ये जो है हाइटेक जिंदगी़

      
ये जो है हाइटेक जिंदगी़

सुबह बिस्तर छोडने से लेकर देर रात बिस्तर पर जाने तक हमारी जिंदगी़ का एक पल भी आज ऐसा नहीं है जब तकनीक की दखल न हो। किचन हो या दफ्तर, रास्ता हो या खेल का मैदान, बाजार हो या अस्पताल, यहां तक कि पृथ्वी हो या भूगर्भ या समुद्र या फिर अंतरिक्ष.. ऐसी कोई जगह ही नहीं बची जहां तकनीक की दखल न हो। अगर कहा जाए कि आज तकनीक ही सर्वव्याप्त व सर्वशक्तिसंपन्न है तो गलत नहीं होगा। यह बात कम से कम शहरी जीवनशैली पर तो सही ही ठहरती है। इधर सर्वज्ञता का आलम तो इंटरनेट ने ऐसा बना दिया है कि किताबें सहेजने की आदत तो बडे लोग भी छोडने लगे हैं और अगली पीढी को तो शायद बताना पडे कि हमारे जमाने में नोटबुक जैसी कोई चीज होती थी।

जैसे-जैसे आदमी की जिंदगी़ में आपाधापी बढती जा रही है, वह अपनी तमाम जिम्मेदारियां तकनीक के हवाले करता जा रहा है। ऐसे दौर में जबकि खुद अपने लिए समय निकालना मुश्किल होता जा रहा है, तकनीक ने जिंदगी़ की तमाम दुश्वारियों को आसान कर दिया है। सिर्फ व्यस्तता ही नहीं, वह आपके लिए आपका अकेलापन बांटने से लेकर जरूरत के वक्त साथ देने, बहुत सारी बातें याद रखने व याद दिलाने और यहां तक कि आपके भरोसे तक का विकल्प अब प्रस्तुत करती है।

यदि न होता विकास

ग्लोबलाइजेशन की हवा के साथ आम भारतीय शहरी की जीवनशैली में जैसा परिवर्तन आया है और जितनी तेजी के साथ हमने जिंदगी़ से तालमेल बिठाया है, वह हैरतअंगेज है। बीस साल पहले तक जिन कई चीजों के नाम तक हमें मालूम नहीं थे, आज वे सभी हमारी जिंदगी़ का अनिवार्य हिस्सा हैं। एक दशक पहले तक जिन चीजों तक सिर्फ उच्च वर्ग की पहुंच समझी जाती थी, आज वे आम भारतीय के लिए उसके दैनिक उपयोग की चीजें बन चुकी हैं। एक दशक पहले जिन सुविधाओं के कस्बों तक पहुंचने की कल्पना नहीं की जा सकती थी, आज वे सुदूर ग्रामीण अंचलों की जीवनशैली में शुमार हो चुकी हैं। दो दशक पहले तक जिन चीजों का जरूरी इस्तेमाल भी बडे लोगों के लिए बडी बात थी, आज वही चीजें बच्चों का खिलौना बन चुकी हैं। सामाजिक परिवर्तन का जो काम कई आंदोलन नहीं कर सके वह तकनीक संभव कर रही है। वर्ग, लिंग, आयु सारे भेदों की खाइयां अब यह पाट रही है।

जरा कल्पना करिए, अगर तकनीक का इतना विकास न हुआ होता तो वे कामकाजी जोडे जिन्हें बच्चे को स्कूल छोडते हुए खुद भी हर हाल में दस बजे तक दफ्तर निकल लेना होता है और शाम को लौटने पर खाना बनाने से लेकर बच्चे को होमवर्क कराने तक कई घरेलू काम जिनके इंतजार में होते हैं, उनके लिए जिंदगी़ कैसी होती? आज के हाइराइज अपार्टमेंट्स में रहने वाले लोगों के लिए लकडी का चूल्हा या कोयले की अंगीठी फूंकते हुए खाना बना पाना संभव होता क्या? एक दिन सब्जियां खरीद कर हफ्ते भर की निश्चिंतता कहां से मिलती, अगर रेफ्रीजरेटर सर्वसुलभ न हुआ होता? तकनीक का यह असर सिर्फ बडे महानगरों तक ही सीमित नहीं है, छोटे कस्बे और दूर-दराज के गांव भी इससे पूरी तरह प्रभावित हुए हैं। अगर तकनीकी विकास नहीं हुआ होता तो शायद आज खेती करना भी बेहद मुश्किल होता।

