सौ अंकों का सुनहरा सफर सफलतापूर्वक तय करने के लिए सखी को बहुत-बहुत बधाई। अपनी उत्कृष्ट रचनाओं के कारण पत्रिका का हर अंक अपने आपमें विशिष्ट और संग्रहणीय है। इस आधुनिक मशीनी युग में हर इंसान एकाकी और आत्मकेंद्रित होता जा रहा है। ऐसे में यह पत्रिका हमारा अकेलापन दूर करने के लिए नायाब नुसखों का खजाना लेकर आती है। लेख, कहानियां, व्यंजन, परिचर्चा, जैसी रचनाएं मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानवर्धन भी करती हैं। पिछले दिनों जीवन स्थितियां कुछ ऐसी हो गई थीं कि मेरा दृष्टिकोण पलायनवादी हो गया था और मैं हमेशा नकारात्मक बातें सोचती थी। तब सखी ने ही मेरा दृष्टिकोण सकारात्मक बनाया। आज के दौर में ऐसी पत्रिका समाज की आवश्यकता है।
शैली माथुर, कोटा
सखी का जून अंक मुझे बेहद रुचिकर लगा। इसमें जिंदगी से जुडे हर पहलू को शामिल किया गया है। यह पत्रिका अपने नाम को सार्थक करते हुए पाठिकाओं के दिल में अपनी खास जगह बना चुकी है। इसमें हर क्षेत्र से जुडी जानकारियां होती हैं। इसका हर स्तंभ लाजवाब होता है। स्तंभ इतिहास गवाह है और आपका कोना मुझे बहुत ही अच्छा लगा। सच, अगर मां अपने अजन्मे शिशु को गर्भ में ही खत्म कर दे तो यह मातृत्व के लिए बहुत बडा कलंक है। जबकि स"ाई यह है कि आज की बेटियां भी बेटों से बढकर हैं। इस पत्रिका को पढने के बाद मुझे ऐसा लगता है कि इसकी मदद से हम पाठिकाएं अपनी जिंदगी से जुडी समस्याएं स्वयं सुलझा सकती हैं।
श्रीती कुमारी, गया
मैं सखी के ज्यादातर अंक पढ चुका हूं क्योंकि यह मेरी बहनों की प्रिय पत्रिका है। वास्तव में हर अंक को पढने के बाद मैंने स्वयं को पहले से अधिक प्रबुद्ध, कुशल व आत्मविश्वासी पाया है। घर, कार्यस्थल व रसोई के अतिरिक्त जीवन के हर पहलू से जुडी समस्याओं का समाधान पत्रिका के स्तंभों ने किया है। पुरुष होते हुए भी मैं बेझिझक सखी पढता हूं, क्योंकि इस पत्रिका ने मुझे समय-समय पर सिखाया है कि अगर इंसान दृढसंकल्प हो तो जीवन में कुछ भी असंभव नहीं। यदि सखी स्त्रियों को बेहतर मां, बहन और पत्नी बनने की सीख देती है तो हम पुरुषों को भी अधिक संवेदनशील सहचर होने का पाठ पढाती है। बढती महंगाई के दौर में जब हर पत्रिका ने अपनी कीमत बढा दी है, ऐसे में सखी एकमात्र पत्रिका है, जो पाठकों की सच्ची हमदर्द है व पुराने मूल्य में ही हमें उत्कृष्ट सामग्री देती है।
सौमिल जैन, दिल्ली
सखी हम पाठिकाओं को सौंदर्य, स्वास्थ्य और फैशन के प्रति तो जागरूक बनाती ही है, साथ ही इसके विचारोत्तेजक लेख भी लाजवाब होते हैं। परिचर्चा जैसे स्तंभ के माध्यम से यह हम पाठिकाओं को वैचारिक अभिव्यक्ति का मंच भी प्रदान करता है। इतनी अच्छी पत्रिका के लिए आपको बधाई।
डॉ. रश्मि गोयल, नीमच (मप्र.)
आज पति और बच्चे दोनों अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त हैं। गर्मियों की उदासी भरी दुपहरी में सखी का ही सहारा होता है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि अगर यह पत्रिका न होती तो जिंदगी कितनी नीरस होती। सखी पढने के बाद मुझे इस बात का एहसास हुआ कि किताबें इंसान की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं और यह पत्रिका सचमुच मेरी सबसे अच्छी दोस्त बन गई है।
सीमा अरोडा, दिल्ली
सखी शुरू से ही स्त्रियों की हितैषी पत्रिका रही है। साथ ही इसमें पुरुषों के लिए भी रोचक और जानकारीपूर्ण पठनीय सामग्री होती है। इसमें प्रकाशित लेख, कहानियां, कविताएं तथा कवर स्टोरी मुझे खास तौर पर पसंद आती है।
डॉ. राधेश्याम डाणी, ब्यावर (राज.)
