कहते हैं जिंदगी का दूसरा नाम जिंदादिली है। पर यह जिंदादिली बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है। हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में जाने कितने ही लोगों से मिलते-जुलते रहते हैं लेकिन वक्त बीतने के साथ हमारे स्मृति पटल पर उनकी तसवीर धुंधली हो जाती है। पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनसे हम भले ही सिर्फ एक बार मिले हों, पर उन्हें याद करते ही बरबस हमारे होंठों पर मुसकान खिल उठती है। इसकी वजह सिर्फ यही होती है कि ऐसे लोगों के जिंदगी जीने का अंदाज सबसे अलग होता है।
आप याद कीजिए अपने बचपन के दिनों को। आपके क्लास में आपका कोई न कोई साथी ऐसा जरूर होगा, जिसके एक दिन स्कूल न आने पर आप सब उदास हो जाते होंगे और जब भी वह आपके साथ होता होगा, हंसता-हंसाता रहता होगा या फिर क्या पता बचपन में आप खुद ही ऐसे बच्चे रहे हों। अगर आप भी बचपन में हंसने वाले बच्चे थे, तो आप अपनी इस हंसी को बसों की रेलमपेल, दफ्तर की फाइलों और अपने हाउसिंग लोन की ईएमआई के जोड-घटाव के बीच खो न जाने दें, क्योंकि आज हमारे के पास बहुत कुछ है पर खुशमिजाजी की अनमोल दौलत हमसे दूर होती चली जा रही है।
संस्कृति में रचा-बसा हास्य
सहज हास्य बोध हमारे जीवन और संस्कृति में सदियों से रचा-बसा है। खिलखिली चिडिया की एक लोक कथा है- एक छोटी-सी चिडिया थी, जो हमेशा हंसती रहती थी। इसी वजह से सब उसे खिलखिली के नाम से बुलाते थे। नगर के राजा जब भी सुबह-शाम सैर के लिए निकलते हमेशा चहकने वाली खुशमिजाज चिडिया उन्हें दिखाई देती। राजा उसे रोज देखते और बहुत हैरान होते कि यह छोटी-सी चिडिया हर हाल में इतना खुश कैसे रह लेती है। जबकि मैं तो राजा हूं फिर भी मैं अकसर उदास रहता हूं। एक दिन राजा को बहुत गुस्सा आया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि वे चिडिया को पकड कर राजमहल के पिंजरे में कैद करवा दें। सैनिकों ने जैसे ही चिडिया को पकडने के लिए अपना हाथ बढाया, उसने मधुर स्वर में गाना शुरू कर दिया-धन्य भाग हमारे जो राजा के सैनिक मुझे लिवाने आए। इसके बाद जब उसे पिंजरे में कैद कर दिया गया तो राजा नेकहा- इसे मेरे कक्ष के सामने रखो, ताकि मैं देख सकूं कि अब यह चिडिया कैसे हंसती है। इसके बाद भी चिडिया ने गाना शुरू कर दिया कि-सोने से बना यह पिंजरा अति सुंदर, धन्य भाग हमारे जो मैं राजमहल में आई। यह सुनकर राजा को बडा अचरज हुआ कि अरे! यह तो अब भी हंस रही है। बार-बार डांटने पर भी वह चिडिया अपना गीत दोहराती रही तो राजा को उस पर गुस्सा आया और उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि इसका पिंजरा महल से बाहर निकाल कर खुले आसमान के नीचे रख दो और इसे दाना-पानी भी देना बंद कर दो। फिर भी चिडिया का हंसना-गाना बंद नहीं हुआ। वह अकसर गाती-आज है मेरा व्रत, नहीं चाहिए मुझे दाना-पानी, बाहर खिली है स्वच्छ चांदनी। इस तरह चिडिया का हंसना-गाना बंद नहीं हो रहा था और राजा का क्रोध बढता ही जा रहा था। अंतत: राजा ने तंग आकर सैनिकों को आदेश दिया कि वे चिडिया को पिंजरे से निकाल कर मार डालें। सैनिकों ने जैसे ही उसे मारने के लिए पिंजरा खोला, वह उन्हें चकमा देकर यह गाती हुई फुर्र से उड गई-राजा तुम हो सबसे गरीब क्योंकि तुम्हारे पास हंसी की दौलत नहीं है। पता नहीं यह कहानी कितनी सच्ची है पर इतना तो जरूर है कि हंसी को अपने दिलों में संजो कर रखने की सीख इसके माध्यम से बच्चों को दी जाती रही है।
क्या है खुशमिजाजी का राज
कुछ लोग गंभीर और कुछ लोग ज्यादा खुशमिजाज क्यों होते हैं? इसके बारे में मनोवैज्ञानिक डॉ. अशुम गुप्ता कहती हैं, जिंदादिल और खुशमिजाज लोगों के ऐसे व्यक्तित्व के निर्माण के पीछे दो तत्व काम कर रहे होते हैं, जिसमें एक तो आनुवंशिक कारणों से कुछ लोग जन्मजात रूप से हंसमुख प्रवृत्ति के होते हैं तो कुछ अपने आसपास के वातावरण से सीख लेकर अपने व्यक्तित्व को खुशमिजाज बनाते हैं और जब लोग उनकी इस आदत की प्रशंसा करने लगते हैं तो धीरे-धीरे हमेशा हंसते रहना इनकी आदत बन जाती है और इस तरह वे खुशमिजाज लोगों में शुमार हो जाते हैं।
हंसी और बहिर्मुखी व्यक्तित्व
खुशमिजाज लोग ज्यादातर बहिर्मुखी व्यक्तित्व के धनी होते हैं। ऐसे लोग वाकपटु होते हैं। ऐसे लोगों में गजब का प्रजेंस ऑफ माइंड होता है। इन्हें यह मालूम होता है कि किस मौके पर क्या बोलने या लोगों के साथ कैसा व्यवहार करने से माहौल खुशनुमा बन जाएगा और वे उसी मौके पर बडी सहजता से कुछ ऐसा व्यवहार करते हैं कि आसपास मौजूद सभी लोग हंस पडते हैं। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.अशुम गुप्ता आगे कहती हैं, बहुत ज्यादा बातें करने वाले या मस्तमौला किस्म के लोगों के मन में कई बार असुरक्षा की भावना रहती है। कहीं न कहीं उनके मन में लोगों द्वारा खुद को नजरअंदाज किए जाने या जीवन में अकेले पड जाने आशंका बनी रहती है। इस वजह से वे अपने हंसमुख व्यवहार से ज्यादा से ज्यादा लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने और उन्हें अपना दोस्त बनाने की कोशिश करते हैं।
