समय की धार पर रिश्ते

      
समय की धार पर रिश्ते

कल-कल करती बहती जीवन रूपी नदी में मधुर तरंगों की तरह आती लहरों की तरह हैं पर्व व त्योहार। भारत क्योंकि परंपरावादी देश है, यहां पर्वो और त्योहारों का अपना अलग महत्व है। व्यक्ति को व्यक्ति से जोडने और संस्कारों से बांधने का इससे बेहतर विकल्प और कोई हो भी नहीं सकता। यह रेशमी धागा हर साल आपको अपने रिश्ते के मूल्यों को याद कराने के लिए बांधा जाता है। रक्षा का अर्थ है सुरक्षा व बंधन है रिश्ता निभाने का संकल्प। केवल सहोदर रिश्तों की याद दिलाने वाला पर्व नहीं है यह, बल्कि पूरे देश को एक साथ जोडने में इस पर्व ने हमेशा ही सक्षम भूमिका निभाई है। पौराणिक मान्यता क अनुसार यह पर्व देवासुर संग्राम से जुडा है। जब देवों और दानवों के बीच युद्ध चल रहा था और दानव विजय की ओर अग्रसर थे तो यह देख कर राजा इंद्र बेहद परेशान थे। दिन-रात उन्हें परेशान देखकर उनकी पत्नी इंद्राणी (जिन्हें शशिकला भी कहा जाता है) ने भगवान की अराधना की। उनकी पूजा से प्रसन्न हो ईश्वर ने उन्हें एक मंत्रसिद्ध धागा दिया। इस धागे को इंद्राणी ने इंद्र की कलाई पर बांध दिया। इस प्रकार इंद्राणी ने पति को विजयी कराने में मदद की। इस धागे को रक्षासूत्र का नाम दिया गया और बाद में यही रक्षा सूत्र रक्षाबंधन हो गया।

इतिहास गवाह है

राखी का सबसे पुराना इतिहास हमें 300 ई.पू. में मिलता है। जब एलेक्जेंडर ने भारत पर चढाई की। राजा पुरु के शौर्य व पराक्रम से विदेशी एलेक्जेंडर अभिभूत था, तभी उसकी विदेशी पत्नी ने स्थानीय लोगों से राखी के बारे में सुना। तुरंत उनके दिमाग में एक विचार कौंधा और उन्होंने राजा पुरु को ससम्मान राखी भेजी। पुरु ने उस राखी को सिर माथे लगा उन्हें बहन माना और युद्ध क्षेत्र में इस राखी के बंधन की पवित्र भावना का पूरा ध्यान रखा।

हिंदुओं द्वारा रक्षाबंधन एक त्योहार के रूप में मनाया जाता रहा है। पुराने समय में इस बंधन से भाई-बहन के पावन रिश्तों की गांठ को और मजबूती प्रदान की जाती थी तथा अपनी रक्षा का वादा भी लिया जाता था। लेकिन चित्तौड की विधवा महारानी कर्मावती ने जब अपने राज्य पर संकट के बादल मंडराते देखे तो उन्होंने गुजरात के बहादुर शाह के खिलाफ मुगल सम्राट हुमायूं को राखी भेज मदद की गुहार लगाई और उस धागे का मान रखते हुए हुमायूं ने तुरंत अपनी सेना चित्तौड रवाना कर दी। इस धागे की मूल भावना को मुगल सम्राट ने न केवल समझा बल्कि उसका मान भी रखा।

गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने राखी के पर्व को एकदम नया अर्थ दे दिया। उनका मानना था कि राखी केवल भाई-बहन के संबंधों का पर्व नहीं बल्कि यह इंसानियत का पर्व है। टैगोर ने पूरे समाज में एकता और इंसानियत को बढावा देने के लिए रक्षा के बंधन को माध्यम बनाया। उनका विचार था कि समाज के सभी सदस्यों को एक-दूसरे का खयाल रखना चाहिए और दूसरों की मदद करनी चाहिए। यह उस समय की बात है जब भारत पर अंग्रेज शासन कर रहे थे और 1905 में उन्होंने बंगाल विभाजन का फैसला ले लिया था।

उस समय रबींद्रनाथ ने इस माध्यम से हिंदू और मुसलमानों के बीच भाईचारा बढाने, प्यार और एकता की भावना को पनपने देने के लिए राखी का सहारा लिया। इसके पीछे उनका उद्देश्य यह था कि हिंदू और मुसलमान एकजुट हों और ब्रिटिश शासन के विरुद्ध मोर्चा लें। उन्होंने इस पर्व को भाईचारे की भावना के प्रसार के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने देश के भिन्न संप्रदायों व जातियों के लोगों को राखी के माध्यम से एक नई सोच व दिशा दी। उन्होंने इसके जरिये धर्म, भाषा, वर्ग, समुदाय, लिंग और जाति के भेद को दूर करने की कोशिश की। राखी के धागों से पूरे भारत को एक करने का संदेश दिया। इसी भावना के तहत उन्होंने शांति निकेतन की स्थापना की।

