जिनसे मिली मशहूर हस्तियों को प्रेरणा
जिनसे मिली मशहूर हस्तियों को प्रेरणा

कहा जाता है कि जिंदगी चलते रहने का नाम है। यह चलते रहना आखिर क्या है? जो है उसमें संतुष्ट रहना अच्छी बात है, लेकिन यह भी सच है कि उतने से दुनिया कहें या जिंदगी चलती नहीं। अगर चल भी जाए तो वह किसी खास मुकाम पर पहुंचती नहीं। जिंदगी चले और एक खास मुकाम तय कर सके, इसके लिए जरूरी है अपने व्यक्तित्व, अपने साधनों, अपने परिवेश और अपने समाज का निरंतर परिष्कार। परिष्कार, यानी रूढिग्रस्त और बेकार हो गए तत्वों की काट-छांट और नए जरूरी तत्वों का संव‌र्द्धन और विकास। बेकार तत्वों की काट-छांट के बगैर न तो नए तत्वों को विकास का पूरा अवसर मिलता है और न समाज की विकासयात्रा को कोई अपेक्षित गति ही मिल पाती है। हालांकि परिष्कार का यह कार्य अपने-आप संभव नहीं है। बहुत लोग तो स्वयं अपने परिष्कार के लिए तैयार ही नहीं होते और अगर कोई खुद तैयार हो जाए तो भी अपने आप अपना परिष्कार कर पाना संभव नहीं होता है।

परिष्कार की यात्रा शुरू करने के लिए जरूरत होती है एक ऐसे व्यक्ति की, जो इसके लिए आपको प्रेरित कर सके। इसकी शुरुआत आम तौर पर तो सबसे पहले घर से ही होती है। एक अबोध शिशु के परिष्कार और उसके व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रिया जहां से शुरू होती है, वह है मां। फिर पिता, भाई-बहन, परिवार के अन्य सदस्य और अपना परिवेश। लेकिन घर से शुरू हुई यात्रा अधिकतर व्यक्तियों का सामान्य परिष्कार ही कर पाती है। उसे बस इस योग्य बना देती है कि वह अपना रास्ता चुनने के लिए सक्षम हो जाए। चूंकि हर व्यक्ति अपने-आपमें अलहदा है, विशिष्ट है, इसलिए यह जरूरी नहीं कि घर का माहौल जैसा है, हर सदस्य उसके अनुरूप ही अपना रास्ता चुने।

टाटा जैसे बडे उद्योगपति परिवार में पले-बढे होने के बावजूद डॉ. होमी जहांगीर भाभा विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक बने। एक आभिजात्य परिवार में जन्मे नेताजी सुभाष चंद्र बोस महान क्रांतिचेता हुए और अभावग्रस्त आम परिवार में पैदा हुए स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारतीय मनीषा के आधार स्तंभ ही बन गए। हालांकि ऐसे उदाहरणों की भी कोई कमी नहीं है जो पारिवारिक माहौल से ही प्रभावित हुए और उसी मार्ग पर चले, जिस पर उनके पूर्वज चलते चले आए थे। लेकिन इन तथ्यों से यह जाहिर है कि किसी व्यक्ति के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह अपने परिवार के अनुरूप ही अपना रास्ता चुने।

जब कोई चुनता है मार्ग

परिवार के इतर जब कोई व्यक्ति अपना अलग मार्ग चुनता है तो भी कई बार परिवार के ही किसी न किसी सदस्य से उसे इस मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है, लेकिन कई लोगों को यह प्रेरणा बाहर से भी मिलती है। घर या बाहर से मिली यह प्रेरणा कोई जरूरी नहीं है कि सीधे सीख या मार्गदर्शन के रूप में ही मिले। सीख या निर्देश के रूप में मिली प्रेरणा बहुत प्रभावी होती भी नहीं है। क्योंकि उसे कोई व्यक्ति मान तो लेता है, लेकिन उसका अंतस स्वीकार नहीं कर पाता है। शिक्षा वही ज्यादा प्रभावी होती है जो निर्देश के बजाय संकेतों या अनुभवों के रूप में हासिल की जाए।

इसीलिए कई बार व्यक्ति के बजाय प्रकृति, परिस्थितियां या घटनाएं ही किसी व्यक्ति के लिए प्रेरणास्त्रोत बन जाती हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के पीछे मूलभूत प्रेरणा दक्षिण अफ्रीका की वह घटना ही थी, जब उन्हें ट्रेन की उच्च श्रेणी के एक कूपे से सिर्फ इसलिए उतार दिया गया था कि वह भारतीय थे। दूसरी तरफ स्वामी विवेकानंद को सामाजिक-आध्यात्मिक उत्थान के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस से और मुगल शासकों के खिलाफ छत्रपति शिवाजी के लंबे संघर्ष के प्रेरणास्त्रोत थे उनके आध्यात्मिक मार्गदर्शक समर्थ गुरु रामदास।

