(परगट सिंह की कलम से)
अब वक्त आ गया है कि सभी की नजरें विश्व के सबसे बड़े खेल आयोजन पर आकर ठहर गई हैं। खेलों के इस महाकुंभ में मेरी शुभकामनाएं ओलंपिक में हिस्सा ले रहे भारतीय दल के साथ हैं। इस वक्त मुझे अपने कैरियर के दौरान ओलंपिक में बिताए गए वे महान क्षण भी याद आ रहे हैं जो मेरे लिए अनमोल हैं। मैं तीन बार ओलंपिक खेलों में हिस्सा ले चुका हूं, दो बार तो कप्तान के रूप में भी। इस दौरान हालांकि हमें हर बार निराशा ही हाथ लगी लेकिन हम सभी ने अपना सौ प्रतिशत दिया।
मुझे उम्मीद है कि बीजिंग ओलंपिक में हिस्सा ले रहे सभी भारतीय खिलाड़ी भारत के गौरव और सम्मान में बढ़ोतरी करते हुए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करेंगे। खेल में यही बात महत्व रखती है। बीजिंग के साथ भी मेरी पुरानी यादें जुड़ी हैं। तब मैंने यहां हुए एशियन खेलों में हिस्सा लिया था। ओलंपिक का हिस्सा होना किसी भी खिलाड़ी के लिए गौरव की बात है। यही वजह है कि ओलंपियन होने की अनुभूति से बढ़कर कुछ नहीं होता। मुझे आज भी याद है जब मुझे 1988 ओलंपिक के लिए चुनी गई भारतीय हाकी टीम में जगह मिली। इससे पहले मैंने गिनती के ही मैच खेले थे, लेकिन ओलंपिक इन सबसे अलग और खास था। ओलंपिक के दौरान खेल गांव में विश्व के महान खिलाडियों के बीच रहना अद्भुत अनुभव होता है।
तीन ओलंपिक में हिस्सा लेने के दौरान मैंने कई दोस्त बनाए। इनमें आस्ट्रेलिया, जर्मनी और हालैंड की हाकी टीम के दोस्त भी शामिल हैं। ये मेरे काफी करीब हैं, मैं जब भी इन देशों में जाता हूं तो ये मेरे मेजबान होते हैं। वहीं जब ये लोग भारत आते हैं तो मुझे भी इनका मेजबान बनने में खुशी होती है। ओलंपियन होने का गर्व हमेशा राहत देता है। मैं ऐसे कई एथलीटों को जानता हूं जिन्होंने अपने विजिटिंग कार्ड पर ओलंपियन लिखवा रखा है और इस बात को वह गर्व से बयां भी करते हैं। ओलंपिक का चार सालों में एक बार आना भी इसकी महत्ता दर्शाता है। खेल गांव और ओलंपिक के दौरान होने वाले पुरस्कार वितरण समारोह एक विशेष एनर्जी देते हैं, जो ओलंपिक को विशेष बनाते हैं।
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