अब न रही हसरत

आजादी के बाद भारत का आर्थिक और शैक्षणिक विकास तो हुआ ही है, हमारे जीवन स्तर में भी पहले की तुलना में काफी फर्क आया है। दो दशक पहले तक जो लोग सिंगापुर, मलेशिया या स्विट्जरलैंड जैसे देशों से घूम कर आते थे, वे वहां की जीवनशैली देखकर मंत्रमुग्ध रह जाते थे। वर्षो तक वहां की स्वच्छता और चमक-दमक की बात करते रहते थे। शायद तब हम उसे बडी हसरत भरी निगाह से देखते थे- काश! कभी हमारे देश में भी ऐसा हो पाता.. पर अब यह सब हमारे लिए कोई न पूरी होने वाली हसरत नहीं रही। उनकी चमक-दमक पर अब भारतीय पर्यटक आश्चर्य नहीं करता है। क्योंकि हमारे देश के एक बडे वर्ग के लिए अब यह सब संभव हो गया है, भले एक सीमित दायरे में सही। बेशक विकसित देशों जैसी सफाई या चमक-दमक हमारे यहां सार्वजनिक स्थानों पर अभी भी नहीं दिखाई देती है, लेकिन यह अब हमारी तकनीकी अक्षमता या संसाधनों की कमी के कारण नहीं है। अब इसके लिए जो तत्व िजम्मेदार हैं वह आम जन में जागरूकता की कमी और सरकारी तंत्र में कुप्रबंधन का बोलबाला होने के कारण है। फिर भी जो लोग सुशिक्षित और जागरूक हैं, वे जीवन स्तर के उम्दा होने के प्रभाव एवं महत्व को समझते हैं तथा सीमित साधनों के बावजूद उसे बनाए रखने के प्रयत्न भी करते हैं।

सिर्फ शिक्षा ही नहीं कारण

यह फर्क सिर्फ शिक्षा से आई जागरूकता ही नहीं, काफी हद तक तकनीक की भी देन है। जागरूकता ने हमें इसके लिए प्रेरित किया है तो तकनीक ने इसे हमारे लिए आसान बनाया है। कल्पना करिए कि आज भी हमें घोडे-हाथी या ऊंट की सवारी करनी पडती तो क्या होता? जिंदगी़ की रफ्तार में तो हम बहुत पीछे छूटे ही होते, चारों तरफ गंदगी का साम्राज्य भी होता। बेशक मोटर वाहनों और अन्य तकनीकी साधनों ने प्रदूषण को बढाया है, पर तकनीक ही समस्या का समाधान ढूंढने में भी जुटी है और काफी हद तक वह उसके निकट पहुंच भी गई है। वाहनों ने वायु प्रदूषण जरूर फैलाया है, लेकिन तकनीक ने चूल्हे से उठने वाले धुएं के प्रदूषण से बचाया भी है। यह सही है कि कई अन्य कारणों से जंगल कट रहे हैं और कोयले के भंडार का दोहन हो रहा है, पर सोचिए अगर इनमें चूल्हे के लिए लकडी या कोयला लगाने की मजबूरी भी जुडी होती तो भारत जैसे बडे आबादी वाले देश में क्या होता?

वैसे ही धुएं भरे माहौल में अगर आज भी खाना पकाना पडता तो क्या आज के छोटे-छोटे फ्लैटों में जो सफाई, सुंदरता और सुरुचि दिखती है, वह संभव होती? यही नहीं, स्त्रियों की सेहत के लिए भी पुराने तौर-तरीके काफी नुकसानदेह थे। नए दौर के मॉडयुलर किचन ने उसे साइटिका से लेकर मोतियाबिंद तक कई खतरनाक रोगों से बचाया है। आज बडे शहरों में बहुत कम जगह में भी जो उम्दा जीवन स्तर बनाए रखना संभव हो रहा है, वह तकनीक के कारण ही है। आज की स्त्री तकनीकी विकास की प्रशंसक है तो उसके ठोस कारण हैं। इन बुनियादी वजहों ने ही तकनीक में उसकी रुचि जगाई है और आज वह तकनीकी जगत में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा रही है।