वहीं अगर किंवदंतियों पर भरोसा किया जाए तो संस्कृत के महान कवि कालिदास को मूर्खता से विद्वत्ता के पर्याय में रूपांतरित करने के पीछे उनकी पत्नी विद्योत्तमा की प्रेरणा ही सबसे महत्वपूर्ण रही। जबकि महात्मा बुद्ध को बुद्धत्व की उपलब्धि के मूल में प्रेरणास्त्रोत के तौर पर उन घटनाओं को देखा जाता है जब वे राजमहल से बाहर घूमने निकले। पहले उन्होंने कोई रोगी देखा, फिर एक वृद्ध और फिर किसी की शवयात्रा ..। दुनिया से उनके मोहभंग के लिए ये घटनाएं ही काफी साबित हुई। इसी तरह चक्रवर्ती सम्राट बनने को आतुर अशोक ने कलिंग युद्ध में जो रक्तपात देखा, उसने युद्ध के प्रति उनके मन में क्षोभ भर दिया और भौतिक उपलब्धियों के प्रति ऊबन पैदा कर दी। अंतत: यही घटना श्रीलंका, चीन, जापान और थाईलैंड समेत कई देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार का कारण बनी।

अंतरदृष्टि की जरूरत

अब प्रश्न यह है कि क्या रोगी, वृद्ध या शव देखने वाले बुद्ध पहले व्यक्ति थे? उनके पहले भी बहुत लोगों ने ऐसी घटनाएं देखी थीं और बाद में भी बहुत लोगों ने यह सब देखा। आगे भी देखते रहेंगे, लेकिन कितने लोग बुद्ध या अशोक की तरह दुनिया भर का वैभव छोड कर सत्य की तलाश या धर्म के प्रसार के लिए निकल पडे? सभी इसे सृष्टि की सहज प्रक्रिया मान लेते हैं। घटनाओं या स्थितियों से मजबूर होना एक अलग बात है, लेकिन उनसे प्रेरणा ग्रहण करना बहुत कम लोगों के बस की बात है। इसके लिए जैसी गहरी अंतरदृष्टि चाहिए, वह कम लोगों में ही होती है।

लक्ष्य की पहचान

दूसरी तरफ, यह भी सच है कि दुनिया में अपना स्थान बनाने, किसी भी क्षेत्र में बडी उपलब्धि या प्रसिद्धि हासिल करने के लिए अंतरदृष्टि से ज्यादा जरूरी तत्व है प्रयास। निरंतर और सुनियोजित प्रयास। अर्जुन अगर चिडिया या मछली की आंख पर निशाना साध सके तो इसके मूल में कोई अंतरदृष्टि नहीं, बल्कि उनकी लगन और प्रयास मुख्य कारण था। अर्जुन के भीतर ऐसी लगन जगाने, उनके प्रयास की निरंतरता बनाए रखने और उसे एक निश्चित दिशा देने में द्रोणाचार्य की जो भूमिका रही है, वह भी बहुत महत्वपूर्ण है।

वह गुरु ही है जो किसी व्यक्ति को उसके लक्ष्य की ठीक-ठीक पहचान कराता है। उसके लिए सही रास्ता बताता है और उस रास्ते पर उसे चलना सिखाता है।

गुरु का यह महत्व जीवन और दुनिया के हर क्षेत्र में हमेशा रहा है, आज भी है, लेकिन उसकी भूमिका और गुरु-शिष्य परंपरा का स्वरूप पहले की तुलना में अब काफी बदल चुका है। प्राचीन काल के गुरुकुलों की जगह अब विश्वविद्यालयों और संस्थानों ने ले ली है। विद्यार्थी के लक्षण अब कागचेष्टा, बकोध्यानम.. से बदल कर मोबाइलधारी नेटसर्चर की हो गई है। ताडपत्रों की जगह पहले कागज, फिर उम्दा क्वालिटी के कागज ने ली और अब धीरे-धीरे हम कंप्यूटर और लैपटॉप की ओर बढ रहे हैं। हैरत नहीं होनी चाहिए, अगर आने वाले एक-दो दशकों में बच्चे स्कूल बैग की जगह छोटा सा कंप्यूटर लेकर स्कूल जाते दिखें और वहां भी क्लास में ब्लैक बोर्ड की जगह स्क्रीन मौजूद हो। स्मृति, जो आज हमारी मूल्यांकन प्रणाली का आधार है या तो बीते दिनों की बात हो जाए या फिर असीम हो जाए। वैसे भी साइबोर्ग यानी साइबर मानव अब केवल कल्पना की बात नहीं रहा, हकीकत में बदल चुका है। गलत नहीं होगा यह कहना कि तेजी से बदलती दुनिया में यह सब होना ही है।

