मोबाइल पर दूसरी ओर से आवाज आयी- मायाकांत, तुम्हारी चाची नहीं रहीं। उसने आज सुबह 6.30 बजे राँची में अपनी अंतिम साँस ली।
हाथ मोबाइल पर ही स्थिर रह गया। चाची नहीं रहीं, यह निश्चय ही एक शोक समाचार था। परन्तु जाने वाले को रोकना संभव नहीं। यह बात हर कोई जानता है, मायाकांत भी इससे अनभिज्ञ नहीं। किंतु चाची पहली बार शहर गई थीं और वहाँ रह नहीं सकीं, यह बात मायाकांत को कचोटने लगी।
आत्मीयजन की मृत्यु से शोक संतप्त होना स्वाभाविक है। किंतु मायाकांत चाची की राँची में मृत्यु होने से असहज हो गया। मेघ गर्जन के समान यह समाचार अनायास आया और जिस वेग से बिजली चमकती है उसी वेग से मायाकांत अतीत में चला गया-चाची तो सदैव शहर जाना चाहतीं, उसे देखना चाहतीं किन्तु मरना गाँव में ही चाहती थीं। हुआ इसका उल्टा, जीवनभर देखती रहीं गाँव को और कल्पना करती रहीं शहर की, अंतत: पहुँच गई शहर में, वह भी तब जब उनकी आँखों की ज्योति चली गई। मैं जब भी फोन से पूछता था कि चाची, शहर में मन लग रहा है क्या, तो उत्तर देतीं- बेटा, बडा आनंद आ रहा है। मुझे लगता जैसे सूरदास जी महाराज नेत्रहीन होते हुए भी श्रीकृष्ण की संपूर्ण बाल लीलाओं के परिपूर्ण ज्ञाता हो गए थे वैसे ही चाची नेत्रहीन होते हुए भी शहर की सभी गतिविधियों से अवगत हो गई थीं। सूर तो श्रीकृष्ण के मनमोहक रूप से अभिभूत थे, चाची को न जाने शहर का कौन-सा रूप भा गया और किस रूप से उसे वितृष्णा थी, इसे कौन जानता है?
चाची की एक विशेषता यह थी कि गाँव में जब भी कोई उन्हें काकी कहता तो वह चिढ जाती थीं और तुनककर कहतीं-चाची बोल, मैं तो शहर जाऊँगी अपने बेटे के पास। वहाँ ऐसे ही गाँव से पहुँचकर काकी, काकी की रट लगाएगा तो लोग क्या समझेंगे? आखिर, मैं इंजीनियर की माँ हूँ। यदि कोई पलटकर जवाब देता- नहीं काकी, शहर में चाची नहीं, आंटी पुकारते हैं। तो वह आग बबूला हो जातीं और अपनी भौंहे तरेरकर कहतीं-रहने दे अपना अंट-शंट। ज्यादा अंग्रेजी नहीं। देसी मुर्गी विदेशी बोल। हुँह...।
किंतु चाची दूसरों को ऐसा कहने के बाद स्वयं उदास हो जातीं। चाची को लगता था कि उसकी बहू तो देसी है पर उसकी बोलचाल है विदेशी। चाची दिनचर्या की बहुत पक्की थीं लेकिन बहू की कोई दिनचर्या ही नहीं थी। प्रत्येक दिन अलग रुटीन। वह आवश्यकता से अधिक प्रयोगधर्मी स्वभाव की थीं। चाची सुबह उठकर एक लोटा पानी पीतीं और बहू एक प्याली चाय। चाची ने जीवन में कभी दवा नहीं ली, पर बहू बात-बात में दवा का सेवन करती। बहू देश-विदेश की खबर रखती और शेयर बाजार में निवेश भी करती थी, सास की तरह निरक्षर-गँवार नहीं। इस प्रकार इंजीनियर की पत्नी बडी बहू और चाची, नदी के दो किनारों की तरह अपने-अपने स्थान पर अविचल-स्थिर, बनी रहीं, जीवन नदी की तरह बहता चला गया।
चाची के बेटे जब छोटे थे तब यदि चाची से कोई कहता कि चलो तीर्थयात्रा, चलो कुंभ मेला तो वह कहती थीं-नहीं, अभी बच्चे छोटे हैं। उन्हें बडे हो जाने दो। वे जब पढ लिख लेंगे, बडे हो जाएंगे तो मैं तीर्थयात्रा ही करती रहूँगी।
बच्चे बडे हो गए। बडा बेटा इंजीनियर हो गया। उसकी शादी बडे घर में हो गई। चाची बेटे से खुश थीं। बहू की आदतों को नापसंद करते हुए भी तटस्थ बनी रही। जब भी वह बहू से शहर के विषय में पूछतीं तो उनके मन में संशय हो जाता।
वह पूछती थीं-क्या वहाँ हम जैसे बुजुर्ग आपस में मिलते हैं, क्या पडोसी के बीमार होने पर लोग रातभर जगते हैं, क्या शाम में लोग चौपाल पर जमा होकर एक-दूसरे से दु:ख-सुख बतियाते हैं?
