भाई-बहन का स्नेह भरा नाता

      
भाई-बहन का स्नेह भरा नाता

बचपन के सुहाने दिन, खेल-खिलौने, शरारतें, छोटी-छोटी बातों पर झगड पडना और सिर्फ एक चॉकलेट के लिए पल भर में सुलह कर लेना। भाई-बहन का रिश्ता होता ही ऐसा है। जरा आप भी याद कीजिए अपने बचपन को। जाने ऐसी ही कितनी ही मधुर स्मृतियां आपके मन के दरवाजे पर हौले से दस्तक देंगी, आपको याद दिलाएंगी उस नेह भरे निश्छल नाते की, जो आपसे कहीं पीछे छूटता जा रहा है।

जिन भाई या बहनों के साथ के हम पले-बढे होते हैं, वे हम से दूर होते चले जाते हैं क्योंकि एक खास उम्र के बाद हमारे सपने, प्राथमिकताएं और हमारी दुनिया बदल जाती है। फिर भी हमारे दिल के किसी कोने में एक-दूसरे के लिए जो स्नेह की भावना छिपी होती है, वह कभी नहीं बदलती। टीवी पर दिखाया जाने वाला एक विज्ञापन किस प्रोडक्ट का है, यहां यह जानना ज्यादा जरूरी नहीं है। पर वह विज्ञापन हमारे दिलों को छू जाता है। इस विज्ञापन फिल्म में यह दिखाया जाता है कि लगभग सत्तर वर्ष से ज्यादा उम्र की दो बहनें अपने भाई के जन्मदिन पर उसे सरप्राइज देना चाहती हैं और इसके लिए वे जल्दबाजी में बिना रिजर्वेशन के लंबी तकलीफदेह यात्रा करके अपने भाई को चौंकाने के लिए उसका मनपसंद उपहार लड्डू लेकर उसके घर पहुंचती हैं। दरवाजे पर लड्डू के पैकेट पर जलता हुआ बर्थडे कैंडल रख कर कॉलबेल बजाकर छिप जाती हैं और भाई जैसे ही दरवाजा खोलता है, बहनें सस्वर हैप्पी बर्थ डे टू यू गाने लगती हैं और इस अप्रत्याशित खुशी से भाई की आंखें भर आती हैं।

रिश्ते का बदलता पारंपरिक स्वरूप

आज भारतीय समाज जिस तेजी से बदल रहा है, उस बदलाव का सकारात्मक असर काफी हद तक भाई-बहन के आपसी रिश्ते पर भी पडा है। पहले परिवार में बेटे का खास रुतबा होता था, तभी तो-घी का लड्डू टेढा-मेढा भला, मुहावरा अयोग्य और अनाकर्षक व्यक्तित्व वाले बेटों के तुष्टिकरण के लिए गढा गया था। पहले लोगों के मन यह धारणा बनी हुई थी कि बेटे और बेटी का भला क्या मुकाबला? बेटा चाहे जैसा भी हो, वह हमेशा बेटी से बढकर होता है और इसी मानसिकता का असर भाई-बहन के आपसी रिश्ते पर भी देखने को मिलता था। ऐसा नहीं था कि पहले भाई-बहन के आपसी रिश्ते में प्यार नहीं था। पुराने समय में भाई के सामने बहन हमेशा कमजोर और निरीह बनी रहती थी, रिश्ते में प्यार तो था पर बराबरी का वह दोस्ताना अंदाज नहीं था जो आज देखने को मिलता है। लडकी को न तो भाई की तरह उच्च शिक्षा हासिल करने का अधिकार था और न ही उसे अपना करियर और जीवनसाथी चुनने की आजादी थी। लडकी को बार-बार यह बताया जाता था कि तुम तो पराया धन हो। लडकों को शुरू से ही इस बात का एहसास कराया जाता था कि तुम शक्तिशाली हो और तुम्हारी बहन कमजोर, इसलिए तुम्हें उसकी रक्षा करनी है। उसके लिए योग्य वर ढूंढने और उसकी शादी का दहेज जुटाने में पिता की सहायता करनी है। भइया-दूज के अवसर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में गाए जाने वाले एक लोकगीत में भी यही भावार्थ निहित है कि भाई अपनी रोती हुई बहन को बहलाने के लिए कहता है कि मत रो मेरी प्यारी बहना पिता की संपत्ति का आधा हिस्सा मैं तुम्हें दे दूंगा तो जवाब में बहन कहती है, भइया, मैं तो परदेसी हूं, मेरे लिए तो बस तुम्हारे द्वारा दिए जाने वाले छोटे-छोटे उपहार ही काफी हैं। लेकिन आज स्थिति काफी हद तक बदल चुकी है। पिता की संपत्ति का आधा हिस्सा देने की बात अब भाई अपनी बहन को बहलाने के लिए नहीं कह सकता क्योंकि अब वह जानता है कि पैतृक संपत्ति में बहन भी कानूनन भाइयों के बराबर की हकदार है, अगर वह इसे नहीं लेती तो यह उसकी उदारता है।