कैसे रहते बेअसर

इतनी बडी दुनिया में जब सब कुछ तेजी से बदल रहा हो तो गुरु-शिष्य संबंध ही इस बदलाव से बेअसर कैसे रह सकता था। जंगलों के बीच फूस के छप्परों में चलने वाले गुरुकुलों की जगह अब औद्योगिक महानगरों के बीच बहुमंिजले एयरकंडीशंड भवनों में चलने वाले विश्वविद्यालयों और तकनीकी व प्रबंधन संस्थानों ने ले ली है। वह दौर था जब सब कुछ छोड कर जंगल में रहने वाला ऋषि समाज की व्यवस्था में सर्वोपरि था। अब वह दौर है जब सब कुछ हासिल करके तमाम सुविधाओं के बीच रहने वाला राजनेता सत्ता के साथ-साथ सामाजिक व्यवस्था के भी शीर्ष पर है। गुरु की स्वतंत्रता और शिष्य की एकाग्र निष्ठा का दौर अब बीते दिनों की बात है। इस उपभोक्तावादी दौर में गुरु और शिष्य दोनों निरंतर बेहतर विकल्पों की तलाश में हैं। शिक्षा का उद्देश्य अब सिर्फ संस्कार और ज्ञान नहीं, व्यवसाय है। और यह स्थिति कोई अचानक नहीं आई है। जैसे सभी बदलाव क्रमिक रूप से होते हैं, यह सब भी क्रमिक रूप से हुआ है।

चौतरफा है बदलाव

प्रयोगों और अनुभवों के कई स्तरों से होते हुए हम यहां तक पहुंचे हैं। यह प्रयोग केवल हमारे देश में हुए हों, ऐसा भी नहीं है। ऐसे प्रयोग दुनिया भर में होते रहे हैं। इसीलिए बदलाव की यह प्रक्रिया भी समान रूप से दुनिया के लगभग सभी देशों में चलती रही है। यह अलग बात है कि दुनिया के अलग-अलग देशों में यह अलग-अलग ढंग और अलग-अलग गति से चलती रही है। शायद इसीलिए हर जगह स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल अलग-अलग असर देखा जा रहा है। इसके बावजूद इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि आज दुनिया के तकरीबन हर देश में पश्चिमी शिक्षा पद्धति ही मानी जा रही है। इसीलिए भारत की गुरु-शिष्य परंपरा भी बदल कर अधिकांशत: अंतरराष्ट्रीय स्वरूप वाले अध्यापक-छात्र संबंधों के दायरे में सीमित होकर रह गई है।

वैश्वीकरण में स्थानीयता

इतना सब कुछ हो जाने के बावजूद यह भी सच है कि वैश्विक सभ्यता और संस्कृति के इस दौर में अंतरराष्ट्रीय चलन के समानांतर स्थानीय संस्कृति भी हर जगह चल रही है। इसीलिए अधिकतर देशों में शिक्षा की वहां की स्थानीय पद्धति कमोबेश किसी न किसी रूप में कायम है। भारत में तो अभी यह परंपरा कई रूपों में देखी जा सकती है। आध्यात्मिक क्षेत्र में तो इसका व्यापक असर है। देश के हर कोने में ऐसे कई मठ हैं जहां आध्यात्मिक विद्याओं का आदान-प्रदान गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत ही हो रहा है। कुछ सूत्र हैं जो गुरु अपने योग्य और विश्वस्त शिष्य को ही बताता है और इसके लिए दोनों को हजारों साल से चली आ रही उन्हीं परंपराओं का निर्वाह करना होता है।

यह परंपरा केवल अध्यात्म की दुनिया तक सीमित हो, ऐसा भी नहीं है। अध्यात्म के बाहर एक दुनिया कलाओं की भी है। संगीत, नृत्य, अभिनय और एक हद तक साहित्य में भी इसी परंपरा को किसी न किसी रूप में निभाया जा रहा है। संगीत और नृत्य की दुनिया में घरानों का अनुशासन है तो सिनेमा में प्रोडक्शन हाउस की सीमाएं और साहित्य की दुनिया में स्कूल ऑफ थॉट्स की पकड है। कहां-कौन अपनी जिम्मेदारी किस हद तक निभा रहा है और किस तरह समाज को क्या दे रहा है, यह एक अलग बात है। पर यह सच है कि अपसंस्कृति की भयावह आंधी के बावजूद हम कला-संस्कृति की दुनिया में अभी भी अपने बहुत सारे मूल्य और मान्यताएं बचाए हुए हैं। हमारी कुछ कला विधाएं आज भी दुनिया की सबसे उत्कृष्ट विधाओं में गिनी जाती हैं। इसके मूल में कुछ और नहीं, गुरु-शिष्य परंपरा ही है। वह तत्व गुरु ही है, जिसकी प्रेरणा तमाम व्यावसायिक दबावों के बावजूद कुछ कलाकारों के भीतर शुद्धता की जिद के रूप में मौजूद है। सच तो यह है कि गुरु कोई निश्चित रूपाकार नहीं है, बल्कि हर वह शख्स, चाहे वह मां-पिता-भाई-बहन-मित्र या कोई भी, जिसकी प्रेरणा आपके भीतर उत्कृष्ट मूल्य को बचाए रखने की जिद के रूप में पलती रहे, गुरु है। गुरु का मूल आशय उस व्यक्ति से है जो आपके भीतर का अंधकार मिटाता है। चाहे वह जीवन के संबंध में हो या प्रोफेशन के संबंध में। अंधकार मिटा कर ही कोई आपको प्रकाश से भर सकता है और प्रकाश के दम पर ही आप कोई मुकाम हासिल कर सकते हैं।

