भारत में पर्व संस्कृति की दीर्घ परंपरा में दीपावली जैसा कोई दूसरा पर्व नहीं है। पांच दिनों का श्रृंखलाबद्ध यह पर्व परस्मै अभिग्रहण का माननीय त्योहार है। कार्तिकमास कृष्णपक्ष की त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा अमावस्या और शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तथा द्वितीया तक आयोजित यह पर्व केवल आगम-निगम का सम्मेलन ही नही होता बल्कि जीवन के तमाम कर्मपक्ष इन्हीं पांच दिनो में अनुस्यूत हो उठते हैं।
कार्तिक की अमावस्या को दीवाली कहा जाता है। इस दिन देश भर में चौतरफा दीपमालाएं प्र”वलित की जाती हैं। नदी [जलाशय] तटों, देव मंदिरों, चौराहों और गलियो में जलते हुए दीपक अमावस्या के निविड अंधकार को पराजित कर खिलखिला उठते हैं। इस दिन घूरे के भी दिन बहुरते हैं। छोटे-बडे सभी एक रूप। यह है दीपावली का ममैव पक्ष।
भतर्ृहरि का कहना है, कृतिनाम् अपि स्फुरति एष निर्मल विवेद दीपक: अर्थात दीपावली मनाने वाले कृतीजन मिट्टी के दीए तो जलाते ही हैं, साथ ही वे अपने विवेक-दीपक भी जला लेते हैं। अमा की पूरी रात विवेक की प्रभा से निर्मल हो उठती है। सब अंधियारा मिट गया, दीपक रेखा मांहि। वास्तव में अंधेरा दीपकों के प्रकाश से डरकर पृथ्वी छोड पाताल में चला जाता है। प्रकाश की जिजीविषा की पहचान दीपावली को ही हो पाती है। यह कोटि भानु दुति दीपती दिखाई पडती है। दीपावली को दीप की लौ मनुष्य के अंदर से बाहर तक जल उठती है। ऐसे ही क्षणो में कुलदीपकों का जन्म होता है। धरणी सनाथ हो जाती है। तुलसीदास इस क्षण को राम नाम मणि दीप कहते हैं। उनका सुझाव है, राम नाम मणि दीप धरू, जीह देहरी द्वार, तुलसी भीतर बाहरहु जो चाहसि उजियार। ऐसी ही मान्यताओं द्वारा भीतर की तमिस्त्रा मिटाई जा सकता है। यही है दीपावली यानी सम्पूर्ण दीपावली।
दीपावली पंचकल्याण पर्व है। इसे पांच दिनों के श्रृंखलाबद्ध कृत्यों द्वारा सम्पन्न किया जाता है। इसका मुख्य त्योहार है अमावस्या, परन्तु अमावस्या के दो दिन पहले से दो दिन बाद तक यह पर्व मनाया जाता है। दो दिन पहले के पर्व हैं- धनतेरस और नरक चतुर्दशी। इसे नरक चतुर्दशी इसलिए कहा जाता है कि इसी दिन घर का सारा कूडा-कतवार बाहर निकालकर एक स्थान पर फेंक देते हैं। शाम होते-होते कतवार के उस ढेर पर घर के सबसे बडे दीए को कडुवा तेल से भरकर चारों मुंह जला देते हैं। किसी भी ओर से नरकासुर के आने की संभावना नहीं रह जाती। धनतेरस दीपावली की शुरुआत होती है। इस दिन क्रेता-विक्रेताओं का उत्तेजक संगमन होता है। दीपवृक्षों और दीप प्रखंडिकाओं से दुकानें सजाई जाती हैं। आजकल बिजली की सजावटें कलात्मक बाजारों को चुनौतियां देने की कोशिश कर रही हैं परन्तु प्राचीनता अपना अस्तित्व कायम रखना चाहती है। ग्लोबल बाजार रहे तो रहे।
धनतेरस के बाजार में स्वर्ण, रजत पात्र से लेकर स्टेनलेस स्टील तक के पात्रों की बिक्री हो जाती है। दीपावली को शिष्टाचारी भक्त लगभग आधी रात को क्रीत पात्रों सहित लक्ष्मी पूजन करते हैं। लक्ष्मी और गणेश की स्थापना करते हैं। बाएं गणेश दाहिने लक्ष्मी। धनतेरस की पूजा का अर्थ ही है लक्ष्मी का आवाहन। गणेश स्थायी सुरक्षा देने वाले देवता माने जाते है। इस प्रकार धनतेरस दीपावली के उत्सव को काफी सघन बना देता है।
कार्तिक की कृष्णा चतुर्दशी यम का दिन होती है। यम और यमी की पूजा दीपावली को वैदिक परंपरा से जोड देती है। पद्मपुराण, भविष्य पुराण, गरुड पुराण और स्कंद पुराण जैसे कई दूसरे पुराणों में दीपावली पर्व की राष्ट्रीय धारा पर बडी-बडी कथाएं लिखी गई हैं।
