खुद से भी करें प्यार

      
खुद से भी करें प्यार

खुद से प्रेम करना और दूसरों से प्रेम करना-ये दोनों बातें एक-दूसरे पर निर्भर करती हैं। दूसरों के लिए जीना नहीं सीखते तो खुद से भी प्यार नहीं कर सकते और खुद से प्यार नहीं कर सकते तो दूसरों के लिए भला कैसे जीना सीखेंगे!

जब हम स्वयं अपने भीतर से खुश और संतुष्ट होते हैं तभी हमारी उपस्थिति दूसरों को भी प्रसन्न कर पाती है। अपने बारे में सोचना कोई अपराध नहीं है, लेकिन न सोचना अवश्य ऐसा त्याग है जिससे किसी का भला नहीं होता। रोजमर्रा के जीवन से कुछ उदाहरण लेकर इस धारणा को स्पष्ट किया जा सकता है-

संचिता को ऐसी स्वास्थ्य समस्या है, जो आगे बढकर गंभीर हो सकती है, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की नौकरी के साथ घर में दो बच्चों की जिम्मेदारी संभालने में उन्हें इतना भी समय नहीं मिल पा रहा है कि डॉक्टर के बताए टेस्ट करवा सकें। पिछले एक महीने में वे तीन बार समय लेने के बावजूद डॉक्टर के पास नहीं जा पा रही हैं। कारण पूछने पर उन्होंने जवाब दिया-पहली बार बच्चों की पेरेंट्स मीटिंग के कारण, दूसरी बार किसी जरूरी कार्यवश और तीसरी बार घर में अतिथियों के आने के कारण उन्हें अपना कार्यक्रम मुल्तवी करना पडा।

डॉक्टर रोमेश दत्ता पेशे से चिकित्सक हैं, पिछले महीने उनका एक बचपन का दोस्त वर्षो बाद विदेश से कुछ दिनों के लिए उनके शहर में आया। वे फोन पर रोज मिलने की बात करते रहे, लेकिन जब भी वह मिलना चाहता, डॉक्टर दत्ता की या तो जरूरी मीटिंग होती या कोई इमरजेंसी केस आ जाता..। दोस्त शिकायतें लेकर वापस चला गया, डॉक्टर दत्ता निराश और दुखी होकर खुद पर कुढते रहे कि उनका अभिन्न मित्र नाराज होकर चला गया। एक समय था, जब मधु के हॉस्टल में उसका कमरा इसलिए मशहूर था कि वहां हमेशा रजनीगंधा, गुलाब की महक भरी होती थी, लेकिन आज दस-पंद्रह वर्षो में वह भूल चुकी है कि उसे ताजा खिले फूल सजाने का शौक हुआ करता था। अब उसकी प्राथमिकता की सूची में बच्चों की पसंदीदा सीडी है, पति की शेविंग क्रीम है, राशन और घरेलू सामान है, नहीं हैं तो ताजे खुशबू से भरे रंगबिरंगे फूल..।

खुद को भूलने की आदत

याद कीजिए किस क्षण आपने अपने तमाम संबंधों जैसे पति, बच्चों, दोस्तों, सहकर्मियों के बारे में सोचना बंद करके खुद से अपने संबंध के बारे में सोचा? अपने आप से संबंध क्या इतना गैरजरूरी है कि उस पर न सोचा जाए या खुद के बारे में सोचना आपको अपराधबोध से ग्रस्त कर देता है? हम पूरे दिन में कितना दूसरों के बारे में सोचते हैं और कितना खुद के बारे में, इसके लिए किसी एक दिन के कुछ घंटों का ही उदाहरण काफी है -

सुबह का 5.30 : पडोसी बुजुर्ग स्त्री मॉर्निग वॉक करते हुए पुत्रवधू की शिकायतें कर रही हैं। जल्दी नहीं उठती, बच्चों को समय पर स्कूल नहीं भेज पाती..।

सुबह 9.30-10.00, सहकर्मी नंबर 1 : उफ! मेड रोज छुट्टी कर जाती है, आएगी भी तो ठीक तब, जब ऑफिस जाने का समय हो जाएगा..।

सहकर्मी नंबर 2 : बेटी के टिफिन में सैंडविच भेजना था, भूल से पोहा चला गया..।

नंबर 3 : पति के वॉलेट में फिर उनका पेन कार्ड रखना भूल गई..।

सुबह 11.00 पर एक पाठिका का ई-मेल : मैं जिंदगी से निराश हूं। पति, बच्चों, ससुराल वालों को सिर्फ मेरे कार्य से मतलब है, मैं जिऊं या मरूं उन्हें कोई फर्क नहीं पडता। मैं अपने जीवन की उपयोगिता नहीं समझ पा रही, क्या करूं..?

दोपहर 1.00 बजे आई डाक : ससुराल वालों के असहनीय हस्तक्षेप ने मेरा जीवन नरक बना दिया है, यहां तक कि मेरी पत्नी मुझसे तलाक लेने के बारे में सोचने लगी है..।

..यानी सभी के पास समस्याओं और शिकायतों का पुलिंदा है, कोई खुश नहीं है। अपने इर्द-गिर्द मौजूद हर संबंध के बारे में सोच रहे हैं लोग, नहीं सोच रहे हैं तो सिर्फअपने बारे में। कोई इसलिए परेशान है कि उसका साथी उससे आगे निकल गया, वह वहीं है, कोई सोचता है उसकी तकलीफें कभी खत्म नहीं होंगी, कोई तो इसलिए भी परेशान है कि दूसरे खुश क्यों और कैसे दिखते हैं! कई समस्याएं तो हम केवल इसलिए खडी कर रहे हैं क्योंकि हमारे पास और बडे काम नहीं हैं, सार्थक उद्देश्य नहीं हैं। जीवन सिर्फरोजी-रोटी कमाने का सामान बनकर रह गया है।