बनी रहेगी परंपरा

ऐसा गुरु हमेशा बना रहेगा और उनके शिष्य भी हमेशा बने रहेंगे। यह अलग बात है कि उसे कहीं प्रोफेसर कहा जाता है, तो कहीं गॉड फादर, कहीं उस्ताद तो कहीं गुरु जी और कहीं कुछ और। यह अलग-अलग दुनियाओं की अलग-अलग तहजीब पर निर्भर है। तमाम बदलावों के बावजूद यह परंपरा अपने मूल अर्थ में आज भी कायम है। चाहे भले इसका रूप बदलता रहे, पर मूल अर्थ में यह हमेशा बनी भी रहेगी।

बच्चन सर और धनराज पिल्लै हैं मेरे प्रेरणास्त्रोत

शाहरुख खान (अभिनेता)

मुझे अपने जीवन में कई हस्तियों से प्रेरणा मिली है और मेरे आदर्श भी कई हैं। मैं हस्तियां इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि इनमें मेरे वालिद साहब भी शामिल हैं। मेरे कॉलेज (दिल्ली) के कुछ प्रोफेसर भी हैं। फिर अपनी बॉलीवुड की मित्रमंडली से भी मैं प्रभावित हूं। मीडिया अकसर बातें करता है कि मेरी और बच्चन सर की कुंडली नहीं जमती, पर मैं उन्हें अभिनय का शहंशाह मानता हूं। वे भी मेरे प्रेरणास्त्रोत हैं। मेरी पत्नी गौरी, जो मेरे जैसे शख्स को पिछले 12 वर्षो से झेल रही है, वह भी मेरी आदर्श है। मैं उसके संयम का फैन हूं। मेरे खास दोस्तों में फराह खान और करण जौहर हैं। मैं उन्हें अपने जीवन की प्रेरणा तक मानता हूं क्योंकि एक अच्छे दोस्त के रूप में वे मुझे जीवन में खुशियां देते हैं। मेरे भले-बुरे दिनों में वे मेरा साथ देते हैं। मुझे हर हाल में उनका साथ मिलता है। मेरे लिए मेरा हर करीबी दोस्त मूल्यवान है, प्रेरणादायी है, क्योंकि मैं उनसे हर पल काफी कुछ सीखता जाता हूं। अपनी मां को तो मैं अपना सबकुछ मानता हूं। जब मैं 10 साल का था, तभी मेरे वालिद गुजर गए। काफी जद्दोजेहद कर अम्मीजान ने मेरी परवरिश की। मेरी मां टीचर थीं। कठोर मेहनत कर उन्होंने मेरी और मेरी छोटी बहन को पढाया-लिखाया। मेरी मां ने ही मुझे इस लायक बनाया कि मैं एक सफल इंसान बन सकूं। मेरे जीवन में एक खास शख्सीयत और है जो काफी इंस्पायरिंग रही है मेरे लिए। मेरा उनसे कोई दोस्ताना रिश्ता नहीं है, परिचय तक नहीं है, पर फिर भी वे मेरे गुरु हैं। मैं जाने-अनजाने उनसे हमेशा सीखता ही रहा हूं। मेरे इस खास गुरु का नाम है धनराज पिल्लै, जो भारत के मशहूर हॉकी प्लेयर हैं। वह कभी बहुत चर्चित नहीं रहे हैं। पेज थ्री टाइप के खिलाडियों के ग्रुप में शामिल होना धनराज पिल्लै ने कभी पसंद ही नहीं किया। हमेशा लो प्रोफाइल रखा उन्होंने। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि हम उनकी प्रतिभा का पूरा इस्तेमाल नहीं कर सके। मैं उनका जबर्दस्त फैन हूं। उन पर अन्याय हुआ। वे टीम के बाहर कर दिए गए। वक्त ने उन पर क्या-क्या सितम ढाए, पर वे मुस्कराते हुए हर हाल का सामना करते रहे। मुझे उनकी मुस्कराहट में मासूमियत नजर आती है। हर गम, हर खुशी में जीवन जीने का मूलमंत्र मैं उनसे पाता हूं। मुझे लगता है, सफलता और असफलता िजंदगी के दो पहियों पर एकसाथ सवार होकर कैसे जिया जाता है, यह कोई उनसे सीखे, जैसे मैंने सीखने की कोशिश की। मेरा उन्हें विनम्र सलाम। मैंने अपनी फिल्म चक दे में खेल संबधी विषय को उजागर करने की सच्ची कोशिश की है। यह मेरी दिली तमन्ना है कि खेल-कूद को लोग गंभीरता से लें। अगर उन्होंने ऐसा किया तो मेरा यह प्रयास सार्थक हो जाएगा।

गुरु के बिना अधूरी है विद्या

पंडित शिवकुमार शर्मा (संतूरवादक)

मुझे तो गुरु बचपन से ही मिला क्योंकि मेरे पिता पंडित उमा दत्त शर्मा ही मेरे गुरु थे। वे मुख्य रूप से सूफी संगीत गाते थे। गायन के अलावा वे तबला, हारमोनियम और दिलरुबा भी बजाते थे। संतूर वे नहीं बजाते थे पर उन्होंने इस पर शोध किए और मुझे पांच वर्ष की उम्र से ही इसकी तालीम देना शुरू किया।