इसमें संदेह नहीं कि सहोदर रिश्तों से ऊपर उठकर रक्षाबंधन की भावना ने हर समय और जरूरत पर अपना रूप बदला है। जब जैसी जरूरत रही वैसा अस्तित्व उसने अपना बनाया। केवल बहन ने भाई को ही नहीं, रक्षा के नाम पर पत्नी ने पति और हिंदू स्त्री ने मुसलमान भाई की कलाई पर इसे बांधा। इस नजरिये से देखें तो एक अर्थ में यह हमारा राष्ट्रीय पर्व है।

पहले और अब के रिश्ते

संबंधों की बात करें तो ये पहले जैसे थे, आज भी वैसे ही हैं। पहले हमारे जीवन का केंद्र बिंदु हमारा घर-परिवार ही हुआ करता था। अधिकतर संयुक्त परिवारों में लोग एक साथ रहते थे और कोई भी त्योहार पूरा परिवार एक साथ मिल कर मनाता था। किसी खास दिन का परिवार के सभी सदस्य बेसब्री से इंतजार करते थे। दरअसल रिश्तों और मानवीय भावनाओं को उत्सव के रूप में मनाना ही राखी है। अपने भाई-बहन के प्रति प्रेम और उसका खयाल रखना ही इसका आधार है। यह पूरे परिवार को एक साथ जोडता है और यही एकजुटता उत्सव के रूप में इस दिन मनाई जाती है।

आज समय और सोच ने इस रिश्ते को प्रभावित किया है। कहीं हत्या तो कहीं दुष्कर्म जैसी घटनाएं सुनने में आती हैं। रिश्तों की गरिमा खोती जा रही है। लेकिन इसमें भी संदेह नहीं कि कुछ अपवादों के कारण सारी मर्यादा, पवित्र भावना तथा अमूल्य रिश्ते को कटघरे में नहीं खडा किया जा सकता। फिर भी यह जरूरी था कि स्त्रियों को उनका पूरा हक मिले।

कानून पर एक नजर

सुप्रीम कोर्ट की वकील कमलेश जैन का कहना है कि यह ठीक है कि पुरुषवादी समाज में स्त्रियों की स्थिति हमेशा शोचनीय रही। पहले पिता, फिर पति और भाइयों पर वह आश्रित रही। इस स्थिति को देखते हुए यह कानून बना कि पैतृक संपत्ति पर बहनों का भी भाइयों के समान पूरा अधिकार हैं। यदि इस कानून की जमीनी सच्चाई पर गौर करें तो यह साफ दिखाई देगा कि इससे स्थितियां बेहतर होने के बजाय और बिगडी ही हैं। अकसर भाई खुशी से बहनों को कुछ नहीं देना चाहता। यहां तक कि कुछ घटनाएं ऐसी भी सामने आई जहां बंटवारे के डर से भाई ने बहन को मरवा या मार डाला। होता यह है कि यह बात बचपन से ही बच्चों को समझाई जाए तभी इसके अच्छा परिणाम सामने आ सकते हैं। क्योंकि यह समस्या मूलरूप से मानसिकता की है। अचानक यह कहना कि बहन को हिस्सा दो, किसी आघात से कम नहीं। दूसरी सच्चाई यह भी है कि कोर्ट-कचहरी में जाकर भाई के खिलाफ खडे होकर अपने अधिकार मांगने का साहस भी बहुत कम स्त्रियों में है। इससे जीवन भर के लिए संबंध खराब हो जाते हैं।

इस संबंध में नई दिल्ली की मनोचिकित्सक जयंती दत्ता का कहना है कि यदि आरंभ से ही बच्चों को इस दिशा में सही रूप से दिशा निर्देश दिए जाएं तो उसी दिशा में आपका दिमाग काम करेगा। अचानक कोई मुद्दा उठ कर ऐसा आए जो आपके लिए एकदम नया हो और उसके लिए दिमागी रूप से आप बिलकुल तैयार न हों तो आधात तो लगेगा ही। जब एक परिवार, एक माता-पिता, एक माहौल व एक थाली में खाकर भाई-बहन बडे होते हैं तो फिर संपत्ति के बंटवारे को लेकर विवाद क्यों? सब कुछ कल तक साझा था तो आज क्यों नहीं? अपनी सोच को विकसित करने की जरूरत है। हो सकता है कि आर्थिक रूप से बहन की आवश्यकताएं भाई से कहीं ज्यादा हों या यह भी हो सकता है कि वह इतनी समर्थ या उदार हो कि वह भाई और पिता से मदद न लेना चाहे। लेकिन वह चाहे या उसका हक देने के लिए भाई को अपनी ओर से तो तैयार रहना ही चाहिए।

