सलाम आखिरी (उपन्यास)   
 
 

मधु कांकरिया का दूसरा उपन्यास सलाम आखिरी दरअसल कुछ विवादों को उछाल कर खुद को लोकप्रिय बनाने की कोशिश है। रातोंरात कुछ पाने की ललक तसलीमा नसरीन के बाद भारत के कुछ साहित्यकारों में भी बढी है। सलाम आखिरी में भी कई ऐसी बातें मिलेंगी, जिन्हें सिर्फ विवाद के लिए उपन्यास में शामिल किया गया है। लेखिका ने विषय का चयन जरूर बढिया किया है। कोलकाता की बदनाम बस्तियों पर उपन्यास लिखना अपने आप में एक जोखिम भरा काम है, पर लेखिका ने यह हिम्मत दिखाई है। यह अलग बात है कि उपन्यास अपने मूल कथ्य से बार-बार भटका है और कई बार तो लगता है कि हम किसी अखबार में प्रकाशित फीचर पढ रहे हैं। लेखिका ने आत्मकथ्य के बहाने भू्िमका में लिखा है दूसरी समस्या जो सामने आई, वह थी इसकी भाषा को लेकर। कोलकाता में प्राय: सभी वेश्याएं बंगलाभाषी हैं। अब इसे बंगला भाषा की समृद्धि कहा जाए, इस भूमि की तासीर कहा जाए या बंगसाहित्य की अंतर्शक्ति का कमाल कि अशिक्षित होते हुए भी यहां के सब्जी वाले, घरों में काम करने वाली बाई, श्रमिक वैगरह भी आम हिंदीभाषी से अच्छी भाषा बोल लेते हैं। वेश्याओं के लिए भी यही सत्य था। मुझे इनकी उच्च बंगाली को निम्न हिंदी में रूपांतरित करने की कवायद करनी पडी, पर अंतत: मुझसे यह कवायद सधी नहीं। पता नहीं किस दौर के सब्जी वालों और वेश्याओं का उल्लेख लेखिका ने किया है, क्योंकि आज उसी कोलकाता में समृद्ध बंगला भाषा अंगरेजी के साथ गलबहियां डालकर ठुमक रही है।

उपन्यास के केंद्र में एक महिला पत्रकार सुकीर्ति की खोजी पत्रकारिता है। वह वेश्याओं के जीवन को करीब से देख-सुनकर उन पर लिखना चाहती है, पर इन गलियों में पहुंचने का जो कारण लेखिका ने बताया है, वह भ्रम की स्थिति भी पैदा करता है। सुकीर्ति की एक सहकर्मी और उसकी बाई की 13 साल की लडकी इन गलियों में कहीं गुम हो गई थी, बकौल महिला पत्रकार के। इन दोनों की खोज में वह इन गलियों की भूल-भुलैया से वाकिफ होती है। देह की अंधी सुरंग में कैद वेश्याएं रोशनी की तलाश में छटपटाती हैं, लेकिन वे इन अंधेरी और भयानक गलियों से निकल नहीं पाती हैं। पर यहीं पर यह सवाल उठता है कि किसी महिला पत्रकार की सहकर्मी इन गलियों में गुम हो सकती है। अगर नहीं तो फिर पूरा उपन्यास जिस बुनियाद पर खडा किया गया है, वह बहुत मजबूत नहीं दिखता। बहरहाल, उपन्यास के अंत में लेखिका इस रहस्य से पर्दा उठाती हैं कि सुकीर्ति स्वतंत्र पत्रकार है और जिस फर्म में वह काम करती है, वह अखबार नहीं निकालती है और फर्म भी उन गलियों में जिस्म बेचती वेश्या की तरह ही है। तभी पता चलता है कि वह सहकर्मी भी इसी फर्म में काम करती थी, जो उपन्यास के आरंभ में इन गलियों में गुम हुई बताई गई है, पर इस खुलासे के बाद भी यह तथ्य गले नहीं उतरता कि वह सहकर्मी इन गलियों में कहीं खोई होगी। मधु कांकरिया की इस बात के लिए तारीफ करनी ही चाहिए कि उन्होंने सोनागाछी, बऊ बाजार और कालीघाट की उन गलियों की मंजरकशी बहुत बेहतर ढंग से की है। वहां के जीवन और रहन सहन को भी बहुत हद तक सामने रखा है। पर उनके साथ व्यावहारिक दिक्कत यह हुई कि सुकीर्ति के अलावा दूसरे पात्र गौण हो गए और सुकीर्ति की कुंठा उभरकर सामने आ गई। सुकीर्ति को बोल्ड दिखाने के लिए ही लेखिका ने विजय और मेघन सरीखे पात्रों को उपन्यास में पिरोया है। सुकीर्ति की अपने पति से नहीं पटी और दोनों में संबंध विच्छेद हो गया है। उपन्यास में साल्ट लेक स्टेडियम में आयोजित यौनकर्मी सम्मेलन व बडे घरों में चल रही वेश्यावृति को बहुत ही चलताऊ ढंग से निपटा दिया गया है।

मधु कांकरिया
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