अभिनव के समर्पण और जुनून ने दिलाया स्वर्ण   
 
 

(परगट सिंह की कलम से)


अभिनव बिंद्रा द्वारा जीता गया ओलंपिक स्वर्ण पदक ऐसी उपलब्धि है जो कभी-कभार ही देखने को मिलती है। इस क्षण का इंतजार सभी भारतीयों को सदी से था। अब जब ये ऐतिहासिक घटना घटित हो गई है तो इसका जश्न लंबे समय तक चलेगा। किसी भी खिलाड़ी का लक्ष्य अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में अच्छा प्रदर्शन करना होता है। एशियन और कामनवेल्थ गेम ऐसी ही प्रतियोगिताएं हैं लेकिन ओलंपिक इन सबसे बढ़कर है जिसमें हिस्सा लेना वास्तव में सुखद अनुभूति है। किसी भी स्तर पर पदक जीतना सिर्फ उस दिन का आपका अच्छा प्रदर्शन ही नहीं होता बल्कि यह दिखाता है कि उस खेल के लिए आपका जुनून ही है जो आपको सफलता का भूखा बनाता है।

अभिनव बिंद्रा अपने कारनामे की बदौलत छोटी सी उम्र में ही स्टार बन चुके हैं। अठ्ठारह साल की उम्र में ओलंपियन बन चुके अभिनव ने 26 साल की उम्र तक तीन ओलंपिक में हिस्सा ले लिया। खेल के प्रति उनका अनुशासन सुखद आश्चर्य में डालता है। इस बात में कोई संदेह नहीं है कि वे भविष्य में भारत के लिए कई और ओलंपिक में हिस्सा लेंगे। अपने लक्ष्य की प्राप्ति को लेकर उनका समर्पण और जुनून निश्चय ही भारत को कई और ओलंपिक पदक दिला सकता है।


भारतीय एथलीटों को अभी भी सफलता की दरकार है। एक वक्त था जब 1960 में मिल्खा सिंह ने रोम ओलंपिक में पदक तक का रास्ता तय किया था। 1976 में श्रीराम सिंह 110 मीटर हर्डल रेस के फाइनल में पहुंचे और सातवां स्थान प्राप्त किया। वहीं 1984 में पीटी ऊषा सेंकेंड के सौंवें हिस्से से पदक से चूक गई।

लिएंडर पेस द्वारा 1996 में टेनिस की व्यक्तिगत स्पर्धा में जीते गए कांस्य पदक ने कई और पदकों की नींव रख दी थी। लिएंडर की इस शुरुआत को 2000 सिडनी ओलंपिक में कर्णम मल्लेश्वरी ने भारोत्तोलन में कांस्य पदक जीतकर आगे बढ़ाया। वहीं 2004 में राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने डबल ट्रैप शूटिंग मुकाबले में रजत पदक जीतकर इस कड़ी को नया आयाम दिया।

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:: Jagran Olympic 2008 Medals Tally ::
पदक तालिका
क्रम संख्या देश सोना चांदी कांसा कुल
1 चीन 51 21 28 100
2 अमेरिका 36 38 36 110
3 रूस 23 21 28 72
4 ब्रिटेन 19 13 15 47
5 जर्मनी 16 10 15 41