ज्ञान की दुनिया में विज्ञान

स्थान के इस प्रबंधन ने सिर्फ घरों को ही नहीं, कारोबार और ज्ञान की दुनिया को भी बडी राहत दी है। पढने के शौकीन लोगों को पहले हजारों किताबों के लिए बीसियों बुकशेल्फ रखनी पडती थीं। हालांकि उनका महत्व इससे कम नहीं हो गया है, लेकिन इतना तो है कि इंटरनेट ने तमाम अखबार, पत्रिकाएं व किताबें उन लोगों के लिए उपलब्ध करा दी हैं, जिनके पास उन्हें रखने के लिए जगह नहीं है या जिनकी पहुंच से वे बाहर हैं। भारत के समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और साहित्य या अध्यात्म की किताबों का इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया या जर्मनी समय से तो पहुंच नहीं सकतीं, पर इंटरनेट के जरिये अनिवासी भारतीयों की पहुंच में ज्ञान के ये साधन नियमित रूप से बने हुए हैं। एक-डेढ दशक पहले तक सामान्य विषयों पर जानकारी जुटाने या लिखने के लिए भी कई ग्रंथालयों के चक्कर लगाने पडते थे। लेकिन अब? आप घर बैठे इंटरनेट पर सर्च करके विशिष्ट विषयों पर भी पूरा शोधपत्र तैयार कर सकते हैं। इसे ज्ञान की दुनिया में विज्ञान का चमत्कार ही तो कहा जाएगा! विज्ञान के इस चमत्कार ने आज की व्यस्त दिनचर्या में सबसे बडा जो कमाल किया है, वह समय प्रबंधन के संदर्भ में है। यूटिलिटी बिल जमा करने से लेकर रेल या हवाई जहाज में रिजर्वेशन तक के लिए कहीं लाइन में लगने की जरूरत नहीं है। घर बैठे इंटरनेट से यह सब हो सकता है। नर्सरी से लेकर विश्वविद्यालय और प्रोफेशनल कोर्सेज में एडमिशन के लिए भी अब आपको बार-बार वहां का चक्कर लगाने की कोई जरूरत नहीं है। माउस की एक क्लिक पर पूरा जहान आपके सामने होगा। यहां तक कि लाखों रुपये सीटीसी वाली नौकरियां और व्यापारिक जगत में करोडों की डील भी। यही वजह है जो कई मामलों में काफी पीछे पडा एशिया आज इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों में सबसे आगे है।

इंटरनेट और हम

दुनिया के 37 प्रतिशत इंटरनेट उपयोगकर्ता अकेले एशिया में पाए जाते हैं, जिसमें भारत की हिस्सेदारी काफी बडी है। यह अलग बात है कि हिंदी इसके बावजूद इंटरनेट पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली दस भाषाओं में अभी नहीं गिनी जा सकी है, पर यह सच है कि अंग्रेजी को पहले नंबर पर होने का गौरव दिलाने वालों में भारतीयों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। फॉन्ट और की बोर्ड की एकरूपता की समस्या के कारण हमें आज भी इंटरनेट पर आम तौर पर रोमन लिपि का प्रयोग करना पडता है। ऐसे में भले ही हमारी भाषा हिंदी या तमिल या कन्नड हो, पर उसकी गिनती लिपि के आधार पर अंग्रेजी में हो जाती है। बहरहाल इस दिशा में भी पूरी गंभीरतापूर्वक काम चल रहा है और काफी हद तक यह समस्या हल भी कर ली गई है। विंडोज एक्सपी के साथ यूनीकोड ने अंग्रेजी कीबोर्ड से हिंदी टाइपिंग की जो सुविधा दी है, उसने इंटरनेट पर हिंदी ब्लॉग्स की एक नई दुनिया ही बसा दी है। हालांकि यह दुनिया अभी बिलकुल बचपन में है, पर इसके जवान होते बहुत दिन नहीं लगेंगे। वह दिन दूर नहीं जब अलग से कोई फॉन्ट डाउनलोड किए बगैर इंटरनेट पर हिंदी पढी जा सकेगी और तब हिंदी को टॉप टेन में शामिल होते देर नहीं लगेगी।

बहुत निकले मेरे अरमां

कह सकते हैं कि इससे ज्यादा और क्या चाहिए? लेकिन नहीं साहब! मिर्जा गालिब अभी अप्रासंगिक नहीं हुए हैं-

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले

इतनी सारी सुविधाओं के बावजूद हमारी चाहतें इन पंक्तियों का अतिक्रमण अभी नहीं कर सकी हैं। खास तौर से जमाने की जो चाल है, उसे देखकर तो लगता ही नहीं कि इससे आगे निकल पाना हमारे लिए कभी संभव होगा। एमएमएस, ईमेल और पांच मेगापिक्सेल कैमरे वाला थ्री जी मोबाइल अब पुराना पड चुका है। नई पीढी दस मेगापिक्सेल वाले फोर जी हैंडसेट का स्वागत करने को तैयार बैठी है। कल्पना करिए कि उसमें और क्या-क्या हैरतअंगेज फीचर्स होंगे! वैसे बाजार सूत्रों का आकलन है कि यह आते ही छा जाएगा और सन 2008 के अंत तक 400 बिलियन डॉलर का कारोबार भी कर लेगा।

आगे-आगे देखिए..

