(स्टीव ओवेट की कलम से)
ओलंपिक हमेशा खिलाडि़यों को बेहतर प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करता है। बीजिंग में भी ऐसा ही हुआ है। अमेरिका के माइकल फेल्प्स ने ऐतिहासिक आठ स्वर्ण जीते जिसमें से सात में उन्होंने विश्व रिकार्ड बनाए। उन्हें 1972 में म्यूनिख में जीते मार्क स्पिट्ज के सात स्वर्ण पदकों से प्रेरणा मिली। पिछले एथेंस ओलंपिक में सिर्फ छह स्वर्ण पदक जीतकर वह संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने बीजिंग में अपनी स्वर्ण पदकों की भूख मिटाई।
एक ही सपना लेकर चार साल तक की गई कड़ी मेहनत ने रंग दिखाया और उसका परिणाम सबके सामने है। बीजिंग में अन्य प्रमुख प्रदर्शन जमैका के उसेन बोल्ट का रहा जिन्होंने सौ मीटर में विश्व रिकार्ड रचकर अन्य प्रतिद्वंद्वियों को उम्मीद से ज्यादा पीछे छोड़ दिया। वह तीन स्वर्ण पदक जीत सकते हैं। मगर मैं इसको लेकर बेहद उत्साहित हूं कि कोई जेसी ओवंस और कार्ल लुइस के एक ओलंपिक में चार स्वर्ण के रिकार्ड को तोड़ने के बारे में सोचे। मुझे उम्मीद है कि अगले लंदन ओलंपिक में कोई उनके अंदर यह उमंग भरेगा। बोल्ट ऐसा कर सकते हैं वह काफी युवा हैं और उनमें क्षमता है। वह सौ मीटर, दो सौ मीटर, 400 मीटर, 4&100 और 4&400 मीटर को अपना लक्ष्य बना सकते हैं।
अपने कैरियर के बारे में बात करूं तो लोग कहते थे कि मैं मध्यम दूरी का चैंपियन नहीं बन सकता क्योंकि मैं अफ्रीकी नहीं था जिनका इस स्पर्धा में दबदबा रहता है। इसी चुनौती ने मुझे प्रेरित किया कि मैं कड़ी मेहनत करूं। मुझे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में बरसों लगे। आप जो हासिल करना चाहते हो पहले यह विश्वास पैदा करो कि आप कर सकते हो और फिर लक्ष्य प्राप्ति में लग जाओ। जब मैं मास्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के बाद पदक मंच पर खड़ा था तो मैंने अपने आलोचकों को जवाब दे दिया था। यह मेरा संयम था जिसने मुझे विश्व रिकार्ड तोड़ने में मदद की और राष्ट्रकुल, यूरोपीय और ओलंपिक खिताब जीतने में मदद की।
(लेखक ब्रिटेन के पूर्व स्टार एथलीट रहे हैं।)
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