तू गंगा की मौज

 
Oct 26, 05:57 pm

गंगा को नदी के किनारे या घाट से देखना उसे उसकी धार में बहते हुए देखने से बिलकुल अलग है। जीवन वही है, जीवनधारा भी वही.. बस निगाहों का फर्क आ जाता है। उस फर्क से ही मानो एक नई तस्वीर बेपरदा हो जाती है।

हाल ही में रिब एक्सपेडिशंस के गोमुख से गंगासागर तक अभियान में कुछ दिन की शिरकत का मौका मिला। यह अभियान अलग था क्योंकि किसी सैलानी की तरह यह क्रूज नहीं था। न ही यह बडी नावों पर था। यह अभियान गंगा पर जीने का था, छोटी सी नावों में जिन्हें पंप से हवा भरकर फुलाया जाता है। जिनमें धूप या पानी से बचने का कोई इंतजाम भी नहीं होता। जिन्हें कम पानी में नदी में उतरकर धकेला भी जा सकता है, जैसे हम दिल्ली में बीच सडक पर खराब हो गई ब्लू लाइन बस को धक्का लगाते हैं और पानी हो तो इंजन की मदद से वाटर स्कूटर की तरह सरपट दौडाया भी जा सकता है।

बीच में कहीं किनारे लगाकर फुर्सत पा ली जाती है। भूख लगी तो या तो नदिया किनारे किसी गांव में कुछ खा लिया या फिर मौका लगा तो कुछ पका लिया। उसका इंतजाम जो साथ में कर रखा था। सूरज ढलने पर इन नावों के साथ पानी में रास्ता खोजना मुश्किल है, इसलिए अंधेरा होने से पहले रुकने का बंदोबस्त जरूरी है। नावें साथ होती हैं, इसलिए किनारे से परे जाकर नहीं रुका जा सकता। नावों व सामान की हिफाजत के लिहाज से आबादी वाले इलाके में भी रुकना मुश्किल होता है। इसलिए आम तौर पर किसी निर्जन स्थान पर कैंप लगाना सबसे बेहतर विकल्प था। इसके लिए यह भी जरूरी होता था कि सुरक्षित, छह-सात टेंट लगाने के लिए समतल जमीन व थोडा खुला इलाका मिल जाए। सूरज नीचे उतरने को होता था तो निगाहें किसी माफिक जगह की तलाश में लग जाती थीं। लेकिन गंगा की धारा में ऐसी जगहों की कोई कमी नहीं। किनारे तो हैं हीं, लेकिन आप गंगा को छोडना न चाहें तो गंगा में कई रेतीले द्वीप भी मिल जाएंगे। उनकी रेत, छोटी-छोटी झाडियां और निर्जनता कैंपिंग के बिलकुल उपयुक्त हैं, बशर्ते आपके पास अपनी जरूरत का सारा सामान हो।

ऐसे एक्सपेडिशन में कैंपिंग भी कोई आसान काम नहीं। जगह ढूंढकर नावें किनारे करनी होती हैं। रोज शाम को कैंपिंग करते वक्त नावों को खाली करना होता है और अगले दिन सवेरे चलते वक्त कैंप समेटकर सारा सामान फिर से नावों में रखना होता है। खासी कवायद है। नावें खाली करके किनारे पर थोडा ऊपर खींच ली जाती हैं ताकि रात में नदी में पानी बढे तो कहीं नावें बह न जाएं। कैंप में कुछ लोग टेंट लगाने में जुटते हैं तो कुछ सूखी लकडियां इकट्ठी करने में ताकि खाना पकाया जा सके। शाम का बाकी समय खाना पकाने, खाने, दिनभर के भीगे कपडों को दुरुस्त करने, सामान सहेजने और दिनभर के सफर का मूल्यांकन करने में बीतता है। एंडी लीमैन सरीखे टीम लीडर सफर की बारीकियों को समझाने का कोई मौका नहीं चूकते।

लेकिन असली चुनौती बैराज या बांध पार करने की होती है। दुनिया के कई देशों के विपरीत भारत में इस तरह के नियम नहीं हैं कि किसी बांध या बैराज का निर्माण किए जाते वक्त नावों व जलपरिवहन के लिए एक चैनल छोडा जाए। लिहाजा भारत में आप किसी नदी में निर्बाध बहना चाहें तो आपके लिए यह मुमकिन नहीं। अभियान के लिए यह सबसे बडी चुनौती रही। शुरुआत पहले ही दिन बिजनौर से और दो दिन बाद नरोरा से हुई। चूंकि नाव पर बैठे-बैठे बांध या बैराज करने का कोई तरीका नहीं, इसलिए बैराज से ठीक पहले किसी किनारे माफिक जगह देखकर पहले नाव का सारा सामान खाली किया जाता है, उसे किनारे चढाया जाता है। फिर नाव का इंजन खोलकर उसे ऊपर लाया जाता है और अंत में नाव को ही खींचकर किनारे लाया जाता है। यह प्रक्रिया तीनों नावों के साथ हुई। अब यह सारा सामान जमीन के रास्ते बैराज पारकर दूसरी तरफ धारा में जगह ढूंढकर उतारा जाता है। पहले नाव, फिर इंजन और अंत में सारा सामान। यह खासी मशक्कत का काम है।

