अंधेरों से उजालों की ओर

      
अंधेरों से उजालों की ओर

कविता होनहार छात्रा थी। अचानक दसवीं के प्री बोर्ड में नंबर कम आने पर वह इतनी डिप्रेस हो गई कि दिन भर पढाई व नंबरों के बारे में सोच-सोचकर परेशान रहने लगी। हर सहेली से यही डिस्कस करती कि उसके पेपर कैसे हुए? हालात इतने बिगड गए कि वह क्रॉनिक डिप्रेशन की शिकार हो गई। नतीजा, उसके जीवन के तीन महत्वपूर्ण साल बर्बाद हुए। लंबे इलाज के बाद उसने बारहवीं की परीक्षा दी, जब कि उसके साथी बीए कर चुके हैं।

स्कूल टीचर पिता की संतान अमित की इच्छा थी कि वह हाई प्रोफाइल नौकरी के साथ कार, बंगले व सुख-सुविधाओं से युक्त जीवन परिवार को दे। उसकी इच्छा तो पूरी हुई लेकिन चैन जिंदगी से लापता हो गया। उसके पास पैसा तो है, समय नहीं है। जिस खुशी के लिए उसने इतनी मेहनत की, आज वही खुशी लापता थी। व्यस्तता ने उसे इतना तनाव दे दिया कि उसे मानसिक शांति के लिए विशेषज्ञ के पास जाना पडा।

आर्मी ऑफिसर की सुंदर पढी-लिखी पत्नी आज पति के न रहने पर मनोचिकित्सक की देख-रेख में इलाज करा रही है। वह अकेली हो गई है। बच्चे हैं लेकिन व्यस्त हैं अपनी दुनिया में। सारा दिन नौकर-चाकर के बीच रहते हुए वह किससे अपने मन की बात कहे, समझ नहीं पाती।

नींद ना आना या नींद के मारे आंख न खुलना। भूख न लगना या दिन भर खाते रहना।

बिना वजह उदास या परेशान रहना। ये सभी लक्षण हैं किसी के तनावग्रस्त होने के।

ऐसे लोग नहीं समझ पाते मनोरोगी कि लोग उनके बारे में क्या कह रहे हैं, क्यों कह रहे हैं? या तो वे दूसरों के व्यवहार पर तटस्थ रहते हैं या जबरदस्त प्रतिक्रिया करते हैं।

आज ऐसा कोई नहीं, जिसे कोई तनाव न हो। किसी को पढाई का, किसी को नौकरी का, किसी को मनचाहे कॉलेज में प्रवेश न मिलने का, किसी को प्यार में असफल होने का तो किसी को घर-परिवार व ऑफिस के वातावरण का और कुछ नहीं तो समय पर न पहुंच पाने या चार्टर्ड निकल जाने का भी तनाव हो सकता है। समस्याएं इतनी हैं कि गिनाई नहीं जा सकतीं। जब जाने-अनजाने व्यक्ति की आकांक्षाएं पूरी नहीं होतीं तो तनाव उत्पन्न होता ही है। तनाव सदैव हमारी विभिन्न मांगों और सामान्यत: बाहरी स्त्रोतों द्वारा मांगों को पूरा करने के साम‌र्थ्य के बीच असंतुलन से संबंधित होता है। यही असंतुलन खुशियों को चेतावनी देता है और अनेक बीमारियों को जन्म देता है। तनाव एक अनिवार्य विसंगति है। ऐसा नहीं है कि यह हमेशा दुखदायी ही होता है, कभी-कभी स्वस्थ प्रतियोगिता के लिए इसकी उपस्थिति आवश्यक है। अच्छा होगा कि आम आदमी इसी रूप में इसे ग्रहण करे।

तनाव क्या है

तनाव वास्तव में अंगारों के समान है। यदि हम इस पर नियंत्रण रखते हैं तो ही इसकी चमक व आनंद उठा सकते हैं और नुकसान से बच सकते हैं। यदि हवा दे दें, तो यह भयानक हो सब खत्म कर देगा। तनाव से मुक्ति पाने के लिए अपनी कमजोरियों को पहचानना जरूरी है। तनाव केवल आज की हकीकत नहीं। यह तब भी था जब आदमी शिकार करता था या शिकार बन जाता था। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि अकबर अपने समय से तीन शताब्दी आगे थे और औरंगजेब अपनी उम्र से कई सौ साल पीछे। उसकी वजह थी कि अकबर किताबों व अपने नौ रत्नों के बताए आवश्यक कार्यो पर केंद्रित रहे और पूरे शासनकाल के दौरान तनावरहित रहे। दूसरी तरफ औरंगजेब की वसीयत की पहली पंक्ति थी कि मैं जीवन भर असहाय रहा और असहाय ही जा रहा हूं। वह हमेशा तनाव में ही रहे। यह अंतर है तनावमुक्त रहने या न रहने का। खैर बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले। यदि तनाव को ठीक से हैंडल किया जाए तो 80 से 86 प्रतिशत तक तनाव घटाया जा सकता है। आपका जीवन आपका अपना है, आप इसे कैसे जिएंगे, यह आप पर ही निर्भर करता है। इसीलिए यह निर्णय भी आपका ही होगा कि आपको खुशगवार जीवन जीना है या तनावग्रस्त। लेकिन यह सच है कि तनाव काबू से बाहर हो जाए तो जिंदगी आसान नहीं रहती।