जब से मैंने सखी पढना शुरू किया उसी दिन से मैंने ठान लिया कि मैं अपनी सभी परिचितों को इसके बारे में बताऊंगी। आज मेरे सभी परिचित और रिश्तेदार सखी के प्रशंसक हैं। मेरी सारी सहेलियां मुझे सखी कहकर बुलाती हैं। जून के महीने में पत्रिका का पर्यटन विशेषांक पढकर हमने भी केरल घूमने का कार्यक्रम बना लिया।
सारिका, पटना
मैं सखी की नियमित पाठिका हूं। पत्रिका का करियर विशेषांक अभिभावकों व टीनएजर्स के जीवन में शीतल हवा का झोंका बनकर आया। जिस तरह सखी ने मुझे कुशल गृहिणी बनाया है वैसे ही यह पत्रिका आज की पीढी को करियर विशेषांक द्वारा उन्नति के पथ की ओर अग्रसर कर रही है। यह साहित्य, सौंदर्य और स्वास्थ्य सबकी खोज-खबर देते हुए अपने ज्ञान की खुशबू चारों ओर बिखेर रही है। यह पत्रिका मेरी ही तरह कई लोगों की मार्गदर्शिका व प्रेरणास्रोत बन गई है।
शशि श्रीवास्तव, सागर, (मप्र.)
हमारी लेडीज क्लब में निबंध प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था, जिसका विषय था-घरेलू हिंसा कानून घरेलू हिंसा रोकने में कितना कारगार/उपयोगी है? मैं नहीं जानती थी घरेलू हिंसा अधिनियम क्या है और किन संदर्भो में लागू होता है? तब मैंने सखी के सभी पुराने अंकों में प्रकाशित कानून स्तंभ को पढा और सखी की सहायता से निबंध प्रतियोगिता में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। मई माह में प्रकाशित कवर स्टोरी मुझसे ही है मेरी पहचान के अंतर्गत लेखिका मैत्रेयी पुष्पा के विचारों को पढकर मुझे लगा मैं अपनी आपबीती पढ रही हूं।
गीता मेलगंड, सिंहभूम
हमारे परिवार के सभी सदस्यों को सखी बेहद पसंद है। इस पत्रिका में हेल्थ केयर और सौंदर्य स्तंभ के माध्यम से कई नई और उपयोगी जानकारियां दी जाती हैं। मई अंक में प्रकाशित कवर स्टोरी में मुझसे ही है मेरी पहचान बहुत सटीक थी । मेरी राय में हर लडकी को यह स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वह अपनी मर्जी से शादी के बाद अपना सरनेम बदले या न बदले।
रीता सिन्हा, रांची
सखी स्त्रियों की संपूर्ण पत्रिका है, जो जीवन के विविध आयामों को समेटते हुए हमें विविध क्षेत्रों की नवीनतम जानकारियों से अवगत कराती है। पत्रिका के विभिन्न स्तंभ सटीक सुझाव देते हैं। स्त्री जीवन से जुडा कोई पहलू सखी से अछूता नहीं है और एक पत्रिका में एक साथ इतने विषयों को समेटना आसान नहीं है। इसके विचारपूर्ण लेखों के साथ उत्कृष्ट छपाई और मोहक आवरण पृष्ठ के लिए आपको ढेर सारी बधाई।
पुष्पा रानी, नैनीताल
नाम के अनुरूप सखी हमारे घर के प्रत्येक सदस्य की सखी बन गई है। सखी का नया अंक आते ही सभी इसे पहले पढने को आतुर हो उठते हैं। पत्रिका के मई अंक में प्रकाशित कवर स्टोरी मुझसे ही है मेरी पहचान पढकर मन प्रफुल्लित हो गया। इसमें सेलिब्रिटीज के विचारों के मन में उथल-पुथल मचा दी लेकिन निष्कर्ष यही है कि पति का नाम भारतीय नारी में भारतीयता की पहचान देता है। भारतीय नारी चाहे कितनी आधुनिक और स्वतंत्र हो जाए किंतु पति के नाम को अपने अस्तित्व का अभिन्न अंग मानती है। पति के न होते हुए भी मैं पति के नाम के सहारे जीवन के पचासवें पडाव में भी खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करती हूं। इस विषय पर इतनी अच्छी सामग्री देने के लिए मैं तहेदिल से सखी का धन्यवाद करती हूं।
