इस माह के पर्व त्योहार

      
इस माह के पर्व त्योहार

बैकुंठ चतुदर्शी- 01 नवंबर

कार्तिक पूर्णिमा- 02 नवंबर

गणेश चतुर्थी- 05 नवंबर

कालभैरव अष्टमी- 09 नवंबर

उत्पन्ना एकादशी- 12 नवंबर

सोमवती अमावस्या- 16 नवंबर

राम विवाहोत्सव- 21 नवंबर

मोक्षदा एकादशी- 28 नवंबर

प्रदोष व्रत- 29 नवंबर

देवताओं का दीपोत्सव कार्तिक पूर्णिमा

सनातन धर्म में चातुर्मास का विशेष महत्व है। धर्मग्रंथों के अनुसार आषाढ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी की रात्रि से भगवान विष्णु चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं। हरिशयनी एकादशी से चार माह तक इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है। संपूर्ण विश्व के पालक भगवान विष्णु के इस समय योगनिद्रालीन होने के कारण ही चातुर्मास में सभी शुभ कार्य वर्जित हैं। यही कारण है कि दीपावली के अवसर पर भी लक्ष्मी जी का पूजन भगवान विष्णु के बिना ही किया जाता है। चार मास की योगनिद्रा पूर्ण हो जाने के उपरांत जब भगवान विष्णु कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं तब यह चतुर्मास समाप्त हो जाता है। इसी कारण यह तिथि देवोत्थान एकादशी के नाम से जानी जाती है। भगवान विष्णु के स्वरूप शालिग्राम का विवाह लक्ष्मी की अंशरूपा तुलसी से संपन्न होता है। यह विवाहोत्सव कार्तिक पूर्णिमा के दिन पूर्ण होता है और इस दिन स्वर्गलोक में देवता दीपावली का उत्सव मनाते हैं। इसी की याद में कार्तिक पूर्णिमा को मंदिरों और तीर्थस्थलों पर दीपोत्सव का आयोजन किया जाता है।

प्रचलित कथा

प्राचीनकाल में त्रिपुर नामक दैत्य ने तीर्थराज प्रयाग में कठोर तपस्या द्वारा सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी को प्रसन्न करके सर्वत्र विजयी होने का वरदान प्राप्त कर लिया और उसने देवताओं को हरा कर स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया। तीनों लोक उसके अत्याचार से कांपने लगे। उसने कैलास पर्वत पर भी आक्रमण कर दिया और भगवान शिव के साथ कई दिनों तक हुए घमासान युद्ध के बाद वह कार्तिक पूर्णिमा के दिन मारा गया। इसी खुशी में देवताओं ने दीप प्रज्वलित करके अपना हर्ष प्रकट किया। आज से 5105 वर्ष पूर्व कार्तिक पूर्णिमा के दिन निम्बार्काचार्य का जन्म हुआ। वैष्णव इन्हें भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का अवतार मानते हैं और उनकी जयंती बडी श्रद्धा के साथ मनाते हैं। सिक्खों के आदिगुरु नानकदेव का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा के पावन दिन ही हुआ था। इसलिए सिक्खों के लिए यह तिथि सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। एक प्राचीन पांडुलिपि के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के सायंकाल भगवान विष्णु का मत्स्यावतार हुआ था। विष्णुप्रिया तुलसी का जन्म भी कार्तिक पूर्णिमा को ही हुआ था।

गंगा स्नान का माहात्म्य

देवी भागवत एवं ब्रह्मवैवर्तपुराण में वर्णित कथानक के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन श्रीराधा-कृष्ण के अंश से पुण्यसलिला गंगा का प्रादुर्भाव हुआ था। इस कथा का सार-संक्षेप यह है कि एक बार जब कार्तिक पूर्णिमा की रात्रि में गोलोक के रास मंडल पर भगवान श्रीकृष्ण और भगवती राधा विराजमान थीं, तब सरस्वती देवी हाथ में वीणा लेकर मधुर स्वर में गीत गाने लगीं। इससे प्रेरित होकर भगवान शिव ने काव्यपाठ प्रारंभ कर दिया, जिसको सुनकर सारे देवता मंत्रमुग्ध हो गए। श्रीराधा-कृष्ण इतने भाव-विभोर हो उठे कि दोनों द्रवीभूत हो गए। रास मंडल पर राधा-कृष्ण को न देखकर देवगण चिंतित होकर उनकी स्तुति करने लगे। तभी आकाशवाणी हुई कि परमात्मा श्रीकृष्ण और परमेश्वरी राधा ने भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए जलमय रूप धारण कर लिया है। इस प्रकार कार्तिक पूर्णिमा को श्रीराधा-कृष्ण के अंशों के परस्पर मिलने से गंगाजी का आविर्भाव हुआ। कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान का अत्यधिक माहात्म्य होने के पीछे यही कथा मूल आधार है। उत्तर भारत में लाखों श्रद्धालु कार्तिक पूर्णिमा के दिन पुण्य अर्जित करने की कामना के साथ गंगा-स्नान करते हैं। विशेषकर काशी में गंगा के घाटों पर यह पर्व बडी धूमधाम से मनाया जाता है। दिनभर भक्तजन गंगा में स्नान, पूजन और दान करते हैं। सूर्यास्त हो जाने के बाद घाटों पर बडी सजावट के साथ गंगा मैया की महाआरती जिस भव्यता के साथ होती है, वैसी कहीं अन्यत्र नहीं। काशी में होने वाला देव-दीपावली का यह आयोजन अब विश्वविख्यात हो गया है।

पूजन की विधि:

सत्यनारायण की पूजा एवं कथा के लिए कार्तिक पूर्णिमा सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इस तिथि में भगवान सत्यनारायण का व्रत एवं पूजन करने से वे अतिशीघ्र प्रसन्न होकर मनोकामना पूर्ण करते हैं। पूर्णिमा का व्रत रखने के इच्छुक लोग इस तिथि से अपना अनुष्ठान प्रारंभ कर सकते हैं। कार्तिक पूर्णिमा को सूर्यास्त के समय से 2 घंटा 24 मिनट की अवधि के दौरान प्रदोषकाल के समय पूजागृह, तुलसी, आंवला, बिल्ववृक्ष (बेल के पेड), पीपल के पेड, मंदिरों, पवित्र नदियों और सरोवरों में दीपदान करें। घर के ईशानकोण (उत्तर-पूर्व) में दीपक अवश्य रखें और इस दिन उसी उत्साह के साथ दीपमालिका प्रज्वलित करें, जिस तरह आपने दीपावली में किया था।

संध्या टंडन
 
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