अतिवादी होना ठीक नही

      
अतिवादी होना ठीक नही

संस्कृति मुख्य रूप से दो प्रकार की कही जा सकती है- भौतिकवादी और आध्यात्मिक। जीवन विषयक दर्शन के संबंध में दोनों के दृष्टिकोण में स्पष्ट भेद है। अन्य अनेक प्रकार की संस्कृतियों का जन्म, दृष्टिकोण में इस प्रकार के भेद के कारण ही होता है।

संसार स्वयं में न खराब है न अच्छा, यह बात सबसे पहले समझ लेनी चाहिए। हम किस प्रकार संसार को देखते हैं, वही असली बात है। हमारी विचार पद्धति और जीवन मूल्यों के अनुरूप हमारी जीवनशैली भिन्न-भिन्न प्रकार की हो जाती है। दार्शनिक विचारधाराओं के संबंध में अतिवादी होना ठीक नहीं है। दोनों में संतुलन रख कर ही दोनों की टकराहट को रोका जा सकता है।

भौतिकवादी संस्कृति

भौतिकवादी संस्कृति के अनुसार जो स्थूल है, ठोस है, जिसका स्पर्श किया जा सकता है और जो इंद्रियों से ग्राह्य होता है बस वही सत्य होता है। भौतिक पदार्थो की प्रकृति के संबंध में और और खोज करने का आग्रह इस संस्कृति में रहता है। भौतिक पदार्थो का यह ज्ञान व्यावहारिक रूप में हमारे जीवन को अधिक से अधिक सुख-सुविधा संपन्न बनाए, यही लक्ष्य भौतिकवादी संस्कृति का होता है। इस संस्कृति को मानने वाले अदृश्य की सत्ता को स्वीकार नहीं करते। अदृश्य की सत्ता का कुछ आभास यदि भौतिकवादी अनुभव करता है तो वह उसे केवल शाब्दिक स्वीकृति देता है, उस संबंध में आगे जानने का कोई प्रयत्न नहीं करता। ऐसा व्यक्ति साहसी तो होता है किंतु वह यह जानना चाहता है कि समुद्र की गहराइयों में क्या छिपा है, पृथ्वी के गर्भ में क्या है, आकाश में कहां क्या है, अथवा विभिन्न ग्रहों में क्या है। यह सारी खोज वह अपनी इंद्रियों एवं मन, बुद्धि और तरह-तरह के वैज्ञानिक उपकरणों एवं स्थूल-सूक्ष्म साधनों के द्वारा करता है। आज हम देख रहे हैं, वैज्ञानिक इस प्रकार की खोज माइक्रोस्कोप, टेलिस्कोप, स्पेक्ट्रोस्कोप्स आदि अनेक उपकरणों के माध्यम से कर रहे हैं। यह सब उपकरण उन वस्तुओं को जानने के लिए हैं, जो दूर, बहुत दूर हैं, कहीं बहुत गहराई में हैं, या जो अत्यधिक सूक्ष्म हैं। आणविक भौतिकी, पारमाणविक भौतिकी के माध्यम से बडे-बडे वैज्ञानिक इन्हीं सारी चीजों की खोज में लगे हुए हैं।

भौतिकवादी दर्शन का दूसरा पक्ष यह धारणा है कियह पूरा संसार हमारे सुख के लिए बना है। भौतिकवादी प्रकृति पर विजय पाकर उसे अपने व्यक्तिगत जीवन के लिए उपयोगी बनाना चाहता हूं। इस प्रकार की संस्कृति में भौतिक समृद्धि पर बल होना स्वाभाविक है। भौतिकवादी चिंतन होता ही है इस प्रकार का। जिस दिशा में मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग करता है उसी दिशा में तो उसका विकास होगा। भौतिकवादी दर्शन के प्रमुख विचार इस प्रकार से वस्तु जगत और उससे प्राप्त होने वाले सुख तक सीमित होते हैं।