आधुनिक संदर्भ

कामकाज के सिलसिले में या नौकरी व व्यवसाय के कारणों से भाई-बहन के बीच दूरियां बढी हैं। एकल परिवारों के बढते चलन तथा संयुक्त परिवारों के विलय से रिश्ते सिमट कर भाई-बहन तक रह गए हैं। पहले जहां एक ही छत के नीचे ताऊ, चाचा, दादा-दादी आदि अनेक रिश्ते होते थे, सभी के बच्चे भाई-बहन की श्रेणी में आते थे। यह पता ही नहीं चलता था कि कौन सगा है था कौन चचेरा। यह जुडाव बेहद मजबूत होता था। आज हालांकि संपर्क सूत्रों में आए क्रांतिकारी बदलावों से दूरियां सिमट गई हैं। एसएमएस, फोन, मेल और इंटरनेट के जरिये दूरियां काफी हद तक सिमट गई है। जब चाहा फ्लाइट पकडी और दूरियां नजदीकियां बन जाती हैं। केवल विदेशों में रह रहे भारतीय ही नहीं, विदेशी भी इस त्योहार का महत्व जानने समझने लगे हैं। पहले जहां महीनों पहले से अपने भाई को राखी भेजने के लिए डाक घर की मेहरबानी पर निर्भर रहना पडता था, वहीं अब इंटरनेट के जरिये जब चाहे मिनटों में अपने संदेश, राखी व तोहफे कुछ भी भेज सकते हैं। वेब कैमरा लगा कर जब चाहे चलते-फिरते जीते-जागते भाई-बहन को आमने-सामने देख सकते हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि उनके परिवार के लोग समुद्र पार बैठे हैं। जब जी चाहा जी भर देख लिया और मन भर बातें कर लीं। लेकिन आज समय के साथ रिश्तों के मायने भी बदले हैं। आज भाई ही नहीं बहन भी अपने कर्तव्यों को लेकर उतनी ही सजग है। आज वह पहले की तरह लाचार और कमजोर नहीं कि हर समय अपने भाई को अपनी रक्षा के लिए बुलाए।

बदली भूमिका

पहले जहां सुरक्षा का वादा भाइयों का ही होता था, वहीं आज बहन भी उतनी ही दृढता से भाई का साथ देने के लिए तैयार रहती है। आज की बहन पहले की तरह लाचार और बेबस नहीं। वह पढी-लिखी और सक्षम है। रिश्तों की बखूभी समझ उसे है, कानून और अधिकारों के प्रति वह पूरी तरह सजग है। वह इतनी परिपक्व है कि उसे जरूरत नहीं तो वह उदारता से अपने भाइयों के लिए सब अधिकार स्वेच्छा से छोड देती है।

आज ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनमें बहनें भाइयों की रक्षा के लिए पूरे समाज से लडने के लिए मुस्तैदी से तैयार दिखाई दे रही हैं। उन्होंने दिखा दिया कि जरूरत पडने पर केवल सिर्फ भाई ही बहन के लिए नहीं लडता, बहन भी अपने भाई के हक के लिए लडने में पीछे नहीं हटती है। सीधी बात यह है राखी भले ही त्योहार भाई-बहन का हो लेकिन रिश्ता परिवार और समाज को जोडने का है। यह एक ऐसा बंधन है जो अपने नेह के मुलायम धागों से संसार के हर व्यक्ति को जोडने और संपूर्ण समाज को नियमों, कायदों और परंपराओं से बांधने का काम करता है। इस पर्व की गरिमा को बनाए रखना और इसके माध्यम से अपनी परंपराओं को जिंदा रखना हम सबके लिए जरूरी है।

अच्छी अंडरस्टैडिंग है

अभिनेता सैफ अली खान

कल और आज के रिश्तों में क्या परिवर्तन देख पा रहे हैं?

मेरा, सोहा और सबा का बचपन काफी भव्य रहा। जो चीज हमने चाही वह हमें न मिले, ऐसा कभी हुआ नहीं। हम तीनों की पढाई-लिखाई विदेश में हुई। जब मैं पढने विदेश गया, तब सोहा और सबा काफी छोटी थीं। मेरे और सोहा में 8 साल का फासला है, तो सबा और मुझमें दस साल का अंतर है। भाई-बहनों में दस साल का अंतर बहुत होता है। मैं जब छोटा था, तो अम्मा उस दौर में फिल्मों में काम किया करती थीं। हमारी देखभाल करने के लिए बहुत से नौकर-चाकर थे। कहीं न कहीं मेरी यह मानसिक जिम्मेदारी बनती गई कि मैं अपनी छोटी बहनों का खयाल रखूं। जिम्मेदारी का एहसास मुझे जल्दी ही होने लगा। गुड्डा-गुड्डी से खेलने के मेरे दिन लद गए जब सोहा और सबा यह सब खेलने लगीं। मुझे डैड की वजह से क्रिकेट का शौक हुआ। मैं उनके साथ क्रिकेट खेलने लगा।

क्या आप लोगों के बीच झगडा होता था?

