देश की किसी भी राजधानी शहर में सरकारी या रेंट कंट्रोल का घर पाना एक तपस्या है। हमने अकसर देखा है कि कई बार तपस्या के बाद भी प्रभु प्रसन्न नहीं होते। लोग हैं कि साधक को ही दोष जडते हैं। अरे भैया! सच्चे मन से साधना नहीं की, अन्यथा परवरदिगार तो बेहद उदार हैं, कतई भोले भंडारी। जो मांगो, सो मिलता है।
अपन इस तप-तपस्या की आग के झुलसे हुए शिकार हैं। नौकरी में एक छोटे शहर से हमें दिल्ली तबादले की सजा मिली। हमने इसके विरुद्ध सरकार में प्रचलित हर किस्म के बहाने बनाए। मसलन बच्चा छोटा है। बीच सत्र में स्थानांतरण से वह न इधर का रहेगा, न उधर का। जिस स्कूल में वह पढता है, वहां छात्रावास ऐसी सुविधा है ही नहीं और रिश्तेदार अब ऐसे सगे नहीं रहे हैं कि उनके यहां यह जिगर का टुकडा छोडा जा सके। आज घर की इकाई शौहर, बीवी और उनकी संतान है। उनका भी भरोसा नहीं है कि कब, कौन, किसे, कहां और क्यों एक-दूसरे को धोखा दे जाए। जहां तक संबंधियों का सवाल है वह भी सिर्फ जन्म, मृत्यु, शादी जैसे मौकों पर पधारने की कृपा करते हैं। आज इसी को वाकई सुख-दुख में साथ निभाना कहा जाता है।
हमने सरकार से यह झूठी गुजारिश भी की कि हमारी पत्नी बीमारी की शिकार है। वह इलाज के खातिर एक स्थानीय डॉक्टर पर निर्भर है। वैसे हमें खुद को बीमार बनाने से भी एतराज नहीं है, पर सरकार में लोग स्वयं को बीमार बताने से हिचकिचाते हैं। जाने ऐसा करने से वक्त के पहले ही रिटायर न कर दिए जाएं। नौकरी गई तो ऊपरी आमदनी भी जाएगी। फिर क्या होगा? ऐसे कई ख्ातरे अंदर से मंडराते हैं, जैसे आकाश में चील-कौए। यों समय से सेवानिवृत्ति तक सरकारी बाबू को गंवारा नहीं है। आधुनिक महिलाएं भले अपनी सही आयु स्वीकार कर लें, किंतु सरकारी मुलाजिम के लिए यह कतई नामुमकिन है। प्रमाणपत्र में आयु कम लिखवाना राजरोग का अनिवार्य लक्षण है। हर सरकारी मुलाजिम के अवचेतन में कुर्सी से भूत होने का भय बसा है।
सरकार कैसे अपनी अर्जी सुनती? व्यवस्था के कान नहीं होते हैं। बचपन में दादी डराती थीं कि जो बच्चे झूठ बोलते हैं, उनके कान कौए ले जाते हैं। हमें दुख है तो यही है। सरकार मक्कार, चाटुकार, ठेकेदार के किस्से-कहानी, कान और ध्यान से सुनती है। बस वह सच की आदी नहीं है। उसने हमारी झूठी फरियाद तक न सुनी। अपनी शिकायत अकेले की नहीं है, जनता का भी यही खयाल है। उसका विचार है कि सरकार के कान वाकई कौए ले उडे हैं। झूठ-सच उसे अब कुछ सुनाई नहीं पडता है। जहां तक व्यक्ति का सवाल है, वह तो सुनने का यंत्र लगा कर काम चला भी ले। सरकार क्या करे? उसके तो कान ही गायब हैं।
तबादले पर दोस्तों ने हमें दिलासा दिया। कितने भाग्यशाली हैं जो इतनी कम सेवा में मुल्क की राजधानी का दर्शन करते हैं? वहां रहोगे तो संपर्क बढेंगे। तरक्की के रास्ते खुलेंगे। पुत्र पप्पू का भी भविष्य बनेगा। राजधानी के स्कूलों का जवाब नहीं है। बडी जगह के ठाठ भी बडे होते हैं। न सब्जियों की कमी, न फलों की। कहीं भी मोहल्ले से पत्थर फेंको तो किसी न किसी मॉल को लगे। बडे शहर जाओ तो वेतन अपने आप बढता है। भत्ते जो ज्यादा हो जाते हैं।