..और हां, इस जोश में होश खोना, सचमुच पागलपन से भी बडी बेवकूफी होगी। सोचिए कि थ्री जी मोबाइल तो एमएमएस कांड कर चुका है, जिसकी शिकार एक स्कूली लडकी हुई। यह तमाम सडक दुर्घटनाओं का कारण भी बन रहा है। इसके अलावा जाने क्या-क्या तीसरी पीढी वाले मोबाइल से ही हो रहा है, फिर सोचिए कि फोर जी क्या करेगा? तकनीक ने सुविधाएं तो दीं, पर शारीरिक श्रम की आदत हमसे छीन ली। बदले में हमें बहुत सारे नए और लाइलाज रोग मिले हैं। अब तो बच्चे क्रिकेट और फुटबॉल भी कंप्यूटर पर खेलने लगे हैं। सोचने की बात है कि उनका शारीरिक विकास भला कैसे होगा? यही नहीं, कंप्यूटर के स्क्रीन पर बच्चों के लिए युद्ध का मैदान भी बन जाता है, जहां वे अत्याधुनिक हथियारों से खून-खराबा करते हैं। नतीजा? सपनीले रोमांच से भरे जब वे बाहर निकलते हैं तो स्कूल में जरा सी बात पर सचमुच का रिवॉल्वर चला देते हैं।

माया की दुनिया में

आगे अब लिंडेन बी की वर्चुअल दुनिया आ रही है। इस दुनिया में आप कंप्यूटर पर अपनी थ्री डी इमेज के साथ स्पेस यानी काल्पनिक जमीन खरीद सकती हैं। वहां अपनी दुकान सजा सकती हैं। खरीद-फरोख्त से लेकर प्रेम और परिवार तक बना सकती हैं। वर्चुअल डॉलर में आप नफा-नुकसान भी कर सकती हैं। जरा सोचिए इस वर्चुअल मुनाफे या घाटे को लेकर जब आप असली दुनिया में आएंगी तो..? यह सच है कि आध्यात्मिक सोच वाले व्यक्ति को यह दुनिया सरायफानी होने का सच्चा बोध करा सकती है। पर आपराधिक तत्वों के हाथ में यह लगी तो? इतिहास गवाह है कि तकनीक का जितना सदुपयोग होता है, दुरुपयोग भी उससे कम नहीं होता। मोबाइल कैमरा इसका ताजा और बेहद भयावह उदाहरण है। इंटरनेट पर दुनिया भर में ठगों के हजारों गिरोह सक्रिय हैं और साइबर अपराध विशेषज्ञ भी अभी उन तक पहुंच नहीं पा रहे हैं। जब भी समाज में ऐसी घटनाएं दिखती हैं, हम अचानक तकनीक को रावण बताने लगते हैं। पर बेचारी तकनीक इसके लिए सचमुच िजम्मेदार है क्या? उस्तुरा लेते हुए यह तो हमें तय करना होगा कि हमारा हाथ बंदर का हाथ साबित न हो। यकीनन तकनीक बहुत अच्छा सेवक है, पर स्वामी उतना ही बुरा है। जब तक हम सचेत ढंग से उसका इस्तेमाल करेंगे, तकनीक हमारा गुलाम बना रहेगा, पर अपना होश खोते ही हमें उसका गुलाम हो जाना पडेगा। यह सचमुच भयावह होगा।

अच्छे लगते हैं स्टाइलिश गैजेट्स

कैटरीना कैफ, मॉडल-अभिनेत्री

मेरा जन्म लंदन में हुआ और 21 साल की उम्र तक मैं वहीं पली-बढी भी। जब मैं वहां रहती थी, मुझे लगता था कि भारत टेक्नॉलजी के मामले में काफी पिछडा हुआ है। पर यहां आने के बाद मालूम हुआ कि मेरा ऐसा सोचना बिलकुल गलत था। भारत टेक्नॉलजी में अव्वल है, यह एहसास मुझे अब हो रहा है।