तनाव बदलता है डिप्रेशन में

लगातार तनाव की स्थिति बने रहने पर डिप्रेशन की स्थिति आ जाती है। आम आदमी शायद यह नहीं जानता हो कि तनाव शब्द को जीव विज्ञानियों ने इंजीनियरिंग की दुनिया से उधार लिया है, जहां उसका अर्थ है कि एक निश्चित तनाव या दबाव का सामना करने का साम‌र्थ्य। मेडिकल जगत के महान ज्ञाता व तनाव के शोधकर्ता डॉ. हैंस सेल्ये के अनुसार तनाव किसी विशेष सिंड्रोम के कारण होता है। इससे हमारे बायोलॉजिकल सिस्टम में बदलाव आ जाता है। वास्तव में तनाव उसे कहते हैं, जिससे हमारे शरीर की कुछ कोशिकाओं को नुकसान पहुंचता है। मस्तिष्क में किसी प्रकार का डिस ऑर्डर होने पर व्यक्ति के मूड पर असर होने लगता है, उसके व्यवहार व विचार तक प्रभावित होने लगते हैं। जो इससे प्रभावित होता है पहले उसका मूड खराब होता है, पहले जिन क्रियाओं को करने में उसे आनंद आता था अब वही काम वह बेरुखी से करता है। फिर एक अच्छा-भला आदमी लाचारी की स्थिति में आ खडा होता है। ये तनाव व निराशा के अंधेरे कभी-कभी इतने घने हो जाते हैं कि आदमी इनमें खो जाता है।

आज की तनावग्रस्त जिंदगी ने हर उम्र के व्यक्ति को अपनी पकड में रखा हुआ है। जहां कभी बचपन को बेफिक्र और मस्त समझा जाता था, वहीं आज बच्चों भी इस तनाव से अछूते नहीं। इस मामले में स्त्रियां ज्यादा संवेदनशील होने के कारण पुरुषों की तुलना में अधिक शिकार होती हैं।

तनाव एक जैसा होता है, ऐसा कहा जाता है, लेकिन यह धारणा एकदम गलत है। 39 प्रकार के तनाव को अभी तक खोजा जा चुका है। लेकिन इन सभी के लक्षण भ्रमित कर देने वाले होते हैं। इन सभी में सबसे कॉमन है तनाव का तकलीफदेह होना।

क्या होते हैं लक्षण

1. स्वभाव में उदासी छाई रहती है।

2. पहले की तरह किसी भी काम को करने में उत्साह नहीं दिखाई पडता।

3. एकाग्रता और याददाश्त में कमी आती है।

4. नींद में अनियमितता रहती है।

5. तनाव होने पर घबराहट, शरीर का सुन्न होना, बैचेनी व धडकन का बढना अधिक हो जाता है।

6. भूख व पाचन-तंत्र में गडबडी आ जाती है।

7. मृत्यु व आत्महत्या जैसे विचारों का आना मन में होने लगता है।

इनमें से एक भी लक्षण यदि दो सप्ताह या उससे ज्यादा रहता है यह दिमागी अस्वस्थता का प्रतीक है, इसके लिए विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी होता है।

इलाज जरूरी है

यह बहुत जरूरी है कि इस बीमारी का पता जितनी जल्दी चल जाए उतनी ही जल्दी उसका इलाज भी हो जाए। इससे न तो स्थिति लाइलाज होगी न ही अस्पताल में भर्ती होना पडेगा। जितनी जल्दी इलाज होगा, उतनी ही जल्दी उसका निदान भी संभव है। यह तनाव व मेंटल डिस ऑर्डर ही है, जो विकट रूप लेकर व्यक्ति को मृत्यु के कगार तक पहुंचा देता है। इस त्रासदी से बचने के लिए और कम तकलीफ पाने के लिए अच्छा है कि समय रहते चिकित्सा कराई जाए। ऐसा करने से आत्महत्या करने वाले रोगियों की संख्या में 15 से 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।

क्या होता है इलाज में

1. फार्माकोलॉजिकल ट्रीटमेंट: इसमें रोगी को उसकी बीमारी समझते हुए दवाओं का कोर्स दिया जाता है। ज्यादातर दवाएं दिमाग को शांत रखने वाली व आराम पहुंचाने वाली होती हैं। कई बार ये एंटी डिप्रेंसेट दवाएं छह से नौ महीने तक लेनी होती हैं और ठीक होने के बाद भी लगातार लंबे समय तक लेनी होती हैं। मूड को नियंत्रित रखने में मनोचिकित्सक व उनकी दवाएं डिप्रेशन से बचाने में मददगार होती हैं।