माता-पिता का उदार दृष्टिकोण

मनोवैज्ञानिक डॉ. अशुम गुप्ता कहती हैं, अब माता-पिता का दृष्टिकोण अपनी बेटियों के प्रति पहले की तुलना में काफी उदार हो गया है। पहले परिवारों में बच्चों की संख्या ज्यादा होती थी। आर्थिक साधन सीमित होते थे। इस वजह से माता-पिता को भी यह मालूम होता था कि उन्हें अपना धन और संसाधन वहीं खर्च करना चाहिए, जहां से उन्हें कुछ फायदा मिल सके। इसलिए वे अपने बेटों की शिक्षा-दीक्षा और पालन-पोषण को ज्यादा अहमियत देते थे क्योंकि उन्हें मालूम था कि बेटियां शादी के बाद ससुराल चली जाएंगी और बुढापे का सहारा हमारे बेटे ही बनेंगे। इसलिए हमें अपने बेटों को ही सफलता की राह में आगे बढने का मौका देना चाहिए। लेकिन अब स्थिति काफी बदल चुकी है। भले ही यह बदलाव छोटे शहरों और गांव की तुलना में महानगरों में ज्यादा दिखाई देता है पर आज स्थिति यह है कि प्राय: सभी परिवारों में एक या दो बच्चे होते हैं और आज के सुशिक्षित माता-पिता के लिए यह बात कोई मायने नहीं रखती कि उनकी संतान बेटा है या बेटी। वे तो सिर्फ यही चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करके अपने करियर में सफल हों। अब वे अपनी बेटी को भी अच्छा करियर बनाने के लिए बेहतर अवसर प्रदान करने से नहीं चूकते। अब लडकियों के लिए भी विदेश जा कर उच्च शिक्षा प्राप्त करना और करियर में सफलता के शीर्ष पर पहुंचना आम बात हो गई है।

रिश्ते में सकारात्मक बदलाव

आज की लडकियों का आत्मविश्वास बढा है और निश्चित रूप से इस बदलाव का सकारात्मक असर भाई-बहन के आपसी रिश्ते पर भी दिखाई देता है। अब न तो भाई बेवजह बहनों पर रौब गांठते हैं और न ही बहनें भाई के रहमोकरम पर निर्भर हैं। बल्कि आज की लडकियां आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की वजह से अपने भाई के साथ मिलकर माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी भी सहर्ष निभाती हैं। आज के माता-पिता भी अपनी बेटी को बेटे से कम नहीं समझते और उन्हें बेटों की बराबरी का दर्जा देते हैं।

सरिता जोशी एक बैंक में कार्यरत हैं। वह बताती हैं, मेरे तीन बच्चे हैं, जिनमें दो बेटियां और एक बेटा है लेकिन हमारे मन में कभी भी ऐसा विचार नहीं आया कि हम लडकियों के लिए लडकों से कुछ कम करें, मैंने उन्हें बेटे की ही तरह पाला है। इतना ही नहीं, मैंने अपने तीनों बच्चों के लिए प्रापर्टी खरीदी है। बल्कि मुझे तो अब ऐसा लगता है कि आजकल माता-पिता बेटों से ज्यादा बेटियों पर खर्च करते हैं क्योंकि उनकी पढाई-लिखाई और पालन-पोषण में तो लडकों के बराबर खर्च होता ही है, इसके अलावा उनकी शादी के अवसर पर भी अच्छी खासी रकम खर्च हो जाती है। यह एक सकारात्मक बदलाव है कि आज के माता-पिता लडकियों को बहुत प्यार से पालते हैं और उन्हें भी करियर के क्षेत्र में सफलता के शीर्ष पर देखना चाहते हैं।