क्या है सेंस ऑफ ह्यूमर
हंसी-मजाक को तुरंत समझ पाने और मजाक में ही उसका उसी वक्त जवाब देने के कौशल को सेंस ऑफ ह्यमूर कहा जाता है। मनोवैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि बुद्धिमान लोगों का सेंस ऑफ ह्यूमर ज्यादा अच्छा होता है क्योंकि शब्दों के पीछे छिपे सही भावों को समझने की क्षमता किसी दिमागदार इंसान में ही हो सकती है। इस संबंध में कार्टूनिस्ट राजेन्द्र धोडपकर कहते हैं, मेरी नजर में अच्छे सेंस ऑफ ह्यूमर के लिए व्यक्ति का उदार होना बहुत जरूरी है। हमारा दिल इतना बडा होना चाहिए, कि जब कोई हमारा मजाक बनाए तो हम उसका बुरा मानने के बजाय खुद भी अपने ऊपर या अपनी खामियों पर खुल कर हंसें। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.अशुम गुप्ता के विचार भी कुछ ऐसे ही हैं। वह कहती हैं, कई ऐसे लोग होते हैं, जिंनका बाहरी व्यक्तित्व देखने में अनाकर्षक होता है, पर वे अपने व्यक्तित्व के इस नकारात्मक पक्ष को भी अपने प्रयास से सकारात्मक बना देते हैं। यह मनोविज्ञान से जुडा ऐसा डिफेंस मैकनिज्म है, जिंसे कोपिंग कहा जाता है। ऐसे लोग अपनी खामियों का भी सकारात्मक ढंग से इस्तेमाल करने की कला जानते हैं और अपने जीवन में हमेशा सफल और खुश रहते हैं।
इस संदर्भ में फिल्म जगत के कुछ हास्य कलाकार उल्लेखनीय हैं। पुरानी फिल्मों की हास्य अभिनेत्रियां टुनटुन और मनोरमा और उसी दौर के कॉमेडियन भगवान दादा और जानी वॉकर, इन सभी का बाहरी व्यक्तित्व देखने में सुंदर नहीं था, फिर भी इन्होंने फिल्मों की ग्लैमरस दुनिया में आने की हिम्मत जुटाई। अपने बेडौल शरीर और अनाकर्षक चेहरे को ही दूसरों के मनोरंजन का साधन बनाया, जिंसकी सभी ने प्रशंसा और सराहना की और इस तरह मनोरंजन की दुनिया में ये नाम अमर हो गए।
हंसी की बदली में छिपी उदासी
बाहर से हमेशा हंसते-हंसाते रहने वाले लोगों का जीवन हमेशा खुशियों से भरा नहीं होता। अकसर उनकी हंसी के पीछे भी गहरी उदासी छिपी होती है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि दूसरों को हंसाने वाली दुनिया की जितनी भी मशहूर शख्सीयतें हुई हैं, उनमें से ज्यादातर लोगों का जीवन कई तरह संघर्षो और दुखों से भरा था। हास्य की दुनिया के महानायक चार्ली चैपलिन का बचपन बहुत दुखों और मुसीबतों से भरा हुआ था। उनके माता-पिता स्टेज के गायक थे और जब चार्ली की उम्र सात वर्ष थी, तभी उनके माता-पिता का तलाक हो गया था। इसके बाद उनकी मां मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गई थीं। वह स्टेज पर शो प्रस्तुत करने के काबिल नहीं रहीं। अंतत: उनकी दिमागी हालत इतनी खराब हो गई कि उन्हें मानसिक चिकित्सालय में भर्ती कराना पडा और अपनी मां के जाने के बाद चार्ली को कुछ वक्त अनाथाश्रम में और उसके बाद लंबा समय अपने शराबी पिता और सौतेली मां का दुर्व्यवहार झेलते हुए बिताना पडा। फिर भी उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी और छोटे-छोटे कार्यक्रमों में मोनो एक्टिंग के शाज प्रस्तुत करते हुए वे हास्य की दुनिया के महानायक बने। लेकिन सफलता के शीर्ष पर पहुंचने के बाद अपने दुख भरे बचपन और अपनी मां को याद करते हुए वे अकसर उदास हो जाते थे। इसी तरह हिन्दी फिल्मों के मशहूर हास्य अभिनेता महमूद अपने जीवन के अंतिम दिनों में जब एक टीवी शो पर इंटरव्यू देने आए थे तो जीवन के अंतिम दिनों में वह इतने अकेले और उदास थे किइंटरव्यू के दौरान ही फूट-फूट कर रो पडे थे। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.अशुम गुप्ता आगे कहती हैं, अगर किसी इंसान को अपने जीवन में बहुत ज्यादा दुखों का सामना करना पडता है तो उसके मन में अपने दुखों से बाहर निकलने की छटपटाहट बहुत ज्यादा होती है और इसके लिए वह अपने गमों को भुलाने के लिए हंसी-मजाक का सहारा लेता है। पर उसके मन के किसी न किसी कोने में उदासी छिपी रहती है।
अंतर्मन की गांठें खोलती हंसी
मनोवैज्ञानिकों का ऐसा मानना है कि कम बोलने वाले, शांत और संकोची स्वभाव वाले लोगों को मानसिक तनाव या डिप्रेशन जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं होने का खतरा ज्यादा रहता है, क्योंकि ऐसे लोग आसानी से अपने मन में छिपी बातों को सबके सामने अभिव्यक्त नहीं पाते। हंसी-मजाक ऐसे लोगों के लिए अचूक औषधि का काम करती है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.भागरानी कालरा कहती हैं, इंसान के मन में कई ऐसी बातें दबी होती हैं, जिन्हें वह सामाजिक वर्जनाओं की वजह से अभिव्यक्त नहीं कर पाता। ये बातें अपनी असफलता, ईष्र्या, निराशा, अपने व्यक्तित्व की खामियों या यौन इच्छाओं से जुडी हो सकती हैं। अवचेतन रूप से अनजाने में ही इंसान की ऐसी भावनाओं का प्रकटीकरण हंसी-मजाक के रूप में होता रहता है। यह मनोरचना व्यक्ति को तनावमुक्त रखने में सहायक सिद्ध होती है और हंसी हमारे अंतर्मन की बंद गांठें खोल देती है।