2. काउंसलिंग व बिहेवियर थेरेपी : तनाव को दूर करने व उसकी वजह जानने में काउंसलिंग महत्वपूर्ण रोल निभाती है। यह अकेले व्यक्ति पर, समूह पर या पूरे परिवार को ध्यान में रखकर की जाती है।

बिहेवियर थेरेपी रोगी के व्यवहार को ध्यान में रखकर दी जाती है कि कैसे उसके स्ट्रेस को कम किया जा सकता है। रिश्तों को बेहतर बनाने और तनाव को कम करने में यह थेरेपी कारगर है।

3. फैमिली एजुकेशन : इस तरह के रोगों में परिवार का सहयोग सबसे महत्वपूर्ण होता है। एक परिवार के सदस्य ही सजग होकर अपने सहयोग से रोगी के भावनात्मक, मानसिक व आर्थिक तनाव को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। वे समझ सकते हैं कि कैसे रोगी का उत्साह बढाएं, खतरों से दूर रखें, मेडिटेशन कराएं, जिससे कि वह अपना अध्याय जल्दी से जल्दी आरंभ कर सके।

4. आधुनिक इलेक्ट्रो थेरेपी : डिप्रेशन के अत्यंत गंभीर रोगी, जो आत्मघाती प्रवृत्ति के होते हैं व जो सीवियर डिप्रेशन के मरीज होने के साथ किसी प्रकार के इलाज को रेस्पांड नहीं करते, ये विधि ज्यादातर उन रोगियों पर आजमाई जाती है।

कैसे अपनी मदद करें

यह जानना बहुत जरूरी है कि गंभीर डिस ऑर्डर से ग्रस्त व्यक्ति अपनी सहायता खुद कैसे कर सकता है। उसके लिए जरूरी है ये बातें-

1. कोई भी डिप्रेशन का शिकार व्यक्ति अपनी मदद करने के लिए अपने को इस विषय के प्रति जाग्रत करे। जितनी जानकारी जहां से मिल सके रोग की, उसे ले लेनी चाहिए, एक्सपर्ट से मिलना व इस संदर्भ में होने वाले वर्कशॉप में सम्मिलित भी होना चाहिए।

2. तनाव हर जगह है, इसे पूरे तौर पर खत्म करना भी कठिन है। ऐसे तरीकों को जानना चाहिए, जिनसे तनाव का प्रबंधन आसान हो और अधिक से अधिक खुश रहने में मदद मिले। स्ट्रेस मैनेजमेंट तकनीक को सीखें, जिससे स्थितियां आसान हो जाएं। तनाव कम करने से आपकी उत्पादन क्षमता बढती है।

3. यह बहुत जरूरी है कि तनाव से ग्रस्त होने पर व्यक्ति को कभी भी आशा नहीं छोडनी चाहिए। अब इसका इलाज बहुत महंगा व मुश्किल नहीं रहा। यह लाइलाज बीमारी नहीं है।

4. अपनी दिनचर्या को जारी रखिए, अपने को कठिन व कठोर स्थितियों की तरफ मत ढकेलिए।

5. हकीकत को स्वीकारिए और लक्ष्य निर्धारित कीजिए। हर छोटी-से-छोटी सफलता को एंजॉय करना सीखिए, बडी सफलता के इंतजार में उसे अनदेखा न कीजिए।

6. सोने का तरीका निश्चित कीजिए। हर रोज निश्चित समय पर बेड पर जाइए और उठने का समय भी तय कीजिए।

7. एल्कोहॉल व ड्रग्स का इस्तेमाल न कीजिए। इसमें मौजूद केमिकल न्यूरोकेमिकल के संतुलन को गडबडा देते हैं और मूड को तेजी से बदलते हैं।

8. सोशियल होइए। अपने को अकेलेपन के अंधेरों से बाहर निकालिए लोगों से मेल-जोल बढाइए, फिल्म देखने जाइए, बाहर खाना खाइए या संगीत का मजा लीजिए।

9. डॉक्टर से सलाह लीजिए। यदि किसी प्रकार की बैचेनी या घबराहट है या इलाज से संतुष्ट नहीं तो डॉक्टर से बात कीजिए। अपने आप अपनी दवाएं बंद न कीजिए। समय पर डॉक्टर के पास जाइए व नियमितता बनाए रखिए।

10. मूड चार्ट बनाइए। अपने को समझने के लिए चार्ट बनाइए जिसमें अपने सारे कामों को, नींद के तरीकों को, दवाओं को व उनके साइड इफेक्ट को नोट कीजिए।

परिवार के लोग कैसे सहायता करें

1. यदि परिवार में किसी को डिप्रेशन है तो अपने को दोषी मत समझिए।

2. अपने प्यार का उसे विश्वास दिलाइए। एक डिप्रेस्ड व्यक्ति यह चाहता है कि कोई उसे आशा की किरण दिखाए और इसके लिए पर्याप्त समय, धैर्य और प्रयास चाहिए।

3. रोगी की सहायता कीजिए, उसकी दिनचर्या को निश्चित कीजिए व उसके उत्साह को बढाइए, जिससे वह नियमित हो सके।