दोस्त तारीफ करें तो खतरे ही खतरे हैं। एक बार कॉलेज में मित्रों ने हमारी कुशाग्र बुद्धि की प्रशंसा की तो हम फेल होते-होते बचे। प्रशंसा के दौरान हमसे कैंटीन में कॉफी की वसूली की सजा दी, वह अलग। दूसरे मौके की भी याद है। तब शुभचिंतकों का इरादा हमसे पिज्जा खरिदवा कर मिल-बांट कर खाने का था। शुरुआत हमारे संतुलित व्यक्तित्व के जिक्र से हुई। यार इसकी पर्सनालिटी में गजब का बैलेंस है। पढाई और खेल दोनों में कितने लोग इतना बढिया तालमेल बिठा पाते हैं? हर इम्तहान में अच्छे नंबर और क्रिकेट के मैदान में लगातार शानदार स्कोर, है और किसी और के वश का। हम फूलकर कुप्पा हुए और मित्रों ने एक मीडियम साइज का पिज्जा धरवा लिया।
यह दीगर है कि इस चर्चा के बाद अपनी बैटिंग को ऐसी नजर लगी कि दो मैचों में शून्य का रिकॉर्ड बनाकर हम टीम से ड्रॉप कर दिए गए। व्यक्तित्व में संतुलन के हमारे प्रशंसक ने टीम में हमारा स्थान हथिया लिया। टीम के कोच ने हमें सांत्वना दी, दरअसल, क्रिकेट आपका शौक है और पवन का जीवन। हमें टीम में ऐसे ही समर्पित खिलाडी चाहिए। थोडा और अभ्यास करो, टैलेंट तो है ही आप में।
हमें लगा कि हमारे मित्र कहीं विरदावली ऐसे ही किसी कारण से तो नहीं गा रहे। हमने सोचा तो पाया कि उनमें से कई के पास सरकारी घर नहीं है, पर अपना खाली हुआ तो कितनों को मिलेगा? ज्यादा से ज्यादा एक को। क्या फिर बाकी उसके तबादले की मनौती मानेंगे? माना कि हमारा पद ऐसा कद्दावर नहीं है कि कमाऊ हो, पर महत्वपूर्ण तो है ही। वह ऐसा खास भी नहीं है कि उसकी खरीद-फरोख्त हो। वह भी तो एक ही के पल्ले पडना है। यहां तो चार-पांच हैं। लगा कि हम व्यर्थ ही भ्रम के भंवर में फंसे हैं। ये अपने हितैषी हैं। जरूर इनकी बातों में कुछ सच्चाई है। क्या पता राजधानी के मुख्यालय में नियुक्ति अपने हित में हो।
अपना प्रतिवेदन खारिज होने की निराशा में कुछ आशा की किरण दिखी। दोस्तों की बातों में दम है। कौन जाने, महानगर पहुंचकर हम सत्ता के सूरज बनें और सहयोगी-साथी सूरजमुखी के समान हमें देखकर ही खिलें। ऐसे ही विचारों में डूबते-उतराते अपनी छुट्टी खत्म हो गई और रवानगी का दुर्दिन भी आ गया। परिवार छोटे शहर और मित्रों से विदा लेते कौन खुश होता है? हम भी उदास मन से स्टेशन पहुंचे तो वहां काफी सहयोगी-साथी मौजूद थे। सबसे मिलते-जुलते ट्रेन का समय हो गया। सबके मुंह पर एक समान वाक्य था-जल्दी पहुंचो और सेटल हो। तुम्हारे राजधानी पहुंचने से हमारा भी तो एक ठिकाना वहां होगा। हमने सबको आश्वस्त किया। वहां हमारा घर सबका होगा। जैसे हमें राष्ट्रपति भवन आवंटित होने जा रहा है। अपन जानते हैं। यह सब प्रस्थान के पल औपचारिक संवाद हैं। कौन इन्हें गंभीरता से लेता है?
यों हम कई बार राजधानी के चक्कर काट चुके थे, पर इस बार मन संशय की बेमौसम घटाओं से घिरा है। सरकारी गेस्ट हाउस सीमित समय का शरणदाता है। घर का क्या होगा? सुना था कि साल-दो साल लगना तो सामान्य बात है, सरकारी घर के आवंटन में। तब तक क्या हम फुटपाथ पर बिस्तर लगाएंगे?