हास्य एवं राजनैतिक व्यवस्था
किसी देश केलोगों का सेंस ऑफ ह्यूमर कैसा होगा, यह बात काफी हद तक उस देश की राजनैतिक व्यवस्था पर भी निर्भर करती है। इस संबंध में कार्टूनिस्ट राजेन्द्र धोडपकर आगे कहते हैं, किसी भी लोकतांत्रिक देश में हास्य बोध शक्तिशाली के खिलाफ कमजोर का सबसे बडा हथियार है, कमजोर इंसान शक्तिशाली के खिलाफ हंस कर खुद को भयमुक्त महसूस करता है। लोकतांत्रिक देशों की राजनैतिक व्यवस्था बहुत उदार होती है, इस वजह से वहां रहने वाला आम आदमी निर्भीक होकर अपनी सरकार, व्यवस्था और नेताओं की खामियों का मजाक उडाता है। इस दृष्टि से लोकतांत्रिक देश के लोगो का सेंस ह्यूमर आम तौर पर अच्छा माना जाता है।
हास्य का समाजशास्त्र
जेएनयू की समाजशास्त्री डॉ.रेणुका सिंह के अनुसार, बचपन से बच्चे की परवरिश जिंस सामाजिक वातावरण में होती है, उस पूरे माहौल से ही बच्चे का व्यक्तित्व निर्धारित होता है। इसमें बच्चे के माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त और टीचर सभी का बहुत बडा योगदान होता है। अगर बच्चे का पारिवारिक माहौल अच्छा और खुशनुमा होगा तो निश्चित रूप से इसका उसके व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पडेगा और बडा होकर वह बच्चा संतुलित और प्रसन्नचित्त इंसान बनेगा।
इसके विपरीत हास्य बोध से संबंधित दूसरा सामाजिक पहलू यह भी है कि अगर कोई इंसान
ज्यादा समय तक प्रतिकूल परिस्थितियों में रह जाता है या उसे अपने जीवन में दुखों का बहुत अधिक सामना करना पडता है तो उसके भीतर एक अलग तरह का हास्य बोध पैदा होता है, जिसे मनोवैज्ञानिक भाषा में ब्लैक ह्यूमर कहा जाता है। दरअसल यह विपरीत परिस्थितियों में भी खुश और जिंदा रहने के लिए अपनाई जाने वाली सुरक्षात्मक मनोरचना है। सामाजिक सर्वेक्षणों में पाया गया कि वर्षो तक युद्ध की त्रासदी झेलने वाले देश वियतनाम के लोग हंसी-मजाक में भी मरने-मारने की बातें किया करते हैं।
भारतीय समाज एवं हास्य बोध
किसी भी समाज के लोगों का हास्य बोध वहां की सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं और मूल्यों पर आधारित होता है। इस संबंध में डॉ. रेणुका सिंह आगे कहती हैं, भारतीय समाज में अलग-अलग सामाजिक संबंधों में स्पष्ट सीमा रेखा निर्धारित है और यहां पारिवारिक रिश्तों की जीवंतता बनाए रखने में हास-परिहास का बहुत बडा योगदान होता है। परिवारों में देवर-भाभी और जीजा-साली के बीच हास-परिहास का रिश्ता सहज स्वीकार्य है, लेकिन छोटे भाई की पत्नी केलिए जेठ आदरणीय होता है और पत्नी की बडी बहन पति के लिए माननीय होती है। इसी तरह घर से बाहर सामाजिक व्यवहार में भी बडों (चाहे किसी भी दृष्टि से) के साथ छोटों का मजाक करना शिष्टाचार के विरुद्ध माना जाता है। साथ ही भारत में अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले, अलग संस्कृतियों के लोग रहते हैं। इसलिए यहां जाति और भाषा को लेकर कई तरह के चुटकुले प्रचलित हैं। इस तरह के उपहास के जरिये एक समुदाय के लोग दूसरे समुदाय के प्रति अपनी धारणाएं अभिव्यक्त करते हैं। इस तरह हंसी-मजाक के माध्यम से हर समुदाय के लोग दूसरे की भाषा और रहन-सहन पर हलकी-फुलकी छींटाकशी करते हैं इससे संबंधों में जीवंतता बनी रहती है।
इस संबंध में कार्टूनिस्ट डॉ.राजेन्द्र धोडपकर के विचार कुछ अलग हैं। उनका मानना है,भारतीय समाज केसाथ यह समस्या है कि यहां लोगों की भावनाएं बहुत जल्दी आहत होती हैं, क्योंकि यहां अभी भी वर्ग भेद बहुत ज्यादा है।
समाज में जिंतनी ज्यादा बराबरी होगी, वहां लोगों का हास्य बोध उतना ही स्वस्थ होगा। इसी वजह से समाज के छोटे समूहों जैसे परिवार के सदस्यों या करीबी दोस्तों के बीच सेंस ऑफ ह्यूमर का सबसे अच्छा रूप देखने को मिलता है। जहां बराबरी का माहौल होता है और लोगों के विचारों में अच्छा तालमेल होता है। सभी को पुराने संदर्भ मालूम होते हैं और उस संदर्भ से जुडे एक शब्द को सुनते ही लोगों को पूरी बात समझ में आ जाती है और हंसी का फव्वारा छूट पडता है।
फर्क हंसी और ठहाके का
जब बात हंसी-दिल्लगी की चल रही है तो एक सहज-सी जिज्ञासा होती है कि क्या इसके पीछे स्त्रियों और पुरुषों का मनोविज्ञान एक ही दिशा में काम रहा होता है या अलग-अलग। कम से कम भारतीय समाज के संदर्भ में यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.अशुम गुप्ता कहती हैं, भारतीय समाज में स्त्रियों पर शुरुआत से ही बहुत बंदिशें लगाई जाती हैं, इस वजह से ज्यादातर लडकियां स्वभावत: संकोची होती हैं। वे अपने व्यवहार में बहुत ज्यादा खुलापन नहीं रख पातीं। लेकिन जब वे घर से बाहर अपनी सहेलियों के बीच होती हैं तो बेफिक्र होकर अपने हास्य बोध का परिचय देती हैं। इस संबंध में समाजशास्त्री डॉ.