नीलम एच. तोलवानी
अनुपम नवीनता और आकर्षण लिए हुए सखी से मेरा नाता सात वर्ष पुराना है। पर जब से हाथ को सखी ने साथ दिया है। यह पत्रिका हर महीने हमारे लिए उपयोगी जानकारियों का खजाना लेकर आती है। सही मायने में यह मार्गदर्शक पत्रिका है। वाकई, मैं तहेदिल से इसकी आभारी हूं।
शकुंतला तिवारी, अजमेर
पहली बार जागरण सखी से साक्षात्कार हुआ। पत्रिका का कलेवर, विषय वस्तु एवं साज-सज्जा उत्कृष्ट लगे। आज जब नारी से जुडे सारे परंपरागत मिथक टूट रहे हैं। मई अंक में प्रकाशित कवर स्टोरी में मुझसे ही है मेरी पहचान में सही कहा गया है कि नाम में क्या रखा है, आज की स्त्री अपने काम के बूते पर अपनी पहचान स्थापित कर रही है। इस विषय पर मशहूर शख्सियतों के विचार रोचक लगे। कहानी नोबल रिवेंज नारी की नैसर्गिक संतुलन शक्ति को रेखांकित करती है। व्यंग्य रचना भी स्तरीय थी। भीड से अलग एक भरोसेमंद सखी को साधुवाद।
लक्ष्मी कांत शर्मा
मेरे व्यक्तित्व के विकास में सखी का योगदान सर्वोपरि है। सखी की सभी ज्ञानवर्द्धक सामग्री को मैंने अपनी भाषा, व्यवहार, क्लब की वाद-विवाद चर्चाओं व पाक कला प्रतियोगिताओं में शामिल किया है। जब लोग मेरे व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं तो मैं इसका सारा श्रेय सखी को देती हूं।
निधि लखोटिया
सखी का मई अंक हम युवाओं के लिए बहुत उपयोगी था। इसमें करियर से संबंधित बहुत उपयोगी और नई जानकारियां थीं। पर्यटन स्तंभ के अंतर्गत दीव का बहुत अच्छा लगा। हमसफर व दांपत्य बढिया रहे। मदर्स डे पर मां एन बढिया लगा, अच्छा साहित्य हमें आगे बढने की प्रेरणा देता है और इसमें सखी का पूरा सहयोग है। प्रत्येक विषय पर ध्यान देना संपादकीय सोच का असर है साथ में सहयोगियों का कमाल है। इटैलियन स्वाद में बूथेटा विद टोमैटो एंड बेसिल अच्छा लगा। कवर स्टोरी अच्छा लगा, संपादकीय में पति का नाम इनमें एक स्वतंत्रता से जुडा है तो दूसरा सुरक्षा और भावनाओं से, पूरे विचार ठीक लगे, किचन में छिपा है। सौंदर्य का खजाना अच्छी समझाईस है शाहनवाह हुसैन की। रिश्ता का ठीक रहा, करियर पर विशेष मार्गदर्शन, समपर्ण, समाधान, आत्माकास और भी राहे यादगार अनुभव, सखी द्वारा हमें मिली। सखी के स्तंभ से काफी जानकारी मिलती है।
श्रीमती काशी चौहान
सखी से मैं काफी देर से रूबरू हुई थी। मैंने जब पहली बार इसकी बारीकियों का सब लेखों से अध्ययन किया तो मैं सखी की दीवानी ही हो गई थी बस फिर तो सखी हर महीने मेरे यहां मेरी हमसफर बनकर आने लगी। सखी 2009 मई का अंक एक प्रेरणा भरा अंक साबित हुआ है। मशहूर हस्तियों की पहली कमाई से मैं समझती हूं कि हम सीख सकते हैं कि इन्होंने कितनी लगन से मेहनत की होगी। जिसके कारण इन्होंने आज ऊंचाईयों को लिया है जबकि आज के कलाकार एक ही दिन में सितारों को छूने के सपने देखते हैं। सखी के इस अंक में स्त्रियों के लिए जो कमाल की जानकारियां दी हुई है जैसे सुंदरता को निखारना, अपने को चुस्त दुरुस्त रखना इत्यादि बहुत ही काबिलेतारीफ है। सखी एक अग्रिम पत्रिका है जो सबको आगे बढने को हमेशा हौसला देती आ रही हैं। सखी हर छोटे बडे की सच्ची सखी है। और इसे पढकर अपनी राहते रौनक कर सकता है।
