रिकवरी
आज की पीढ़ी कर्ज में गले-गले तक डूबी है। बैंकों की आसान किस्तें और बढ़ती आमदनी उन्हें लोन लेने के लिए प्रेरित कर रही हैं। पुरानी पीढ़ी को ऋण लेना बुरा लगता था, भले ही वह बैंक से लेना हो। बहुत मुश्किल हालात में ही इसके बारे में सोचा जाता था। इस कहानी के पात्र हरि बाबू ने भी ऐसी ही मुश्किल स्थितियों में कर्ज ले तो लिया, लेकिन फिर न चुकाने की स्थिति में उनके साथ क्या हुआ और कैसे निकले वे इस हालात से, पढि़ए इसी कहानी में।

छोटी-छोटी इच्छाएं पूरी कर पाना भी कई बार मुश्किल होता है मध्यवर्ग के लिए। कुछ ऐसी ही कुंठा और हीनता-बोध से ग्रस्त हो गई इस कहानी की नायिका सुगंधा, जब उसे भाई की शादी में पच्चीस वर्ष पुरानी जरी की साड़ी पहननी पड़ी। खुद को बहनों एवं मां की तुलना में कमतर समझती रही। लेकिन इसी आयोजन में कुछ ऐसा हुआ, जिसने उसे इस मनोवृत्ति से बाहर निकाल दिया। स्त्री-मनोदशा को बारीकी से दर्शाती एक कहानी।
 
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