चिंतकों के दिए अर्थ

खुद से प्यार करना इसलिए जरूरी है क्योंकि यदि आप खुद से प्रेम नहीं करते तो कोई दूसरा आपसे कैसे प्रेम कर सकता है! महात्मा बुद्ध इसकी दार्शनिक व्याख्या कुछ ऐसे करते हैं, स्वयं के बनो, खुद की सराहना करो और अपने स्व से प्रेम करो, ब्रह्मांड की हर चीज से आपको खुद प्रेम हो जाएगा। दूसरी ओर महान चिंतक अरस्तू इसे जीनियस और अयोग्य व्यक्तियों के संदर्भ में परिभाषित करते हुए कहते हैं, जीनियस खुद अपना सर्वोत्तम मित्र होता है और वह अपनी निजता का पूरा आनंद लेता है, जबकि वह व्यक्ति जिसमें कोई गुण या योग्यता नहीं है, खुद अपना सबसे बडा शत्रु होता है और वह अपनी तनहाई से डरता है। विलियम शेक्सपियर खुद से घृणा करने को बहुत बडा अपराध मानते हैं।

यदि आप दूसरे से प्रेम करना चाहते हैं तो जरूरी है कि खुद को जानें-समझें और अपने स्वाभिमान से प्रेम करें। कई पर्तो में खुद को छुपाने के बजाय गुण-अवगुणों के साथ खुद को स्वीकारें तभी सकारात्मक ढंग से खुद को बदलना भी सीखेंगे अन्यथा खुद के आलोचक बने रह जाएंगे। याद रखें कि आप अपने ही जैसे व्यक्ति हैं, किसी दूसरे की प्रतिलिपि न बनें, अपने जैसे बनें। खुद के बनकर देखें, अपनी गलतियों-अवगुणों को अपनाकर देखें।

अपराध नहीं है अपने लिए सोचना

अपने लिए कुछ करने-सोचने की बात पर आम तौर पर एक ही जवाब आता है-अपने लिए तो सभी जीते हैं। भारतीय दर्शन में भी इसे नकारात्मक अर्थ में प्रचारित किया गया है। एक गीत की पंक्तियां कहती हैं, अपने लिए जिए तो क्या जिए..।

हमें हमेशा यही सिखाया जाता रहा है कि खुद के लिए जीना, अपनी इच्छाओं की पूर्ति करना स्वार्थ है और दूसरों के लिए जीना परमार्थ। इस एक दर्शन को पत्थर की लकीर मानकर हम सब उसका अनुकरण कई बार इस हद तक कर बैठते हैं कि खुद को नजरअंदाज करना हमें बडी बात नहीं लगती। एक मोड पर आकर जब एहसास होता है कि कुछ खो दिया है, तो देर हो चुकी होती है। आिखर क्या कारण है कि तीस-पैंतीस की उम्र तक पहुंचते न पहुंचते 60-65 फीसदी लोगों का वजन बढना शुरू हो जाता है, ब्लड प्रेशर, शुगर, अर्थराइटिस जैसी तमाम बीमारियां घेरने लगती हैं? माना जाता है कि स्वस्थ दिनचर्या और बेहतर आर्थिक स्थिति एक-दूसरे के पूरक हैं। बेहतर आर्थिक स्थिति वाले लोग ही खुद पर ध्यान दे सकते हैं, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसके विपरीत अच्छी आर्थिक स्थिति वाले लोगों को आज ज्यादा बडी बीमारियां घेर रही हैं, क्योंकि सुविधाओं से भरे जीवन की कीमत चुकानी पडती है, शोहरत और समृद्धिअपने साथ अनियमित दिनचर्या और तनाव का खास बोनस भी लाती है। यदि स्त्रियों की बात करें तो वे अपने बारे में कितना सोचती हैं, यह तो आंकडे बता देते हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक हमारे देश में लगभग 93 प्रतिशत स्त्रियां एनीमिया से ग्रस्त हैं। तमाम स्वास्थ्य सुविधाओं के बावजूद प्रसव के दौरान मरने वाली स्त्रियों की तादाद में कमी नहीं आई है। अर्थराइटिस जैसी बीमारी, वजन बढना, पीठ और कमर का दर्द स्त्रियों को आम तौर पर ज्यादा परेशान करता है। छोटी-छोटी बीमारियों से वह हमेशा घिरी रहती हैं। खुद के बारे में सकारात्मक ढंग से सोचना तक उन्हें अपराधबोध से भर देता है और वे अपने स्वास्थ्य पर ध्यान देना भूल जाती हैं। यही कारण है कि वे स्वास्थ्य समस्याओं से ज्यादा घिरी रहती हैं।

खुद से रखें स्वस्थ संबंध

बच्चा बीमार होता है-हम दौडकर डॉक्टर के पास जाते हैं, पति के मामूली से सिरदर्द में भी परेशान हो जाते हैं। यहां तक कि पालतू जानवर भी बीमार होता है तो उसे लेकर डॉक्टर के पास जाते हैं, लेकिन जब बारी अपनी आती है, हम टाल जाते हैं या अनावश्यक देरी करते हैं। खुद से प्रेम करना अपने मन और शरीर को स्वस्थ और सुखी रखना भी है। एक मित्र खाने की बेहद शौकीन हैं, लेकिन मोटापे को लेकर चिंतित भी रहती हैं। वह चाहती हैं वॉक पर जाएं, जिम जाना शुरू करें, योग-ध्यान करें। अपने बीते दिनों के बारे में वह बताती हैं कि नृत्य, बैडमिंटन से लेकर स्विमिंग तक में उन्हें दिलचस्पी थी। वह बेहतरीन एरोबिक कर सकती थीं, आज भी चाहें तो एक हफ्ते में पहली जैसी छरहरी हो सकती हैं। लेकिन कहने-सोचने और करने में काफी फर्क होता है। यदि सचमुच वह अपने शरीर से प्रेम करती तो असमय मोटापे जैसी समस्या से ग्रस्त न होतीं। समय नहीं है जैसी बातें सिर्फ एक बहाना हैं। 24 घंटे का एक दिन सबके लिए समान रूप से होता है। प्रकृति देने में पक्षपात नहीं करती कि किसी को धूप ज्यादा दे, किसी को कम, किसी का दिन बडा कर दे तो किसी का छोटा..। 24 घंटे में एक-एक घंटे का हिसाब हमारे पास होता है कि परिवार, करियर, बच्चों, माता-पिता सबके लिए हमें कितना करना है तो क्या एक-दो घंटा खुद के लिए नहीं निकाला जा सकता? सबकी जिम्मेदारियां उठाने में खुद की जिम्मेदारी से मुंह मोडना कहां की समझदारी है? माधुरी मध्यवर्गीय हैं, पति की मासिक आय पांच अंकों में है। पढी-लिखी बुद्धिजीवी स्त्री फिलहाल अपने खालीपन से घबराई हुई हैं। घर-परिवार के लिए करते-करते उन्होंने अपनी प्रतिभा को खत्म कर लिया है, ऐसा वह सोचती हैं। उन्हें लगता है कि सबको खुश करने के प्रयास में वह अपनी खुशी भूलती चली गई। लेकिन ऐसा कोई प्रयास भी उन्होंने नहीं किया जिससे उन्हें खुशी मिलती और उनकी मुश्किलों की गठरी कुछ हलकी होती। दरअसल उनकी समस्या यह है कि वह सोचती रह गई कि कोई दूसरा आकर उनके लिए कुछ करेगा, यह अपेक्षा हास्यास्पद है। अगर आप अपने बारे में नहीं सोच पा रहे तो कोई दूसरा भला क्यों सोचने लगा? अब स्थिति यह है कि तनाव-अवसाद ने माधुरी के मन और शरीर पर ही नहीं बल्कि समूचे घर पर भी अपना कुप्रभाव छोडा है। अपनी इच्छाएं मारकर उन्होंने हासिल क्या कर किया? क्या उनका परिवार खुश हो सका है? क्या वह खुद खुश हैं? पढी-लिखी स्त्रियां भी अपने बारे में इतनी उदासीन हैं तो अन्य स्त्रियों की बात क्या करें।