विकसित देशों में बच्चे तीन-चार साल की उम्र से ही कंप्यूटर पर गेम खेलने लगते हैं। जब वे आठ-दस साल के होते हैं, पूरी तरह नेटफ्रेंड और कंप्यूटरसैवी हो जाते हैं। मुझे खुद को आधुनिक गैजेट्स के मामले में अपडेट रखना अच्छा लगता है। एक लंबे अरसे से मैं मोबाइल और उससे जुडे सारे फंक्शंस का इस्तेमाल कर रही हूं । कई बार एक मजेदार बात मेरे जेहन में आती है। मुझे लगता है काश! सारी जिंदगी़ कभी फास्ट-फॉरवर्ड हो जाती तो. कुछ बोरिंग पल. चंद यादगार लम्हे रिवाइंड हो सकते तो. कहने का मतलब यह कि मैं पूरी तरह टैक्नोसैवी हूं। अपने करीबी लोगों से संपर्क मैं अकसर ई-मेल, मोबाइल पर ही करती हूं। जब भी मैं कोई नया सेल्यूलर फोन या कंप्यूटर लेती हूं तो मेरी कोशिश रहती है कि उन्हें इस्तेमाल करने में आसानी हो। क्योंकि अगर उन्हें ऑपरेट करने में ही दिक्कतें होंगी तो उनके इस्तेमाल में फिर मजा नहीं आता। मुझे स्टाइलिश गैजेट्स अच्छे लगते हैं। मेरे पास व्हर्तू का सेलफोन है, एप्पल का आय पॉड और कोडक का ईजी शेयर डििजटल कैमरा है, जिनका मैं रेग्युलर उपयोग करती हूं। यदि मोबाइल की खोज नहीं होती तो क्या इस सदी में यह पीढी इतनी तरक्की कर पाती? हाथ में रहने वाले मोबाइल फोन के जरिये आप दुनिया के किसी भी कोने में मौजूद अपने प्रियजनों से सीधे बात कर सकते हैं। मेरे लिए मोबाइल सबसे उपयुक्त गैजेट है। वैसे मैं वॉशिंग मशीन, अवन जैसे घरेलू गैजेट््स का इस्तेमाल करना भी जानती हूं और अपने घर पर इनका प्रयोग करती भी हूं। मुझे लगता है कि इन चीजों के जरिये ही हम इतनी तरक्की हासिल कर पा रहे हैं। अब इनका इस्तेमाल हम लोग किसी भी हाल में टाल नहीं सकते । वाकई, आज की पीढी मोबाइल की गुलाम बनकर रह गई है, पर अब इसे रोका नहीं जा सकता।

उत्सुकता के साथ-साथ जानकारी भी जरूरी

जूही परमार, टीवी कलाकार

आज हर कोई किसी न किसी तरह इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का इस्तेमाल करता ही है। इसके बिना तो जीवन जीने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बचपन से लेकर आज तक मैंने देखा है कि कितनी जल्दी महिलाएं भी इन चीजों को अपने उपयोग में ला रही हैं। वैसे तो मैं इसके बारे में अपने आपको मास्टर नहीं समझती, पर जब भी कोई नई मोबाइल लेती हूं तो यह जांच-परख करती हूं कि पहले की तकनीक और इसमें अंतर क्या है। कई बार तो खोलकर भी देख लेती हूं। मुझे इन सब चीजों में उत्सुकता है। इसके अलावा कंप्यूटर की छोटी-मोटी परेशानी मैं अपने हाथ से ही ठीक कर लेती हूं, क्योंकि उत्सुकता के साथ-साथ मुझे इन सब बातों का ज्ञान भी है। इससे चीजें खराब नहीं होतीं। अगर केवल उत्सुकता हो और ज्ञान न हो तो वस्तुएं खराब हो जाया करती हैं। मुझे समय कम मिलता है। पर जब भी समय मिलता है तो मिक्सी, माइक्रोवेव आदि का प्रयोग करती हूं। खाना बनाती हूं। बचपन में भी मुझे इन सब चीजों से लगाव था। एक बार मेरे घर में लाइट चली गई थी। गर्मी का मौसम था। सब परेशान थे तो मैंने ही फ्यूज ठीक किया था। पहले तो उन्हें विश्वास नहीं हुआ, पर जब मैंने उन्हें दुबारा ठीक करके दिखा दिया तो बात सबकी समझ में आ गई। रोजमर्रा की जिंदगी़ में मैं आयरन, मोबाइल, कंप्यूटर, हेयर ड्रायर, घडी आदि सभी वस्तुओं का प्रयोग करती हूं। आज की तेज रफ्तार जिंदगी़ में कम समय में अधिक काम करने पडते हैं। इसलिए इन सब वस्तुओं का प्रयोग भी जरूरी हो चुका है।