मुझे उनसे वैसे तो बहुत सारी चीजें सीखने को मिलीं, परंतु उनमें सबसे महत्वपूर्ण था संगीत के मूल्य को समझना और उसके सम्मान के प्रति सजग रहना। इस विषय पर मैं भी कभी समझौता नहीं करता। जहां संगीत का मान न हो, वहां मैं कार्यक्रम तक नहीं करता। क्योंकि यह एक आराधना है। इसका वरदान सबको नहीं मिलता। इसके अलावा उनका कहना था कि प्रसिद्धि को लेकर अहंकार के शिकार कभी न होना। दुनिया कितनी भी तारीफ करे, पर आपको अपने अंदर बार-बार झांककर देखना चाहिए कि आपने क्या किया? क्या आप इस तारीफ के काबिल हैं? प्रसिद्धि के अहंकार को छोड कर व्यक्ति में सीखने की इच्छा प्रबल होनी चाहिए, तभी वह सही अर्थ में कामयाब होगा। आज के युवा वर्ग के बारे में मेरा यह कहना है कि वे संगीत के आध्यात्मिक नियम को छोडकर आगे बढने की कोशिश न करें। कोई भी विद्या गुरु के बिना अधूरी है। समय के साथ विचारों में परिवर्तन आया है, परंतु गुरु-शिष्य परंपरा हमेशा रहेगी। सुनकर या आधुनिक उपकरण की सहायता से किसी विद्या में महारत हासिल नहीं की जा सकती।

भले ही आज लोग आश्रम में जाकर गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत विद्या हासिल नहीं कर सकते, अब हमारी टेक्नोलॉजी में काफी परिवर्तन आ चुका है, पर गुरु का साथ मिले बिना विद्या हासिल करना संभव नहीं है। इसके लिए गुरु का आदर-सम्मान भी जरूरी है। अन्यथा आप उनके विचारों का पालन नहीं कर सकते। मैं तो हमेशा अपने आपको एक माध्यम मानता हूं जो गुरु और भगवान की कृपा से ही है।

शिष्य चाहे देशी हो या विदेशी, हमारे यहां समान है। जिस किसी भी शिष्य में मुझे प्रतिभा दिखाई पडती है उसे मैं गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत संतूर सिखाकर मंच पर प्रस्तुत करता हूं। इसमें भारतीय और विदेशी दोनों ही तरह के लोग शामिल हैं।

विचारों में बदलाव जरूरी

रीता भादुडी (अभिनेत्री)

सबसे पहले मुझे मेरी मां चन्द्रिमा भादुडी गुरु के रूप में मिलीं। उन्होंने हमेशा मुझे बताया कि किसी भी संकटपूर्ण स्थिति से घबराना नहीं है। संयम और धीरज से ही कोई भी काम बनता है। उसका मैंने हमेशा अनुसरण किया है इसलिए आज भी किसी परिस्थिति में अगर तनाव होता है तो मैं उसे सहज ढंग से लेती हूं। ऐसा मानती हूं कि यह भी जीवन का एक जरूरी हिस्सा है। इसके बाद मुझे शिक्षा के क्षेत्र में गुरु रोशन तनेजा जी मिले नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में। उन्होंने बताया कि एक्टिंग जितनी मजेदार है, उतनी ही मुश्किलें भी हैं उसमें। उन्होंने धीरज, संयम व मेहनत को ही प्रमुख बताया और जीवन में उतारने की सलाह दी। फलत: आज भी मैं हमेशा खुश रहती हूं।

नई पीढी की बात की जाए तो उनके विचारों में काफी बदलाव आया है और यह स्वाभाविक भी है, परंतु आए दिन अखबारों और टीवी से गुरु की अवमानना वाली घटनाओं की जो जानकारियां मिल रही हैं, उनसे ऐसा लगने लगा है कि गुरु के लिए भी अपने विचार में बदलाव जरूरी हो गया है। उन्हें आज की पीढी के विचारों को ध्यान में रखना है। तब शायद ये फासले दूर होंगे। उन्हें सम्मान मिल सकेगा। साथ ही युवाओं को भी समझना है कि कोई भी विद्या गुरु के बिना मिल पानी संभव नहीं है। जमाना चाहे कितना भी बदल जाए, पर एक-दूसरे का आदर और मान जरूरी है। नहीं तो हम सभ्य समाज के नागरिक नहीं कहला सकेंगे।

सबसे अधिक असर पिता का

शेखर (म्यूजिक कम्पोजर)

मैं सबसे अधिक प्रभावित हूं अपने पिता जी से। उसके अलावा उस्ताद मियाज अहमद खां साहब से, जिनसे मैंने पांच साल तक तालीम ली और जेवियर फर्नाडिस जी से, जिनसे मैंने करीब पांच साल तक पियानो सीखा। मैं एक व्यक्ति का नाम और लेना चाहूंगा वह हैं-झंकार बीट्स के पंचम दा। इन लोगों से मैंने जाना कि जीवन के हर मोड पर संगीत बसता है। वैसे मेरे घर में शुरू से ही बिजनेस का माहौल रहा, पर मेरे पिताजी अकॉर्डियन बजाते थे। उन्हें देखते-देखते मेरे अंदर छिपा संगीत भी जागा और धीरे-धीरे संगीत की तरफ मेरा रुझान बढता चला गया।