रेणुका सिंह आगे कहती हैं, स्त्रियां ज्यादा संवेदनशील होती हैं। कई बार उन्हें मजाक में कही गई बातें भी चुभ जाती हैं। जबकि पुरुषों के साथ ऐसा नहीं होता, क्योंकि उनका सामाजिक दायरा ज्यादा विस्तृत होता है और उन पर बंदिशें भी नहीं के बराबर होती हैं। नतीजतन उनका हास्य बोध सबके सामने ज्यादा स्पष्ट रूप से दिखाई देता है कई बार वे आपस में हंसी-मजाक में ऐसे शब्दों का भी इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें शालीन नहीं कहा जा सकता। फिर भी वे हंसी को हंसी में उडा देने के फन में माहिर होते हैं। इसी संदर्भ में कार्टूनिस्ट राजेन्द्र धोडपकड कहते हैं, भारतीय स्त्रियां समाज द्वारा बनाए गए नियम-कायदों का बहुत ज्यादा सम्मान करती हैं। वे पुरु षों की तरह हर बात का सरेआम मजाक उडाने का दुस्साहस नहीं कर पातीं। सामाजिक वर्जनाओं की वजह से ही हास्य-व्यंग्य के क्षेत्र में आज भी बहुत कम स्त्रियां देखने को मिलती हैं।
व्यक्तित्व की कई परतें
यह हमेशा जरूरी नहीं है कि व्यक्ति का जो बाहरी व्यक्तित्व दिखाई रहा हो, वास्तव में उसका आंतरिक व्यक्तित्व भी वैसा ही हो। हर इंसान के व्यक्तित्व की कई परतें होती हैं, जिसमें उसके व्यक्तित्व के कई रंग छिपे होते हैं, जिसे हम मनोविज्ञान की भाषा में प्राइवेट सेल्फ और पब्लिक सेल्फ कहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि एक इंसान अलग-अलग जगहों पर और अलग-अलग स्थितियों में अलग-अलग ढंग से व्यवहार करता है। इसलिए यह जरूरी नहीं है कि कोई इंसान अपने सार्वजनिक जीवन में जिंतना हंसमुख और जिंदादिल दिखाई देता है, अपने व्यक्ति जीवन में भी वह वैसा ही हो। कभी-कभी इंसान अपनी प्रोफेशनल जरूरतों के तहत भी सचेत रूप से अपने व्यवहार में बदलाव लाता है। उसे मालूम होता है कि यह उसके प्रोफेशन की जरूरत है और सफलता पाने के लिए उसे अपने व्यवहार में बदलाव लाना बहुत जरूरी है। उदाहरण के लिए अगर कोई कम बोलने वाला और संकोची प्रवृत्ति का इंसान वकालत, पत्रकारिता या मार्केटिंग जैसे क्षेत्र में हो, जहां प्रतिदिन उसे कई लोगों से बातचीत करके अपना काम करना होता है, तो ऐसी स्थिति में वह अनिच्छा से ही सही, पर धीरे-धीरे सामाजिक व्यवहार का कौशल हासिल कर लेता है। जैसे-लोगों के साथ मिलने पर गर्मजोशी से पेश आना, सहज ढंग से हंसते हुए बातें करना, अपने व्यवहार को संतुलित रखना आदि। फिर जब लोग उसके इस बदले हुए व्यवहार पर अच्छी प्रक्रिया देते हैं, तो उसे खुद भी अच्छा लगता है और वह अपना व्यवहार खुशमिजाज बनाए रखने के लिए प्रेरित होता है। सबसे बडी बात यह है कि कामकाज के दौरान थोडा-हंसी मजाक व्यक्ति को तनावमुक्त कर देता है। उदाहरण के लिए एक बार रेल मंत्री लालू यादव से किसी पत्रकार ने पूछा था कि, इतनी व्यस्तता के बावजूद आप हमेशा हंसी-मजाक की भाषा में बातचीत कैसे कर पाते हैं तो इसके जवाब में उन्होंने यही कहा था कि, राजनीति में इतना अधिक तनाव है कि अगर मैं अपना व्यवहार ऐसा न रखूं तो तनाव की वजह से मेरा ब्रेन हैमरेज हो जाएगा।
सामाजिक जरूरत है हंसी
कहावत है कि तुम हंसोगे तो सारा संसार तुम्हारे साथ हंसेगा पर अगर तुम रोओगे तो तुम्हें अकेले ही रोना होगा। सदियों पहले किसी बुजुर्ग ने यह बात यूं ही नहीं कही होगी। हर हाल में खुश रहना या प्रतिकूल परिस्थितियों में भी कम से कम खुश रहने की कोशिश करना एक सहज स्वीकार्य सामाजिक गुण माना जाता है। अति व्यस्त जीवन शैली में सभी के पास समय की कमी है। जीवन की परेशानियों से जूझने के बाद जो भी थोडा-बहुत समय मिलता है, उसका सबसे अच्छा उपयोग खुश रह कर ही किया जा सकता है। अपने जीवन की लडाई हर इंसान को खुद ही लडनी होती है, कोई दूसरा आपकी समस्याएं सुनकर आपको सिर्फ सुझाव ही दे सकता है। वह सुझाव आपके अमल करने के योग्य है या नहीं, यह तय करना और इस पर अमल करना भी आपका ही काम है। इसी वजह से दूसरों को बार-बार अपनी तकलीफों या परेशानियों के बारे में बता कर उन्हें भी तनावग्रस्त करने वाले लोगों के सगे-संबंधी और दोस्त उनसे मिलने-जुलने से कतराने लगते हैं। समस्याओं के बारे में बार-बार बातें करके अपनी बेचारगी जाहिर करने से बेहतर है उस समस्या को दूर करने की दिशा में सार्थक प्रयास करना।
तनावग्रस्त जीवन और हास्य
इस संबंध में समाजशास्त्री डॉ. रेणुका सिंह आगे कहती हैं, दुनिया के हर समाज में खुशमिजाजी की सराहना की जाती है और सभी को खुशमिजाज लोगों का साथ पसंद आता है और उनके साथ रहकर उदास रहने वाले भी स्वयं को तनावमुक्त महसूस करते हैं। खुशमिजाज लोगों के दोस्तों की संख्या बहुत ज्यादा होती है, किसी अजनबी को भी ऐसे लोग बहुत जल्दी अपना दोस्त बना लेते हैं, सामाजिक व्यवहार में भी ऐसे लोग निपुण होते हैं।
इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.अशुम गुप्ता आगे कहती हैं, दरअसल बाहर से खुशमिजाज दिखना, आज की सामाजिक जरूरत और सफलता की पहली शर्त है। इस वजह से आजकल बिजनेस स्कूलों में छात्रों की ग्रूमिंग क्लासेज के दौरान इंप्रेशन मैनेजमेंट की ट्रेनिंग दी जाती है, जिसमें यह बताया जाता है कि आप चाहें भीतर से कितने ही दुखी या तनावग्रस्त क्यों न हों, लेकिन अपने कार्यस्थल पर लोगों के साथ बातचीत करते समय आप हमेशा खुश नजर आएं, क्योंकि खुशमिजाज व्यक्तित्व की समाज में सभी सराहना और प्रशंसा करते हैं और आज करियर की सफलता के लिए भी ऐसा करना जरूरी समझा जाता है। समाज में लोगों के साथ बेहतर संबंध बनाने की पहली शर्त भी खुशमिजाजी है।