वैसे, हम तीनों में अमूमन भाई-बहनों में होने वाले झगडे-बहस जैसी बातें घटी नहीं। दोनों को मैंने बेहद प्यार दिया। उनके लिए (छोटी बहनों) मैं हमेशा सपोर्टिव रहा। जब सोहा ने फिल्मों में जाने की जिद की, मैंने उसका साथ निभाया। डैड उतने खुश नहीं थे सोहा के निर्णय पर। बहरहाल हम तीनों के बीच जबर्दस्त प्यार व लगाव है। सोहा जब मुंबई में अपना करियर बनाने आई, वह सिटी बैंक में नौकरी करती थी। सोहा बेहद प्रतिभाशाली है, उसे इकोनॉमिक्स में स्वर्ण पदक मिला। मेरे ही घर रहा करती थी वह। मेरे दोनों बच्चों सारा और इब्राहिम को अपनी बुआ से कुछ ज्यादा ही लगाव है।

रिश्ते का आधार क्या है?

हम तीनों में खूब अच्छी अंडरस्टैंडिंग है। सच तो यह है कि सोहा में अपनी उम्र से अधिक परिपक्वता है, वह अपने जीवन और करियर के प्रति गंभीर है। रिश्तों में स्वार्थ न हो और समझदारी रहे तो रिश्ते बेहतर होंगे।

बहनों के हक में कानून पर आपके विचार?

मैं कहूंगा, इस कानून को पहले ही लागू कर देना चाहिए था। इससे वे रिश्ते प्रभावित होंगे, जहां भाई एक-एक पैसे के लिए जान देते हैं। पिता की वसीयत पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले भाई अपनी बहन से दुश्मनी ले सकते हैं। ऐसे किस्से रोजाना घट रहे हैं। अल्लाह की मर्जी से हमारी खानदानी वसीयत का क्या करना है, यह सिर दर्द डैड का है। मुझे उसमें नहीं पडना। अच्छा कमा रहा हूं, नहीं भी कमाता तो भी यही चाहता कि अल्लाह मेरी बहनों को बरक्कत दे। रिश्तों से बढकर पैसा नहीं हो सकता।

कोई यादगार घटना?

डैड मेरे लिए साइकिल लेकर आए तो मैं बहुत खुश था। दिन-रात साइकिल चलाता। सोहा ने अम्मी से मेरी शिकायत कर दी। अम्मी ने मुझे डांटा और साइकिल सोहा को चलाने के लिए दे दी। मैं गुस्से में कुडता रहा, अगले दिन गुस्से में मैंने टायर काट दिए। बाद में सबके लिए साइकिल आ गई।

विश्वास नींव है रिश्तों की

रीना मारवाह, बहन बोनी कपूर, अनिल कपूर व संजय कपूर

भाई-बहन के रिश्तों पर संपति कानून में तब्दीलियों का कोई असर पडा है क्या?

इस मामले में मतलब कानून को मैं नहीं मानती। नहीं मानने से मेरा पालन करने का नहीं बल्कि उसके प्रति बाध्यता का है। भाई-बहनों के संबंध में कानून का क्या काम? मेरे हिसाब से रिश्ता किसी भी कानून से परे है।

पहले और अब के संबंधों का तुलनात्मक अघ्ययन?

बहुत से बदलाव आए, हम सब चेंबूर के एक छोटे से घर में रहते थे। तीन भाइयों की इकलौती बहन होने के कारण सबकी लाडली थी। पिता सुरेंद्र कपूर निर्माता थे लेकिन घर फिल्मी वातावरण से पूरी तरह आजाद था। जो कुछ भी था, हम भाई बहन का साझा था। न बहुत ख्वाहिशें ही थीं और न बहुत अरमान। एकदम परंपरावादी परिवार था हमारा। वैसे ही संस्कार हमें विरासत में सब भाई बहन को मिले।

एक ही प्रोफेशन में होने पर क्या स्थितियां बदलती हैं?

जो है नहीं उस पर क्या राय दें, लेकिन जहां तक मेरा सवाल है मैं यदि समान क्षेत्र में होती तो भी मुझे पूरा सहयोग मिलता मेरे भाइयों से। अब भी जब मैंने अपने पति के साथ दिल्ली में अपना स्टूडियो बनाया तो मेरे तीनों भाई वहां पूरे मन से उपस्थित थे। बात पैसे की नहीं भावनाओं की है।

किसकी ज्यादा चलती है?

