नई दिल्ली। हिन्दी साहित्य के प्रति भले ही लोगों की बेरुखी नजर आती हो, लेकिन प्रेम रस की अभी भी साहित्य में मांग है और इसी के चलते नया ज्ञानोदय के प्रेम महाविशेषांक का पांचवा अंक आ रहा है।
नया ज्ञानोदय के रवीन्द्र कालिया ने बताया कि शायद यह पहला मौका है जब किसी लघु पत्रिका के विशेषांक की न केवल श्रृंखला निकाली गई बल्कि इनका कई दफा पुनर्मुद्रण भी किया गया। उन्होंने बताया कि आज पेश किए जाने वाले प्रेम महाविशेषांक का पांचवां अंक प्रेम के लोक पक्ष पर आधारित है। इसमें पंजाबी, अवधी, संथाली और राजस्थानी भाषा की कुल नौ प्रेम कहानियां शामिल की गई हैं। इसमें लैला मजनूं, हीर रांझा, शीरी फरहाद, फुलझरी रानी, छैला संदू और नल दमयंती प्रमुख हैं।
उन्होंने बताया कि पांचवें अंक में लोगों को रांगेय राघव और ममता कालिया की कहानी भी पढने को मिलेंगी। इसमें कबीर, सूर, विद्यापति और भारतेन्दु की पदावली शामिल की गई है। प्रेम महाविशेषांक के पहले चारों अंकों को देखा जाए तो गालिब से लेकर यश मालवीय तक की शायरी की खुशबू बिखरी हुई है और जयशंकर प्रसाद से लेकर प्रियवंद तक की कहानियों के रंग भी इसमें देखने को मिल जाएंगे।
उन्होंने बताया कि जुलाई में लघु पत्रिका नया ज्ञानोदय ने प्रेम महाविशेषांक का पहला अंक निकाला था और उस वक्त हमने सोचा भी नहीं था कि हमें न केवल इसका पुनर्मुद्रण करना पडेगा बल्कि इसकी श्रृंखला निकालनी पडेगी। कालिया ने बताया कि जुलाई में प्रकाशित नया ज्ञानोदय के प्रेम महाविशेषांक एक की मांग के आधार पर अगस्त और सितंबर में तीन बार पुनर्मुद्रण किया और अगस्त के नया ज्ञानोदय के प्रेम महाविशेषांक दो का सितंबर में दो बार पुनर्मुद्रण किया गया। उन्होंने बताया कि पहले दो प्रेम महाविशेषांक की लोकप्रियता को देखते हुए पहले अंक का पांचवीं बार और दूसरे अंक के तीसरी दफा पुनर्मुद्रण की तैयारी है। पहली बार पहले अंक की केवल 15 हजार प्रतियां छापी गई थीं।
उन्होंने बताया कि दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें अंक में प्रत्येक की 14 हजार प्रतियां छापी गई थीं और इसके बाद पुनर्मुद्रण में प्रत्येक बार प्रतियों की संख्या एक हजार से 11 सौ के बीच थी। नया ज्ञानोदय के प्रेम महाविशेषांक के पहले अंक का तीन बार और दूसरे अंक का दो बार पुनर्मुद्रण किया गया।
उन्होंने बताया कि दिल्ली पुस्तक मेले के दौरान प्रेम महाविशेषांक के जुलाई और अगस्त के अंक की 360 प्रतियां एवं सितंबर के अंक की 450 प्रतियां बेची गई और 137 पाठकों को नया ज्ञानोदय का सदस्य बनाया गया।
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