तलाश खुशी के दो पल की
आज की जीवन शैली इतनी तनाव से भरी है कि किसी भी इंसान के लिए सुकून के कुछ पल निकाल पाना बहुत मुश्किल होता है। फुर्सत में उसे जो भी थोडा-बहुत समय मिलता है, उसे वह हंसी-खुशी के साथ गुजारना चाहता है। आज जीवन से सहज हास्य गुम होता जा रहा है, इसलिए आजकल लोग हंसने और खुश रहने का अवसर ढूंढते नजर आते हैं। इस संबंध में समाजशास्त्री डॉ. रेणुका सिंह कहती हैं, भारतीय समाज की गतिशीलता इतनी बढ गई है कि आज लोगों के पास समय बिल्कुल नहीं है और आज कोई भी व्यक्ति उदासी का बोझ उठाने को तैयार नहीं है। सत्तर और अस्सी का दशक एक सामाजिक ठहराव का समय था, तब लोगों के पास गंभीर चिंतन और विचार-विमर्श करने का वक्त होता था। इसी वजह से इस दौर में मनोरंजन का सबसे बडा माध्यम सिनेमा भी सामाजिक सरोकारों से जुडा हुआ था। इस समय मनोरंजक फिल्मों के साथ-साथ सामाजिक हितों से जुडी गंभीर कलात्मक फिल्में भी खूब बनीं और लोकप्रिय हुई। लेकिन आज ग्लोबलाइजेशन के बाद स्थितियां बहुत बदल चुकी हैं। आज किसी के भी पास ज्यादा सोचने और सोच कर उदास होने का वक्त नहीं है। आज लोगों के ध्यान केन्द्रित करने की क्षमता भी कम हो गई है। इसलिए लोगों को सब कुछ इंस्टैंट चाहिए। हास्य बोध के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है, उन्हें कुछ ऐसा मनोरंजन चाहिए जो उन्हें पल भर में हंसा सके। इसी वजह से आज हास्य फिल्में और लाफ्टर शोज इतने ज्यादा लोकप्रिय हो रहे हैं।
सच तो यह है कि खुशी हमारे आसपास ही छिपी होती हैं, बस आपके भीतर उसे तलाशने की इच्छा होनी चाहिए। आप एक बार सच्चे मन से उसे ढूंढ कर तो देखें, फिर वह कभी भी आपका साथ नहीं छोडेगी।
मौज-मस्ती पसंद है मुझे
शांता कुमारन श्रीसंत, क्रिकेट खिलाडी
दरअसल मैं काफी जॉली किस्म का शख्स हूं और अपनी लाइफ को पूरी तरह एंजॉय करने में यकीन रखता हूं। मुझे जोश, मौज-मस्ती और ग्लैमर से भरपूर जिंदगी पसंद है। मैं अपनी भावनाओं का खुल कर इजहार करता हूं। मैच के दौरान भी अगर मुझमें ज्यादा जोश आता है या मुझे खुशी होती है तो मैं बेझिझक होकर सबके सामने डांस करके या हवा में अपना बैट लहराते हुए अपनी खुशी का इजहार करता हूं। मुझे लोगों से मिलने-जुलने और उनसे खुल कर बातें करना अच्छा लगता है। पार्टियों में भी शामिल होने और डांस करने में भी मुझे बहुत मजा आता है। बचपन से ही मुझे डांस का बेहद शौक रहा है। मुझे डांस का इतना जबरदस्त शौक है कि मैंने इसके लिए कोचिंग भी ज्वाइन की थी और वहां नए-नए डांस के स्टेप्स सीखे। ब्रेक डांस बचपन से ही मेरा फेवरेट रहा है। स्कूल और कॉलेज में मैंने कई डांस कॉम्प्टीशंस में हिस्सा भी लिया और अवार्ड भी जीते। यदि मैं क्रिकेटर नहीं होता तो डांस के फील्ड में करियर बनाता। डांस के साथ मैं म्यूजिक सुनने का भी शौकीन हूं। मुझे सॉफ्ट म्यूजिक बहुत पसंद है। मेरा मानना है कि अच्छा संगीत ध्यान केन्द्रित करने में भी सहायक होता है। सिर्फ क्रिकेट के मैदान को छोड कर, बाकी सभी जगहों पर फिर चाहे वह होटेल हो या ड्रेसिंग रूम, मेरा आई पॉड हमेशा मेरे पास होता है। लता मंगेशकर, कुमार शानू, सोनू निगम मेरे पसंदीदा गायक रहे हैं। फिल्में देखने का भी मैं बहुत शौकीन हूं। अमिताभ बच्चन मेरे फेवरेट एक्टर हैं। मुझे कॉमेडी फिल्में खास तौर से पसंद हैं। फुर्सत के वक्त प्यानो बजाना, दोस्तों के साथ बैठ कर बातें करना और हंसना-हंसाना मुझे बहुत पसंद है। असल में मैं बहुत फन लविंग इंसान हूं, इसी वजह से मेरे बहुत सारे दोस्त हैं।
अपनी तो आदत ही है हंसने की
तनाज करीम-बख्तियार, टीवी एवं फिल्म अभिनेत्री
आज हम आम तौर पर हंसना भूल से गए हैं और आज हर किसी को जरूरत है हंसने-हंसाने की। यही वजह है कि पिछले कुछ समय से टीवी पर दिखाए जाने वाले लॉफ्टर शोज इतने पॉपुलर हो रहे हैं। वैसे अगर मैं अपनी बात करूं तो यही कहूंगी कि मेरा पारिवारिक माहौल हमेशा से सपोर्टिग रहा है। मुझे हमेशा जो जी चाहे, करने की आजादी दी गई है। मैं बचपन से ही बहुत शरारती और खुशमिजाज रही हूं और ज्यादा हंसने की वजह से स्कूल-कॉलेज में टीचर्स की कई मर्तबा डांट खा चुकी हूं। पर इससे मेरी इन आदतों में कोई सुधार नहीं आया। सच तो यह है कि आज टेलीविजन के कलाकारों पर काम का दबाव बहुत ज्यादा है। हमें कम समय में काफी काम करना होता है। आजकल मैं मैटरनिटी लीव पर हूं इसलिए मैंने खुद को टेंशन फ्री रखा है। मैंने आजकल काम से लंबा ब्रेक लिया है। जब मैं चाहूंगी फिर से काम शुरू कर दूंगी। मेरी नजर में अच्छा सेंस ऑफ ह्यूमर वही है, जो किसी की निजी भावनाओं को ठेस न पहुंचाए। ह्यूमर तो वह है कि लोग हंसें। यदि आपके मजाक या जोक ने किसी को दुखी कर दिया तो ऐसे मजाक का क्या फायदा?