दूसरे दिन दफ्तर में हमने अपने पुत्र के प्रवेश की जानकारी हासिल की एक सहयोगी से। उन्होंने मुसकराते हुए सूचित किया, भैया, यहां जन्म से पहले स्कूलों में बच्चे रजिस्टर करवाए जाते हैं। कौन कहे, कहां चांस लगे। सेंट्रल स्कूल तक में एडमिशन के लिए मंत्री-मंत्रालय की सिफारिश जरूरी है। हमने जानना चाहा, डोनेशन, जान-पहचान कुछ काम आएंगे? उसने हमें अक्ल दी, डोनेशन की अपनी बिसात नहीं है। एक-दो का नहीं, यहां आठ-दस लाख का सवाल है। क्या आप भ्रष्ट हैं? उसने सवाल उछाला और हमने इंकार में सिर हिलाया। उसने डोनेशन शब्द को अपने निजी शब्दकोश से हटाने का निर्देश जारी किया।
उसे बोलने का मर्ज था। यह लाइलाज रोग कइयों को होता है। इसका मरीज धाराप्रवाह बोलता है। चुप रहने से उसे घुटन होती है। अंग्रेजी में इसे वर्बल डायरिया कहा जाता है। मुल्क के ज्यादातर छुटभइये नेता, सेवानिवृत्त अफसर, लेक्चरर, प्रोफेसर, वगैरह-वगैरह इसके शिकार हैं। बडे लोगों की इस बीमारी से ग्रसित जुबानी अतिसार का लघु मानव, याने छुटका बाबू अपन ने महानगर में पहली बार देखा है।
वह सांस लेने के क्षणिक अंतराल के बाद फिर चालू हो गया, कृपया याद रखें। इस राजधानी में मगरमच्छ, अजगर, घडियाल, हिंसक शार्क आदि बसते हैं। यहां बिच्छू-सांप तक की कतई वकत नहीं है। उन्हें तो कोई भी पैरों के नीचे रौंद दे। काम सिर्फ उसका होता है, जिसके काम कोई आता है। एडमिशन के संदर्भ में जान-पहचान जैसे कोरे, अर्थहीन शब्द भुला दें। यहां पारस्परिक पीठ-खुजाई भी बेकार है। बस दारोगाई धौंस चलती है। हमने हाथ जोडे, जॉइनिंग रिपोर्ट दी और अधिक प्रवचन का मौका दिए बगैर कूच कर गए।
आला अफसर ने अपने निजी सविच के मार्फत सलाम भेजा तो हम उनके दिव्य दर्शन को हाजिर हुए। हमने सुना था, वह कामयाबी के कालियादहन हैं। नाम उनका बालकिशन है, पर कन्हैया आज के युग में हैं ही कहां! वह भ्रष्टाचार की गटर के भागीरथ हैं। उन्होंने हमें गौर से सुना। इसके बाद आंख का आभूषण उतारा। श्रीमुख से बोले, अब तो आदेश हो चुका है। हम आपकी ईमानदारी से प्रभावित हैं। करप्शन आप जैसे लगनशील, निष्ठावान लोग ही रोक सकते हैं। दिल्ली के बडे ठाठ हैं। धीरे-धीरे आपको आदत पड जाएगी।
उन्होंने चश्मा चढाया, हमें अपनी उपस्थिति से बर्खास्त करने को। हमारे जाते-जाते उत्साह बढाया, हम भी दिल्ली विजिलेंस के पद पर ही आए थे। तबसे यहीं हैं।
अपन उनसे सहमत हैं। उनके चरित्र-निर्माण में राजधानी की जबर्दस्त भूमिका है। महानगर के असर ने उन्हें अतीत के दकियानूसी मूल्यों से छुटकारा दिला, भ्रष्टाचार की भीमकाय हस्ती बनाया। हमारा क्या होगा? तब से अपन, उनका अनुकरण कर, किसी ताकतवर हस्ती की तलाश में हैं। जो कुछ ले-लिवाकर हमें राजधानी से नजात दिलाए। हमें फिर से छोटे शहर में भेजे। पांच-छह महीने से असफल हैं। जाने, जहर को जहर मारता है, जैसी कहावतें, आज सच हैं या झूठ। |