खुद को भी दें प्राथमिकता

हम सभी कई तरीकों से अपने मन और शरीर को यातना देते हैं। समय पर खाना न खाकर या अस्वास्थ्यकर ढंग से खाकर, समय पर न सोकर, दवा को निर्देश के अनुसार न लेकर. हम खुद को कितने हलके ढंग से लेते हैं! खुद के लिए प्रयास करना स्वार्थी होना नहीं है। कामकाजी स्त्री यदि महीने भर की हाडतोड मेहनत के बाद पार्लर जाकर फेशियल या हेड मसाज कराना चाहे, स्पा लेना चाहे, रोज खाना बनाने से हुई ऊब को कभी-कभी बाहर डिनर लेकर कम करना चाहे, कभी म्यूजिक सुने, नॉवल पढे, पौधों के बीच समय बिताए और हरियाली के बीच अपनी सांसों का स्पंदन महसूस करे तो क्या वह स्वार्थी है? यदि हां, तो यह स्वार्थ भी अच्छा है। क्योंकि ऐसा स्वार्थ केवल उसके भीतर ही सकारात्मक सोच को जन्म नहीं दे रहा, बल्कि उसके आसपास के माहौल को भी स्वस्थ बना रहा है। यदि अपने प्रयासों से वह अपने भीतर एक नई ऊर्जा महसूस कर पा रही है तो जाहिर है अपने तमाम संबंधों को भी खुशी देगी? आदर्श बच्चों कहला सकें, इसके लिए हम माता-पिता की इच्छा को सर्वोपरि मानते हैं, परिवार, पति, पत्‍‌नी या अन्य संबंधों को खुश रखने के लिए हरसंभव प्रयास करते हैं, अपनी कई इच्छाएं भुला देते हैं, दफ्तर में सहकर्मियों के बीच लोकप्रिय होने के लिए कई ऐसे कार्य भी करते हैं, जो हमें प्रिय नहीं, तो फिर ऐसे कार्य खुद के लिए क्यों नहीं कर सकते, जो हमें प्रिय भी हैं और उससे कोई दूसरा भी नाखुश नहीं है?

आत्म-आलोचना भी है बुरी

अपनी गलतियों की आत्मस्वीकृति अच्छी आदत है, लेकिन अति आलोचना बुरी है, क्योंकि इसमें व्यक्ति खुद को माफ करना नहीं सीख पाता। अतीत की कई गलतियां या भूलें उसका पीछा नहीं छोडतीं। डर, गलतफहमी, भ्रम, दुख, तनाव, गुस्से और अपराधबोध जैसे नकारात्मक मनोभावों के कारण घटनाओं का सही पक्ष वह नहीं जान पाता, दूसरों को सजा देने के साथ वह खुद को भी सजा देता है। दूसरों को माफ कर सकते हैं तो आप खुद को भी माफ करना सीखते हैं। जरूरी है कि अपने कुछ गुणों की तारीफखुद से करें, ऐसी बातें सोचें जो आपको अपने प्रति सुखद एहसास से भर दें। जैसे-किसी दिन आपने किसी जरूरतमंद की मदद की हो, आपने किसी दुखी व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कान ला दी हो..ऐसी कई बातें आपको खुद से प्रेम करना सिखाती हैं। अपना सम्मान करना, अपने स्वाभिमान से प्रेम करना सीखें, तभी दूसरे भी आपका सम्मान करेंगे।

छोटी-छोटी बातों में है बडी खुशी

खुशी बाजार से नहीं खरीदी जाती, इसे अपने मन के भीतर ही खोजा जाता है। कई दफा छोटी-छोटी बातों में भी वह खुशी मिल जाती है, जो बडी खुशियों में मिल जाती है। तीन वर्ष के कॉन्ट्रेक्ट के तहत जर्मनी गए एक मित्र ने वापसी हवाई यात्रा के दौरान सूर्यास्त का दृश्य देखा तो उनकी आंखों में आंसू भर आए। वह लगभग तीन वर्ष बाद इस खूबसूरत सिंदूरी शाम को देख पा रहे थे। चंद क्षणों के इस दृश्य ने उनके मन और विचारों को मानो पवित्र कर दिया और अपनी मातृभूमि के प्रति एक अटूट रिश्ते में बंध गए वह। कुदरत का हर कतरा कितनी शांति प्रदान करता है!

