लिएंडर पेस का कालम
भारत के लिए अभी तक के सबसे सफल ओलंपिक में मिली उपलब्धियों ने मुझे गौरवान्वित कर दिया है। सुशील और विजेंदर कुमार के पदक ओलंपिक में अपने देश का प्रतिनिधित्व करने के लिए की गई उनकी कड़ी मेहनत का परिणाम हैं।
कुश्ती में सुशील कुमार का कांस्य विशेष रहा, आखिरकार अपने सबसे पुराने खेलों में से एक में पदक जीतना किसे अच्छा नहीं लगेगा। ये प्राचीन खेल भारत विशेषकर गांवों में काफी लोकप्रिय है। यहीं वजह है कि इस खेल के अखाड़े भारत भर में कहीं भी देखे जा सकते हैं, विशेष रूप से उत्तर भारत में। इस सफलता ने दिखा दिया है कि भारत के युवा अपने देखे सपनों को पूरा करने का दम भी रखते हैं। निशानेबाजी और टेनिस जैसे खेल महंगे उपकरणों की मांग करते हैं जबकि मुक्केबाजी और कुश्ती के लिए सिर्फ और सिर्फ हौसला चाहिए होता है जो हमने दिखाया कि हमारे पास है। हमारे मुक्केबाजों की सफलता सचमुच रोमांचित करने वाली है।
पांच में से तीन मुक्केबाजों का क्वार्टर फाइनल में पहुंचना वास्तव में बड़ी बात है। इससे भारत में ओलंपिक खेलों को निश्चित ही नए आयाम मिलेंगे। इन मुक्केबाजों की सफलता के लिए इनके साथ गए सहायक स्टाफ की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। ये सुविधाएं काफी फर्क पैदा करती हैं। मेरे समय में ये सुविधाएं नहीं थी। तब मुझे महसूस होता था कि एक अच्छा फिजियो और ट्रेनर किसी एथलीट को जीतने के लिए किस तरह तैयार करते हैं।
अब समय आ गया है कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे जूनियर स्तर से ही गंभीर खेलों की तरफ ध्यान दें ताकि ओलंपिक खेलों में इन प्रतिभाओं का इस्तेमाल किया जा सके। मुझे उम्मीद है कि अगले ओलंपिक खेलों में हम तीन से ज्यादा पदक लेकर आएंगे।