मैं अकेली व लाडली रही इसलिए अपनी चलाने के लिए कोई प्रयास अलग से नहीं करना पडा। सब कुछ बिन मांगे ही मिलता गया। मैं यदि कुछ भूले से भी कह दूं तो भाई उसे पूरा करने के लिए विदेश तक दौडे चले जाएंगे। इस मामले में बहुत किस्मत वाली हूं।

क्या आप लोगों के बीच कभी झगडा होता है?

बचपन की तो याद नहीं, पर लगता है नहीं ही होता रहा होगा। क्योंकि मैं अकेली और वो तीन थे। बहुत बचपन में शायद लडे हों। अब तो बहस भले ही हो, झगडे का तो सवाल ही नहीं। तीनों मुझे लेकर पजेसिव बहुत थे। अनिल अपनी फिएट में मुझे रोज कॉलेज छोडने और लेने जाते थे। अकेले आने-जाने या घूमने की इजाजत बिल्कुल नहीं थी। तब गुस्सा आता था आज उनके स्नेह व सुरक्षा की भावना को समझ कर हंसी आती है।

रिश्तों का आधार क्या है?

हमें बचपन से ही बडों का मान व छोटों से स्नेह करना सिखाया गया। हम सभी ने उन संस्कारों को अपने जीवन में बखूबी उतारा। मेरी नजरों में आपसी प्यार और सम्मान ही रिश्ते बनाने में मददगार होता है। हमारे परिवार की एकजुटता ही सबसे बडा आधार है सुख-दुख में सब एक साथ खडे होते हैं। बोनी भाई सबसे बडे थे। उन्होंने भाई के साथ बडा बेटा होने का फर्ज ठीक से निभाया। जिस समय पिता को बिजनेस में उन्होंने सहयोग दिया पापा की कंपनी घाटे में थी। उसे फिर से खडा किया। अनिल को नायक बनाने के लिए मदद की और संजय को भी मार्गदर्शन दिया। विश्वास रिश्तों की सबसे मजबूत नींव है। कोई यादगार घटना?

कुछ दिन पहले अनिल का फोन आया पूछा, कहां हो? मैंने कहा दिल्ली में घर पर। बोले अच्छा आ रहा हूं थोडी देर में। लगा कि अकसर दिल्ली किसी काम से आते रहते हैं आए होंगे। थोडी देर में भाभी सुनीता का फोन आया। बोलीं गाडी भेज दो एयरपोर्ट वह पहुंच रहे होंगे। तब पता चला कि वह बहुत दिन से मिले नहीं विशेष तौर पर मेरे व परिवार के साथ समय गुजारने आ रहे हैं। वह आए चाय नाश्ता कर बोले दो घंटे सोने जा रहा हूं। ग्यारह बजे उठे, मेरे हसबैंड से बोले, यार तू ऑफिस नहीं जाएगा? उन्होंने पूछा, तो क्या करूंगा? बोले कि क्रिकेट खेलेंगे। घर के गार्डन में वह मेरे परिवार के साथ क्रिकेट खेलते रहे। शाम को एक बेहद यादगार दिन बिताने के बाद उन्हें एयरपोर्ट छोडा।

न बदला है न बदलेगा भाई-बहन का रिश्ता

मानसी जोशी

रिश्ते का आधार क्या है?

रिश्ते की बुनियाद विश्वास, प्यार और सम्मान पर टिकी होती है। हर रिश्ते में इन तीनों चीजों का होना जरूरी है। जहां विश्वास और प्यार न हो, वहां कोई भी रिश्ता लंबे समय तक नहीं निभाया जा सकता है। वह धोखे के सिवाय कुछ नहीं।

बहनों के हक में बने कानून पर आपको क्या कहना है?

जहां तक कानून की बात है तो मेरी समझ से कानून ने सिर्फ पति-पत्नी का रिश्ता बनाया है। बाकी सभी रिश्ते हमारे जन्म के साथ जुड जाते हैं। यह दुख की बात है कि भाई-बहन के पवित्र रिश्ते के बीच कानून को हस्तक्षेप करना पडे।

क्या भाई से कभी आपका झगडा हुआ?

किसी बात को लेकर मतभेद होना, झगडा होना एक अलग बात है और अलगाव होना एकदम अलग बात है। हालांकि यह व्यक्तिगत स्तर पर निर्भर करता है कि कोई अपने रिश्ते को कैसे निभाता है। हमारा और भाई शरमन जोशी का रिश्ता बहुत अच्छा है। वह मुझसे छोटा है, इसका यह मतलब नहीं कि मैं उसकी भावनाओं की कद्र न करूं, उसकी न सुनूं। बचपन में हमारे बीच बहुत झगडे होते थे।

कल और आज के रिश्ते पर विचार?