संगीत में गहरी दिलचस्पी थी रुचिका की, लेकिन शादी, बच्चों और करियर के बीच वह कब यह शौक भूलती गई, उन्हें खुद भी पता नहीं चला। बेटी को संगीत सिखाने लगीं तो एक दिन कुछ गुनगुना उठीं। बेटी के शिक्षक ने इतना प्रोत्साहित कर दिया कि उन्होंने अपनी अधूरी संगीत शिक्षा को फिर से शुरू कर लिया। बताती हैं, संगीत ने उन्हें एक बार फिर से युवावस्था के दिनों में लौटा दिया है, वह बेटी के साथ ही पढती हैं, रियाज करती हैं और यहां तक कि उससे प्रतिस्पर्धा भी करती हैं। पुरानी दिल्ली की एक तंग-सी गली में एक जिम है, जो सिर्फस्त्रियों के लिए है। यह बात इसलिए गौरतलब नहीं है कि यह जिम स्त्रियों के लिए है, बल्कि इसलिए है कि इसमें उस समुदाय की स्त्रियां आती हैं, जो आम तौर पर पर्दे में नजर आती हैं। यह उदाहरण बताता है कि धीरे-धीरे ही सही स्त्रियां अपने वजूद को पहचानने लगी हैं, अपने लिए भी कुछ करने की ख्वाहिश उनके दिल में पनपने लगी है।

सुरेंद्र सॉफ्टवेयर की व्यस्त नौकरी में फुटबॉल के अपने शौक को लगभग भूल चुके हैं, जबकि कुछ वर्ष पहले तक वह बेहतर खिलाडी थे। एक छुट्टी के दिन अचानक कुछ लडकों के साथ उन्होंने खेलना शुरू किया तो उनकी सांस फूलने लगी। बताते हैं वह, दो-तीन वर्षो में ही शरीर से धीरे-धीरे मेरा नियंत्रण जैसे खत्म होता जा रहा है। मैं इन वर्षो में एक साथ कई तरह की जिम्मेदारियों में घिर गया और भूल ही गया कि खुद पर ध्यान नहीं दे पा रहा हूं। हमारे काम के घंटे ऐसे हैं कि दिनचर्या को चाहकर भी मैं व्यवस्थित नहीं कर सकता, लेकिन अब मैंने इस स्थिति को चेतावनी की तरह लिया है, मैं जल्दी ही इस पर काबू पाने की कोशिश करूंगा। पूरे हफ्ते न सही, शनिवार और रविवार को वक्त निकालूंगा, उम्मीद है फिर से तीन वर्ष पुरानी स्थिति में लौटूंगा।

मुश्किल है मगर फिर भी

खुद को चाहना या प्यार करना इतना आसान भी नहीं। काम की जरूरतें, जीवन शैली, तनाव, आर्थिक समस्याएं, पारिवारिक जिम्मेदारियां यानी तमाम चीजें हमें खुद से धीरे-धीरे दूर करने लगती हैं। लेकिन राहें तो इन्हीं के बीच से खोजनी पडती हैं। हाल ही में अनीता नायर का उपन्यास आया-लेडीज कूपे। इसकी नायिका 45 वर्षीय अविवाहित स्त्री है, जिसने अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने के सिवाय जीवन में अब तक कुछ नहीं सोचा था। उम्र के इस मोड पर जब वह अपने लिए खुशी ढूंढने की कोशिश करती है तो लोगों के गले यह बात नहीं उतरती। वह जीवन में पहली बार लंबी यात्रा पर अकेली निकलती है और ट्रेन के एक लेडीज कूपे में उसे कई टुकडों में बंटी अपनी ही जैसी कुछ अन्य स्त्रियां मिलती हैं। उन सबकी जिंदगी से प्रेरणा लेकर वह आगे बढती है और इस फैसले तक पहुंचती है कि जिंदगी उसकी है और अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करना कोई अपराध नहीं। नागेश कुकनूर की फिल्म डोर में एक कम उम्र की नवविवाहिता का पति मारा जाता है और उसे जबरन विधवाओं की तरह रहने पर मजबूर किया जाता है। एक दिन किसी गीत की धुन पर बरबस उसके पैर थिरकने लगते हैं और वह खुद को नहीं रोक पाती। नृत्य के बाद उसके भीतर अपराधबोध जागता है कि पति को गए दो महीने भी नहीं हुए और वह थिरक रही है। उसकी मित्र उसे समझाती है कि अपनी छोटी-छोटी इच्छाओं को पूरा करना स्वार्थ नहीं है। हालात विपरीत हो जाएं तो भी मुस्कुराने के छोटे-छोटे पलों को क्यों गंवाया जाना चाहिए!

समीर पुरानी दिल्ली के अच्छे बिजनेसमैन थे, स्थितियों ने कुछ ऐसा रुख लिया कि उन्हें जबरदस्त आर्थिक क्षति हुई और बहुत मेहनत के बावजूद वह इसकी भरपाई नहीं कर पाए। उनके साथ-साथ परिवार की मानसिक-भौतिक स्थिति चरमरा गई थी। कुछ समझ नहीं आता था कि कहां से शुरू करें। वह बताते हैं, मैं जितना खुद को संभालने की कोशिश करता था, उतना ही और गिर जाता था। वक्त ने जैसे जानबूझकर मेरी परीक्षा लेने की ठान रखी थी। जब स्थितियों को संभालना मुश्किल हो गया तो मैंने उन्हें उनके हाल पर छोड दिया। परिवार की राय से छोटी सी नौकरी शुरू कर दी। पत्‍‌नी और बच्चों ने मुझे भरपूर मानसिक संबल प्रदान किया। परिवार के हर सदस्य ने अपना खर्च खुद उठाने की कोशिशें शुरू कर दीं। हमें दो-तीन वर्षो का समय लगा संभलने में क्योंकि यह अर्श से फर्श पर आने जैसा था, लेकिन पूरी तरह एक नई कोशिश की हमने। परिणाम यह हुआ कि कुछ समय बाद हम संभलने लगे। वक्त ने गिराया, लेकिन बहुत-कुछ सिखाया भी। उन विपरीत स्थितियों में हमारा परिवार एकजुट हो गया और अपने दुखों के साथ हमने हंसना भी सीखा, शायद इसीलिए जीने की कला सीख सके। आसान नहीं है खुद से प्रेम करना, जीवन के गूढ अर्थ को समझना, लेकिन जो इसे समझ पाता है-वही अपने होने का अर्थ भी समझ पाता है। जिसने दुख नहीं देखा, उसे सुख की कीमत कैसे मालूम होगी! जिसने फूल का मुरझाना नहीं देखा, वह उसके खिलने का सौंदर्य कैसे महसूस कर सकता है! जो सूर्यास्त के यथार्थ को नहीं स्वीकार सका, वह सूर्योदय का स्वागत कैसे करेगा! जिसने बिछोह के कांटों पर पैर न धरा हो, वह प्रेम की राह पर कैसे चलेगा! और जिसने मौत सी खामोशी के बीच अपनी आंखें न खोली हों, वह जिंदगी का स्पंदन भला कैसे महसूस करेगा!