प्रभा प्रताप सिंह
मेरी मम्मी सखी की नियमित पाठिका हैं परंतु मेरी पत्रिकाओं को पढने में कोई विशेष रुचि नहीं थी। मैं इंजीनियरिंग का फाइनल ईयर का छात्र हूं। सखी के मई 2009 के कवर पेज पर करियर विशेषांक देखकर मुझे इसको पढने की जिज्ञासा पैदा हुई। जैसे-जैसे मैं सखी को पढता जा रहा था वैसे-वैसे इसमें समाहित और भी लेखों क्यों पढने का जिज्ञासा बढती जा रही थी। मुझे सखी में सबसे बडी विशेषता यही लगी कि इसने मंदी के दौर में किशोरों के लिये करियर पर ऐसे समय विषय सामग्री प्रस्तुत की जब समाज को इसकी भरपूर आवश्यकता थी। यह अंक किशोरों के लिये बहुत महत्वपूर्ण, ज्ञान रूपी सागर उन्हें नई राह दिखाकर उनमें आशा की किरण प्रज्वलित कर रहा है। अंक पढकर मैं तो सखी का दीवाना हो गया हूं। उम्मीद है मेरे जैसे सभी युवा सखी के दीवाने अवश्य हो जाएंगे। सभी के लिये यह संग्रहणीय अंक है। ऐसे महत्वपूर्ण अंक के लिये मैं पूरे संपादकीय टीम को बधाई देता हूं। स्वतंत्र व्यक्तित्व की धनी आज की नारी अपने नाम को लेकर अपने विचारों को उजागर करती अंक की कवर स्टोरी मुझसे ही है मेरी पहचान में माधुरी दीक्षित तथा डॉ. नंदिता पालशेतकर के विचार अच्छे लगे कि नाम बदलने से न तो स्वतंत्रता में कमी आती है और नहीं पुरानी पहचान मिटती है बल्कि यह तो पति-पत्नी के बीच एक प्यार भरा सेतु है। हलचलें, जीवन की राहों में, पर्यटन तथा जागो सखी कॉलम पसंद आये। निर्भीक और स्वाभिमानी मां एना के विषय में पढना एक सुखद एहसास रहा।
तरुण गुप्ता
मैं स्वभाव से अंतर्मुखी तथा आत्मकेंद्रित हूं शायद बहुत अधिक सामाजिक भी नहीं। ऐसे में सखी हर माह मेरे घर अपनेपन की एक भीनी सी सुगंध ले कर आती है और मुझे दुलार जाती है। अपनों से भी अधिक अपनी सखी इस बार भी नव्य नवेली ही लगी। किचन में छिपा है सौंदर्य का खजाना में शहनाज हुसैन के नुसखे बेहद उपयोगी थे। कवर स्टोरी मुझसे ही है मेरी पहचान लेख तथा उसमें महत्वपूर्ण महिलाओं के विचार प्रेरणास्पद थे किंतु यह भी उतना ही सच है कि आज भी भारतीय स्त्री अपनी पहचान को तरसती है। काश ऐसा हो कि इस पुरुष प्रधान समाज में हर सत्री के अस्तित्व को मान्यता मिले। खानपान में शीतल पेयों की विविधता तरावट दे गई। कहानी अचला बेहद अपनी सी लगी। महेश भट्ट जी का लेख पुरस्कारों की प्रतिष्ठा रुपहले पर्दे के पीछे के अंधकार पर प्रकाश डालता है। उदयगिरी और खंडगिरि की गुफाएं बौद्ध युग की तरफ ले गई। कहना तो बहुत कुछ है किंतु अनुरोध बस इतना है कि कृपया सखी को पाक्षिक करें।
आभा श्रीवास्तव