4. रोग के प्रति अपना ज्ञान बढाइए, उसके इलाज को समझिए और उससे कैसे निबटें, यह भी जानिए। उसका अपने परिवारजनों की प्रतिक्रियाओं को समझने की कोशिश कीजिए और इस पर भी ध्यान दीजिए कि इस बीमारी से व्यवहार जनित समस्याएं कम हों। यह याद रखिए कि इस रोग को दूर करने में काफी समय लगता है और बहुत सा धैर्य चाहिए इसके लिए।

5. उसे यह एहसास कराइए कि वह भी परिवार का महत्वपूर्ण सदस्य है और सबको उसकी जरूरत है।

6. यदि आत्महत्या की धमकी रोगी दे रहा है तो उसे गंभीरता से लीजिए। ऐसे में आप ही नहीं, परिवार के सभी सदस्यों, मित्रों और डॉक्टर को मिल कर सहयोग देना चाहिए।

7. डिप्रेशन पर खुल कर बात कीजिए व सुनिए। फिर देखिए कि वह कैसी प्रतिक्रिया दे रहा है। आलोचना ना कीजिए उसकी। डिप्रेशन का रोगी अपने को लेकर नकारात्मक सोच से वैसे ही घिरा होता है, ऐसे में कोई भी ऐसी बात ना कीजिए, जिससे उसकी नकारात्मक सोच और गहरी हो।

8. समझने की कोशिश कीजिए उन संकेतों को, जो रोग की सूचना दे रहे हैं। ये संकेत नींद की अनियमितता, मूड में बदलाव, एकाग्रता की कमी, आत्मविश्वास की कमी व एनर्जी की कमी व मृत्यु की सोच से जुडे होते हैं। यदि आपको इस प्रकार संकेत मिल रहे हैं तो घबराइए नहीं। शांत रहकर सही मेडिकल हेल्प लेने की कोशिश कीजिए।

9. अपने साथी की मदद करते हुए अपने को तनाव के बोझ से न दबाइए।

यह याद रखिए कि

1. अगर हम आनंददायक बातों को सोचेंगे, तो हम खुश होंगे।

2. यदि हम दयनीय विचारों को रखेंगे तो हम दयनीय होंगे।

3. अगर हम कायरतापूर्ण बातों को सोचेंगे तो कायर बन जाएंगे।

4. मुश्किल से मिले इस मानव जीवन को सार्थक बनाना आपके अपने हाथ में है। एक बार कोशिश कर देखिए, कब ये अंधेरे उजाले में बदल जाएंगे, पता भी नहीं चलेगा।

कर ली दुनिया मुट्ठी में

प्रियंका चोपडा, अभिनेत्री

यदि मैं अपने जीवन की एक सच्ची घटना से मैं आपको परिचित कराऊं तो शायद आप यकीन नहीं करें। मेरे बचपन के दिन डिप्रेशन और निराशा भरे अंधेरों के थे। इसका कारण था मेरे पापा, जो आर्मी में डॉक्टर थे, उनका और मेरी मां का व्यक्तित्व काफी आकर्षक था। उनकी बेटी मैं थी, जिसका न तो रंग गोरा था, न आकर्षक व्यक्तित्व ही था। मैं अपने साधारण व्यक्तित्व और सांवले रंग से कुंठित रहती। जब भी रिश्तेदारों को मिलना-जुलना होता था, मुझे यह सुनने को मिलता कि मैं ऐसी क्यों हूं? इन हालातों में मैं सपने में भी खुद को मिस व‌र्ल्ड या ब्यूटी क्वीन के रुप में सोच भी नहीं सकती थी। इन्हीं निराशा के पलों में मेरा बचपन बीता। मेरी मानसिक मनोदशा के बारे में मेरे अभिभावकों को भी पता नहीं था। हालांकि मैं एकेडेमिक्स में ठीक थी। फिर आगे की पढाई के लिए मुझे पापा ने विदेश भेजा। अपने देश में मेरे अपनों (रिश्तेदारों) ने मुझे जहां कुरूप माना था, वहां विदेश में मेरे साधारण लुक को स्मार्ट माना गया। डार्क इज ब्यूटीफुल यह सुंदरता की नयी परिभाषा विदेश में मैंने पहली बार महसूस की। इससे मेरा आत्मविश्वास बढ गया। यहां मैं जहां खोई-खोई और बुझी-बुझी-सी लगती थी, वहां विदेश में मैं आउट स्पोकन हो गयी। मैं छुट्टियों में यहां आई, सभी मेरे चेहरे की चमक देखकर सकते में आ गए। मुझमें आत्मविश्वास से आए निखार से ही प्रभावित होकर मॉम ने मेरा फेमिना मिस इंडिया के लिए फॉर्म भर दिया। मेरा इस प्रतियोगिता के लिए जब सेलेक्शन हुआ तो बस बेहोश होना बाकी था।

