(मानवजीत की कलम से)
ओलंपिक किसी भी खेल का उच्च स्तरीय मंच है। हर खिलाड़ी का एक लक्ष्य होता है कि वह अपना स्तर इन खेलों के उच्च स्तरीय मापदंड तक पहुंचाए क्योंकि इनमें हिस्सा लेने के लिए क्वालीफाई करना पड़ना था। चार साल में एक बार आने वाले खेल महाकुंभ का बड़ा महत्व होता है। आप बरसों इसके लिए मेहनत करते हो और फिर चंद दिनों में आपको अपना श्रेष्ठ देना होता है। मेरे लिए भी ओलंपिक बड़ा आकर्षण का केंद्र है।
हमेशा से इसमें भाग लेना मेरी ख्वाहिश रही है। मेरे पिता गुरबीर सिंह संधू भी ओलंपियन रहे हैं। मुझे उनसे बड़ी प्रेरणा मिलती है। परिवार और प्रायोजकों से बड़ी मदद के बावजूद इस स्तर पर श्रेष्ठ प्रदर्शन करना तो किसी भी खिलाड़ी को खुद ही करना पड़ता है। मैंने राष्ट्रीय, एशियाई और अब अंतरराष्ट्रीय स्तर सभी स्तर पर प्रतियोगिताओं में भाग लिया है। मेरा हमेशा से मानना रहा है कि मैं सबसे बेहतर कर सकता हूं। इस धारणा और विश्वास ने ही मुझे विश्व चैंपियन बनाया है।
खेल के प्रति समर्पण ने ओलंपिक के द्वार मेरे लिए खोले हैं। अब मैं अपनी स्पर्धा के महान खिलाडि़यों की चुनौतियों का सामना करने को तैयार हूं। यहां दुनिया के अन्य स्पर्धाओं के महान एथलीट भी जमा हैं जिनके साथ होना जीवन भर न भुलाने वाला अनुभव है। हार या जीत से परे बड़े खिलाडि़यों से दोस्ती होना भी बड़ी उपलब्धि है। ओलंपिक गांव में सबके एक साथ रहने का भी अलग महत्व है। मैं यहां तक बड़ी कोशिशों के बाद पहुंचा हूं। मुझे यकीन है कि अंत में मुझे इस बात का संतोष रहेगा कि मैंने अपना श्रेष्ठ करने का प्रयास किया। हमारी स्पर्धा शुरुआत में ही हो जाएगी उसके बाद में दुनिया के श्रेष्ठ खिलाडियों से मिलूंगा और जानने का प्रयास करूंगा कि वह अपने खेल में कैसे शीर्ष पर पहुंचे हैं और कैसे उन्होंने अपना स्तर इतना बढ़ाया। एक ओलंपियन के लिए यह जानने से बेहतर और क्या जिज्ञासा होगी।
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