भारत के यादगार लम्हे
खेलों के इस महाकुंभ में भारत ने पहली बार वर्ष 1900 में पेरिस में हुए दूसरे ओलंपिक में भाग लिया। इस ओलंपिक में भारत की ओर से सिर्फ एक एथलीट नार्मन प्रिचार्ड ने हिस्सा लिया। प्रिचार्ड हालांकि ब्रिटिश एथलीट थे लेकिन ब्रिटेन की टीम में जगह नहीं मिलने के कारण उन्हें भारत का प्रतिनिधित्व करने को कहा गया। प्रिचार्ड ने 200 मीटर की दौड़ और 200 मीटर की बाधा दौड़ में भारत को रजत पदक दिलाया। इसके बाद अगले तीन ओलंपिक में भारत को भाग लेने का मौका नहीं मिला जबकि 1916 में प्रथम विश्व युद्ध के कारण ओलंपिक का आयोजन नहीं हुआ। ओलंपिक खेलों में भारत की पुन: प्रविष्टि 1920 में बेल्जियम के शहर एंटवर्ट में आयोजित ओलंपिक से हुई। इसके बाद से भारत ने अब तक हुए सभी ग्रीष्म कालीन ओलंपिक खेलों में भाग लिया है। 1920 एंटवर्प ओलंपिक और 1924 पेरिस ओलंपिक में भारत को कोई पदक नहीं मिला।
हाकी ने दिलाई प्रतिष्ठा
ओलंपिक में स्वर्ण पदक का स्वाद भारत ने पहली बार 1928 में एम्सटर्डम में चखा। हालैंड की राजधानी में हुए इस ओलंपिक में भारत की पुरुष हाकी टीम ने फाइनल में मेजबान हालैंड को 3-0 से हराया। भारत की ओर से तीनों गोल हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद ने किए। ओलंपिक में भारतीय हाकी टीम की स्वर्णिम कामयाबी का सिलसिला 1956, मेलबर्न ओलंपिक तक निर्बाध रूप से चला। इस दरम्यान भारत ने लगातार छह स्वर्ण जीते। भारतीय हाकी टीम का विजय रथ 1960, रोम ओलंपिक में पाकिस्तान ने रोका। पाक टीम ने फाइनल में भारत को 1-0 से मात दी। फलस्वरूप भारत को रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा। हालांकि भारत ने अगले ही ओलंपिक (1964, रोम) में पाकिस्तान से उस हार का बदला चुकता कर लिया। फाइनल में भारत ने अपने परंपरागत प्रतिद्वंद्वी को 1-0 से मात दी। टोक्यो ओलंपिक के बाद 1968 मैक्सिको ओलंपिक और 1972 म्यूनिख ओलंपिक में भारतीय हाकी टीम को कांस्य पदक से ही संतोष करना पड़ा। 1968 में पाकिस्तान ने जबकि 1972 में पश्चिमी जर्मनी ने पुरुष हाकी का स्वर्ण जीता। इस तरह भारतीय पुरुष हाकी टीम ने ओलंपिक खेलों में देश को आठ स्वर्ण, एक रजत और दो कांस्य पदक दिलाए।
भारतीय हाकी ने खोई चमक
1976, मांट्रियल ओलंपिक में भारत कोई भी पदक जीतने में कामयाब नहीं हुआ। भारतीय हाकी टीम सातवें स्थान पर रही। यह 1924 पेरिस ओलंपिक के बाद पहला मौका था जब भारत एक भी पदक जीतने में कामयाब नहीं हो सका और इसी ओलंपिक के बाद से भारतीय हाकी की चमक फीकी पड़ने लगी। अलबत्ता भारतीय हाकी टीम ने 1980 मास्को ओलंपिक में स्वर्ण पदक जरूर जीता लेकिन इस ओलंपिक में पाकिस्तान समेत कई मजबूत दावेदारों ने शीत युद्ध की वजह से हिस्सा नहीं लिया था। इसके बाद से भारतीय हाकी टीम ओलंपिक में कोई पदक नहीं जीत सकी है।
जाधव का जलवा
यूं तो नार्मन प्रिचार्ड ने 1900, पेरिस ओलंपिक में भारत को दो रजत पदक दिलाए थे लेकिन वह एक अंगरेज थे। ओलंपिक में किसी भी खेल की एकल स्पर्धा में पहला पदक जीतने का गौरव केडी जाधव को 1952, हेलसिंकी ओलंपिक में मिला। उन्होंने पुरुषों की फ्री स्टाइल कुश्ती की बेंटमवेट स्पर्धा में कांस्य पदक अपने नाम किया।