अब यह दोहराने की जरूरत नहीं कि मिस व‌र्ल्ड जीतने के बाद मैंने दुनिया घूम ली, कई ब्रैंड्स को एन्डोर्स किया, फिल्मों में आ गई। पर मैं वो दिन आज भी भूल नहीं सकती, जब मैं पूरी रात रोते हुए बिताया करती थी। अपने इस दुख का राजदार मैंने कभी मॉम तक को नहीं बनाया। यह डिप्रेशन मैं और मेरी तनहाई तक ही सीमित था। जब फेमिना मिस इंडिया की कडी ट्रेनिंग शुरू हुई तो यही वो समय था, जब मुझ में धीरे-धीरे आत्मविश्वास आता गया। हाई हील्ज पहनने के बाद अपने आप ही दिल ही दिल में आत्मविश्वास की पहली सीढी मैंने चढी। इसी ग्रूमिंग ने मुझमें एक नयी प्रियंका जगाई। हालांकि मेरे दिल में बचपन में किस कदर खुद के प्रति कुंठा भरी थी, यह आज कोई नहीं जानता था। हेयर कट के सेशन्स से लेकर कैट वॉक तक सारे ग्रूमिंग सेशन्स ने मेरा एक आश्चर्यजनक कायापलट कर दिया। एक मध्यमवर्गीय अग्ली डकलिंग से एक प्रिन्सेस होने तक में, मुझमें कुछ अपने आप होता गया। इस सारे बदलाव का श्रेय मुझे और मेरे पेरेंट्स को जाता है। उन्होंने हमेशा मुझे बेइंतहा प्यार दिया व मुझ पर विश्वास किया। यह तकदीर का खेल तो है लेकिन खुद पर यकीन करना निहायत जरूरी है। डिप्रेशन का एक दौर हर व्यक्ति के जीवन में आता ही है, पर उस समय अपना नियंत्रण न खोना और आगे बढते रहना ही उचित है। दुनिया आपकेबारे में क्या सोचती है, इसकी चिंता न करके आप अपने बारे में क्या सोचते हैं, यह जानें। इस दृष्टिकोण के साथ जिएं तो दुनिया हमारी मुट्ठी में होगी।

विशेषज्ञों की राय

तनाव बरबाद कर देगा

निर्मला सेवानी, भविष्यवक्ता

यूं देखा जाए तो हमारे ज्योतिष शास्त्र में किसी का डिप्रेशन का मरीज होना उसकी ग्रह दशा पर निर्भर करती है। किसी भी व्यक्ति की दिमागी अभिव्यक्ति का प्रतीक है चंद्रमा। चंद्रमा के केंद्र में रहने पर राहु, शनि और केतु की स्थिति पर व्यक्ति का दिमागी दशा निर्भर करती है।

इसमें भी 25 प्रतिशत उसके जन्म के समय की स्टार पोजीशन व 25 प्रतिशत वातावरण का प्रभाव पडता है। आज जो स्थिति है व आम आदमी की जो जीवन शैली है, वे दोनों ही किसी को भी तनावग्रस्त करने के लिए काफी हैं। इसमें भी सबसे बडा कारण यह है कि फिजिकल वर्क एकदम कम हो गया है।

काम करने से जहां आपका दिमाग व शरीर व्यस्त रहता है, वहीं थकावट होने पर नींद भी अच्छी आती है। अब तो बिस्तर पर लेटने के बाद घंटों करवटें बदलनी पडती हैं। जब खाना हो जाए कम और बिल जाए बढ तो क्या होगा, तनाव ही ना? यह मैं ऐसे ही नहीं कह रही।

मेरे पास 17 लडकियां हैं, जो इस विषय पर रिसर्च कर रही हैं। एक-एक लडकी ने चार से पांच हजार जन्मपत्रियों का विश्लेषण किया, तभी यह निष्कर्ष निकला। इस पर हमारे एक्सपर्ट क्या करते हैं? इलाज करने के नाम पर वे रोगी को दवा व इंजेक्शन दे कर सुला देने का काम करते हैं। समय देकर काउंसलिंग करने के बजाय, यह तरीका उन्हें ज्यादा आसान लगता है। नतीजा यह होता है कि तनाव भूल कर आप छह की जगह दस घंटे तो सो पाएंगे, पर सारा दिन उनींदे रहेंगे। आपकी सक्रियता पर विपरीत प्रभाव पडेगा। एक एयर होस्टेस को लेकर उसके सीनियर मेरे पास आए। उसे ऊंचाई पर जाने का व अकेलेपन का फोबिया हो गया था। पूरा परिवार उसके ऊपर निर्भर था, इसलिए वह यह नौकरी नहीं छोड सकती थी। मैंने ढाई-तीन घंटे लगाए, लेकिन कामयाब रही। उसे सकारात्मक सोच की तरफ बढाया। कहा कि ये ही प्रोफेशन तुम्हारे लिए है, तुम इसी में प्रगति करोगी। धीरे-धीरे उसके दिमाग से यह फितूर निकल गया। यह याद रखें कि असंतोष व कुढन से आपके ज्ञान-तंतु नष्ट होते हैं और इसका नकारात्मक प्रभाव आपके व्यक्तित्व पर ही नहीं सोच पर भी पडता है। तनाव बढने की जो गति दिखाई पड रही है, उससे लगता है कि यह इंसान को तबाह कर देगा। इसे रोकना जरूरी है।

