, मगर तैयारियां शुरू हुई 2007 में। इसलिए काम पिछड़ना तय था और फिर साख बचाने के लिए पैसा बहाया जाना भी लाजिमी। जल्द ही इस सवाल का जवाब तलाशना होगा कि तैयारियों में देरी कितनी स्वभाविक थी और कितनी कृत्रिम? सरकार के भीतर इस सवाल से मुठभेड़ शुरू हो गई है।




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