रचनात्मक व्यस्तता में मिलता है सुकून

ऐश्वर्या राय (अभिनेत्री)

बचपन से लेकर आज तक मैंने वही किया है, जो मुझे अच्छा लगा। वाद-विवाद, नाटक से लेकर भरतनाट्यम तक में हिस्सेदारी थी मेरी, हालांकि अरंगेत्रम नहीं कर सकी, इसका अफसोस है। खालीपन से मेरे भीतर बेचैनी सी आ जाती है। सौंदर्य-प्रतियोगिताओं में हिस्सेदारी भी मेरे लिए सामान्य बात थी, अति-सक्रियता या रचनात्मकता मुझे खुश रखती है। इन 34 वर्षो में कभी स्वास्थ्य के लिहाज से गंभीर समस्या मेरे सामने नहीं आई, इसके लिए ईश्वर को धन्यवाद देती हूं, फिर भी कहूंगी कि एक उम्र के बाद स्वास्थ्य और फिटनेस का ध्यान रखना जरूरी होता है। मिस व‌र्ल्ड का खिताब जीतने के बाद से अब तक लगातार काम कर रही हूं, पहले मॉडलिंग और फिर फिल्में., परिवार और दोस्तों के लिए मैं समय नहीं निकाल पाती, लेकिन जब भी फुरसत होती है मैं सारी कमी पूरी कर लेती हूं। छुट्टी के दिनों में मुझे घरेलू कार्यो से ताजगी मिलती है, अगर मैं फ्री हूं तो कपडों पर इस्तरी भी कर सकती हूं। छोटी थी तो मॉम के साथ किचन में जाकर खाना बनाने में मदद किया करती थी। खाना बनाने से लेकर सिलाई मशीन चलाना तक मुझे आता है। मेरे लिए ये छोटे-छोटे घरेलू कार्य ताजगी और ऊर्जा के माध्यम हैं। मैं मानती हूं कि दूसरों को खुश रखने की पहली शर्त है खुद को स्वस्थ और खुश रखना। खुद को तरोताजा रखने और फिटनेस के लिए मैं योग, ध्यान और स्पा ट्रीटमेंट्स लेती हूं। यह हमारे काम के लिए भी जरूरी है। अब मैं जहां हूं, वहां मुझे रिवार्ड की नहीं, अवार्ड की जरूरत है। मेरी प्रतिभा को सराहा जाए, बस यह चाहती हूं। धीरे-धीरे वर्कोहॉलिक होने की अपनी आदत को भी खत्म कर रही हूं मैं।

संगीत और परिवार का साथ रखता है खुश

टुपुर चटर्जी (मॉडल)

अपने शौक पूरे करने के लिए मुझे कभी सोचना नहीं पडा, मैं जिंदगी को भरपूर जीने में यकीन रखती हूं। पढना, जिम जाना, घूमना, पार्टी में जाना..यानी मैं वे सारे कार्य करती हूं, जिससे मुझे ऊर्जा मिले और मन-शरीर जीवंत हो उठे। मैं अपना खानपान ठीक रखती हूं, मुझे कोई स्वास्थ्य समस्या नहीं है, घूमती बहुत हूं। किसी नई जगह पर जाना मुझे हमेशा अच्छा लगता है, चाहे वह समुद्री किनारा हो, पर्वत श्रृंखला हो या फिर हरियाली से भरपूर जगह। कुछ दिन पहले मैं जर्मनी गई थी और वहां के प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लिया। किताबें भी मुझे नई ताजगी से भरती हैं। कुछ दिन पहले मैंने मेन आर फ्रॉम मार्स वूमेन आर फ्रॉम वीनस नामक पुस्तक पढी, जिसके लेखक जॉन ग्रे हैं। अभी सिंगल हूं, लेकिन समय मिलने पर माता-पिता, भाई-बहन के साथ वक्त गुजारना मेरी प्राथमिकता होती है। शॉपिंग मुझे पसंद है, सप्ताह में तीन बार जिम जाती हूं। कभी-कभी पार्लर जाती हूं। संगीत मुझे पसंद है, लेकिन फास्ट नहीं, मधुर-कर्णप्रिय और सुरीला धीमी गति वाला संगीत मुझे भाता है। कहीं बाहर होती हूं तो संगीत ही मेरा मूड ठीक करता है। मैं मानती हूं कि हमारे काम में व्यस्तता बहुत ज्यादा है, लेकिन इस काम से भी मुझे खुशी मिलती है क्योंकि मेरा पूरा परिवार इससे खुश है और मेरा आर्थिक स्तर भी इससे अच्छा हुआ है। मैं यह जरूर कहना चाहूंगी कि आम तौर पर स्त्रियां खुद पर ध्यान नहीं दे पातीं। मैं फिलहाल अकेली हूं तो ध्यान देती हूं खुद पर, लेकिन परिवार की जिम्मेदारियों को संभालने वाली स्त्रियों को खुद के लिए वक्त जरूर निकालना चाहिए।

स्वयं को जानना ही खुद से प्रेम करना है

स्वामी चैतन्य कीर्ति (संपादक, ओशो व‌र्ल्ड)