रोग है इलाज जरूरी है

डॉ. जंयती दत्ता, मनोचिकित्सक लेडी हार्डिग कॉलेज

आज की जीवन शैली ऐसी है कि जहां न चाहते हुए भी इंसान डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। आज समाज का ढांचा बहुत बदल गया है, रहन-सहन के तरीके बदल गए हैं।

आज इंसान अकेला पड गया है। उसमें असुरक्षा व अकेलापन बहुत बढ गया है। इसलिए तनाव शहरी जिंदगी का हिस्सा बन गया है। वास्तव में डिप्रेशन एक ऐसी मानसिक स्थिति है, जिसमें केवल मूड का इधर-उधर होना नहीं और भी है। इसमें न भूख लगती है न नींद आती है और नकारात्मक सोच हावी हो जाती है। पुरुषों के मुकाबले स्त्रियां डिप्रेशन की शिकार अधिक होती हैं। उसकी वजह हार्मोनल है। यहां तक कि पहले बच्चों इस डिप्रेशन के शिकार नहीं होते थे, अब वे भी इस बीमारी की चपेट में हैं। अब इस बीमारी का उम्र से कोई लेना-देना नहीं। ये बीमारी किसी को भी कभी भी हो सकती है। डिप्रेशन कई तरीके का होता है। कई बार बच्चों को जन्म देने के बाद भी हार्मोनल परिवर्तन के कारण स्त्रियों में तनाव या डिप्रेशन हो जाता है इसे पोस्ट पार्टम कहते हैं। ये कई बार समय पर इलाज न किए जाने पर खतरनाक साबित होता है। मेनापॉज के समय भी कई बार स्त्रियां डिप्रेशन का शिकार हो जाती हैं। बहुत सी बार ऐसा भी होता है कि आस-पास देखने से हमें डिप्रेशन के कारण मिल जाते हैं, जिन्हें समय रहते दूर करना संभव हो जाता है। कई बार बिना कारण व वजह के भी व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार हो जाता है। वह बेसुध हो जाता है। रोगी में अपने को किसी भी हद तक नुकसान पहुंचाने की भावना बलवती हो जाती है। कुछ स्थितियां ऐसी भी होती हैं, जिसमें माइग्रेन, जोडों में दर्द, पेट दर्द व अपने चेहरे से नजरें चुराना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।

डिप्रेशन शहरी जिंदगी का खास हिस्सा बन गया है। आज कोई भी रिश्ता इससे अछूता नहीं रह गया है। आज नितिन जैसा बेटा अपने विवाहेतर संबंध के लिए अपनी पत्नी, होने वाले बच्चे के साथ मां-बाप की भी हत्या कर सकता है, वहीं शबनम जैसी बेटी भी है, जो अपने मां-बाप को मार सकती है।

आज रिश्तों के सच बदल गए हैं व भावनात्मक जुडाव खत्म होता जा रहा है। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि लोगों की इस ओर जागरूकता बढी है। पहले जहां डिप्रेशन का मानसिक रोग या पागलपन समझा जाता था, वहीं अब इसके प्रति लोग सचेत ढंग से काम कर रहे हैं। घर बैठे भी इसका इलाज संभव है। साइकोथेरेपी, योग, मेडिटेशन व दवा के साथ परिवार का सहयोग भी कारगर उपाय है। डिप्रेशन का रोगी बहुत से नकारात्मक कामों की वजह अपने को मानने लगता है। बिना वजह की चीजें अपने ऊपर ओढ लेने की रोगी को आदत हो जाती है।

यह समझना जरूरी है कि जैसे स्वस्थ शरीर में अस्वस्थता हो सकती है, वैसे ही स्वस्थ मन भी है। ऐसी ही मेरी एक पेशेंट थी जो एक लडके केप्यार में पड कर अपना सब कुर्बान कर बैठी थी। दो बार आत्महत्या का प्रयास कर चुकी थी। तीसरी बार के लिए वह पूरे तौर पर तैयार थी। उसके अंदर गिल्ट फीलिंग इतनी थी कि वह कुछ सुनने को तैयार नहीं थी। मैं घंटों-घंटों बोलती और वह चुपचाप सुनती कुछ नहीं बोलती। उसका रुझान संगीत की तरफ था। उसी का सहारा लेते हुए मैंने अपना इलाज शुरू किया। वह रेस्पांस करने लगी। म्यूजिक स्कूल में प्रवेश दिलाने के साथ उसे कॉलेज में एडमिशन दिलाया। आज वह एमएससी कर रही है। आज जब उसे जीवंतता से भरा देखती हूं तो बहुत खुशी मिलती है। कहना यह है कि कोई भी डॉक्टर या मनोचिकित्सक भगवान नहीं है, न ही जादू है उसके पास, बिना परिवारवालों के सहयोग के वह अकेला कुछ नहीं कर पाएगा।