प्रयोग सबका करता हूं पर टेक्नोसैवी नहीं

संजय अगरवाला, आर्थोपेडिक सर्जन, हिंदुजा हॉस्पिटल, मुंबई

मेरी राय में अधिकतर हम उन्हीं आधुनिक संसाधनों का इस्तेमाल करते हैं जो अकसर हमारे काम आते हैं। आज हम जिसे आधुनिक संसाधन कहते हैं, जैसे मशीन चलाने से लेकर ई-मेल करने तक की बात, वह बहुत हद तक तो हमारी आवश्यकता है और कुछ मायनों में मजबूरी। मेरे लिए यह आकलन आसान नहीं है कि मैं कितना टेक्नोसैवी हूं, कितने गैजेट्स का प्रयोग करता हूं और कितने के बारे में जानकारी रखता हूं। मैं कई तरह के इक्विप्मेंटस का उपयोग ऑपरेशन थिएटर में करता हूं। वहां मेरे लिए यह रोज की बात हो गई है कि मैं अपनी सारी आधुनिक मशीनों का प्रयोग दैनंदिन कामकाज के लिए करता हूं। मैं हिंदुजा हॉस्पिटल में हिप और नी आर्थोप्लास्टी करता हूं, जिसमें अब लंबा अरसा हो चुका है। मुझे हिप और नी आर्थोप्लास्टी में कई तरह के मेडिकेटेड इन्स्ट्रूमेंट्स की जरूरत पडती है। मैं शायद ही किसी को ई-मेल करता हूं, मेरे करीब सारे काम मेरी सेक्रेटरी करती है। हां, मेरी आवाज दिन भर जरूर चलती रहती है, क्या आवाज को तकनीकी ऐवज  मानना चाहिए? मेरा जो सेलफोन है, वो पीडीए है। उसमें कुछ सुविधाएं हैं। पर मैं खुद को टेक्नोसैवी नहीं कह सकता। लैपटॉप का उपयोग प्रतिदिन होता भी है और नहीं भी, क्योंकि काफी सारा वक्त मेरा रिसर्च और सर्जरी के काम में ही चला जाता है। बहुत लोग सोचते हैं कि जॉन्सन एंड जॉन्सन कंपनी बच्चों के उपयोग की चीजें ही बनाती है, पर इसी कंपनी ने हम आर्थोपेडिक डॉक्टरों के लिए वरदान साबित हो रहे अत्याधुनिक सर्जरी इक्विप्मेंट्स भी बनाए हैं, जिससे मरीजों को पुनर्जन्म मिल रहा है। हर सिक्के के जिस तरह दो पहलू होते हैं, वैसे ही दुनिया की हर चीज के दो पक्ष होते हैं। इंसान कुछ अच्छे होते हैं तो कुछ बुरे भी। एक इंसान कहता है- अहिंसा परमो धर्म:, तो दूसरा मानव जाति को ही नष्ट करने के लिए अणुबम बनाता है। ऐसे ही तकनीक के अच्छे-बुरे उपयोग होते हैं। उसे हम कंस्ट्रक्टिव कामों के लिए इस्तेमाल में लाते हैं या डिस्ट्रक्टिव कामों के लिए, यह अलग-अलग व्यक्ति पर निर्भर है।

मशीन के हवाले नहीं होना

डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी, निर्माता-निर्देशक

मैंने पिछले कई वर्षो से चिट्ठी नहीं लिखी है। सारा काम ई-मेल, एसएमएस, फोन पर ही चल रहा है। चिट्ठी की गंध लगभग भूल ही गई है। पर मैं इसके महत्व को कितनी गहराई से महसूस करता हूं इसे आप मेरी फिल्म पिंजर के एक गाने से समझ सकते हैं, चुन-चुन चिट्ठियों को सूंघ-सूंघ रही है। वैसे कलम का इस्तेमाल मैं अभी करता हूं। मैं अभी भी सीधे टाइप नहीं करता। पहले लिखता हूं, फिर टाइप करवाता हूं। हालांकि जानता हूं कि देर-सबेर मुझे यह सीखना पडेगा। इसके बगैर काम नहीं चलेगा। हालांकि हमारी दुनिया के अधिकतर लोगों की स्थिति यह है कि वे सिर्फ चेक पर साइन करने के लिए ही कलम निकालते हैं और वह भी करते हुए उनकी उंगलियां कांपती हैं, क्योंकि आदत नहीं रह गई। मुझे याद है कि मैं जब पढता था तब मेरे गुरुजन कहा करते थे कि मनुष्यता ने जितने भी आविष्कार किए हैं, उनका सदुपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा हो रहा है। तकनीक के विकास के संदर्भ में यह बात साफ तौर पर देखी जा सकती है। मेरा मानना है कि अगर आप जरूरत भर के लिए संचार के साधनों या तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं तब तो वह सदुपयोग है, लेकिन अगर अनावश्यक उपयोग किसी चीज का कर रहे हैं तो वह दुरुपयोग ही है। यह सही है कि तकनीकी विकास ने हमारे लिए बहुत सारी चीजें आसान की हैं। आज इसके बगैर जीने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लेकिन दूसरी तरफ इसने व्यक्तियों के बीच की दूरियां भी बढा दी हैं। पहले एक भाई दूसरे भाई से मिलने उसके घर जाता था। आज फोन पर बात हो जाती है, चैटिंग हो जाती है। प्रत्यक्ष मिलकर जो बात बनती थी, वह ऐसे कभी नहीं बन सकती है। रिश्तों के बंधन ढीले पडते जा रहे हैं। कुछ तो टूट ही जा रहे हैं। रिश्तों के दायरे इस तरह सिकुडते जा रहे हैं कि हमारे लिए संबंध का मतलब पति-पत्नी और बच्चा होकर रह गया है। मामा-मामी, बुआ, मौसी, नानी, चाची, दादी जैसे संबंध खत्म होते जा रहे हैं। यह अच्छी बात नहीं है। मैं मोबाइल-कंप्यूटर का जरूरत भर को तो इस्तेमाल करता हूं, पर फालतू प्रयोग नहीं करता, क्योंकि मैंने यह तय कर रखा है कि मैं खुद को मशीन के हवाले नहीं करूंगा।