खुद से प्रेम करने को अकसर स्वार्थी के अर्थ में लिया जाता है। लेकिन स्वार्थी है कौन? स्वार्थी व्यक्ति को निंदित क्यों समझा जाना चाहिए? स्वार्थी का अर्थ है स्वयं का अर्थ जानना-समझना। जैसे मेरा जीवन किसलिए है? मैं क्यों हूं-किस दिशा में जा रहा हूं? जो स्वयं का अर्थ जानता है-परमार्थ भी वही कर सकता है। जो स्वयं से प्रेम नहीं कर सकता, वह किसी से भी प्रेम नहीं कर सकता। खुद से प्रेम करने की कुछ तकनीकें हैं, हमें खुद को समझने के लिए कई स्तरों पर कार्य करना होता है। पहला स्तर है-शरीर। शरीर को सुंदर बनाएं, स्वस्थ बनाएं, दूसरा स्तर है-मन। इसका अर्थ यह कि अपने मन से तमाम विषाक्त पदार्थो को बाहर निकालें, विकृतियों, राग-द्वेष और नकारात्मक विचारों को खत्म करें। तीसरा स्तर है-विचार, यानी अपने विचारों में स्पष्ट रहें, ऊहापोह की स्थिति में न रहे, उपद्रव-हिंसा में लिप्त न हों, अपनी भावनाओं को सुंदर बनाएं। यही खुद से प्रेम करने की प्रथम शर्त है। जब इस तकनीक से हम पूरी तरह खुद को शुद्ध करते हैं तो जो श्वास उठती है-वही दूसरे को प्रसन्नता प्रदान करती है। विनम्रता और कृतज्ञता हमारे व्यक्तित्व में आनी चाहिए। विनम्रता व्यवहार का आधार है, जबकि कृतज्ञता के लिए प्रार्थना जरूरी है। क्योंकि जब हम प्रार्थना करते हैं, हमारे मन से अहंकार मिट जाता है। प्रार्थना से ही हमारे भीतर सच्ची शक्ति आती है। सागर में शक्ति है, लहर में नहीं, सागर में मिलकर ही लहर को ताकत मिलती है। अगर मैं स्त्रियों की बात करूं तो मुझे लगता है कि वे आज भी हजारों साल पुरानी स्थितियों को ही जी रही हैं, जबकि स्थितियां बदल भी रही हैं। कारण यह है कि उन्हें कहा गया है कि वे दूसरों के लिए ही बनी हैं। उन्हें त्याग की प्रतिमूर्ति कहा जाता है, और इस मानसिक गुलामी की जकडन से वे मुक्त नहीं हो पातीं। मुक्ति पाने के लिए जरूरी है-आत्मसाक्षात्कार। यह जरूरी है खुद को जानने के लिए, यह जानने के लिए किहमें क्या चाहिए, हम कहां जाना चाहते हैं?

इस स्वार्थ में ही परमार्थ छिपा है

शैरी कोहली (स्टाइल गुरु, मुंबई)

जब हम अपने काम से प्यार करते हैं, तो उससे थकान नहीं होती, बल्कि काम के प्रति अपनापन, लगन, निष्ठा बढती है। मैं स्टाइलिस्ट हूं, यह मेरा काम ही नहीं, मेरा जुनून भी है। अपने कार्य में खुद को खपाए रखना मुझे खुशी प्रदान करता है। अपनी खुशी मैं इसी रचनात्मक कार्य में ढूंढती हूं। मेरा जन्म और पढाई-लिखाई यानी मेरी उम्र के 20-22 वर्ष दिल्ली के हौज खास क्षेत्र में बीते, शादी के बाद मुंबई आई तो उदासीनता और हिचकिचाहट दोनों थी, लेकिन फिर आत्मविश्वास के साथ काम शुरू किया और आज मुंबई के लोगों को मैंने एक स्टाइल मंत्र दिया। जब हम खुद से प्यार करते हैं तो उसी प्यार के साथ अपने काम, परिवार और संबंधों के लिए भी काम करते हैं। खुद से प्रेम करने के साथ ही समाज के लिए भी कुछ करने की इच्छा पैदा होती है। मुझे मेरे कार्य के अलावा अंग्रेजी फिक्शन पढने की आदत है। फिटनेस के लिए मैं सुबह दस बजे जिम जरूर जाती हूं। अपने बच्चों को पढाने से मुझे दिली खुशी मिलती है। महीने में दो-तीन बार सामाजिक आयोजनों में भी हिस्सा अवश्य लेती हूं। लेकिन टीवी देखना मेरी आदत में शामिल नहीं है। मेरा मानना है कि हमारे जीने के ढंग में कोई ऐसी बात जरूर होनी चाहिए, जिससे खुद के प्रति प्रेम पैदा हो सके, यदि खुद की जिंदगी को अच्छा करेंगे तो समाज को भी उससे ज्यादा प्यार लौटा सकेंगे। मैं यही कहूंगी कि खुद के लिए जीना यदि स्वार्थ है तो इस स्वार्थ में परमार्थ भी निहित है।

स्व की अवधारणा को व्यापक बनाएं

डॉ. जयंती दत्ता (वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक, दिल्ली)

मेरा स्लोगन है-लव योरसेल्फ। स्त्रियां हर बात का खयाल रखती हैं, घर में कौन क्या खाता है, क्या पहनता है जैसी हर बात उन्हें पता है लेकिन उन्हें क्या चाहिए, यह बात आम तौर पर परिवार वालों को नहीं मालूम होती।

