(लिएंडर पेस की कलम से)
खेल मानवीय भिड़ंत का विशुद्ध स्वरूप है। इसमें वर्षो की कड़ी मेहनत आपको इनाम से नवाजती है अपनी संपूर्णता और पारदर्शिता के साथ। वस्तुत: ओलंपिक खेल का सबसे बड़ा मंच है जहां दुनिया भर के खिलाड़ी एक उद्देश्य को लेकर भाग लेते हैं। खेल गांव में कहीं कोई जिमनास्ट नजर आता है तो कभी कोई पहलवान या जूडोका। मैं पांचवीं बार ओलंपिक में हिस्सा ले रहा हूं। बरसों से यही सब दृश्य तो सामने आते रहे हैं पर नई शक्ल और नए स्वरूप के साथ।
विभिन्न संप्रदाय व प्रजाति के लोगों को एक मंच पर अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन करते देखता हूं तो यह खेल मुझे बार-बार प्रेरित करते हैं और अपार खुशी व उत्साह से भर देते हैं। खेल गांव में रहने वाले हर खिलाड़ी की अपनी एक दास्तां है। बरसों के कड़े प्रशिक्षण और बड़े त्याग के बाद कहीं जाकर सबसे बड़े पुरस्कार ओलंपिक स्वर्ण के लिए चुनौती देने की स्थिति बनती है। दुनिया विविधता भरी है लेकिन ओलंपिक में सभी पदक जीतने का एकसमान सपना लेकर उतरते हैं। खेल महाकुंभ वैश्वीकरण का एक उत्सव बन जाता है। पूरी दुनिया जैसे एक कुटुम्ब बन जाती है। बीजिंग ओलंपिक का नारा सही ही दिया गया है 'वन वर्ल्ड-वन ड्रीम'।
मैं अपने पांचवें ओलंपिक को यादगार बनाने का वायदा कर चुका हूं। यह मेरे लिए बड़े गौरव की बात है कि मैंने डबल ट्रैप रजत पदक विजेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़ की अगुवाई में ओलंपिक के उद्घाटन समारोह की मार्चपास्ट में हिस्सा लिया। राठौड़ वह शख्स हैं जिन्होंने एक व्यक्तिगत स्पर्धा में देश को गौरवपूर्ण क्षण उपलब्ध कराए हैं। निशानेबाजी ऐसी स्पर्धा है जिसमें गलत समय पर आई छींक भी आपको होड़ से बाहर कर सकती है। ओलंपिक किसी खिलाड़ी के कौशल, एकाग्रता और संयम की कड़ी परीक्षा होता है। कड़े प्रतिद्वंद्वियों के बीच आपको काफी आत्मबल की जरूरत होती है। इस मंच पर कोई उपलब्धि सिर्फ खिलाड़ी के लिए ही नहीं पूरे देश के लिए खुशी का सबब बन सकती है।
(टीसीएम)
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