एक बार मुझे सिराज मुकुल आनंद ने बुलाया। मैंने उनके लिए उनकी पुरानी फिल्म दस का एक गाना बनाया। उसके बाद मैंने आर्चीज म्यूजिक गैलरी, दिल्ली के लिए म्यूजिक दिया और म्यूजिक के साथ मेरा रिश्ता मजबूत होता चला गया। फिल्म ब्लफ मास्टर, जिसमें अभिषेक बच्चन ने ही अपने पर फिल्माया गया गाना गाया है, की म्यूजिक मैंने ही दी। अभी हाल में मैंने अनुभव सिन्हा की नई फिल्म कैश का म्यूजिक कम्पोज किया है। एक म्यूजिक डायरेक्टर के लिए हमेशा कुछ नया करने का चैलेंज होता है। आजकल मैं शेखर के साथ जीटीवी पर प्रसारित होने वाले सारेगामापा में जज की हैसियत से भी काम कर रहा हूं। म्यूजिक में कोई नियम नहीं होता। आज के दौर के संगीतकारों में मैं ए.आर. रहमान का बहुत बडा फैन हूं। अगर गुरु की बात करें तो मेरे खयाल से अब गुरु नहीं होते। सिर्फ सलाहकार और दिशा निर्देशक होते हैं। रातोरात या नाम पाते ही आदमी गुरू नहीं बन जाता, न ही आज पहले जैसे शिष्य रहे। हां आज भी अगर मैं किसी को गुरु मानता हूं तो वह हैं खय्याम साहब, लता जी, आशा जी और राजेश रोशन।

सबसे गहरा असर परिवार का

बॉबी देओल (अभिनेता)

मैं अपने परिवार में सबसे छोटा और सबका लाडला रहा हूं। मुझे पापा, ममा, दादाजी ने जितना प्यार दिया, उतना ही सनी भैया ने भी दिया। आय हैव बीन ऑलवेज पैंपर्ड ऑल द टाइम। मेरे लिए पापा (अभिनेता धर्मेन्द्र) और भैया में कोई फर्क नहीं है। मेरे अब तक के जीवन में परिवार के लोगों ने ही गहरा प्रभाव डाला है। आज मैं जो भी कुछ हूं अपने परिवार की बदौलत हूं। फिर भी मैं खास तौर पर उन दो खास शख्सीयतों का नाम लेना चाहूंगा, जिनके कारण मैं बना, मुझे जीवन भर प्रेरणा मिलती रही और मेरा परिष्कार हुआ। सच्चाई, मेहनत और लगन से जीना क्या होता है यह मैं बिना किसी ग्रूमिंग या पर्सनैलिटी डेवलपमेंट स्कूल गए सीखता गया। मेरे जीवन के दो महान गुरु हैं, मेरे दादाजी किशन सिंह देओल, जो अब इस दुनिया में नहीं रहे और मेरे पापा धर्मेन्द्र।

मेरे दादाजी पेशे से शिक्षक और किसान थे। पंजाब में हमारी जमीन थी, जिसमें वे खेती करते थे और स्कूल में बच्चों को पढाने भी जाते थे। दादाजी ने बच्चों को पढाना कभी नहीं छोडा। घर आने वाले बच्चों को वे फ्री सिखाते थे। इसके पहले दादा जी स्वतंत्रता सेनानी थे। यदि मैं यह कहूं कि वह हमारे गांव के सबसे लोकप्रिय नेता बन चुके थे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब वे गुजरे तो उन्होंने 90 पार कर लिया था। 85 की उम्र तक तो रोज प्रात: चार बजे उठना, ठंडे पानी से नहाना, वॉक और एक्सरसाइज के लिए जाना, एक लीटर कच्चा दूध पीना- यही उनकी दिनचर्या थी। पापा ने उन्हें कई बार कहा होगा कि अब ठंडे पानी से आप नहाना छोड दें। यहां गीजर की सुविधा है, पर उनकी सादगी भरी आदतें कभी नहीं गई। जीवन भर वे भारतीय शालीनता-और सादगी, सच्चाई के मूल्यों के साथ जिए।

दादाजी को पापा की चंद फिल्में खूब भाई। उनमें सत्यकाम, नया जमाना, शोले वे इन फिल्मों को बार-बार देखते रहते। दादाजी तो ज्ञान, सादगी, सच्चाई, पवित्रता के सागर थे, उनसे कोई जितना सीखे उतना कम था। पापा, सनी भैया, मैं, मेरे दो बेटे हम सभी ने उनकी आज्ञा का हमेशा पालन किया। आज उनके गुजरने के बाद यह मलाल नहीं कि उनकी बात नहीं मानी। वे चाहते थे कि परिवार में कोई शिक्षक हो, उनका यह खवाब पूरा नहीं हो सका।

दादाजी हमेशा कहा करते थे कि भारत जो कभी किसानों का देश था, आज उसकी पहचान लोग भुलाते जा रहे हैं। कोई अपना अस्तित्व कैसे भुला सकता है? देश की तरक्की जरूर हो, पर अपना वजूद खोकर नहीं। आज कई बार उनका यह कहना याद आता है।