दोस्ताना संबंध भाई-बहन का

आज समाज और परिवार का माहौल पहले की तुलना में ज्यादा उदार और खुला हुआ है। आज के समाज में भाई-बहन के बीच समानता पर आधारित दोस्ताना और स्वस्थ संबंध विकसित हो रहा है। इस संबंध में डॉ.अशुम गुप्ता कहती हैं, पहले लडकियों और लडकों की दुनिया अलग होती थी, घरों में जब लडकियां टीनएजर हो जाती थीं तो उन्हें यह हिदायत दी जाती थी कि लडकों से ज्यादा बातें मत करो। इस वजह से भाई-बहन एक-दूसरे के व्यक्तित्व को अच्छी तरह समझ नहीं पाते थे। पर अब आज हमारा समाज तेजी से बदल रहा है और ज्यादातर बच्चे सहशिक्षा वाले स्कूल-कॉलेज में पढते हैं। इस वजह से उनके आपसी संबंधों में खुलापन होता है। अब वे अपने अंतर्मन की बातें आपस में शेयर कर लेते हैं। यहां तक कि उन्हें अपने प्रेम संबंध से जुडी बातें भी एक-दूसरे को बताते हुए कोई झिझक महसूस नहीं होती। आजकल लडकों की दोस्ती लडकियों से भी होती है, इस वजह से वे अपनी बहन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। उन्हें मालूम होता है कि आज एक युवा लडकी की जरूरतें और इच्छाएं क्या हैं, इस वजह से वे पुराने जमाने के भाइयों की तरह अपनी बहन पर बंदिशें नहीं लगाते, बल्कि कई बार तो वे अपनी बहन की जरूरतों के लिए माता-पिता से भी सिफारिश करते हैं कि उसे भी दोस्तों के साथ पिकनिक पर जाने दो या उसे भी पढने के लिए शहर से बाहर किसी अच्छे कॉलेज में भेज दो। शुरुआत से ही जब बच्चे अपने माता-पिता को बेटे और बेटी के बीच कोई भेदभाव बरतते हुए नहीं देखते तो उनके मन में भी बचपन से ही एक-दूसरे के प्रति ईष्र्या-विद्वेष या गैर-बराबरी की भावना विकसित नहीं होती।

जरूरी है आपका सहयोग

भाई-बहन के आपसी संबंध में आने वाली कटुता या दूरी के लिए काफी हद तक माता-पिता जिम्मेदार होते हैं। उदाहरण के लिए अगर आप अपनी बेटी और बेटे के पालन-पोषण में भेदभाव बरतते हैं तो इससे बेटी के मन में अपने भाई के प्रति ईष्या की भावना विकसित होगी। साथ ही आपकी बेटी के मन में इस बात को लेकर हीन भावना और कुंठा पनपने लगेगी कि मुझे करियर में आगे बढने का मौका नहीं मिला और मेरा भाई मुझसे आगे निकल गया। नंदिनी का सपना था कि वह डॉक्टर बनेगी, पर शुरू से ही उसके माता-पिता उसे उच्च शिक्षा दिलाने के सख्त खिलाफ थे, उनका कहना था कि लडकी की शादी में भी काफी पैसों की जरूरत होगी इसलिए हम उसकी पढाई पर ज्यादा खर्च नहीं करेंगे। नंदिनी का सेलेक्शन पीएमटी में हो गया था फिर भी उसके माता-पिता ने मेडिकल कॉलेज में उसका एडमिशन नहीं कराया। जबकि उसका भाई मयंक एक औसत दर्जे का विद्यार्थी था और बारहवीं की परीक्षा में अच्छे अंक नहीं लाने की वजह से उसे कहीं एडमिशन नहीं मिल पा रहा था। तब भी उसके माता-पिता ने डोनेशन की बडी रकम देकर किसी मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में उसे एडमिशन दिलाया। माता-पिता के इस भेदभाव पूर्ण रवैये की वजह से एक प्रतिभावान लडकी कुछ ही वर्षो में कुंठित और चिडचिडे स्वभाव वाली गृहिणी बन गई। जब भी उसे मौका मिलता, वह अपने भाई को ताने देने से नहीं चूकती कि पापा ने अगर मुझे मेडिकल कॉलेज जाने दिया होता तो आज मेरा करियर तुम से कहीं ज्यादा ब्राइट होता।

बच्चों के आपसी रिश्ते कैसे होंगे यह माता-पिता की परवरिश पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है। इसलिए शुरू से उन्हें सचेत तरीके से यह कोशिश करनी चाहिए कि वे स्वयं बच्चों के बीच कोई भेदभाव न बरतें। साथ ही, उन्हें भी एक-दूसरे का खयाल रखना और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करना सिखाएं। यह भी देखा गया है कि अगर माता-पिता के संबंध अपने भाई-बहनों के साथ अच्छे नहीं हैं तो आगे चलकर बच्चों के आपसी संबंध भी अच्छे नहीं बन पाते क्योंकि बच्चे भी अपने माता-पिता का ही अनुसरण करते हैं।