उसे उत्तर मिलता-शहर में इतनी फुर्सत कहाँ? वहाँ सारे संबंध मतलब से होते हैं। बिना काम के बातचीत करने वाले या किसी के घर जाने वाले को उठल्लू माना जाता है। यह सुनकर चाची निराश हो जाती थीं। शहर का मतलब तो चाची समझती थी कि वहाँ के जीवन में खुशियों का रंग होगा, चेहरे पर शिकन नहीं होगा, लोगों में परस्पर सम्मान का भाव होगा। पर बहू तो शहर की अलग ही कहानी कहती थी। फिर सोचने लगती-बहू को जीवन का क्या अनुभव? वह तो किताबों-पेपर में डूबी रहती है। चाची मानती थीं कि जीवन को समझने के लिए जीवन को भोगना जरूरी है। बात-बात में कहती थीं-वह क्या जाने पीर परायी जिसके पाँव न फटी बिंवाई। चाची स्वयं अनुमान लगाती थीं कि लाखों लोगों को शहर से ही रोटी मिलती है, ऐसा कैसे हो सकता है कि वहाँ सभी स्वार्थी हो जाएं। दरअसल शहर में लोग एक दूसरे को उतना नहीं जानते, इसलिए एक-दूसरे पर सहज विश्वास नहीं करते। चाची कहा करती थीं- शहर में मुझ जैसे गप्प-शप्प करने वाले लोग चले जाएंगे तो लोगों के बीच आपसी मेलजोल बढ जाएगा। बहू जो कहती है कि शहर में लोग भागते ही रहते हैं, सो एक समय ऐसा भी आएगा जब शहर में पीपल के पेड होंगे और जिनके नीचे लोग एक पल के लिए ठहर जाएंगे।
इसी उधेड-बुन में चाची रह गई गाँव में, बडे बेटे के साथ नहीं गई शहर।
जब भी हम हँसी करते थे और पूछते थे- चाची, शहर से हमारे लिए क्या लाओगी, तो कभी निराश नहीं करती, हमेशा कुछ-न-कुछ लाने का आश्वासन देती थीं। जब मैं छोटा था तो वह कहतीं-शहर से तुम्हारे लिए गुडिया लाऊँगी। जब मैं बडा हुआ तो वह कहती थीं कि शहर से तुम्हारे लिए सुंदर मेम लाऊँगी।
मैं जब शहर आने लगा तो कहा-चाची, तुम मेरे साथ शहर चलो, किसी मेम से मेरी दोस्ती करवा देना। इस पर चाची बोलीं, ना बाबा, ना मुझे अंग्रेजी नहीं आती। मैं किसी मेम से बात कैसे करूँगी? मुझे देहातिन समझकर मेम लोग मुझसे बिदक न जाएं।
मुझे लगा कि चाची यह ऊपर के मन से कह रही हैं। उसमें इतना आत्मविश्वास है कि वह किसी मेम को पानी पिला सकती हैं। मेरा शक तब यकीन में बदल गया जब चाची मेरे कान में आकर बोली-पगला, तू नहीं समझता। लोग अभी ताने देने लगेंगे कि अपने बेटे के साथ शहर नहीं गई, भतीजे के साथ चली गई। फिर अगले ही क्षण चाची को लगा कि मायाकांत को मैंने पराया कह दिया, उसे दुख न हो जाए। चाची संभलकर बोलीं-अरे तू तो मेरे लिए बेटे से भी बढकर है। अभी तू जा, बाद में मैं आऊँगी। मैं जरूर आऊँगी, मुझे तो शहर में लोगों के बीच मेलजोल बढाना है।
मैं शहर आ गया। किंतु मेरा बचपन मेरी जवानी के रोम-रोम में समाया हुआ था। मुझे तब भी याद था और अभी भी याद है- जब मैं लगभग तीन साल का था तो एक दिन एक तरफ चाची मेरे दोनों पैर और दूसरी ओर चाचा मेरे दोनों हाथ पकडकर मुझे झूला झुला रहे थे और गा रहे थे-