फिल्म कहो न प्यार है में एक चुलबुली लडकी का मेरा जो किरदार है, उससे मैं खुद को काफी हद तक रिलेट करती हूं। टीवी पर या फिल्मों में मैंने अकसर वो ही किरदार निभाया है, जिसे मैं खुद स्क्रीन पर निभाना एंजॉय करती हूं। मेरा मानना है कि वैसे काम और पैसे का क्या फायदा जो हमें हाई ब्लडप्रेशर का मरीज बना दे। मैं जब भी टेंशन में होती हूं तो उसे दूर करने के लिए म्यूजिक सुनती हूं या कुछ कॉमेडी टीवी सीरियल्स देखती हूं। मेरे पति बख्तियार ईरानी भी मेरी ही तरह खुशमिजाज और जिंदादिल इंसान हैं।
कॉमेडियन का कोई दुश्मन नहीं होता
साजिद खान, फिल्म निर्देशक
मैं बचपन से बहुत हंसोड रहा हूं, पर ऐसा नहीं है मैं अपने जीवन के प्रति गंभीर नहीं हूं। मैं अपने बचपन के एक किस्से से आपको रूबरू कराता हूं। दरअसल मैं रोज स्कूल देर से पहुंचता था और हर दिन नए बहाने बनाया करता था। जैसे कभी मैं कहता था कि मेरे घर में चोरी हो गई है, कभी कहा करता था पुलिस ने आकर मुझे धर दबोचा। मेरी कहानियां बडी दिलचस्प हुआ करती थीं। कुछ समय बाद मुझे यह एहसास हुआ कि मेरी झूठ-मूठ की कहानियां सभी पसंद करने लगे हैं। फिर आगे चलकर तो हद हो गई, जब मेरी टीचर्स भी मेरी इस आदत से परिचित हो चुकी थीं और जब भी पी.टी. पीरियड या फ्री पीरियड होता था तो वे खुद क्लास में बच्चों से पूछती थीं- तुम्हें खेलने के लिए प्ले ग्राउंड में जाना है या क्लास रूम में बैठ कर साजिद से कहानियां सुननी हैं? बचपन की ऐसी बहुत सी बातें हैं, जिंन्हें याद करके बहुत हंसी आती है। लेकिन अपनी खुशमिजाज इमेज ऐसे मौके पर बडी भारी पड जाती है जब अपना मूड खराब हो, किसी से बात करने की भी इच्छा न हो, पर लोग यही उम्मीद रखें कि मैं उन्हें हंसाता रहूं।
दरअसल सदा हंसने वाले लोगों को सभी पसंद करते हैं। मुझे लगता है कि कॉमेडियन महमूद और जॉनी लीवर का कोई दुश्मन नहीं होगा। वैसे लोगों को हंसाना आसान काम नहीं है। हमें दुनिया के पल-पल की खबर रखनी पडती है। जोक्स तभी तो बन पाते हैं। मेरा मूड जब भी ऑफ होता है तो मैं ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्में गोलमाल और चुपके-चुपके देखता हूं और जी भर कर हंसता हूं। इसके बाद तरोताजा हो जाता हूं। मैंने छोटे पर्दे के लिए कई सारे शोज किए हैं। उन कार्यक्रमों में मैंने फिल्म इंडस्ट्री के लोगों का मजाक तो उडाया ही है, खुद का भी अकसर मजाक उडाया है। मजाक को मजाक के लेवल पर छोड देना ही अच्छा होता है। अगर मजाक करने वाला और उसे सुनने वाला दोनों ग्रेसफुल हों तो दूध में शक्कर वाली बात होती है।
क्या है लाफ्टर थेरेपी
आज पूरी दुनिया में हंसी को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। वैसे इस चिकित्सा पद्धति का इतिहास काफी पुराना है। 14वीं शताब्दी में फ्रेंच सर्जन हेनरी मानडेविले ने अपने एक शोध-पत्र में लिखा था कि मैंने अस्पताल में रोगियों की देखभाल के साथ-साथ उनके कुछ रिश्तेदारों और ऐसे खास दोस्तों को उनके साथ रहने की इजाजत दी, जो हंसने-हंसाने में माहिर हों। इससे रोगी के स्वास्थ्य में अपेक्षाकृत ज्यादा तेजी से सुधार हुआ। इसके बाद 1930 से आधुनिक लाफ्टर थेरेपी की शुरुआत हुई, जिसमें यूरोपीय देशों के अस्पतालों में भर्ती पोलियोग्रस्त बच्चों को हंसाने के लिए जोकर्स बुलाए जाते थे। इसके बाद पूरी दुनिया में उपचार के लिए इस थेरेपी की मदद ली जाने लगी और इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। कैलिफोर्निया स्थित लोमा लिंडा यूनिर्वसिटी के डॉ.ली ब्रेक और उनके सहयोगी स्टैनली टैन ने लाफ्टर के थेरेपी पर गहन अध्ययन किया और 1996 में ह्यूमर एंड हेल्थ जनरल में प्रकाशित इन दोनों मनोवैज्ञानिकों के शोध पत्र के अनुसार हंसना निम्नलिखित तरीके से सेहत के लिए फायदेमंद साबित होता है :
1. हंसी हाई ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करती है।
2. अध्ययनों में यह पाया गया है कि जब हम हंसते हैं तो हंसने के दौरान शरीर का इम्यून सिस्टम बहुत तेजी से सक्रिय हो जाता है, साथ ही यह शरीर की संक्रमित कोशिकाओं, कैंसर और टयूमर से प्रभावित कोशिकाओं को भी नष्ट करने का काम करता है।
3. हंसने से श्वसन-तंत्र मजबूत होता है और रोग प्रतिरोधक हॉर्मोन्स का स्त्राव होता है, जिससे श्वसन-तंत्र इनफेक्शन से बचा रहता है।
4. हंसने से फेफडों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन मिलता है, जो थकान और तनाव दूर करने में सहायक होता है।
5. हंसी अपने आप में बहुत अच्छे दर्द निवारक दवा का काम करती है। हंसने से ऑर्थराइटिस और सिरदर्द जैसी समस्याओं में राहत मिलती है।
6. हंसने से चेहरे की मांसपेशियों की अच्छी एक्सरसाइज होती है, जो सेहत के लिए फायदेमंद साबित होती है।
सारे दुखों को दूर कर देती है हंसी
कैलाश खेर, गायक