रिश्ते का मनोवैज्ञानिक पहलू

भाई-बहन के रिश्ते में सिबलिंग राइवलरी की भावना दो भाइयों या दो बहनों के आपसी रिश्ते की तुलना में बहुत कम होती है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ. अशुम गुप्ता आगे कहती हैं, प्रकृति ने लडके और लडकी के व्यक्तित्व को बुनियादी तौर से एक-दूसरे से अलग बनाया है और भाई-बहन के व्यक्तित्व का एक-दूसरे से अलग होना ही दोनों को भावनात्मक रूप से एक-दूसरे के ज्यादा करीब लाता है। हम चाहे कितने ही आधुनिक क्यों न हो जाएं पर आज भी लडके और लडकी से परिवार और समाज की अपेक्षाएं अलग-अलग होती हैं। इस वजह से बेटे और बेटी के बीच परिवारों में तुलना कम की जाती है। जबकि जहां दो बहनें या दो भाई होते हैं तो घर से लेकर स्कूल, रिश्तेदार और पास-पडोस तक के लोग सभी उनकी आपस में तुलना करने लगते हैं। जैसे-तुम्हारी बहन तुमसे ज्यादा सुंदर और सलीकेदार है या तुम इतने शरारती हो कि जबकि तुम्हारा भाई कितना शांत और समझदार है। साथ ही भाई और बहन की रुचियां और शौक भी एक-दूसरे से अलग होते हैं, इस वजह से छोटी उम्र से ही उनके बीच झगडे कम होते हैं। उनके कपडे और खेल-खिलौने एक दूसरे से अलग होते हैं, इसलिए उनके बीच इन चीजों को लेकर उनके बीच झगडा बहुत कम होता है। दो बहनों के बीच खिलौने, कपडे, पर्स, ज्यूलरी जैसी चीजों को लेकर अकसर खींचातानी चलती रहती है कि मम्मी हमेशा तुम्हें ज्यादा अच्छी गुडिया दिलाती हैं या मैं तुम्हारी छोटी पड गई ड्रेस क्यों पहनूं? जाने कितनी ही ऐसी छोटी-छोटी बातें, जिन्हें लेकर अकसर दो भाइयों या बहनों के बीच झगडा होता रहता है, लेकिन किसी भाई और बहन के बीच ऐसा कम ही होता है। इस वजह से उनके आपसी संबंध हमेशा मधुर बने रहते हैं।

भावनाओं का अटूट बंधन

यह जरूरी नहीं है कि भाई-बहन का रिश्ता सिर्फ खून का ही रिश्ता होता है बल्कि यह दिल की भावनाओं से जुडा प्यार भरा नि:स्वार्थ रिश्ता है। आजकल परिवारों में ज्यादातर दो ही बच्चे होते हैं और महानगरों के शिक्षित परिवारों में अब बेटे को लेकर ऐसी कोई धारणा नहीं रह गई है कि-बेटा होना ही चाहिए। ऐसी स्थिति में आजकल महानगरों में कई ऐसे परिवार आसानी से दिखने को मिल जाते हैं, जहां लडकियों का कोई सगा भाई नहीं होता, पर उनके मन में अपने कजन के लिए भी वैसा ही स्नेह होता है, जैसा कि किसी लडकी के मन में अपने सगे भाई के लिए होता है। इसी तरह जिन लडकों की सगी बहन नहीं होती है, उन्हें भी बहन की कमी बहुत खलती है, इस वजह से वे अकसर अपनी किसी परिचित लडकी को अपनी बहन बना लेते हैं, मुंहबोले भाई या मुंहबोली बहन का रिश्ता सिर्फ कहने भर को भाई-बहन का रिश्ता नहीं होता बल्कि कई बार यह नाता खून के रिश्ते से भी ज्यादा प्रेमपूर्ण और मजबूत होता है। कविता के परिवार में सिर्फ लडकियां हैं क्योंकि उसका कोई कजन भाई भी नहीं है। वह बताती है, मुझे बचपन में भाई की कमी बहुत खलती थी तो मैंने पडोस में रहने वाली अपनी सहेली तृप्ति के भाई आकाश को राखी बांधनी शुरू कर दी। आज शादी के बाद मैं दूसरे शहर में आ गई हूं। फिर भी मेरा वह भाई मुझे नहीं भूला। मैं भी जब मम्मी से मिलने जाती हूं तो उसके घर जाना नहीं भूलती। वह भी मेरे बच्चों को सगे मामा जैसा प्यार देता है। वह जब भी मेरे घर आता है, मेरे बच्चों की सारी फरमाइशें पूरी करता है।