जैसे-जैसे हम बडे हुए हम भाई-बहन से अधिक एक-दूसरे के दोस्त बन गए हैं। मुझे याद है जब हम छोटे थे तो डैडी के नाटकों के संवाद हम दोनों रट लेते थे और फिर खुद प्ले करते थे।

क्या एक ही प्रोफेशन रिश्तों पर असर नहीं डालता?

एक ही प्रोफेशन में होने से हमारे रिश्ते प्रभावित नहीं हुए बल्कि और मजबूत हो गए हैं। स्थितियां तब बदलती हैं जब आपकी किसी से दुश्मनी हो या आप उससे नफरत करते हों। मैं तो बस इतना ही कहूंगी कि न बदला है न बदलेगा भाई-बहन का रिश्ता। शरमन मेरा छोटा भाई है मैं तो रिश्तों में बदलाव के बारे में सोच भी नहीं सकती। उसे आगे बढते देखकर मुझे बहुत खुशी होती है। वह मेरा सम्मान करता है। मैंने आज तक उसके दिए हुए हर गिफ्ट को संभाल कर रखा हुआ है। ईश्वर करे वह सफलता की ऊंचाइयों को छुए।

देर आए दुरुस्त आए

प्रवीण डबास

मैं उसे बहुत मिस करता हूं

क्या आप लोगों के बीच खटपट होती थी?

बचपन में हमारे बीच अकसर छोटी-मोटी बातों पर खटपट होती रहती थी। बडा होने के नाते मम्मी-डैडी मुझे ही कुसूरवार मानते और मुझे डांटते। तब वह धीमे से मुझे देखकर मुसकराती मानो कह रही हो भविष्य के लिए याद रखना हालांकि मुझे कहीं खरोंच भी आ जाती तो वह पूरे घर में हाय-तौबा मचा देती।

किसकी ज्यादा चलती है?

मुझे नहीं याद आता कि उसने सीधे मम्मी या डैडी से कभी किसी चीज की फरमाइश की हो। छोटी होने के नाते बचपन से लेकर आज तक वही मुझ पर रौब डालती रही है। मगर अब दूर-दूर होने पर हमारे बीच झगडा नहीं होता।

रिश्तों का आधार क्या है?

हमारे रिश्तों का आधार केवल और केवल प्यार है। सुनीता अपने पति के साथ अमेरिका निवासी हो गई है। आज मैं उसे बहुत मिस करता हूं। खास कर त्योहारों के वक्त उसकी कमी खलती है। साल दो साल में वह यहां आ जाती है तो कभी मैं चला जाता हूं।

एक ही प्रोफेशन में होने पर रिश्तों पर क्या असर पडता है?

भाई-बहन एक ही प्रोफेशन में हों या नहीं हों रिश्तों पर कोई फर्क नहीं पडता। बल्कि मुझे लगता है कि ऐसी स्थिति में बहन की सुरक्षा के प्रति भाई की जिम्मेदारी बढ जाती है। जहां तक रिश्तों में लगाव की बात है तो हर आदमी अलग अलग किस्म का होता है। हर किसी की सोच अलग होती है, उसके रिश्तों की गरमाहट अलग-अलग किस्म की होती है।

कानून में बदलाव के बारे में क्या सोचते हैं?

हिंदी में एक कहावत है, देर आए दुरुस्त आए। कानून ने स्त्री और पुरुष को बराबरी का हक दिया है, यह फैसला बहुत पहले ले लेना चाहिए था। एक ही पिता की संतान होने के बाद इस तरह का भेद रखने का कोई अर्थ ही नहीं। मेरी इकलौती बहन है सुनीता। बचपन से आज तक मैंने दुनिया की हर खुशी उसे देने की कोशिश की है। हमारे रिश्ते दिल से जुडे हुए हैं संपत्ति या जायदाद से नहीं।

पैसे की चाहत ने पैदा की रिश्तों में दूरियां

जतिन-ललित (म्यूजिक कम्पोजर)

संपत्ति कानून पर आपके विचार?

कानून ने यह काम बहुत अच्छा किया कि बहन को उसका हिस्सा मिले। मेरा जो कुछ भी है मैं चाहता हूं कि 50 प्रतिशत मेरी बेटी को मिले और पचास प्रतिशत मेरे बेटे को। लोग पहले बेटी को पराया धन समझकर छोड देते थे। पिता भी जायदाद में उसे भागादारी नहीं देते थे। यह कितना गलत था। आखिर वह भी तो एक पिता की संतान है, फिर भाई-बहन के रिश्ते में आर्थिक फर्कक्यों।

रिश्तों का तुलनात्मक अध्ययन?