तनाव दूर करें

ओशो, चिंतक

ओशो ने यह तनाव विधि उनके लिए दी है, जिन्हें अपने रोजमर्रा के कार्यो में निराशा और क्रोध की सतत पुनरुक्ति का अनुभव होता है। प्रतिदिन पंद्रह मिनट के लिए, जब भी सुविधाजनक समय हो, एक समय तय कर लें। उस समय कमरा बंद कर लें और क्रोधित हो जाएं, लेकिन क्रोध को बाहर न निकालें। क्रोध को बढाते जाएं, क्रोध से पागल हो जाएं, लेकिन उसे बाहर न निकालें। बाहर कोई अभिव्यक्ति न करें, तकिए को न पीटें। हर तरह से उसे भीतर दबा लें।

यदि ऐसा लग रहा है कि पेट में तनाव बढता जा रहा है, जैसे कि कोई चीज फूटने वाली है तो पेट को भीतर खींचें, जितना खींच सकें खींचें। यदि ऐसा लगे कि कंधे तनावग्रस्त हो रहे हैं तो उन्हें और भी तानें। पूरे शरीर को जितना तनाव से भर सकें, भर लें। बिलकुल ऐसे, जैसे कोई ज्वालामुखी धधक रहा हो और कोई विकास न हो। यही स्मरण रखने वाली बात है, कोई निकास नहीं, कोई अभिव्यक्ति नहीं। चीखें भी नहीं, नहीं तो पेट शिथिल हो जाएगा। कुछ पीटें भी नहीं, नहीं तो कंधे हलके और शिथिल हो जाएंगे। पंद्रह मिनट के लिए पूरे तनाव से भर जाएं, जैसे कोई सौ डिग्री पर हो। पंद्रह मिनट में तनाव की पराकाष्ठा को छू लें। पंद्रह मिनट का अलार्म लगा दें और जब अलार्म बजे तो अपनी पूरी ताकत लगा दें और जैसे ही अलार्म बजना बंद हो शांत बैठ जाएं, अपनी आंखें बंद कर लें और बस देखें कि कि क्या हो रहा है। शरीर को बिल्कुल ढीला छोड दें। शरीर को इस तरह तनाव की पराकाष्ठा तक ले जाना आपके पुराने ढांचों को बदल देगा।

खुशियों की फसल उगाइए

प्रमोद बत्रा, मैनेजमेंट गुरु

मैंने कभी अपनी समस्याएं, अपनी व्याकुलता, अपनी चिंता और अपना तनाव किसी के साथ नहीं बांटता, चाहे वह मेरी सहायता ही क्यों न करे। मुझे गुरु नानक देव के इस कथन से प्रेरणा मिली कि नानक दुखिया सब संसार। मैं मानसिक रूप से हर स्थिति के लिए तैयार रहता हूं, यहां तक कि मौत के लिए भी। मैंने उन सभी चीजों को करीब से देखा है, जो मेरे जीवन से होकर गुजरी हैं। मैंने उन लोगों को भी देखा है जो बुरी परिस्थितियों में भी बहुत अच्छी तरह रहते हैं। यह पूर्णतया इस बात पर निर्भर करता है कि एक व्यक्ति अपने को मानसिक रूप से किस प्रकार तैयार करता है। हमारा मस्तिष्क उस एक एकड भूमि की तरह है, जिसमें हम खुशियां या तनाव कुछ भी उगा सकते हैं। यह मानवीय स्वभाव है कि इसमें तनाव रूपी फसल ही पैदा होती है। अगर इसमें अपनी कहानियों, उदाहरणों, सुहावने दृश्यों और कहावतों रूपी खुशियों के बीजों को पौधों केरूप में बदलने के लिए संघर्ष न किया जाए और बुआई, सिंचाई, गुडाई का पर्याप्त खयाल न रखा जाए तो आपको शांति कहां से मिलेगी। ऐसे में हमारे पास खुशियों की फसल होगी व तनाव से मुक्ति भी। अपने घर की अपेक्षा अपने दिल और दिमाग को वातानुकूलित बनाइए। एक सूची बनाइए, उसमें जो दिमाग पर दबाव डालने वाली चीजें हों, उन्हें लिख लीजिए, फिर कोशिश कीजिए उनसे दूर रहने की। इंसान का जीवन चक्रकी तरह होता है, जो दुर्भाग्य और भाग्य के विभिन्न रंगों के बीच घुल-मिल कर घूमता है। तनाव से मुक्ति पाने के लिए अपनी कमजोरियों को पहचानना जरूरी है। लक्ष्य निर्धारित कीजिए, दूसरों की मदद कीजिए, दोस्तों, रिश्तेदारों से मिलिए, इस तरह तनाव का कुछ हद तक खत्म कर पाएंगे।