लडकियों की संवेदनशीलता

यह बात सुनने में थोडी अटपटी लग सकती है पर सच्चाई यह है कि लडकियां जन्मजात रूप से अति संवेदनशील और केअरिंग नेचर की होती हैं और उनकी इसी स्वभावगत विशेषता के कारण कोई भी लडका अपने किसी भाई की तुलना में बहन को ज्यादा पसंद करता है। घर के कामकाज में रुचि लेना, परिवार के सभी सदस्यों का खयाल रखना आम तौर पर हर लडकी की आदत में शुमार होता है। मिसाल के तौर पर अगर घर में एक भाई बीमार होता है तो दूसरा भाई ज्यादा से ज्यादा उसकी तबीयत के बारे में उससे पूछता है, फिर अपने आप में व्यस्त हो जाता है। लेकिन जब बहन को यह बात मालूम होती है तो उसी वक्त सब कुछ भूलकर वह भाई की देखभाल में जुट जाती है। भाई की छोटी-सी परेशानी में भी वह खुद परेशान हो उठती है। उसकी लंबी आयु, अच्छी सेहत और सफल करियर के लिए हमेशा ईश्वर से प्रार्थना करती रहती है। सबसे बडी बात यह है कि बहन के साथ भाई की प्रत्यक्ष प्रतिस्पद्र्धा नहीं होती और न ही उनके हितों का आपस में टकराव होता है क्योंकि दोनों के जीवन की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से काफी हद तक अलग होती हैं।

भले ही भारतीय समाज पहले की तुलना में बहुत बदल गया है फिर भी भाई के मन में यह बात जरूर छिपी होती है कि अपनी बहन के साथ मुझे ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहना, शादी के बाद उसका एक अलग ही घर-संसार होगा। फिर जिसके साथ थोडे ही समय के लिए रहना है, उससे झगडा कैसा? इस वजह से भाई के मन में अपनी बहन के प्रति कहीं न कहीं अतिरिक्त स्नेह की भावना जरूर होती है। साथ ही लडकियों की स्वभावगत संवेदनशीलता भाई के साथ उनके स्नेह भरे नाते को और भी ज्यादा मजबूत बनाती है।

दोस्ताना रिश्ता है हमारा

बाबा आजमी, कैमरामैन

अकसर मैं सोचता हूं कि अगर मेरी जिंदगी में शबाना जी नहीं होतीं तो शायद मैं कितनी ही खुशियों से मरहूम हो जाता। भाई-बहन का रिश्ता असल में बहुत ही प्यारा होता है। इस रिश्ते को मुझसे अधिक शायद ही किसी भाई ने महसूस किया होगा। असल में देखा जाए तो बहनें हमेशा से ही भाई के ऊपर जान छिडकती हैं और अगर बहन बडी हो तो फिर क्या कहना! वैसे तो शबाना जी मुझसे बडी हैं पर हम बचपन से ही अच्छे दोस्त हैं। बचपन में मैं कभी कोई शरारत करता था तो वह मुझे हमेशा बडों की निगाह से बचाती थीं। उनके पास हर समस्या का हल पहले भी था, अब भी है। अगर मुझे कोई परेशानी हो तो मैं उसके बारे में अपनी आपा से जरूर सलाह-मशविरा करता हूं। उनसे अपने दिल की बातें किए बिना मुझे चैन नहीं मिलता। शबाना जी का व्यवहार लोगों के साथ इतना अच्छा है कि सभी उनकी बहुत तारीफ करते हैं और उनका भाई होने की वजह से मुझे भी समाज में इतना मान मिलता है कि मैं खुद को बहुत गौरवान्वित महसूस करता हूं कि मैं शबाना जी का भाई हूं। उन्होंने हमारे पिता कैफी आजमी के साथ मिलकर बहुत चैरिटेबल काम किया है और आज भी कर रही हैं। शायद उनके अच्छे कर्मो का फल मुझे भी मिल रहा है और मैं इस बात से बहुत खुश हूं।

बचपन से शबाना जी मुझे रक्षाबंधन के दिन राखी बांधती हैं। प्राय: लोग राखी बांधने के एक-दो दिन बाद उतार देते हैं पर मैं तब तक नहीं उतारता, जब तक कि राखी टूट या गिर न जाए। मैंने पिछले साल की राखी को अपनी कलाई में अब भी बांधे रखा है, क्योंकि वह धागा सिर्फ रक्षाबंधन के दिन ही नहीं हमेशा मैं अपनी कलाई में बांधकर रखना चाहता हूं और उनके प्यार को हमेशा महसूस करना चाहता हूं। उनके बारे में अगर मैं कुछ भी कहूं तो कम ही होगा। सच्चाई सिर्फ यही है कि मैं उनका भाई हूं और इस वजह से मैं अपने आप को खुशिकस्मत समझता हूं।