उनसे सीख-प्रेरणा हम सभी ने ली, पर उनकी तरह आदर्शवादी मैं नहीं हो पाया। शायद हमारे पेशे में ऐसा आदर्शवाद संभव भी नहीं है। शायद ही कोई ऐसा दिन बीता हो जब मैंने उन्हें याद न किया हो। मैं बचपन में दूध नहीं पिया करता था। उन्होंने ही मुझे प्यार से दूध पीने की आदत लगवाई। खैर, दादाजी से जुडी कई यादें घेर लेती हैं दिल को। फिर इस जीवनगुरुको लेकर दिल कहता है. आप कहीं आसपास हैं मेरे।

गुरु का स्थान ही सबसे ऊपर

छन्नू लाल मिश्र (ठुमरी गायक)

मैं जब बच्चा था, महज पांच साल का, तो अकसर पिताजी के साथ ही रहता था। उनके साथ ही सोता था। वह सुबह चार बजे ही मुझे जगा देते और संगीत के रियाज के लिए बैठा देते थे। मुझे हारमोनियम थमाते और गाने के लिए कहते और खुद वह तबला लेकर बैठ जाते थे। मेरे पिता श्री बद्री प्रसाद मिश्र खुद शास्त्रीय संगीत के मर्मज्ञ थे। संगीत की बारीकियों पर उनकी जैसी पकड थी, वह मैंने कम लोगों में ही देखी। सुबह चार बजे उठकर संगीत साधना का यह क्रम करीब चार साल तक चला।

इसके बाद जब मैं थोडा बडा हुआ, करीब नौ साल का, तब उन्होंने मुझे मुजफ्फरपुर भेज दिया। किराना घराने के बडे संगीतज्ञ प्रो.अब्दुल गनी खां साहब के पास। वह दरभंगा महाराज के गुरु थे। उनसे गंडा बंधवा कर मैंने 11 साल तक संगीत सीखा। बडी मेहनत करवाते थे वह। हालांकि मैं संगीत का बहुत समर्पित विद्यार्थी था, फिर भी कभी-कभी अखर जाता था। लेकिन अब समझ में आता है कि अगर उन्होंने वह मेहनत न करवाई होती तो आज यह मुकाम भी मुझे नहीं मिल पाता। फिर वह मुझे आयोजनों में ले जाने लगे। इसके बाद मैं पद्मभूषण ठाकुर जयदेव सिंह के पास बनारस आ गया। ठुमरी की बारीकियां मैंने उनसे ही सीखीं।

इस तरह मेरे सबसे पहले गुरु तो मेरे पिताजी हैं और संगीत की दुनिया में कदम रखने की प्रेरणा भी मुझे उनसे ही मिली। फिर प्रो.अब्दुल गनी खां साहब और ठाकुर जयदेव सिंह जी। खां साहब और ठाकुर साहब की गायकी में जो रस था, वह उनके बाद मुझे कहीं और दिखा नहीं। ठाकुर साहब ने मुझसे कभी कुछ लिया नहीं और जब भी मैं गया तो वह मुझे बडे प्रेम से बैठा कर सिखाते थे।

ठाकुर जयदेव सिंह जी से सबसे बडी बात जो मैंने सीखी, वह यह कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती है। यह उन्होंने कोई कह कर नहीं सिखाया, खुद करके दिखाया। उनकी उम्र जब करीब 90 साल के आसपास पहुंच गई तब उन्होंने फारसी भाषा पढनी शुरू की, मार्फुल नगमात को समझने के लिए। यह फारसी में संगीत की बारीकियों के बारे में है। इसके लिए उन्होंने बाकायदा टयूशन लगवाई। एक मौलवी रोज उन्हें आते थे फारसी पढाने। वैसे मेरे पिताजी ने और दोनों गुरुजनों ने जो स्नेह मुझे दिया और जो त्याग की भावना अपने कर्म से सिखाई, उसे मैं कभी भूल नहीं सकता हूं। आज मैं जो कुछ भी हूं वह उनसे मिली सीख और प्रेरणा की बदौलत ही हूं। उनकी जलाई हुई लौ ही अब तक मेरे भीतर जल रही है और यह हमेशा जलती रहेगी। मुझे रोशनी देती रहेगी। गुरु-शिष्य की यह परंपरा केवल मेरे ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण प्रेरणास्त्रोत है। हमारे यहां गुरु को भगवान से भी बडा बताया गया है। कबीर ने साफ तौर पर कहा - बलिहारी गुरु आपने, गोबिंद दियो बताय।

यह अलग बात है कि अब इसके कुछ विपरीत उदाहरण भी दिखने लगे हैं। इसकी वजह जिंदगी में आई आपाधापी है। हर किसी को हर काम की जल्दी पडी है। आदमी रातोरात मशहूर और अमीर हो जाना चाहता है। उसमें लंबे समय तक सीखने का धैर्य नहीं रह गया है। ऐसे गुरु भी हैं और शिष्य भी हैं। लेकिन ऐसे लोग बहुत कम हैं और यह दौर भी स्थायी नहीं है। जिन्हें सचमुच सीखना है और जिन गुरुओं को अपनी परंपरा कायम रखनी है, वे आज भी परंपरा की मर्यादा से बंधे हुए हैं और बंधे रहेंगे।