कम समय में होता है अधिक काम

डॉ. सोमा घोष, शास्त्रीय संगीत गायिका

आज की सभी स्त्रियां आधुनिक उपकरणों का इस्तेमाल करती हैं। इससे कम समय में अधिक काम किया जा सकता है। पहले पुरुष इन चीजों का प्रयोग अधिक करते थे, पर अब स्त्रियां भी इन्हें अपना चुकी हैं। आज हर स्त्री के पास मोबाइल है। मुझे भी बहुत अच्छा लगता है जब मैं बाहर व्यस्तता के दौरान भी मोबाइल के जरिये अपने परिवार से जुडी रहती हूं। इसके अलावा वाकमैन से संगीत सुनती हूं। जब भी मैं सफर में होती हूं तो नए-नए गीत सुनती हूं। कंप्यूटर पर मैं रोज नहीं, पर जब भी बैठती हूं तो क्या-क्या नया एलबम या गाना आ रहा है उससे अपडेट होती हूं। कंप्यूटर का तो मैं अधिक से अधिक प्रयोग करती हूं। किसी से कम्यूनिकेट करना अपने कार्यक्रमों की सूची बनाना आदि करती हूं। मुझे एक बार बहुत खुशी हुई जब मैंने अपने एक ऐसे कार्यक्रम की फोटोग्राफ इंटरनेट पर देखी जिसे मैंने कहीं दूरदराज के क्षेत्र में प्रस्तुत किया था। घर पर मैं सभी नए उपकरणों का प्रयोग करती हूं और विज्ञान को धन्यवाद देती हूं कि उसने हम जैसी कामकाजी स्त्रियों को घर और बाहर दोनों जगहों पर कामयाबी हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वैसे मैं किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के बिगड जाने पर उसे ठीक तो नहीं कर पाती, पर अगर कोई नया आविष्कार मुझे दिखता है और उसका प्रयोग मेरे जीवन में है, तो जरूर खरीदती हूं। आज संगीत भी इस नई तकनीक के चलते ही लोगों को और ज्यादा कर्णप्रिय लगने लगा है। घर में टीवी, फ्रिज, अॅवन, सीडी प्लेयर, मोबाइल आदि सभी जरूरी चीजें हैं, जिनका प्रयोग मैं करती हूं और कम समय में खाना बना लेती हूं।

