देवशयनी एकादशी- 03 जुलाई
गुरु पूर्णिमा- 07 जुलाई
सावन मास प्रारंभ- 09 जुलाई
कामिका एकादशी - 18 जुलाई
मास शिवरात्रि- 20 जुलाई
हरियाली अमावस्या- 22 जुलाई
हरियाली तीज- 24 जुलाई
नाग पंचमी- 26 जुलाई
तुलसी जयंती- 28 जुलाई
दुर्गाष्टमी- 29 जुलाई
शत्रु नहीं हैं शनि
शनि ग्रह को लेकर जनमानस में कई तरह की भ्रांतियां हैं। लोग इसका नाम सुनते ही भयभीत हो उठते हैं और इसे दुखों का पर्याय मान लेते हैं। पर वास्तव में ऐसा नहीं है, शनि देव के बारे में जानकारी न होने के कारण ही लोग ऐसा सोचते हैं।
भ्रामक धारणा
लोगों के मन में यह भय बना रहता है कि यदि हमारे ऊपर शनि ग्रह का प्रभाव है तो हम दुखों से बच नहीं सकते। यह हमारा भ्रम है कि शनि ग्रह केवल कष्ट ही प्रदान करता है। भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यह बृहस्पति के बाद दूसरा सबसे बडा और रमणीक ग्रह है। किसी भी व्यक्ति पर इनका प्रभाव अधिक समय तक बना रहता है। इस प्रभाव की पूरी अवधि साढे सात वर्ष होती है। एक व्यक्ति के जीवन में अधिक से अधिक तीन बार साढे साती लगती है। शनि की ढइया का प्रभाव 2 वर्ष 6 माह तक रहता है।
ऐसा माना जाता है कि शनि की मूर्ति सीधी नहीं होती। शनिदेव सदैव झुक कर चलते हैं। उनकी दृष्टि तिरछी पडती है, क्योंकि वह स्वयं को अशुभ मानते हैं। इस संबंध में यह कथा प्रचलित है कि गणेश जी के जन्म के बाद शनिदेव नवजात बालक को देखने इसलिए नहीं जा रहे थे कि कहीं बालक पर उनकी दृष्टि पडने से उसे कष्ट न हो जाए। लेकिन देवी पार्वती के बहुत आग्रह करने के बाद शनिदेव वहां गए और अपनी दृष्टि नीचे झुका कर बैठे हुए थे। तब देवी पार्वती ने उनसे बालक को आशीर्वाद देने का आग्रह किया। उनकी दृष्टि के प्रभाव से ही बाद में शिव जी के हाथों गणेश जी की गर्दन कट गई थी। जो ग्रह स्वयं को अशुभ मानकर दूसरों को अपनी दृष्टि से बचाना चाहता है वह विनाशकारी कैसे हो सकता है?
न्याय के देवता शनि
शनि को न्याय का देवता माना गया है। वह कभी भी मृत्यु नहीं देते, बल्कि पूर्व जन्म के बुरे कर्मो का दंड देते हैं। उसके प्रभाव से जो भी कष्ट आते हैं वे मनुष्य को शिक्षा देते हैं। जिससे वह भविष्य में इस प्रकार के काम न दोहराए। ऐसा माना जाता है कि शनि ग्रह मनुष्य को नास्तिक से आस्तिक बनाते हैं। व्यक्ति के मन में धर्म, भक्ति, अध्यात्म की भावना जगाते हैं।
प्रत्येक वर्ष माघ से फाल्गुन (जनवरी-मार्च) की अवधि में सूर्य शनि के कक्ष में प्रवेश करते हैं तो यह अवधि विवाह आदि मांगलिक कार्यो के लिए सर्वाधिक शुभ मानी जाती है। लेकिन इसके विपरीत जब शनि सूर्य के कक्ष में प्रवेश करता है तो अछा नहीं माना जाता। ऐसी दशा में पृथ्वी पर कई तरह के संकट आते हैं। यह चक्र प्रत्येक 30 र्ष के बाद दोबारा आता है। आज संपूर्ण विश्व जिस आर्थिक मंदी से गुजर रहा है, यह शनि के इसी प्रभाव के कारण है।
शनि किसी राशि से बाहर जाते समय समृद्धि, धन, कीर्ति प्रदान करता है। शास्त्र शनि को जितना कष्टदायक मानते हैं। उससे कहीं अधिक सुख, समृद्धि प्रदाता मानते हैं क्योंकि शनि के प्रभाव से जो कष्ट आते हैं वह भी हमें जीवन में शिक्षा देते हैं, जो हमारे लिए अत्यंत उपयोगी है और यदि हमारे ग्रह के प्रभाव से हमें सीख मिले तो इसमें क्या बुराई है?
अत: शनि ग्रह हमें न्यायपूर्ण बनाते हैं, मुश्किल परिस्थितियों का मुकाबला करना सिखाते हैं और हमारी क्षमता बढाते हैं। फिर यह हमारे शत्रु कैसे हो सकते हैं?
कैसे दूर करें शनि का प्रभाव
जब भी आपको यह मालूम हो कि शनि ग्रह का प्रभाव आपकी कुंडली पर दिख रहा है तो नकारात्मक प्रभाव से बचने के लिए आपको प्रत्येक शनिवार को मंत्र ॐशं शनैश्चराय नम: का जप करें।
शनिदेव का ध्यान करते हुए इस स्तुति-निलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। ायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।। (मंद गति से चलने वाले, छाया और मार्तड के पुत्र और यम के बडे भाई शनि, जिनका श्यामवर्ण है, को मैं प्रणाम करता हूं) का उचारण करें। आप इन उपायों को अपना कर देखें। इससे आपका मन विचलित नहीं होगा। इसके अलावा आपको इस निमित्त ये उपाय भी करने चाहिए :
1. हनुमान जी का पूजन, नित्य हनुमान चालीसा का पाठ
2. पीपल के वृक्ष के नीचे आटे का दीपक बनाकर सायंकाल जलाएं
3. काले कुत्ते को तेल चुपडी रोटी खिलाएं
4. काले उडद के लड्डू तिल के तेल में बनाकर कौवे को खिलाएं
5. भैंस को काले चने खिलाएं
6. काले चने का दान दें
7. शनि मंदिर में सरसों का तेल दान करें ।
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