नहीं भूलता राखी का वो दिन

प्रिया दत्त

अपनी बहनों को लेकर संजय उतने ही संवेदनशील रहे हैं, जितना हर भाई होता है। बचपन में हमें पॉकेटमनी मिलती थी तो संजय मेरे लिए चॉकलेट लाते थे क्योंकि उनको पता था कि मुझे चॉकलेट बहुत पसंद है। संजय अब भी चॉकलेट ले आते हैं और हम बचपन की बातें याद करके खूब हंसते हैं। मुझे और मेरी बहन को पूरे साल भैया दूज और रक्षाबंधन का इंतजार रहता है। बचपन में हम संजय को राखी बांधते थे और हमें मम्मी से पैसे मिलते थे। मुझे आज भी याद है संजय जब पहली बार होस्टल गए, तो रक्षाबंधन पर उनका आना नहीं हुआ। हमने पोस्ट से राखियां भेजीं लेकिन जब त्योहार आया तो उस दिन हम बहुत रोए। पापा से रहा नहीं गया और अगले दिन वह हम दोनों बहनों को भैया के पास होस्टल ले गए, जहां हमने उनको राखियां बांधी। उस दिन संजय बहुत रोए। उनकी टीचर ने बताया कि कल भी वह रोते रहे, खाना भी नहीं खाया। उसके बाद से कभी भी हमने यह त्योहार मिस नहीं किया। मैं उस राखी के दिन को कभी नहीं भूल पाती, जब भैया जेल में बंद थे और मैं वहीं उनको राखी बांधने गई थी। उस दिन मैंने एक ही वक्त में भैया और पापा को रोते हुए देखा। भैया बैरक में फूट-फूट कर रो रहे थे और पापा जेल से बाहर निकलने के बाद खुद को रोक नहीं पाए। ईश्वर से मेरी प्रार्थना है कि वह ऐसा दिन किसी बहन को न दिखाए। भैया का जीवन दुनिया के लिए खुली किताब की तरह रहा है। हर कोई जानता है कि उन्होंने किस तरह मुश्किलों भरा जीवन जिया है। पापा के चले जाने के बाद वह घर की सारी जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। संजय जैसे भाई के होने पर मुझे हमेशा गर्व महसूस होता है।

बहुत प्यारे थे बचपन के वे दिन

सोहा अली खान

भाई (मैं सैफ को इसी नाम से बुलाती हूं ) हमसे काफी बडे हैं और वह बचपन में इस बात का बहुत रौब झाडते थे लेकिन सच यह है कि मुझे प्यार भी बहुत करते थे। हम एक ही स्कूल में पढते थे। एक बार उन्होंने एक बच्चे को इसलिए पीटा क्योंकि उसने हमारे वॉटर बॉटल से पानी पी लिया था। बाद में उनको स्कूल में अलग सजा मिली और घर पर अम्मा से भी बहुत डांट पडी। उनको उस लडके को सॉरी बोलना पडा। बचपन में भाई बहुत शरारती थे। एक किस्सा याद आ रहा है। पापा ने उनको एक साइकल गिफ्ट की उनके बर्थडे पर, जिसे किसी और को वह छूने भी नहीं देते थे। एक दिन जब इसी बात पर उन्होंने हमारे साथ झगडा किया तो हमने फौरन अम्मा को बताया। अम्मा से उनको खूब डांट पडी। अम्मा के सामने गार्डन में एक घंटे तक हमने उनकी साइकल चलाई। गुस्से में अगले दिन उन्होंने टायर को ब्लेड से काट दिया। मामला उस वक्त सुलझा जब अम्मा हमारे लिए एक नई साइकल लेकर आई। आज उन दिनों को याद करके बहुत हंसी आती है। भाई मेरा बहुत खयाल रखते हैं। एक बार उन्होंने कहा कि तुम अपने फैसले खुद करना सीखो, तभी जिंदगी का मतलब समझ पाओगी। एक्टिंग में दिलचस्पी की बात हमने सबसे पहले उनको ही बताई थी तो वह बहुत खुश हुए। आज भी वह जब हमारी फिल्में देखते हैं तो उनकी राय मेरे लिए बहुत अहम होती है क्योंकि बेकार की तारीफ की जगह वह कमजोरियों को सामने लाते हैं। हमारी फिल्मों में रंग दे बसंती उनको बहुत पसंद आई। भाई जब घर में होते हैं तो बहुत खुश होते हैं। आम तौर पर हम घर में फिल्मों की बातें नहीं करते। हमारे यहां पूरी तरह घरेलू माहौल होता है। सब बहुत खुलकर बातें करते हैं। राखी का त्योहार हमें बचपन से पसंद है क्योंकि उस दिन हमें गिफ्ट मिलता है। पर अब मुझमें इतनी समझ आ चुकी है कि गिफ्ट एक फीलिंग का नाम है और अब मुझ पर इससे कोई खास फर्क नहीं पडता। फिर भी आजजब हम भाई की कलाई में राखी बांधते हैं तो उनकी आंखों में एक वादा होता है कि तुम्हारे लिए हमारे दिल में हमेशा यह प्यार बना रहेगा।