इन दोनों पूर्व पर्वो के बाद कृषिकर्मा दीपावली आती है। प्रात:काल ही मिट्टी के दीए और काजल पारने की मृत्तिका घटी खरीदे जाते हैं। दिन में दीपावली का विशेष पकवान बनता है। विशेष इस अर्थ में कि सूरन (जिमीकंद) का भर्ता और नए आलू के साथ नए बैगन की सब्जी अवश्य बनाते हैं। यहा यह कह देना असंगत न होगा कि सूरन और बैगन आर्यकालीन द्रविडों के मुख्य भोग्य थे, जिन्हें वे यम-दिशा (दक्षिण) में उगाते थे। बाद में आर्यो ने भी इन्हें खाना शुरू कर दिया। दीपावली पर ओदन (भात) और उडद का बडा का पकवान निश्चित बनता है।
दीपावली पर ऋग्वेदिक आर्यो का सबसे प्रिय खेल द्यूतक्रीडा था। महाभारत का पूरा युद्ध ही द्यूत-क्रीडा का परिणाम माना गया है। ये सभी कर्म निगमवादी हैं, परन्तु दीपावली को आगमवादियों ने भी कम महत्व नहीं दिया है। दीपावली की आधी रात को तंत्रसाधना का बहुविधान किया गया है।
दीपावली की आधी रात के करीब घंटी में पारा गया काजल पूरे घर को लगाया जाता है। इससे आंख की रोशनी तो बढती है है तांत्रिक साधकों की नजर भी नहीं लगती। दीपावली की सारी रात श्वान निद्रा तक सीमित रहती है क्योंकि उषाकाल होते ही घर की कोई स्त्री शूर्पवादन करते हुए घर के कोने-कोने से दरिद्रता का निष्काषन और ईश्वरता का प्रवेशन करती है। इस दीपावली की रात बीती और शुक्ल प्रतिपदा लगते ही अन्नकूट की सजावट प्रारंभ हो जाती है। अन्नकूट देवता के भोगोपरांत प्राय: सभी मंदिरों, घरों में दर्शन-पूजन और कथा श्रवण तथा दीपदान का विधान होता है।
अन्नकूट के भोग के लिए छप्पन प्रकार के व्यंजन बनते हैं। अन्नकूट के दूसरे दिन भैयादूज पडता है। इसे यम द्वितीया भी कहते हैं। पद्मपुराण में कहा गया है कि कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यम अपनी बहन यमुना के घर जाते थे। बहन यमुना भाई के दीर्घ जीवन की कामना करते हुए यम को टीका काढती थी और यम अपनी बहिन को यथाशक्ति दक्षिणा देते थे। ऋग्वेद में यम-यमी मंत्र द्रष्टा ऋषि के रूप में वर्णित है। इसी दिन चित्रगुप्त के वंशज कलम और दावात की पूजा करते हैं। दो दिवसीय विश्राम के बाद कलम फिर अपना काम शुरू कर देती है।
चित्रगुप्त के संबंध में दो कथाएं प्रचलित हैं। पहली यह कि एक राजा खाताबही रखने में बडे निपुण थे। एक दिन जब वे नदी में स्नान कर रहे थे तो यम ने उन्हें अगवाकर लिया और उन्हें अपने समान धर्मराज चित्रगुप्त यम का पद दिया। वे संसार के प्राणियों के पाप-पुण्य का लेखा-जोखा रखते हैं।
दूसरी कथा के अनुसार एक दिन ब्रह्माजी के काय से एक स्वरूप निकला और हाथ जोड कहने लगा मैं आपका कायस्थ जन्मा हू। मुझे क्या आज्ञा है? ब्रह्माजी ने उसे धर्मराज के रूप में यमराज के पास भेज दिया। आज भी कायस्थ लोग भैया दूज को चित्रगुप्त जयंती का आयोजन करते हैं। भैया दूज को गोवर्धन पूजा का विवर्तन होता है। यह पूजा इन्द्र को अपदस्थ कर विष्णु (कृष्ण) को पदस्थ करने का उद्यम है। ऐतरेय ब्राह्मण में इन्द्र से बडे विष्णु कहा गया है। गोवर्धन पूजा में स्त्रियां श्रृंगार कर एकत्र होती है। किस्से सुनती सुनाती हैं और गोबर पिंड को अंचल-नमन करती हैं।
इस प्रकार दीपावली पंचगुच्छ पर्व अपने स्वभाव, संस्कृति और प्रांजलता में वर्ष का बडका त्योहार कहा जाता है।
-[डा. भवदेव पांडेय]
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