फ्लाइंग सिख की चूक
फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह 1960 के रोम ओलंपिक में 400 मीटर दौड़ में बेहतरीन प्रदर्शन करने के बावजूद पदक से चूक गए। प्रारंभिक दौर और सेमीफाइनल मुकाबले में दूसरे स्थान पर रहने वाले मिल्खा ने फाइनल रेस में जोरदार शुरुआत की लेकिन बीच में धीमे पड़ गए। बाद में उन्होंने जोर लगाया लेकिन 45.6 सेकंड के साथ चौथे स्थान पर रहे और 0.1 सेकंड के अंतर से कांस्य पदक से चूक गए।
दुर्भाग्यशाली पीटी ऊषा
मिल्खा सिंह के बाद 1984 के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में पायोली एक्सप्रेस पीटी ऊषा की बदौलत एक बार फिर मौका आया जब भारतीयों को पदक की आस बंधी थी लेकिन 400 मी की बाधा दौड़ के फाइनल में तीसरे स्थान के लिए फोटो फिनिश में वह दुर्भाग्यशाली रहीं और सेकंड के सौंवे हिस्से से कांस्य पदक से वंचित हो गई। उड़नपरी कही जाने वाली ऊषा ओलंपिक स्पर्धा के फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं।
पेस का कमाल
टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस ने 1996 अटलांटा ओलंपिक में पुरुष एकल स्पर्धा का कांस्य पदक जीतकर 16 सालों से एक अदद पदक के लिए तरस रहे भारत को पदक तालिका में लौटाया। पेस ने कांस्य पदक के अपने सफर में खुद से कहीं ऊंची वरीयता वाले खिलाडि़यों को मात दी। सेमीफाइनल में वह शीर्ष वरीय अमेरिका के आंद्रे आगासी से मात खा गए जिन्होंने इस स्पर्धा का स्वर्ण भी जीता लेकिन कांस्य पदक के मैच में पेस ने कोई गलती नहीं की और ब्राजील के फर्र्नाडो मेलीजेनी को 3-6, 6-2, 6-4 से मात दी।
मल्लेश्वरी ने दिखाई ताकत
2000, सिडनी ओलंपिक में महिला भारोत्तोलक कर्णम मल्लेश्वरी ने 69 किलोग्राम भार वर्ग में कांस्य पदक जीता। मल्लेश्वरी ओलंपिक में भारत को कोई पदक दिलाने वाली पहली महिला बनीं। उन्होंने कांसा जीतकर भारत को खाली हाथ लौटने की शर्मिदगी से बचा लिया। उन्होंने स्नैच और क्लीन एंड जर्क में कुल मिलाकर 244 किग्रा वजन उठाया। पहले स्थान पर मौजूद चीन की वेनिंग लिन और दूसरे स्थान पर आने वाली हंगरी की एर्जसेबेत मार्कस दोनों ने ही 242.5 किग्रा का वजन उठाया। लिन के शरीर का वजन कम होने के कारण वह सोना जीतने में सफल रहीं।
राठौड़ ने साधा चांदी पर निशाना
2004, एथेंस ओलंपिक में डबल ट्रैप निशानेबाज राजवर्धन सिंह राठौड़ ने रजत पदक जीतकर भारत को पदक विहीन होने से बचा लिया। राठौड़ द्वारा जीता गया यह पदक ओलंपिक खेलों में भारत को मिला 17वां और आखिरी पदक है। राठौड़ व्यक्तिगत स्पर्धा में चांदी को कब्जे में करने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बने। सेना में मेजर के पद पर कार्यरत राठौड़ ने कुल 179 का स्कोर बनाया जिसमें क्वालीफाइंग में 135 और फाइनल में 44 अंक अर्जित किए। इस स्पर्धा का स्वर्ण संयुक्त अरब अमीरात के शेख अहमद अल मकतूम ने जीता।
 
फोटो गैलरी
 
 
 
:: Jagran Olympic 2008 Medals Tally ::
पदक तालिका
क्रम संख्या देश सोना चांदी कांसा कुल
1 चीन 51 21 28 100
2 अमेरिका 36 38 36 110
3 रूस 23 21 28 72
4 ब्रिटेन 19 13 15 47
5 जर्मनी 16 10 15 41