बचपन में बहुत शरारती थीं सुश

राजीव सेन

सुश मुझसे चार साल बडी हैं। बचपन में हम दोनों के बीच महायुद्ध होता था। हम खूब झगडते थे। मेरी उनसे बिलकुल नहीं बनती थी। लेकिन अब हम भाई-बहन से अधिक दोस्त हैं। हम दोनों दिल्ली के एयर फोर्स गोल्डेन जुबली स्कूल में पढते थे। सुश मम्मी-पापा से मेरी खूब शिकायत लगातीं और क्लास भी बंक करती थीं। बडी होने के नाते वह मुझ पर खूब रौब जमाती थीं। मुझे याद है कि एक दिन हम दोनों कुछ ज्यादा ही झगड रहे थे। मैं उनके पीछे पड गया। उस दिन वह कहीं से गले में आर्टिफिशियल पट्टी और हाथों में बैंडेज लगाकर मम्मी के पास पहुंच गई तो मैं उन्हें देखकर घबरा गया। मम्मी तो आग-बबूला होकर मुझे पीटने ही वाली थीं कि उन्होंने पट्टियां खोल दीं। इस तरह मैं पिटने से बच गया। लेकिन उस घटना से मैं डर गया था और उनसे ज्यादा नहीं झगडता था। वह हमेशा मुझसे अधिक तेज दिमाग की रही हैं। उनमें बचपन से आज तक बिलकुल बदलाव नहीं आया। रक्षाबंधन का त्योहार मुझे बहुत अच्छा लगता है। वह अगर भारत में होती हैं तो राखी बांधने जरूर आती हैं। रक्षाबंधन पर मैंने उन्हें कभी गिफ्ट नहीं दिया लेकिन जब वह मुझे राखी बांधती थी तो मैं उन्हें पैसे देता था क्योंकि हमारे घर में रक्षाबंधन पर बहन कोपैसे देने का ही रिवाज है। हमारी और उनकी रुचियां मिलती-जुलती हैं। वह अगर मेरे लिए शर्ट खरीदती हैं तो उन्हें पता होता है कि वह मुझे पसंद आएगी ही। हम दोनों भाई-बहनों को म्यूजिक, तरह-तरह की गाडियों और ट्रैवलिंग का शौक है। हम दोनों अच्छे खाने के शौकीन हैं। सुश बहुत इमोशनल हैं। मुझे याद है जब ढाई साल पहले मेरे पापा की बाईपास सर्जरी हुई थी तो वह पूरी रात जागती रहीं। सुश मेरी बहुत प्यारी बहन हैं और सबसे अच्छी बात यह है कि वह दिल की बहुत अच्छी हैं और उनके साथ मेरा बेहद दोस्ताना रिश्ता है।