मैंने एक कार्यशाला आयोजित की थी। उसमें शामिल स्त्री-पुरुष ब्यूरोक्रेट थे। मैंने पूछा कि उनके शौक क्या हैं? ज्यादातर लोग जवाब नहीं दे पाए। आप अपनी रुचियों के बारे में तुरंत जवाब नहीं दे पाते तो इसका अर्थ है कि आपके पास अपने लिए वक्त नहीं है। घरेलू हेल्पर से लेकर बडे-बडे अफसरों तक समय नहीं होने का रोना रोते हैं। अपने बारे में सोचना उनकी प्राथमिकता नहीं है। आपसी संबंधों में सराहना की कमी है, दूसरों को खुश कर रहे हैं तो उन्हें भी तो सिखाएं कि वे आपके लिए कुछ करें। खुशी का आधार पैसा नहीं होता। मुझे बागबानी का मुझे शौक है, बैलकनी में मैंने प्लांट्स रखे हैं, खुद उनकी देखभाल करती हूं, चिडियों को देखती हूं तो खुशी मिलती है। ये खुशियां बिना पैसा खर्च किए मिला करती हैं। मनोविज्ञान में दो वाक्यांश प्रचलित हैं-कॉगनेटिव इमोटिव थैरेपी (संज्ञानात्मक भावात्मक चिकित्सा), पॉजिटिव इमेजरी थैरेपी (सकारात्मक कल्पना उपचार)। नकारात्मकता का प्रभाव पूरे शरीर-मन, पाचन तंत्र पर पडता है। यदि खाना सामने है और ठीक तभी किसी ने नकारात्मक कमेंट कर दिया तो मूड बिगड जाएगा और भूख मर जाएगी। कई बार माहौल को बदलना बस में नहीं होता जबकि खुश रहना जरूरी है तो कोशिश करके नकारात्मक स्थितियों से खुद को मानसिक तौर पर हटाना होता है। इसके अलावा बायो फीडबैक कंट्रोल करें, शरीर के संकेतों को पहचानें। शरीर बताता है कि वह इससे ज्यादा दबाव नहीं झेल सकता। अपने दायरे तक सीमित न रहें, इसे बढाएं। यदि आप दूसरों के बारे नकारात्मक सोचते हैं तो अपने लिए ही स्थितियां खराब करते हैं। कंसेप्ट ऑफ सेल्फ यानी स्व की अवधारणा को व्यापक बनाएं, तभी खुद से प्यार कर सकते हैं। इस भावना की गहराई में जाना जरूरी है।

कला सिखाती है खुद से प्रेम करना

मिलॉन मुखर्जी (चित्रकार-लेखक, मुंबई)

पिछले 25 वर्षो से मैं रंगों और कैनवस की दुनिया में मैं कुछ इस तरह घुल-मिल गया हूं कि मेरे भीतर आनंद के सिवा और कुछ नहीं है। जब आप अपने प्रिय काम में ऐसे घुलते हैं जैसे पानी में रंग घोल दें तो बोरियत जैसे शब्द हमारे पास फटकते भी नहीं। हर बार कैनवस पर उकेरे गए चित्र मेरे लिए नए होते हैं, कोई भी नया चित्र मेरे लिए जन्म देने की तरह महान होता है, उसकी खुशी भी नई होती है। कला और रचनात्मकता हमेशा खुश होने की प्रेरणा देती है। रंग थोडा थकाते हैं तो कलम थाम लेता हूं और लिखने लगता हूं। मैंने बांग्ला और अंगे्रजी में लिखा है। आनंद बाजार पत्रिका में मैं मुंबई मुमताज कॉलम लिख रहा हूं लंबे अर्से से। जिन चीजों पर पेंटिंग नहीं बना सकता, उन पर लिखता हूं। क्योंकि मेरा मानना है कि कलम में तूलिका से ज्यादा ताकत है। जैसे कोयल को मैं पेंट कर सकता हूं, लेकिन उसकी आवाज भी तो बडी मधुर होती है। उसे किन रंगों में पेंट करूं? जब यह करने में असमर्थ होता हूं तो शब्दों में उसका वर्णन कर लेता हूं।

यही कारण है कि जिन चीजों पर मैं ब्रश नहीं चला पाया, उन पर मैंने कलम पकडा। अब तक कुल 22 किताबें लिखीं, चार टीवी धारावाहिक भी लिखे हैं। मैंने हमेशा दिल की बात मानी, वही किया जो दिल ने कहा। मैं अपनी फिटनेस को लेकर भी जागरूक हूं। वॉकिंग-जॉगिंग नियमित करता हूं। बाबा रामदेव के रास्ते पर चलकर योग भी निरंतर करता हूं। इंटरनेट का इस्तेमाल करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। एक उम्र के बाद लोग थकने लगते हैं, लेकिन मुझे अपनी उम्र से कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि मैं अपने विचारों में चिरयुवा हूं और हमेशा ऐसे ही रहना चाहता हूं। मैं यह कभी न कर सकता-यदि खुद से और अपनी कला से प्रेम न करता।

समाज कार्यो में ढूंढता हूं खुद को

राहुल बोस (अभिनेता, सामाजिक कार्यकर्ता)

खुद से प्यार करने का अर्थ मेरे लिए बहुत गहरा है। सामाजिक कार्यो के जरिये ही मैं खुद को समझ पाता हूं। कई बार लोग मुझे अभिनेता से ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ता मानते हैं। इस राय पर मुझे आपत्ति भी नहीं है। मैं मानता हूं कि हम भी यदि जानवरों की तरह जीने लगे तो इंसानों और जानवरों में क्या फर्करहेगा? मैंने महसूस किया है कि संकट के समय तो जानवर भी एक-दूसरे की मदद करते हैं। मुझे जरूरतमंदों की सहायता करना फर्ज लगता है। पिछले तीस वर्षो में मुझे याद नहीं कि कब मैंने अपने दोस्तों के साथ मस्ती में समय बिताया हो। हालांकि मैं मानता हूं कि दोस्तों के साथ समय बिताने से एक नई ताजगी, चुस्ती-फुर्ती मिलती है। व्यस्त दिनचर्या में दोस्तों का साथ जीवन में जैसे नई जान डाल देता है। लेकिन व्यर्थ गपशप शायद मेरे लिए नहीं है, मैं जो कुछ भी करूं, सार्थक करूं। मेरे लिए अपने लिए जीना अपनी रुचियों को पूरा करना है। मेरा शौक है पढना, लिखता भी हूं, इंटरनेट सर्फिग करता हूं। दिन भर में चार अखबार पढे बगैर मुझे चैन नहीं मिलता। सच कहूं तो सामाजिक संस्थाओं के साथ जुडने के बाद मुझे लगा कि मुझे मेरा मकसद मिल गया। कैंसर रोगियों के लिए काम करने वाली संस्था के लिए भी मैं काम करता हूं। जो चाहता हूं-कर लेता हूं, शायद इसलिए मैं अपनी जिंदगी को सार्थकता प्रदान कर पा रहा हूं। संगीत सुनना मुझे पसंद है, खास तौर पर वेस्टर्न और जैज म्यूजिक मुझे बहुत पसंद है। हॉलीवुड की फिल्में देखता हूं, रॉक गार्डनिंग का शौक रखता हूं। मुझे ऑपेराज में भी दिलचस्पी थी। मैं बेहद रचनात्मक व्यक्ति रहा हूं और जो कुछ भी मैंने किया है अपनी संतुष्टि के लिए किया है। सिर्फइसलिए कि मैं खुद से भी प्यार करता हूं, कई बार अजीबोगरीब लगने वाली फिल्में भी कर लेता हूं। मैं नहीं मानता कि सामाजिक संस्थाओं से जुडकर मैं कोई महान कार्य कर रहा हूं, यह मेरा अपना स्वार्थ है क्योंकि इससे मुझे आत्मसंतुष्टि मिलती है, लेकिन मैं यह अवश्य चाहता हूं कि आम लोग भी यदि ऐसे सामाजिक उद्देश्यों से जुडें तो समाज का कुछ भला हो सकता है।