रिश्ते को निभाना आपके संस्कार में होता है। आज बडे-बडे लोग साथ-साथ रह रहे हैं। वे संयुक्त परिवार का महत्व समझते हैं। यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर है कि वह अपने रिश्ते को कितनी मजबूत डोर से बांध कर रखता है। जहां भावनाओं की कद्र की जाती है, एक-दूसरे का सम्मान, एक-दूसरे का विश्वास किया जाता है वहां रिश्ते हमेशा मजबूत होते हैं। संयुक्त परिवार में सब लोग मिलकर रहते हैं। यह ध्यान रखना जरूरी है कि सभी साथ-साथ होकर भी अपनी प्राइवेसी बनाए रखें। सफलता पिरामिड की तरह होती है। जैसे-जैसे व्यक्ति ऊपर चढता जाता है उसके आसपास की सीढियां और लोग कम होते जाते हैं। सबसे अंत में वह अकेला बचता है। यह उदाहरण मैं इसलिए दे रहा हूं कि पैसा कमाने और सफलता के आसमान को छूने की चाहत ने आदमी को आदमी से दूर कर दिया है। जाहिर है, ऐसे में भाई-बहन का रिश्ता भी प्रभावित होगा। जब पैसा आता है तो अपने साथ-साथ बहुत सारी चीजें लेकर चला जाता है।

हम सात भाई-बहन थे। एक ही बेडरूम में पूरा घर एडजस्ट करता था। तब किसी को किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होती थीं। लेकिन चाहतें बढ, नई-नई ख्वाहिशों ने पनपना शुरू किया और धीरे हम सब दूर-दूर हो गए। यह जरूर है कि हम दिल से दूर नहीं हैं। लेकिन सशरीर दूर हो गए हैं। पैसा आने से माइंडसेट चेंज हो जाता है। दूसरे पैसा जब आता है तो उसकी भूख और बढ जाती है।

लोग इतना दूर-दूर जाकर बस जाते हैं कोई विदेश चला गया तो साल भर की फुर्सत रिश्ते कैसे निभाएं। देखिए एक भाई को पता है कि वह उसकी बहन है तो उसे यह जताने के लिए हर रक्षाबंधन पर राखी बंधवाने की जरूरत नहीं होती कि वह वाकई भाई है या ऐसा करने से ही उसकी बहन उसे मानेगी। अगर संभव नहीं है तो बहन राखी भेज देती है और भाई बंधवा लेता है। हां अगर बहन दूर हो और भाई राखी बांधने के लिए खास तौर पर रक्षाबंधन पर आए तो भाई और उसके परिवार वाले गदगद हो जाते हैं। लगता है कि एक बार फिर से वह रिश्ता मजबूत हो गया है।

रिश्ते का आधार क्या है?

किसी भी रिश्ते में वास्तविकता होनी चाहिए। सहयोग और दिल से किए गए सम्मान के आधार पर रिश्ता चलता है। बनावटीपन से रिश्ते नहीं चलते। रिश्तों का जुडाव भी इन्हीं बातों पर निर्भर करता है। हर रिश्ते में छोटी-छोटी बातों का ध्यान रखना जरूरी होता है।

किसकी चलती है?

मेरी मम्मी बहुत डोमिनेटिंग थीं। जाहिर है कि विजेयता में कुछ-कुछ गुण तो आने ही थे। ऐसा नहीं है कि हर समय उसकी ही चलती थी। लेकिन घर के कुछ खास निर्णयों में उसकी सुनी जाती है।

क्या कभी झगडा हुआ?

हम सातों लोग बचपन में खूब लडते-झगडते थे। रूठना-मनाना सब कुछ होता था। हमारा भी आम बच्चों की तरह ही बचपन बीता। लेकिन मेरी बहन जब गुस्सा होती थी उसे मनाना एक कठिन काम होता था। जब हम बडे हुए तो बिलकुल बदल गए। झगडे स्नेह, प्यार और आदर में बदल गए।

मन के बंधन हैं

सिद्धार्थ दास भाई नंदिता दास, अभिनेत्री

पहले और अब के रिश्तों की तुलना?

समय बदला है तो दुनिया की हर चीज पर उसका असर तो दिखाई देगा ही। मुझे जो सबसे महत्वपूर्ण बदलाव नजर आया वह है व्यस्तता। इसके चलते रिश्तों में दूरियां बढ गई हैं।

संपत्ति कानून पर आपके विचार?

मैं ज्यादा कुछ नहीं जानता लेकिन यह कह सकता हूं कि कानून अच्छे के लिए बनता है। हमारे पुरुष प्रधान देश में यदि लडकियों के हक में कानून बनाया गया है तो ठीक ही होगा।

झगडा होता है आप दोनों के बीच?