आध्यात्मिक संस्कृति

आध्यात्मिक संस्कृति के दर्शन में, दृश्य जगत की अपेक्षा जो अदृश्य है, उसे अधिक महत्व दिया जाता है। वस्तु जगत की सत्ता को पूर्ण रूप से नकारा नहीं जाता, लेकिन यह कहा जाता है कि जो दिखाई देता है केवल उतना ही सत्य नहीं है। कुछ और है, जो अदृश्य है, इंद्रियातीत है, उसकी सत्ता को नकारा नहीं जा सकता। सच बात तो यह है कि आध्यात्मिक व्यक्ति का यह विश्वास होता है कि जो अदृश्य है वही दृश्य जगत को, इंद्रिय ग्राह्य वस्तुजगत को नियंत्रित करता है।

उदाहरण के लिए, शरीर गतिशील है और उसकी सारी क्रियाएं होती रहती हैं, लेकिन किसकी वजह से ये सारी क्रियाएं हो रही हैं? इसका पता हम अपनी इंद्रियों से या अन्य किसी ज्ञान के उपकरण से नहीं लगा सकते। पूर्ण रूप से दृश्य जगत पर नियंत्रण रखने वाला जो अदृश्य है, आध्यात्मिक दर्शन को मानने वाले व्यक्ति की खोज का विषय वही है। आध्यात्मिक विचारधारा वाले लोग भी बहुत साहसी होते हैं, लेकिन उनका साहस, उस अदृश्य को खोजने की चेष्टा करता है जिसका इंद्रियों से अनुभव नहीं किया जा सकता।

अगर किसी मनुष्य की दृश्य वस्तु जगत में घोर आसक्ति है और वह इस वस्तु जगत में विमोहित होने के कारण स्वयं को इसी में डूबा हुआ पाता है, तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हमारी इंद्रियां निरंतर रूप और रंग देख रही हैं, अनुभव कर रही हैं, ये सब निश्चित ही हमारी इंद्रियों को बहुत प्रलोभन में डालने वाले हैं। लेकिन जो और भी आश्चर्यजनक और विमुग्ध करने वाली बात है वह यह है कि तमाम लोग ऐसी वस्तु के प्रति आकर्षित हैं जो अदृश्य है, जिसकी झलक भी अधिकांश लोगों ने नहीं देखी, लेकिन फिर भी उसके लिए वे खुशी- खुशी धन, वैभव, राजनीतिक बल और सारी सुख-सुविधाएं लुटा देने को तैयार हैं।

हर युग में इस प्रकार के लोग होते हैं। सच बात यह है कि संसार में आध्यात्मिक लोग कम ही होते हैं। हां, बहुत से धार्मिक लोग होते हैं, जिन्होंने भगवान को कभी नहीं देखा है, लेकिन फिर भी उन्हें भगवान की धारणा में विश्वास बहुत होता है। वस्तु जगत में मोहाविष्ट होने की अपेक्षा अदृश्य के प्रति मनुष्य का यह आकर्षण बहुत ही विचित्र है, बहुत आश्चर्यजनक है।

मनुष्य जाति में अदृश्य के प्रति स्वाभाविक सहज जिज्ञासा रही है। हम जानना चाहते हैं कि मृत्यु के बाद क्या शेष रहता है। किसी आत्मीय या संबंधी की मृत्यु हो जाए तो तुरंत हमारे मन में यह प्रश्न उठता है कि मृत्यु के बाद क्या होता है। थोडे दिनों तक यह प्रश्न मन में जब तब आता रहता है और फिर न जाने कब विलीन हो जाता है।

वह जो कि भले ही अदृश्य है, किंतु जिसकी सत्ता है, उसे आत्मा कहते हैं। इस अदृश्य सत्ता, इस आत्मा को जानने की प्रक्रिया आध्यात्मिक संस्कृति का मूलाधार है।