मेरे प्रेरणास्त्रोत हैं भैया

तनूजा चंद्रा

मेरे विक्रम भैया उम्र में मुझसे काफी बडे हैं। हमारे बीच तब तक बडा ही फॉर्मल नाता रहा, जब तक वे पढ रहे थे। भैया की पढाई हमेशा हॉस्टल में रहते हुए पूरी हुई। पिछले 20 वर्षो से भैया कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में पढा रहे हैं। जब मैं छोटी थी तो उनसे बातचीत कम ही होती थी, वे उम्र में बडे जो थे। उनके साथ मेरा सम्मान का नाता था। जब से मैंने होश संभाला है, मैंने भैया को हमेशा पढते ही देखा है। भैया की पर्सनैल्टी हमेशा से इंट्रोवर्ट रही है। मैं तब ताज्जुब करती थी कि कोई इतने घंटे लगातार कैसे पढ सकता है? तब हमारे परिवार में कोई नहीं जानता था कि विक्रम भैया विश्व प्रसिद्ध लेखक बनेंगे। हमारी मां कामना चंद्रा लेखिका हैं और भैया मां के नक्शेकदम पर चले। भैया से स्नेहपूर्ण रिश्ता तब बना, जब मैं उन्हें जानने लगी, उनकी किताबें पढ कर समझ सकने की क्षमता मुझमें विकसित होने लगी। हां, भैया की एक बात मुझे तो आज तक समझ नहीं आई, वह है- उनका इंडिया का सोशल सर्कल। विदेश में रहते हुए भी उन्होंने भारत में दर्जनों दोस्त कैसे बनाए हैं। हां, भैया की एक और विशेष बात है कि उन्हें कंप्यूटर बहुत पसंद है। वो या तो पढते-लिखते हैं या फिर कंप्यूटर पर मिलते हैं। कंप्यूटर की इतनी ज्यादा जानकारी होने के बाद भी वे अपनी नॉलेज को हमेशा अपडेट करते रहते हैं। फोन पर हम उनसे अपनी कंप्यूटर से संबंधित समस्याओं के बारे में बातें करते हैं और भैया वहां से हमें जानकारी देते हैं। मजे की बात यह है कि वे हर साल जब भी छुट्टियों में आते हैं, हम सभी के बिगडे कंप्यूटर ठीक करते रहते हैं। भैया से अब मेरा रिश्ता काफी हद तक दोस्ताना हो गया है। जब से वो अमेरिका में बसे हैं, ऐसा एक भी रक्षाबंधन का त्योहार नहीं गया, जब हमारी भेजी राखी उन्होंने कलाई पर न बांधी हो। वे ई-मेल के जरिये अपनी राखी बांधे फोटो यहां जरूर भेजते हैं और हां, राखी के एवज हमें अच्छी-खासी रकम भी भेजते हैं। भैया बहुत प्यारे इंसान हैं। आज मुझमें जो भी थोडी-बहुत रचनात्मकता है, उसके प्रेरणास्त्रोत मेरे भैया ही हैं।

नजरिया अलग है फिर भी एक जैसे हैं हम

गायिका सागरिका

शान मेरा बहुत प्यारा भाई है। बचपन में हम बहुत शरारतें करते और तरह-तरह के गेम्स खेलते। चूंकि मैं बडी बहन थी इसलिए शान के ऊपर मेरा रौब खूब चलता था। हम दोनों के बीच कोई बहुत बडा झगडा कभी नहीं हुआ। शान शुरू से ही बेहद सुलझा और कोमल हृदय वाला रहा है। बचपन में शान के दोस्त ही मेरा दोस्त हुआ करते थे। सब मुझे दीदी कहते थे। दोस्तों के बीच मेरी इतनी चलती था कि खेल के दौरान मुझे कोई हलकी-सी चपत नहीं लगा सकता था। हम लोग बांद्रा में रहते थे। तब हम घर की सीढियों पर बैठ कर न जाने कितने खेल मनगढंत खेलते थे। आइसपाइस और अंत्याक्षरी हमारे पसंदीदा खेल थे। बचपन से ही मैं गाने की शौकीन थी। शान ने बाद में गाना शुरू किया। तब मैं सोचती थी कि जो मैं गाती हूं वही ठीक है। लेकिन जब शान बडा हुआ तो मुझे बताने लगा कि दीदी आप जो गा रही हैं, वह ठीक नहीं है। एक बार इसी बात को लेकर झगडा हो गया था। फिर मैंने बाद में महसूस किया कि वह बडा भले न हो, लेकिन सही समझाता है। हम रक्षाबंधन और भाईदूज दोनों ही त्योहार मनाते हैं। बचपन से मैं ही राखी बांधकर शान को चॉकलेट या उसके पसंद की कोई चीज देती थी। वह छोटा था, लिहाजा उसके लिए गिफ्ट देना जरूरी नहीं था, पर अब वह मुझे गिफ्ट देता है। अब यह त्योहार हमारे और शान के बच्चों के बीच पहुंच गया है। शान की खास खूबी है कि उसमें गजब का धैर्य और सहनशक्ति है। वह दूसरों के दुख को समझता है। लेकिन अपना दुख जाहिर होने नहीं देता है लेकिन मैं ऐसा नहीं कर पाती। हमारे विचारों में काफी असमानता है फिर भी भावनात्मक रूप से हम दोनों के बीच गहरा लगाव है।

(साक्षात्कार : मुंबई से पूजा सामंत, अनुज अलंकार, सोमा घोष एवं दिल्ली से इला श्रीवास्तव)

विनीता
 
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