दस साल की उम्र तक तो शायद होता था लेकिन समझदार होने पर नहीं हुआ। दीदी सरदार पटेल में पढती थी और मैंने उनकी तमिल की किताब छुपा दी। सारा घर मेरे सहित परेशान हो उस किताब को ढूंढ रहा था क्योंकि दीदी का एग्जाम था। लेकिन वह नहीं मिली। मैंने कहां छिपाई मुझे भी याद नहीं रहा। बाद में सर्दी के कपडे निकालते हुए कंबल के बीच वह मिली।

किसकी चलती है?

हमारा परिवार आरंभ से ही खुली सोच व आजाद विचारों का रहा इसलिए कोई किसी पर अपनी नहीं चलाता। बैठ कर हेल्दी वातावरण में बात होती है। जहां सबकी राय मायने रखती है।

रिश्तों का आधार क्या है?

रिश्ते मन के हैं बंधन या मजबूरी नहीं। खुली हवा में गहरी सांस लेने जैसे। हम किसी परंपरा या अंधविश्वास से परे हैं इसलिए किसी तरह के पर्व-त्योहार से हम बंधे नहीं। रिश्तों के प्रति अपने एहसास जिंदा रखें और उनकी कद्र करें।

कोई यादगार घटना?

दीदी कान फेस्टिवल के लिए फ्रांस गई हुई थीं, उन दिनों मैं स्विट्जरलैंड के रीटबर्ग म्यूजियम में प्रदर्शनी डिजाइन कर रहा था। उसी दिन ओपनिंग थी इसलिए नहीं जा पाया। दो दिन बाद मैं पहुंचा। वहां रेड कारपेट वेलकम होता है। मैं दीदी के साथ फार्मल सूट में उस रास्ते पर चल रहा था। देश-विदेश के कैमरे खटाखट चमक रहे थे। मैं नर्वस हो रहा था दीदी ने समझाया। लग रहा था कि मैं कैसे भी दीदी की ओट में छिप जाऊं।

पारदर्शी रिश्ता है हमारा

अभिनेत्री-एंकर-मॉडल पूजा बेदी

संबंधों का आधार क्या है?

कुछ साल पहले मेरे सगे भाई सिद्धार्थ और मां प्रोतिमा की एक हादसे में दर्दनाक मौत हुई थी। एडम मेरा सगा भाई नहीं है। पर हमारे परिवार का माहौल हमेशा खुले विचारों का रहा। गैर परंपरावादी परिवार में परवरिश होने से मुझ में और मेरे सौतले भाई एडम के संबंध में पूरा खुलापन है। सगे भाई-बहन से अधिक प्यार है। एडम की मां अमेरिकन है पर पिता हैं कबीर बेदी। एडम मुझसे 12 साल छोटा है। हम दोनों भाई-बहन भी हैं, दोस्त भी हैं। हमारे रिश्तों में पूरी आजादी है लेकिन जहां गलती हो मैं उसे डांटने में संकोच नहीं बरतती। अपने जीवन की हर बात वह मुझे बताता है। एडम अकसर यूएसए जाता रहता है, सो हर रक्षाबंधन पर मैं उसके साथ नहीं होती। हालांकि एडम अमेरिकन होने के कारण रक्षाबंधन के त्योहार का औचित्य नहीं समझता पर जब भी वह मुंबई में होता है, खुद राखी लेकर मेरे घर पहुंच जाता है।

कभी झगडा होता है?

एडम के साथ उसकी स्मोकिंग की आदत को लेकर झगडा होता है। मैं उसे खूब डांटती हूं, पर अब तक वह छोड नहीं पाया।

कोई यादगार घटना?

आज से कुछ 5-6 साल पहले मैं यंबकेश्वर (नासिक-महाराष्ट्) में शूटिंग कर रही थी और वो एक एड फिल्म के लिए वहां से कुछ ही दूरी पर कुंभ में शूटिंग कर रहा था। हालांकि हम दोनों इस बात से बेखबर थे। उस दिन संयोग से राखी थी। शाम को एडम का फोन आया तो हम दोनों दंग रह गए कि इतने करीब शूटिंग कर रहे हैं। हम लोग मिले और हंसी खुशी रक्षाबंधन का त्योहार मनाया।

कानून के बारे में क्या कहना है?

मैं कानून के इस नये प्रावधान पर खुश हूं, जिससे कि पिता की वसीयत पर अब भाई की तरह बहन का भी अधिकार होगा। इससे करोडों बहनों को फायदा होगा। डैड की वसीयत से हमें सरोकार नहीं है। एडम और मेरा नाता पहले की तरह पारदर्शी रहेगा।

(दिल्ली से इला श्रीवास्तव व मुंबई से एस. सुशीला, राजेश श्रीवास्तव)

प्रीति सेठ
 
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