मेरी कोशिश ने दिया मुझे सबकुछ

पंकज बेरी, टीवी और फिल्म अभिनेता

सन् 1986 से फिल्म और टीवी जगत में नाम कमाने के साथ मैंने अनगिनत फिल्मों और सीरियलों में काम किया। तमस फिल्म के लिए नेशनल और इंटरनेशनल एवॉर्ड मिला। एक कलाकार तभी कामयाब हो सकता है जब वह हर तरह से किरदार को निभा सके। मुझे याद है कि जब मेरी पहली फिल्म हिट हुई तो मेरे पास उस समय 28 फिल्में थी। एक फिल्म सैनिक की शूटिंग के दौरान मेरा एक्सीडेंट हुआ जिसमें राइट फ्यूमर बोन पूरी तरह से क्रश हो चुका था। मुझे दिन में तारे नजर आने लगे। मैं चार महीने बेड पर पडा रहा। मेरे आर्थिक और दिमागी हालात पूरी तरह से खराब हो चुके थे। मुझे लगता था कि अब मेरा क्या होगा। सभी प्रोडयूसर मेरे पास आते दया दृष्टि से देखते और चले जाते। लेकिन उन्हीं दिनों सिनेविस्टा वालों का सीरियल जुनून शुरू हुआ। उन्होंने मेरी हालत के अनुसार रोल लिखा। मैंने 31 वर्ष की आयु में 65 वर्ष के वृद्ध व्यक्ति का रोल किया, जो हैंडीकैप्ड था और व्हीलचेयर पर बैठा रहता था। उस रोल ने मुझे फिर से जीने का सहारा दिया। मुझे उस रोल की वजह से तीन एवॉर्ड मिले। इस रोल में मेरे जीवन में आये अंधेरे को उजाले में बदल दिया। आज मैं इस हादसे को भूल चुका हूं। मैंने उस दौरान फिल्म इंडस्ट्री के सारे लोगों को आटे की छलनी से छाना है और मुझे एहसास हुआ कि यह इण्डस्ट्री हर किसी के साथ है, पर कोई किसी के साथ नहीं। यहां चढते सूरज को हर कोई सलाम करता है। मै काम मांगने भी जाया करता था, पर उनका रवैया मेरे साथ वैसा नहीं रहा जैसा पहले था। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा था कि क्या आप पहले जैसा काम कर पाएंगे? मैंने कहा था कि मैं खुद अपने पैरों पर चलकर आऊंगा और गया भी। आज मुझे पैसा इज्जत और शोहरत सब मिल रहा है। यह मेरी कोशिश और बाबा की कृपा है।

धीरज और हिम्मत नहीं हारें

गार्गी पटेल, टीवी कलाकार

जीवन में उतार-चढाव तो हमेशा आते रहते हैं, परंतु कई बार कुछ हादसे ऐसे होते हैं जिन्हें हम अतीत के पन्नों पर ही रहने देना चाहते हैं और भूल जाना चाहते हैं। आज से कुछ साल पहले मैं अपने पति सी मौशिक पटेल के साथ किसी मित्र को जन्मदिन की मुबारक देने जा रही थी, तभी कार का एक्सीडेंट हो गया। मैं उस समय मां बनने वाली थी। वह दुर्घटना इतनी जबर्दस्त थी कि मेरा चेहरा बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो चुका था। कई सारी स्टिचेज मेरे चेहरे पर आई, यहां तक कि एक आंख को खतरा हो गया था। जब मैंने अपना चेहरा शीशे में देखा तो हैरान हो गई थी कि मेरा क्या होगा? परंतु भगवान की दया थी कि जब प्लास्टिक सर्जरी हुई और मैंने वापस मेरा चेहरा आईने में देखा तो हैरान रह गई। मैं पहले से भी काफी खूबसूरत हो चुकी थी और चौंकाने वाली बात यह भी थी कि मेरे बच्चे को कुछ भी हानि नहीं पहुंची। यह सब भगवान की कृपा है, जिसने पल-पल मेरा साथ दिया और आज मैं यहां तक हूं, इतना ही नहीं, उस समय मैं इतनी टूट चुकी थी कि लगता नहीं था कि मैं वापस कुछ कर सकूंगी। पर मेरा परिवार और मेरे पति ने बहुत साहस दिया मैं फिर से नॉर्मल हो गई।

मेरे हिसाब से व्यक्ति को हमेशा किसी भी हालत में धीरज और हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, क्योंकि हम सब पृथ्वी पर कठपुतलियां है, जिसे चलाने वाला सिर्फ भगवान है और वह इन सब हादसों का शिकार हमें इसलिए बनाता है ताकि हम अपने मकसद से भटक न जाए। अपने आप को पहचाने और जानें। उस समय मैंने दवा का नहीं, पर मेडिटेशन का सहारा अवश्य लिया था। ताकि इस दशा से मैं अपने आप को निकाल सकूं और नॉर्मल हो सकूं। जब आप ही लडने को तैयार नहीं होंगे तो कोई दूसरा इसमें क्या कर पाएगा?

(डॉ. संदीप वोहरा, अपोलो अस्पताल के वरिष्ठ मनोचिकित्सक से बातचीत पर आधारित)

साक्षात्कार : मुंबई से पूजा सामंत, राजेश श्रीवास्तव, सोमा घोष व एस. सुशीला

प्रीति सेठ
 
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