मैं कई मैग्जीन हमेशा से मंगवाकर ही पढती हूं लेकिन मैं जब बाजार गयी तो मेरी निगाह सखी पर पडी। दिल हुआ कि अब के इस इस सखी को पढके देखे। जब मैं घर आकर मेज पर सखी को रखा तो मेरी दोनों बेटियों ने सखी को देखा तो कहने लगी ये सखी तो बहुत अच्छी है। इसकेपेज तो बहुत अच्छे है। इसमें तो कुछ खास ही होगा। डाइट-स्वस्थ खाए थकान भगाए, ठंडा ठंडा कूल कूल व एक्सरसाइज से रहे त्वचा जवां-जवां, फैशन जिज्ञासा पढा तो कहने लगी सच मम्मी आप तो हमारे लिये सच में सखी लेकर आयी है और मुझे धन्यवाद दिया। जब मैंने सखी देखी व पढी। चिंतन-भतर का दिया जले तो बात बने, सखी सौंदर्य, स्वस्थ्य, व्यक्तिगत समस्या व उलझनें सखी की। ये तो मुझे भी बहुत ही अच्छी लगी। मानो हमारी सब की सखी पहली बार घर आयी है। सो हम सभी की तरह से दिल के साथ सखी का धन्यवाद करते है। वास्तव में सखी सभी के दिलों पर राज करेंगी।
श्री आलोक गोस्वामी, सोनिया गोस्वामी
उम्र के हर मोड पर एक साथी की जरूरत होती है सखी एक ऐसा साथी है जो हर वर्ग, हर उम्र के लिए सच्चे दोस्त की भूमिका निभा रही है। इसकी साफ-सुथरी छवि मन को छू लेती हैं। आज की कडी प्रतिस्पद्र्धा के युग में ऐसी शालीन पत्रिका का प्रकाशन किसी उपलब्धि से कम नहीं है। इसका हर अंक संग्रहणीय है।
नम्रता मेहता, पानीपत
सखी का मई 2009 का अंक पढा। करियर पर आधारित होने के कारण यह अंक युवाओं के लिए विशेष लाभदायक है। आज के युवाओं को करियर के प्रति जागरूक करने व उन्हें सही मार्गदर्शन देने में सखी का महत्वपूर्ण योगदान है। कवर स्टोरी में मुझसे ही है मेरी पहचान लेख बहुत अच्छा लगा इसको पढकर महिलाओं में आत्मविश्वास जाग्रत होता है और उन्हें यह एहसास होता है कि हमारी भी एक पहचान है। आज की नारी भी अब जागरूक हो गयी है। सखी समाज के सभी वर्गो का मार्गदर्शन करती है। हर समस्या का समाधान है सखी है पास। यदि हमें इस पत्रिका का बेसब्री से इंतजार रहता है तो इसका कारण है सखी की अनगिनत खूबियां जो इसे एक विशेष दर्जा देती है।
राजेश बाला जैन
मेरा विवाह कुछ माह पूर्व ही हुआ है और हम शाकाहारी हैं। एक रोज मैंने अपने पति के लिए सखी के जून अंक में प्रकाशित बंगाली व्यंजन आलू पाटलेर डालना सब्जी बनाई, जो उन्हें बेहद पसंद आई। खट्टी-मीठी के अंतर्गत डॉक्टर के प्रेमपत्र का अनुवाद स्तरीय हास्य-व्यंग्य रचना थी। अच्छी प्रिंटिंग, और कागज की क्वालिटी वाली यह पत्रिका सचमुच हम सबकी अभिन्न सखी बन गई है।
ऋचा चतुर्वेदी, इंदौर
सखी अपने आप में संपूर्ण पत्रिका है। जिस प्रकार संपूर्ण और संतुलित आहार हमारे शरीर के लिए लाभदायक है, उसी प्रकार यह पत्रिका हमें संतुलित वैचारिक पोषण देती है। सखी हमारे जीवन का अटूट हिस्सा बन चुकी है। बुक स्टॉल पर इसकी एक झलक पाने के लिए हम बेकरार हो जाते हैं। सखी के सौवें अंक के अवसर पर संपादकीय परिवार को हार्दिक शुभकामनाएं।
अंजु खन्ना, बंगलौर
सखी तुमने संवारा मेरा जीवन खिला-खिला सा रहे ये मन जब से पाया तुमको मैंने नया-नया नित मिलता है ज्ञान पाक कला की शिक्षा देकर मुझे बनाया घर की शान रिश्ते निभाना तुमने ही सिखाया फैशन सौंदर्य सब तुममें समाया
मैं तो बनी अब पिया मन भावन घर को सजाना तुमसे ही सीखा महका-महका मेरा घर-आंगन
तुम बिन रह नहीं सकती अब तो तुम बन गई हो मेरी जान
सीमा श्रीवास्तव, इलाहाबाद |