जहां चाह है वहीं राह है

डॉ. आम्रपाली पाटिल (चीफ एग्जाीक्यूटिव साइंटिफिक कंटेंट, सीएमपी मेडिका यूके इन मुंबई)

लिखना, पढना, सामाजिक कार्य करना ही मेरा शौक है। मैं मानती हूं-इच्छाशक्ति बडी चीज है। कहावत है जहां चाह है वहीं राह है। मैं खुद डॉक्टर हूं, इसलिए स्वास्थ्य को लेकर बहुत सजग रहती हूं। नियमित तीन महीने के बाद स्वास्थ्य जांच करवाती हूं। मेरी बडी बेटी 15 साल की है। दो बच्चों की मां हूं मैं। स्वास्थ्य के अलावा खानपान का भी ध्यान रखती हूं मैं। व्यस्त दिनचर्या के बीच भी मैं अपने लिए कुछ समय निकाल लेती हूं। मुझे यात्रा करना अच्छा लगता है। कुछ समय पहले मैं लोनावाला खंडाला गई थी। वहां की पहाडियां और फूल बेहद खूबसूरत हैं। अब हम यूरोप जाने वाले हैं। मुझे किताबें भी पसंद हैं। पाउलो कोइलो की किताब अल-केमिस्ट ने मुझे बहुत प्रभावित किया। इससे पहले डेन ब्राउन की लिखी दा विंची कोड भी मुझे पसंद आई। एम डी करने के साथ-साथ मार्केटिंग पर पढने का मुझे बहुत शौक था, जिसे मैं अब कर रही हूं। मैं यूं तो सात से आठ घंटे काम करती हूं, लेकिन कई बार इमरजेंसी केस आने पर इससे भी ज्यादा काम करना पडता है। लेकिन इनके बीच भी सुबह 2 घंटे मैं व्यायाम करती हूं, जिसमें योग, फिर एक्सरसाइज होता है। 25 दिन में एक बार ब्यूटी पार्लर जाती हूं। गाने मुझे पसंद हैं, हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के साथ मुझे कुछ पश्चिमी धुनें भी अच्छी लगती हैं। जब भी समय मिलता है मूड ठीक करने के लिए गाना सुनती हूं। आत्मसंतुष्टि बडी चीज है, जो अपने अच्छे कार्यो से ही मिलती है। आज मेरी कंपनी 40 से 45 देशों से जुडी है। डॉक्टर से लेकर मरीज सभी इसका लाभ उठाते है। यह कंपनी डॉक्टरों के लिए ज्वलंत स्वास्थ्य समस्याओं पर नई-नई फिल्में बनाती है। इस तरह काफी लोग इसका लाभ उठाते हैं। मेरा मानना है कि स्त्रियों को अपनी प्रतिभा को बाहर लाने का प्रयास करना चाहिए और अपनी रुचियों को बढाना चाहिए, तभी उन्हें खुशी मिलेगी और तभी वे अपने आसपास के लोगों को भी खुश रख सकेंगी।

दूसरों को खुशी देने से मिलती है संतुष्टि

राजेश बडेरिया (चित्रकार, दिल्ली)

स्वार्थी होना और अपने बारे में सोचना अलग-अलग चीजें हैं। दूसरों को खुशी देकर इतनी आत्मसंतुष्टि मिलती है कि उसके आगे अपनी खुशी बेमानी लगती है। मैं कलाकार हूं और कला की दुनिया में प्रतिस्पर्धा, सफलता, नाकामी, ईष्र्या सब है। महत्वाकांक्षा सबके भीतर होती है, कलाकार भी चाहता है उसकी रचना को लोग सराहें, इसलिए प्रदर्शनी आयोजित करता है, खुशी पाने के लिए ही यह सब।

कला मेरे लिए खुद को ढूंढना है, क्योंकि पेशे से मैं मैकेनिकल इंजीनियर हूं। मैं ईश्वर में आस्था रखता हूं, प्रकाश मेरी सभी पेंटिंग्स का मूल विषय है। जीवन में कई बार ऐसा होता है-जिसके बारे में लगता है कि नहीं होना चाहिए था और उसे सुधारा जाना चाहिए..। पेंटिंग्स में कहीं किसी उम्मीद को दर्शाता हूं मैं। खुशी के लिए संवेदनशीलता का होना जरूरी है। यदि कहीं पानी की समस्या है और मैं एक ट्यूबवेल वहां लगवा दूं, तो मुझे वह खुशी मिलती है-जो शायद अपने लिए करने में न मिलती। हर धर्म में माना गया है कि आय का एक हिस्सा दान करना चाहिए। मुझे महान लोगों की जीवनियां पढना भी भाता है। विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस से लेकर ओशो तक को मैंने पढा। पाउलो कोइलो की पुस्तक अल-केमिस्ट ने मुझे प्रभावित किया। अध्यात्म में मुझे दिलचस्पी है। पेंटिंग्स में कैनवस, रंगों, लाइट एंड शेड्स के जरिये अनुभवों को निकालने का प्रयास करता हूं। मेरे रंग और आकृतियां ध्यान, आस्था व अध्यात्म की तरफ ले जाती हैं, जिससे जीवन को दिशा मिलती है। मेरा तो यही मानना है।

समस्त साक्षात्कार : मुंबई से पूजा सामंत, चित्रा सेठ, सोमा घोष और दिल्ली से इंदिरा राठौर

इंदिरा राठौर
 
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