हिरला झूल गे सजनी
बिहान हेतौ पबनी।
चाची इसका अर्थ समझाती थीं-हे सजनी, आज झूला झूल लो, कल त्यौहार होगा।
मैं झूलता रहा। पर्व-त्यौहार की पूर्व संध्या पर सजनी के साथ झूला झूलने की कल्पना का खेल ही खेल में मेरे मन में संचार करने वाली मेरी चाची दुनिया की नजरों में अनपढ हो सकती है किंतु मेरे लिए तो वह अनुराग की जीवन्त मूर्ति थी।
ऐसे ही, एक रात अँधेरे में जुगनू चमक रहा था तो मैंने पूछा-चाची, यह जुगनू क्यों चमकता है? इस पर चाची बोली-जुगनू इसलिए चमकता है कि चाँद छुप गया है। जुगनू यह संदेश देता है कि चाँद छुप गया तो क्या हुआ, अँधेरा दूर करने के लिए जुगनू भी प्रयास करेगा और अंतत: अँधेरा छँट जाएगा, सबेरा हो जाएगा।
मैं उस समय चाची की बात को ठीक से नहीं समझ पाता था किंतु अब लगता है कि चाची कर्मयोग का कितना सूक्ष्म ज्ञान रखती थीं।
चाचा भी परदेश में रहते थे। साल में एक-दो बार गाँव आते थे। आमदनी कम थी। वे शहर में चाची के साथ पूरे परिवार को कैसे रखते? इसलिए चाची, चाचा के साथ शहर नहीं जा सकीं। कालांतर में चाचा भी इस दुनिया से चल बसे।
फिर चाची का छोटा बेटा प्रमोद डॉक्टर हो गया। वह गाँव आता था, चाची को काफी रुपये-पैसे दे जाता था। दो पल बातें भी कर लेता था किंतु चाची को शहर नहीं ले जाना चाहता था। वह भी दो किनारों के बीच से यात्रा कर रहा था। हाल ही में उसकी शादी हुई थी। पत्नी नहीं चाहती थी कि सास उसके साथ रहे। वैसी सास किस काम की जो किसी का फोन भी अटेंड न कर सके? चाची जब यह सुनतीं तो गुस्सा के मारे आग-बबूला हो जातीं। झट से कह देती थीं-क्या फोन से बतियाकर मैंने डाक्टर-इंजीनियर बेटे पैदा किए हैं? छोटी बहू निरुत्तर हो जाती थी, प्रसन्न नहीं।
समय बीतता गया और चाची के आँखों की ज्योति चली गई। जो बेटा औरों का इलाज करता हो भला उसकी माँ अंधी रहे? ले गया अपने साथ माँ को राँची, आँखों के आपरेशन के लिए।
मायाकांत पुन: अतीत से लौटा। उसे याद आया-वह तो फोन अटेंड कर रहा है। वह संभल गया। रुआँसी आवाज में पूछा-यह कैसे हुआ?
- माया, माँ बाथरूम गई थी, वहाँ गिर गई। ब्रेन हेमरेज हो गया और फिर चल बसी। इतना सुनने के बाद फोन का संपर्क टूट गया।
मायाकांत फिर सोचने लगा-फोन का संपर्क तो टूट गया? चाची के पार्थिव शरीर का भी अंत हो गया। क्या चाची से फिर कभी भेंट नहीं होगी?
मायाकांत के मन से एक अन्य मायाकांत निकला और कहने लगा-आदमी चाहे चाँद से भी आगे पहुँच जाए, उसे अपने शहर में पीपल का एक वृक्ष चाहिए ही जिसके नीचे लोग एक पल के लिए ठहर सकें, एक पल अपना सुख-दु:ख बतिया सकें। शहर में जब ऐसे पेड उगने लगेंगे तो चाची आएंगी और कहेंगी-
हिरला झूल गे सजनी
बिहान हेतौ पबनी।
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