गुरु ने डाली जान मुझमें

जितेन्द्र जी महाराज (कथक गुरु)

मैं जब छोटा था, मुझे स्कूल भेजा गया। वहां सारे शिक्षक मुझे स्नेह देते थे, लेकिन पढाई-लिखाई में मेरा मन नहीं लगता था। कोई मुझसे नाराज नहीं होता था। जब मैं आठवीं या नवीं कक्षा में था, हमारे स्कूल में एक समारोह हुआ। हमारे संगीत अध्यापक ने बुलाया और पूछा कि तुम कुछ नहीं करोगे? मैंने कहा कि मैं नृत्य करूंगा। वह तो मान गए, पर कार्यक्रम के समन्वयक ने कहा कि तुम अपने घर से लिखा कर लाओ, तब हम तुम्हें इसकी अनुमति देंगे। यह बात मुझे लग गई। तभी मैंने सोच लिया था कि नृत्य के प्रति समाज में जो नकार भावना है, इसे एक दिन हम खत्म करेंगे। इसे सम्मानजनक स्थान दिलाएंगे। खैर, मैंने नृत्य प्रस्तुत किया। यह पहली प्रस्तुति मैंने बिना किसी प्रशिक्षण के की थी और वह था दीपक नृत्य। उसी कार्यक्रम में एक कथक गुरु भी आए थे कृष्ण कुमार जी महाराज। उन्होंने मेरा पूरा नृत्य देखा और कार्यक्रम संपन्न होने के बाद मुझे अपने पास बुलाया। मेरी प्रस्तुति की मुक्त कंठ से सराहना की और मुझे खुद ही नृत्य सिखाने का प्रस्ताव किया।

फिर गुरुजी ने मुझे नृत्य के एक-एक तत्व से परिचित करवाया। मुद्राओं के प्रदर्शन, रसों की अभिव्यक्ति, घुंघरुओं के प्रयोग, भाषाओं का ज्ञान - हर तत्व और हर क्रम की साधना करवाई। इसके लिए लंबी साधना और एकाग्रचित्तता की जरूरत होती है। नृत्य अपने आपमें एक पूर्ण विधा है, क्योंकि इसमें सारी कला विधाएं सन्निहित हैं। इसीलिए कहा जाता है कि उत्तम गाना, मध्यम बजाना और विकट नाचना। नृत्य के जनक हैं शिव और सृष्टि में इसके प्रचारक हैं चंद्रमा। चंद्र ही सभी कलाओं से पूर्ण हैं। चंद्र के प्रति मेरा आकर्षण बचपन से ही था, लेकिन इस आकर्षण का कारण गुरुजी से मुलाकात के बाद ही मेरी समझ में आया। अध्यात्म से नृत्य के संबंध की बात भी मुझे तभी समझ आई जब गुरुजी ने इसकी साधना करवाई। आहिस्ता-आहिस्ता उन्होंने मेरी सारी कमियां दूर कर दीं।

गुरुजी ने मुझे हर तरह से गढा। जब मैंने उनसे सीखना शुरू किया इसके दो साल बाद ही उन्होंने मुझे नृत्य शिक्षण का आदेश देना शुरू कर दिया। फिर वह मुझे मंचों पर भी ले जाने लगे। यह सब वह परंपरा की सहज प्रक्रिया के तहत करते चले गए। गुरु को तब तक मुक्ति ही नहीं मिल सकती, जब तक कि वह अपना एक योग्य शिष्य न तैयार कर ले और यह शिष्य अगर वह अपने परिवार के किसी सदस्य को बनाता है, यानी पुत्र या पुत्री को बना लेता है, तो भी उससे उसकी मुक्ति संभव नहीं है। तो इसलिए हम भी जब शवाब पर आए तो हमने खोज शुरू की योग्य शिष्य की। आए-गए तो कई लोग हमारे साधना कक्ष में, लेकिन उनमें नलिनी-कमलिनी में मुझे वह प्रतिभा दिखी और विद्या के लिए जरूरी समर्पण दिखा। तो मैंने इनसे नृत्य की साधना शुरू करवाई। जिस तरह मेरे गुरुजी ने मुझे हर तरह से गढा वैसे ही मैंने भी इन्हें हर तरह से गढा। अब जब मैं अपने गुरुजी को याद करता हूं तो मुझे लगता है उनसे प्रेरित या प्रभावित होने जैसी बात करना बहुत छोटी बात होगी। मुझे आज महसूस होता है कि मैं उस वक्त बेजान पुतला भर था। गुरुजी ने मुझमें जान डाल दी। इसलिए मैं मानता हूं गुरु-शिष्य का संबंध भी ऐसा ही है जो कभी प्रभावित होने वाला नहीं है।

साक्षात्कार : मुंबई से पूजा सामंत, सोमा घोष, एस.सुशीला, दिल्ली से इष्ट देव, इला श्रीवास्तव

इष्ट देव सांकृत्यायन
 
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