मैं अपने ऊपर तनाव कभी नहीं लेता। मेरे लिए पूरी दुनिया एक एम्यूजमेंट पार्क है। जहां जाता हूं, मुझे सारे लोग खुश ही नजर आते हैं। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जब आप लोगों से मिलते हैं तो उनके प्रति आपके मन में क्या भाव रहता है। अगर आपकी भावनाएं अच्छी होंगी तो आपको सभी अच्छे लगेंगे। मेरे हिसाब से अच्छा सेंस ऑफ हयूमर जावेद अख्तर जी में है और हमेशा खुश रहने की प्रेरणा मुझे उन्हीं से मिली है।
मेरी जिंदगी दिल्ली में शुरू हुई और वहां से मैं करियर बनाने मुंबई पहुंच गया और आज वहां मुझे कामयाबी मिली। मैं हमेशा ही हंसमुख था और इसकी वजह से मुझे हमेशा तारीफही मिली। हंसना जीवन में सबसे अधिक जरूरी है। इससे हर तरह का तनाव दूर हो जाता है। मेरा मूड कभी ऑफ नहीं होता। अगर कोई बात मेरे मन की न भी हो तो मैं उसे सकारात्मक रूप में ले लेता हूं। मैं सोचता हूं कि भगवान ने मुझे इतना ही दिया है। उसके बाद मुझे दुख नहीं होता। मैं हमेशा इस सिद्धांत पर चलता हूं कि हमेशा खुश रहो और दूसरों को खुश रखो। मैं अपने आसपास रहने वाले लोगों को खुशी बांटता हूं। हंसते-हंसते जीना ही सबसे बडी बात है। यूं तो बहुत अमीर, अरबपति लोग भी अकसर उदास रहते हैं। मैं धन से सुख को नहीं आंकता इसीलिए खुश रहता हूं।
मैं भगवान में आस्था रखता हूं। उसने मुझे बहुत कुछ दिया है। मेरे आसपास के लोग हमेशा मेरे साथ ही रहना चाहते हैं। वे मुझे हर महफि ल की जान समझते हैं। मुझे देखते ही लोगों के चेहरे पर खुशियां दौड जाती हैं। मुझे अच्छा लगता है कि मेरी मौजूदगी सबके लिए कितनी खास है। इसका लुत्फ मैं भी उठाता हूं और खुशी के साथ बल्ले-बल्ले करता हूं।
तबस्सुम में गम को छिपाओ तो जानें
तबस्सुम, रेडियो एवं टीवी एंकर
मेरे मम्मी-पापा दोनों जर्नलिस्ट थे। उन्होंने एक उर्दू अखबार भी निकाला था, जिसमें अली सरदार जाफरी साहब, मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी, शकील बदायुंनी, जां निसार अख्तर जैसी महान हस्तियां अपना-अपना योगदान देती थीं। मेरा बचपन ऐसी ही महान हस्तियों के साथ बीता। मेरे मम्मी-पापा दोनों ही बहुत जिंदादिल इंसान थे। जब मैं साढे तीन साल की थी तो मेरे पहले स्टेज कार्यक्रम से जो पैसे मुझे मिले थे, उन्हीं पैसों से मेरे पापा ने एक लॉफ्टर क्लब ह्यूमर अनलिमिटेड बनाया और मैं चार साल की उम्र में उस क्लब की प्रेसिटेंड बनी। तब से मेरा हंसने-हंसाने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है। मैं लगभग दो सौ से भी अधिक फिल्मों में बतौर बाल कलाकार काम कर चुकी हूं। आज मेरी उम्र 63 वर्ष हो चुकी है, पर मेरी खुशमिजाजी आज भी वैसी ही बनी हुई है, जैसी कि पहले थी। बहुत पहले एक बार मशहूर एक्टर देवानंद साहब ने मुझसे कहा था कि- अगर तुम अपनी खुशमिजाजी को बरकरार रखना चाहती हो तो जो बात तुम्हें टेंशन दे रही हो, उसे अटेंशन मत दो। मैं इसी उसूल पर अमल करती हूं और हमेशा खुश रहती हूं। मैंने लगातार 21 वर्षो तक दूरदर्शन पर लोकप्रिय टॉक शो फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन प्रस्तुत किया है। इसके लिए मुझे फर्स्ट लेडी ऑफ इंडियन टेलीविजन का दादा साहेब फाल्के अवार्ड मिला है। मैं पहली महिला एंकर थी, जिसने रेडियो और टीवी पर जोक्स का प्रोग्राम शुरू किया था। इसके लिए मुझे जोक्स क्वीन का भी खिताब मिल चुका है। मेरा मानना है कि अगर हम किसी को कुछ नहीं दे सकते तो कम से कम उन्हें थोडी हंसी तो दे ही सकते हैं। यह भी बात सच है कि बाहर से खुश दिखने वाला इंसान कई बार भीतर से काफी उदास होता है। इससे जुडा एक शेर मुझे याद आ रहा है-
तबस्सुम में गम को छिपाओ तो जानें,
हमारी तरह मुस्कराओ तो जानें।
कॉमेडी है मेरे अंदाज में
देलनाज पॉल, अभिनेत्री
मुझे लगता है कि जिंदगी में सकारात्मक दृष्टिकोण रखने से तनाव कभी नहीं होता। ऐसा नहीं है कि मुझे तनाव नहीं होता, लेकिन मैं बहुत चिंता नहीं करती। तनाव से सेहत को नुकसान पहुंचता है इसलिए मैं हमेशा मस्त रहती हूं और इसका अंदाजा मेरी सेहत को देखकर आप खुद ही लगा सकते हैं। अगर अच्छे ह्यमूर की बात की जाए तो मुझे ऐसा लगता है कि इसके लिए पहले खुद पर हंसना सीखना जरूरी है। खुद पर जोक क्रिएट कर पाओ, वही सही और अच्छा ह्यूमर होगा। मजाक के नाम पर दूसरे को दुख पहुंचाना गलत है।
मैं बहुत फन लविंग हूं। मुझे मौज-मस्ती बहुत पसंद है। जब मैंने फिल्म कल हो न हो में प्रीति जिंटा की सहेली स्वीटू का किरदार निभाया तो उसके बाद मुझे काफी काम मिला। लेकिन मैं यह नहीं मानती कि सिर्फ मेरे मोटापे के कारण कॉमेडी क्रिएट होती है। मेरे अंदाज में भी कॉमेडी होती है। मैं हर स्टोरी पर काम नहीं करती, हमारी स्टोरी जरा हटकर होती है। मैं खुद भी थोडी डिफरेंट हूं। मैंने मोटापे में ग्लैमर भरा है। मेरा अंदाज एकदम अलग है। परदे पर ज्यादातर पतली-दुबली लडकियां देखने को मिलती हैं और सब एक ही जैसी लगती हैं। लेकिन हमारे जैसी वजनदार एक-दो ही होती हैं। इसलिए हमारे जैसे लोग अलग से नजर आते हैं और भीड में भी याद रह जाते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि किरदार भी ऐसा होना चाहिए जिसमें कॉमेडी का पुट बखूबी भरा जा सके।