इस सारे अभियान के पीछे कई कारण थे- गंगा की सांस्कृतिक विरासत को समझना, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक प्रवाह में इंसानी दखल के चलते धारा पर हो रहे असर को जानना और विशुद्ध सैलानी नजरिये से गंगा को देखना। जैसा कि मैंने पहले ही कहा, गंगा की संस्कृति को समझना किनारे से और बात है और धारा में बहते हुए और बात। जलवायु परिवर्तन की चिंता सबसे बडी है। गोमुख में गंगोत्री ग्लेशियर लगातार पीछे खिसक रहा है तो नीचे बांधों व बैराजों ने नदी की सामान्य धारा को विलुप्त कर दिया है। हाल यह है कि हरिद्वार से चलने के थोडी ही देर बाद गंगा की मुख्य धारा में नाव बहना रुक जाती है क्योंकि इंजन का प्रोपेलर नीचे तलछट को छूने लगता है। यानी वहां दो फुट भी पानी गंगा में नहीं। यह हैरान करने वाली बात है लेकिन कानपुर तक यह सिलसिला चलता है। उसके बाद गंगा में पानी बढता है लेकिन उसमें अन्य नदियों के पानी के अलावा क्या-क्या आकर मिलता है- यह हम सबसे छिपी हुई बात नहीं। लेकिन ऊपर नाव के अटकने पर या तो उसे चप्पू से खेना होता है या फिर पानी में उतरकर उसे धक्का देना होता है जब तक कि वह इंजन चलने लायक गहरे पानी में न पहुंच जाए।

एक प्रकृति प्रेमी के नजरिये से भी गंगा में देखने व आनंद लेने को बहुत कुछ है। डॉल्फिन गंगा का सबसे बडा आकर्षण है। दुनिया में गंगा के अलावा केवल तीन नदियों- एमेजन, यांगत्जे और सिंधु में ही डॉल्फिन मिलती हैं। बाकी सभी तरह की डॉल्फिन खारे पानी की हैं। मीठे पानी की डॉल्फिनों की सबसे ज्यादा संख्या भी दुनिया में गंगा में ही है लेकिन इसमें भी तेजी से गिरावट आ रही है। कभी इनकी संख्या छह हजार से ज्यादा थी जो अब घट कर दो हजार से भी नीचे आ गई हैं। गंगा डॉल्फिन के नाम से पहचानी जानी वाली डॉल्फिन सात राज्यों में मिलती है- असम, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल। गंगा के अलावा चंबल, कोसी, सोन, घाघरा, गंडक, ब्रह्मपुत्र वगैरह में डॉल्फिन देखने को मिल जाती हैं। बिजनौर से नरोरा तक दो दिन में हमें कई डॉल्फिन देखने को मिलीं। नीचे वाराणसी से पटना तक भी बडी संख्या में डॉल्फिन हैं। डॉल्फिन को अपने आसपास पानी में उछाल मारते देखना बडा रोमांचक है और उसका फोटो खींचना उतना ही मुश्किल क्योंकि वह इतनी तेजी से फिर पानी में घुस जाती है कि अक्सर आपका कैमरा डॉल्फिन की चपलता को मात नहीं दे पाता।

गंगा के परिंदे भी उतने ही अद्भुत हैं। नदी में बहते हुए ही आप ज्यादातर परिंदे देख सकते हैं जो किनारे से देखना मुमकिन नहीं। कई प्रवासी पक्षी तो नदी के बीच में बने छोटे-छोटे द्वीपों को ही अपना अड्डा बनाते हैं। गंगा में तीन सौ से ज्यादा किस्म के पक्षी दिखाई देते हैं जिनमें से कई दुर्लभ और कुछ तो लुप्तप्राय हो चले हैं। इसके अलावा गंगा में कई दुर्लभ कछुए (टर्टल) मिलते हैं। रेतीले द्वीपों के किनारे आपको बडी संख्या में कछुए बैठे मिल जाएंगे। भारत में कछुओं की ज्यादातर प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। चंबल के किनारे टर्टल सर्वाइवल अलायंस कई प्रजातियों को बचाने में लगा हुआ है।

गंगा की अहमियत को अक्सर हम केवल गंगाजल तक सीमित कर देते हैं। वह उससे कहीं आगे हमारी संस्कृति व प्रकृति की भी जीवनधारा है, जिसे हम अक्सर भुला देते हैं या केवल अपने मतलब के लिए इस्तेमाल करते हैं। गंगा को देखें, उसमें घूमें और उसे समझें- एक घुमक्कड की आंखों से। उसमें बहुत लुत्फ है।

उपेंद्र स्वामी




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