चांद पर पानी मिला है।
जो हैं पानीदार चेहरे
तब भी
अब भी चांद जैसे
गाल पर तिल लिए
दर्पण में
सदी का दिन खिला है।
हो रहा इंसान पुलकित
हो रहा विज्ञान पुलकित
गांव-देश-जहान पुलकित
और ऊंचे और ऊंचे ...
फिर धोया जाता स्वच्छ पानी में
तन-मन को धोने की तरह..
फिर सनसनाते हुए अधन में
पितरों को नमन करते हुए
डाला जाता है- चावल को
अधन का ताप बढने लगता है
और चावल का रूप गंध बदलने लगता है
लोहे को पिघलना ...
झालर झूमर दीप सब, सजकर हैं तैयार।
अंधकार के तखत को, पलटेंगे इस बार॥
अंधियारे की बाढ में, चली दीप की नाव।
घर-घर पहुंची रोशनी, रोशन सारा गांव॥
मावस आती बांटने, जग को काली रात।
देहरी से दीपक उसे, देता दो-दो लात॥
बंद आंख ...
गुजारूं
सूख चुकी उनकी
टांगों पर लेट जाऊं
और कहूं-
अम्मा! सुनाओ कोई कहानी
उनके लाख चिडचिडाने के बावजूद।
चाहता था
अम्मा के रोपे पौधे को
पानी दूं
अम्मा सरीखे उदास
फूलों से बतियाऊं
और गुलमोहर से धीरे से ...
अपनी प्रिय बीवी के लिए
क्या वह अपनी बीवी से उमगकर करता होगा प्रेम
घर लौटकर चूमता होगा उसका चेहरा
उतार लेता होगा उन वक्तों में
अपने चेहरे से बनावटी वह सख्त नकाब
क्या उसकी दिल की घडी बदल लेती होगी अपनी चाल
क्या ...
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