मैंने हमेशा ऐसे कपडे पहने हैं कि वे फूहड न लगें और वे हमारी जैसी लडकी के लिए आइडियल हों। कहनेका मतलब यह कि मेरे कपडे शालीन होते हैं। ह्यमूर मेरे अंदाज में होता है। हंसकर मैं अपने सारे टेंशन दूर कर देती हूं। यहां तक कि जब कभी मेरे पति राजीव के साथ मेरा झगडा भी हो रहा होता है तो बीच में अपनी ही कही बातों पर अचानक मुझे हंसी आ जाती है और मैं उसी पल अपना सारा गुस्सा भूल कर हंस पडती हूं।
हंसी-खेल नहीं है दूसरों को हंसाना
अशोक चक्रधर, हास्य-व्यंग्य कवि
मेरा मानना है कि सहज हास्य बोध के लिए यह बहुत जरूरी कि हमारा व्यक्तित्व एक नन्हे शिशु-सा निर्मल और निश्छल हो। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर इंसान के भीतर एक शिशु छिपा होता है और हमें अपने भीतर छिपे इस शिशु का पालन-पोषण अच्छी तरह करना चाहिए ताकि हमारे भीतर का वह शिशु किलकारियां भरता रहे और हम हमेशा प्रसन्नचित्त रहें। मेरे खयाल में अच्छा सेंस ऑफह्यूमर उसी का माना जाता है जो अपने आप पर भी हंसने का हौसला रखे और इसके लिए बहुत मजबूत कलेजा होना चाहिए। दूसरों को हंसाना कोई हंसी-खेल नहीं है। सच तो यह है कि दूसरों को हंसाने वाला व्यक्ति बहुत गंभीर प्रकृति का होता है। उसे अपने दुखों का शमन करके लोगों को हंसाने की कला आती है। जब हंसी की बात चल रही है तो मुझे हास्य कवि काका हाथरसी बरबस याद आते हैं। गजब का मस्तमौला व्यक्तित्व था उनका। एक बार की बात है, हम दोनों ट्रेन से कहीं जा रहे थे। एक स्टेशन पर जब ट्रेन रुकी तो मैं सेब खरीद कर लाया। काका ने अपने थैले से छोटा-सा चाकू निकाला और मुझसे कहा कि लला जरा इसे छील कर काट दो। मैं उनके कहे अनुसार सेब को छील-काट कर प्लेट में रख दिया। फिर मैंने उनसे कहा कि काका सेब के छिलके मत उतरवाया करो, इनमें बहुत विटमिन होता है। यह सुनते ही काका ने सारे छिलके मेरे आगे रख दिए और कहा कि, ऐसा करो बेटा, सारा विटमिन-सिटमिन तुम खा लो, मैं खाली सेब खा लेता हूं। इसके बाद हम दोनों हंस पडे। मेरा मानना है कि हंसी की कोई लिखित-पठित, छपित भाषा नहीं होती फिर भी यह पूरी दुनिया की मातृभाषा है। यह तनाव दूर करने वाली अचूक औषधि है। जब हम मुसकुराते हैं, हमारे होंठों का आकार एक नाव की तरह होता है। इसलिए जब भी आप तनावग्रस्त हों मुसकान की नाव के ऊपर तनाव को रखकर आप उसे बंगाल की खाडी में फेंक दें, वह दुबारा आपके पास नहीं फटकेगा।
खुद पर हंसना पसंद है मुझे
खुशवंत सिंह, लेखक एवं पत्रकार
मेरे खयाल से सेंस ऑफ ह्यूमर को बरकरार रखने के लिए इंसान में दो बातों का होना बहुत जरूरी है- जिंदगी से हंसी के पल तलाशने की काबिलीयत और खुद पर हंसने की कूवत। यहां मैं अपनी जिंदगी से जुडी एक ऐसी ही मजेदार घटना का जिक्र करना चाहूंगा। एक बार मैं गर्मी के मौसम में घूमने इटली गया हुआ था, जहां मैं एक छोटे से होटेल में ठहरा हुआ था, वहां एक झील थी, जो इटली और स्विट्जरलैंड की सीमा को अलग करती थी। मुझे इस बात का डर था कि विदेश में मेरी ऑड एपियरेंस कहीं मजाक का विषय न बन जाए। इस वजह से मैं सुबह के बजाय रात को बोट पर बैठकर स्विमिंग के लिए जाता था, लेकिन मुझे इस बात की जानकारी नहीं थी कि वहां सीमा की रक्षा के लिए रात को झील में पुलिस की गश्त लगवाई जाती है। एक राज जब मैं स्विमिंग कर रहा था तभी वहां मुझे गश्त लगा रही पुलिस की बोट की रोशनी दिखाई देने लगी। मैंने पूरे कपडे भी नहीं पहने हुए थे और बाल भी खुले हुए थे, इसलिए हडबडी में तैरते हुए मैं खुद को बोट के पीछे छिपाने की कोशिश करने लगा, लेकिन मेरी यह कोशिश कामयाब नहीं हुई। मेरे खयाल से वहां की पुलिस ने अजीबोगरीब शक्ल-सूरत वाले इंसान को पहली बार पानी में तैरते देखा था। वे इटैलियन में मुझसे बार-बार क्या कह रहे थे, मेरी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। लेकिन एक पुलिस वाला मेरा हुलिया देखकर इस वजह से मुझे पहचान गया क्योंकि उसकी बेटी ने पहले उसे मेरे बारे में बताया था कि बॉर्डर के किनारे वाले होटेल में एक दाढी वाला अजीबोगरीब शख्स ठहरा हुआ है। तभी उस पुलिस वाले ने मेरे करीब आ कर मुझे टूटी-फूटी अंग्रेजी में हिदायत दी कि आप बॉर्डर के नजदीक स्विमिंग न किया करें। उसके बाद से मैं दोबारा उस लेक में स्विमिंग के लिए नहीं गया। मुझे जब भी यह वाकया याद आता है, मैं हंसे बिना नहीं रह पाता।
(इंटरव्यू: मुंबई से यशवंत सिंह, एस. सुशीला, सोमा घोष, पूजा सामंत, दिल्ली से इला श्रीवास्तव एवं विनीता) |