भौतिकवादी संस्कृति में प्रकृति पर विजय प्राप्त कर उसे अपनी सुविधा के अनुकूल बनाने की चेष्टा होती है। आध्यात्मिक संस्कृति में प्रकृति को समझने, उसके साथ सामंजस्यपूर्ण जीवन जीने और अंतत: उसके पार जाने का प्रयत्न होता है। यह भौतिकवाद से नितांत भिन्न दृष्टिकोण है। आध्यात्मिक दर्शन व्यक्ति के जीवन को पूर्णत: बदल देता है। व्यक्ति की तो कायापलट कर ही देता है, पूरी की पूरी मनुष्य जाति को ही बदल डालता है।

सांस्कृतिक मूल्यों के स्रोत

जब कोई जाति या समाज या राष्ट्र किन्हीं विशिष्ट जीवन मूल्यों को मानकर चलता है, तो यह स्पष्ट है कि ये मूल्य किसी के द्वारा दिए गए होंगे, किसी के द्वारा बनाए गए होंगे। इस प्रकार के जीवन मूल्यों का निश्चित ही कोई आधार, कोई स्रोत होता है, जहां से इन्हें लिया जाता है। कहीं न कहीं इनकी व्याख्या करके लोगों के हितार्थ इन्हें प्रस्तुत किया गया होता है।

कम्युनिस्ट देशों में, जिनकी समस्त पद्धतियां आज हम टूटती हुई देख रहे हैं, सरकार ने पहले ईश्वर और धर्म से संबंधित सभी बातों का निषेध कर दिया था। उन्होंने कहा था धर्म एक निरर्थक विचार है, जनसमूह को नशे में रखने का साधन है, एक ऐसी चीज है जो जनता को केवल मदोन्मत्त करता है, पागल बना देता है। कुछ वर्ष पहले अंतिम सोवियत राष्ट्रपति ने कहा-हमने जो सबसे बडी गलती की वह यह कि अपने देश से धर्म को बाहर निकाल फेंका। उन्होंने बाइबिल, वेद या किसी भी धार्मिक ग्रंथ को स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। लेकिन उन्होंने एक व्यक्ति के दर्शन को स्वीकार किया। वह व्यक्ति था-कार्ल मा‌र्क्स। प्रारंभ में, सोवियत संघ ने मा‌र्क्सवादी दर्शन के आधार पर अपने जनसमाज के लिए नियम बनाए, लेकिन कितनी करुणाजनक स्थिति उस देश की हुई। बात यह है कि मनुष्य को रोटी कपडा और मकान के अलावा कुछ और भी चाहिए। मनुष्य केवल रोटी के सहारे जीवित नहीं रह सकता।

तो ध्यान देने की बात यह है-कि किसी भी संस्कृति की विचारधारा के पीछे कोई बुनियाद होती है, कोई स्रोत होता है, जहां से वह निकलती है। वे मूल्य, जिनका वह संस्कृति अनुसरण करती है, किसी न किसी के द्वारा स्थापित किए हुए होते हैं। चाहे वह एक व्यक्ति के द्वारा बनाए गए हों, या समूह के द्वारा। इस्लाम धर्मानुयायी, मध्य पूर्व के और अरब राष्ट्रों को देखें तो वहां की पूर्ण संस्कृति का स्रोत मुहम्मद साहब के आदेश हैं, वहां की पूरी संस्कृति उनके उपदेशों की नींव पर ही बनी है। इसी प्रकार ईसाई धर्मावलंबी देशों में लोगों के जीवन मूल्यों का स्रोत बाइबिल है। जिस संस्कृति की नींव में जीवन मूल्यों की जडें गहरी नहीं होतीं, वह संस्कृति हर पांच-दस वर्ष में बदलती दिखाई देती है, और वहां के लोग जिस समय जो हवा चल गई उसे मानने लग जाते हैं, जब वो विचार दिखाई दिए उन्हें स्वीकार कर लेते हैं। दोनों ही स्थितियों में, यह तो है कि कोई न कोई मूल्य ऐसे होते हैं जो समयानुसार प्रमुख हो जाते हैं, और संस्कृति की धारा का युगानुसार दिशानिर्देश करते हैं।

(प्रस्तुति : स्वामी निखिलानंद जी, चिन्मय मिशन ट्रस्ट)

सखी प्रतिनिधि
 
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