नई धारा के 60 वर्ष

नई धारा के 60 वर्ष   


वैसे तो बिहार में साहित्यिक पत्रकारिता का एक लम्बा और समृद्ध इतिहास रहा है। सन् 1880 से अब तक साहित्य, आरती, अवन्तिका, गंगा, माधुरी, जागरण, हिमालय, नालंदा, ज्योत्सना, जन्मभूमि, कमला, लक्ष्मी, श्रीशारदा जैसी ख्यातिलब्ध साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन होता रहा है, लेकिन इनमें से प्राय: सभी समय के अंतराल पर बंद होती चली गयीं। ...

तमसो मा ज्योतिर्गमय की सनद है दीपावली   


भारत में पर्व संस्कृति की दीर्घ परंपरा में दीपावली जैसा कोई दूसरा पर्व नहीं है। पांच दिनों का श्रृंखलाबद्ध यह पर्व परस्मै अभिग्रहण का माननीय त्योहार है। कार्तिकमास कृष्णपक्ष की त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा अमावस्या और शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तथा द्वितीया तक आयोजित यह पर्व केवल आगम-निगम का सम्मेलन ही नही होता बल्कि जीवन के तमाम कर्मपक्ष इन्हीं पांच दिनो में अनुस्यूत हो उठते हैं। ...

इंग्लैंड में बही हिंदी की नदी   


जिन अंग्रेजों ने हमारे देश को दासता की बेडियों में जकडकर लंबे समय तक राज्य किया, हमारी भाषा, संस्कृति व संस्कारों को नष्ट करने की पुरजोर कोशिश की, उनकी धरती पर जब एक दो नहीं, दस शहरों में अंग्रेज प्रशासकों की उपस्थिति में हमारी राजभाषा हिंदी गूंजी, तो कुछ बात है हममें जो हस्ती मिटती नहीं हमारी का आत्मविश्वास और मजबूत हो गया। ...

सूखे और बाढ़ के बीच कुइयांजान   


बहुत दिनों से दिल में एक ख्वाहिश मचल रही थी कि इस बार कुछ ऐसा लिखूं जिसमें इंसान और जमीन दोनों एक साथ हों। शायद क्या, यकीनन इसकी वजह बचपन में कहे बडों के ये जुम्ले थे कि धीरे-धीरे चलो, जमीन पर खौलता पानी मत फेकों, धूप से जलती जमीन पर छिडकाव मत करो जिसने धरती को भी एक जिन्दा शख्सियत में बदल डाला था। ...

भारतवासी लोकप्रिय अंग्रेज लेखक रस्किन बांड   


मसूरी की मनोरम पहाडियां, चिंतन को भी उतार चढावभरा रचनात्मक रास्ता प्रदान करती हैं-और समझ को बालक की उत्सुकता! व्यू प्वाइण्ट पर भीड में बच्चे भी थे-कोई गाइड उन्हें कह रहा था- उधर सामने जो हिमालय की श्रृंखला नजर आ रही है सफेद-सफेद सी..बीच-बीच में कालापन है.. दरअसल मसूरी अंग्रेजों द्वारा बसाया गया था- सो उन्होंने उन पहाडियों को सफेद चूने से पुतवा दिया और अब जगह-जगह उस सफेदी की परतें उधड गई हैं..। ...