समय के साथ कदमताल के लिए तकनीक जरूरी

रीता बहुगुणा जोशी, अध्यक्ष, उ. प्र. कांग्रेस

विज्ञान के जितने भी आविष्कार हैं, वे जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए ही किए गए हैं। इक्कीसवीं सदी में समय के साथ कदमताल के लिए यह जरूरी हैं, क्योंकि सभी व्यक्ति आम जीवन से संतुष्ट नहीं हो सकते हैं। कुछ लोगों के लिए जीवन का कुछ खास लक्ष्य है, जिन्हें हासिल करने के लिए वे प्रयत्नशील हैं। अब व्यस्तता के इस दौर में एक कामकाजी स्त्री तकनीक की विरोधी भी हो तो भी उसे सुबह बाल धोने के बाद धूप में सुखाने का मौका रोज नहीं मिल सकता। ऐसी स्थिति में उसे ड्रायर का प्रयोग तो करना ही पडेगा और यहीं से उसकी दिनचर्या में तकनीक शामिल हो जाती है। मैं खुद बहुत तेज गति से कंप्यूटर नहीं चला पाती, लेकिन इस्तेमाल करना जानती हूं। चूंकि मैं लगातार किसी न किसी महत्वपूर्ण पद पर रही तो मुझे लोगों की चिट्ठियों के जवाब तो प्रतिदिन देने ही पडते हैं और यह तभी संभव है जबकि मैं ई-मेल करना और पढना जानूं। इतना काम मैं कर लेती हूं। कई बार मुझे 15-20 दिनों तक बाहर रहना पडता है। इसके लिए पहले हमें भारी मात्रा में फाइलें ले जानी पडती थीं, पर अब मुझे इसकी जरूरत नहीं पडती है। अब हम केवल एक लैपटॉप ले कर निकल लेते हैं और उस पर ही हमारा सारा काम चलता रहता है। इसी तरह मोबाइल ने परिवार और अन्य करीबी लोगों से संपर्क बनाए रखना हमारे लिए अत्यंत आसान कर दिया। लेकिन मोबाइल के मैं केवल दो-तीन जरूरी इस्तेमाल ही जानती हूं। एक फोन करना-सुनना, दूसरा एसएमएस प्राप्त करना और भेजना, कैलेंडर और टाइम देखना और एलार्म लगाना। कभी-कभी मैं यह भी सोचती हूं कि एक अकेले मोबाइल ने हमारा काम कितना आसान कर दिया। हर काम के लिए अलग-अलग कई चीजें लेकर चलना अब हमारी जरूरत नहीं रही। लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि आधुनिक तकनीक ने हमसे बहुत कुछ छीन भी लिया है। मोबाइल और इंटरनेट के जरिये संपर्क तो आसान हुआ है, लेकिन रिश्तों में अब वह सघनता कहां दिखती है जो पहले के जमाने में होती थी। जो प्रगाढता आप निजी तौर पर मिल कर महसूस कर सकते हैं वह फोन पर बात करके या चैटिंग में कभी भी नहीं महसूस हो सकती है। इसी तरह मैं देखती हूं कि छोटे-छोटे बच्चे अब इस तरह कंप्यूटरसैवी हो गए हैं कि वे पूरे दिन कंप्यूटर पर ही लगे रहते हैं। यहां तक कि आउटडोर गेम्स भी वे कंप्यूटर पर ही खेल रहे हैं। जो खेल मैदान में खेले जाते हैं, जब उन्हें आप कंप्यूटर पर खेलेंगे तो इसका क्या मतलब रह जाएगा? क्या इससे वह प्रभाव कभी मिल सकता है, जो उसे मैदान में खेलने से मिलता? पर यह सब आज हो रहा है। इसी तरह मोबाइल का भी कई तरह से बेजा इस्तेमाल हो रहा है। मेरा खयाल है कि यह सब नहीं होना चाहिए। इससे समय, धन और स्वास्थ्य तीनों की बर्बादी करते हैं। यही चीजें वरदान के रूप में आई तकनीक को अभिशाप बनाने लगती हैं। इसलिए उपयोग तो होना चाहिए, पर सचेत तरीके से।

जरूरी है नई तकनीक की जानकारी

नवनीत निशान, अभिनेत्री

मेरी स्पष्ट राय है कि इस युग में हर किसी को आधुनिक तकनीक की जरूरी जानकारी होनी ही चाहिए, वरना जिंदगी़ की दौड में आप पिछड जाएंगे। मैं मोबाइल का इस्तेमाल तो करती ही हूं, कंप्यूटरसैवी इस हद तक हूं कि दिन भर में एक-दो घंटे नेट सिर्फग न करूं तो चैन नहीं मिलता। इसमें कोई दो राय नहीं कि इंटरनेट दुनिया को जानने का महाद्वार है। मैं यह भी जानना चाहती हूं कि कंप्यूटर की दुनिया में नया क्या हो रहा है? मैंने पिछले साल पैम लैप भी खरीदा था। फुर्सत के वक्त मैं उसे  आजमाती भी थी, पर फिर मुझे लगा कि इसकी उपयोगिता अधिक नहीं है। सो मैंने उसका खास उपयोग किया नहीं। मैं अपने दोस्तों, रिश्तेदारों को ई-मेल के जरिए संदेश व लेटर भेजा करती हूं। लंबे अरसे बाद मैं सब टीवी का कॉमेडी धारावाहिक गपशप कॉफी शॉप कर रही हूं। इसमें मुझे दादी प्रमिला धारीवाल का रोल करना है। वह 60 वर्ष की है, पर टेक्नोसैवी है और आधुनिक खयालात वाली है। आधुनिक संसाधनों में मुझे एतराज सिर्फ मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल पर है। आज अधिकतर लोग मोबाइल से चिपके रहते हैं। जो शख्स आपके सामने है, उससे बात करना अब लोगों को जरूरी नहीं लगता। जबकि मोबाइल पर बात करने बात करने को लोग वरीयता देने लगे हैं। मैं खुद मोबाइल पर सिर्फ आवश्यक बात करती हूं। मेडिकल साइंस के अनुसार मोबाइल से निकलने वाली किरणें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती हैं, पर कौन ध्यान देगा? पता नहीं, मोबाइल की यह क्रंाति अगली पीढी को कहां ले जाएगी? टेक्नोसैवी होना अच्छी बात है, पर मुझे यह भी लगता कि इसकी अति कहीं हमारी जिंदगी़ ही तबाह न कर दे।

(इंटरव्यू : दिल्ली से इष्ट देव, मुंबई से पूजा सामंत, सोमा घोष, एस. सुशीला )

इष्ट देव सांकृत्यायन
 
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