अमृता प्रीतम की लेखनी में थी बेबाकी   
 
 

नई दिल्ली। स्त्री संसार के तमाम अंधेरों उजालों को अपनी बेबाक और अनूठी शैली से सतरंगी छटा प्रदान करने वाली रचनाकार अमृता प्रीतम ने अपनी साहित्य साधना के जरिए पंजाबी को विश्व साहित्य में स्थान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उनकी रचना यात्रा दरअसल हमारे दौर का जीवंत दस्तावेज है।

अमृता प्रीतम ने अपनी लेखनी में उन विषयों को छुआ जिनकी अभिव्यक्ति में बेबाकी की जरूरत होती थी। उनकी रचनाओं में उन मूल्यों के खिलाफ बगावत झलकती थी जिन्हें वे गलत और अन्यायपूर्ण मानती थीं। भारतीय साहित्य में अमृता का कद कितना बडा है, यह इसी से साबित होता है कि उन्होंने अपने रचनाकाल में 24 उपन्यास, 15 लघुकथा संग्रह और 23 कविता संकलन लिखे।

अपनी शुरुआती कविता राजा के महल के जरिए डोगरी की अमृता प्रीतम के नाम से जानी गई वरिष्ठ कवियत्री पद्मा सचदेव कहती हैं कि अमृता प्रीतम अपनी शर्तो पर जीने वाली आजाद ख्याल महिला थीं। वह बेहद रचनात्मक, खूबसूरत और शालीन थीं। उनकी किसी से तुलना नहीं की जा सकती।

अमृता की लेखनी में अलग तरह का स्त्री विमर्श था। चाहे कविता हो, कहानी हो या उपन्यास, उन्होंने हर बार नारी के प्रति पुरुष की उदासीनता को पेश किया। भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर रचे उनके उपन्यास पिंजर में पूरो नाम की हिंदू लडकी और उसे भगाकर ले जाने वाले रशीद के बीच के रिश्ते की कशमकश झलकती है।

अमृता प्रीतम की ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त पुस्तक कागज ते कैनवास की कविता कुमारी में वह आधुनिक लडकी की कहानी बयां करती हैं। उनकी आत्मकथा रसीदी टिकट भी बेबाकी भरी नजीर पेश करती है। इस बारे में पद्मा बताती हैं कि अमृताजी ने अपनी रचनाओं के जरिए उन महिलाओं को एक रास्ता दिखाया था जो तब दरवाजों के पीछे सिसका करती थीं। उनकी रचनात्मकता के बारे में एक वाकया याद करते हुए पद्मा कहती हैं कि एक बार दिल्ली में एक घर की छत पर छोटा जमावडा हुआ। वहां एक-दो पंजाबी रचनाकार मौजूद थे। अचानक अमृता के आने की सुगबुगाहट शुरू हुई। उस मौके पर उन्होंने एक नज्म पेश की।

दिलचस्प यह था कि नज्म ब लफ्ज से शुरू होने वाले अपशब्दों जैसे बदतमीज, बेलगाम, बेलिहाज, बेरहम पर आधारित थी। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने नज्म बेहद खूबसूरती से गढी थी। अमृता वाघा सीमा के दोनों ओर के पंजाब में लोकप्रिय हैं। कहा जाता है कि उनकी लोकप्रियता पंजाबी रचनाकार मोहन सिंह और शिव कुमार बटालवी से भी ज्यादा है।

मोहाली निवासी वरिष्ठ पंजाबी रचनाकार डा. संतोख सिंह धीर कहते हैं कि यह कहना ठीक नहीं है क्योंकि अमृता को उनकी रचनाएं अनूदित करवाने का मौका मिला जो मोहन सिंह और बटालवी को उनके समय में नहीं मिल पाया। हालांकि, इसमें कोई संदेह नहीं है कि कविता के मामले में अमृता काफी आगे हैं। उनकी कहानी शाह की कंजरी और उपन्यास पिंजर भी बेहद मशहूर है लेकिन उनकी कविताओं में ज्यादा गहराई है।

अविभाजित पंजाब के गुजरांवाला में 31 अगस्त 1919 को जन्मीं अमृता लाहौर में पली-बढीं। उन पर पिता करतार सिंह हितकारी का काफी प्रभाव रहा। वह हमेशा मियां मीर वारिस शाह और बुल्ले शाह की मजार पर सुकून तलाशतीं। विभाजन के समय महिलाओं के साथ हुई ज्यादतियों पर उन्होंने लिखा कि आज आक्खां वारिस शाह नूं, कित्तों कब्रां विच्चों बोल।

इसका अर्थ कुछ इस तरह है कि आज पूछूं वारिस शाह से, किसी कब्र में से बोल और आज किताब-ए-इश्क का कोई अगला पन्ना खोल, पंजाब की एक बेटी : हीर के संदर्भ में : रोई तो तुमने, लिख-लिखकर खूब चीत्कार किया, आज लाखों बेटियां रो रही हैं और तुझसे फरियाद कर रही हैं।

अमृता ने पत्रिका नागमणि का संपादन किया, राज्यसभा में नामित हुई, 1982 में उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला और साहित्य अकादमी पुरस्कार पाने वाली भी वह पहली पंजाबी लेखिका रहीं। सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण से नवाजा। जाने माने चित्रकार इमरोज उनके जीवन साथी रहे। अमृता का उपन्यास पिंजर, आत्मकथा रसीदी टिकट और कविता आज आखां वारिस शाह नूं के अलावा एक और नज्म भी खासी मशहूर है जो कहती है कि मैं तुझे फिर मिलूंगी..कहां, किस तरह, पता नहीं..शायद तेरी कल्पनाओं में चित्र बन के उतरूंगी.. जहां कोरे तेरे कैनवास पर.. इक रहस्यमय लकीर बन के.. खामोश तुझे तकती रहूंगी।

दिल्ली में 31 अक्तूबर 2005 को जब उनका निधन हुआ तो पंजाबी साहित्य ने उसे दुनिया के नक्शे पर लाने वाली एक रचनाकार को भी खो दिया।

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