आईक्यू+ ईक्यू= सफलता

      
आईक्यू+ ईक्यू= सफलता

मेरी उम्र 35 वर्ष है। मैं एक निजी कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर हूं। मेरी समस्या यह है कि मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आ जाता है, इस वजह से ऑफिस में सभी सहकर्मी मुझसे नाराज रहते हैं। मैं अच्छा काम करता हूं, लेकिन कोई भी मेरे काम की प्रशंसा नहीं करता। मेरा दांपत्य जीवन भी बेहद तनावपूर्ण हो गया है। समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं?

ए. बी., दिल्ली

मैं 27 वर्षीया विवाहिता हूं। मेरी शादी को दो वर्ष हो चुके हैं। मुझे अपनी सास के व्यवहार से ऐसा महसूस होता है कि वह मुझसे अकसर नाराज रहती हैं। मैं अपनी तरफ से उन्हें खुश रखने की पूरी कोशिश करती हूं। पर मालूम नहीं क्यों वह अकसर चिढी हुई नजर आती हैं। इस वजह से मैं बहुत तनावग्रस्त रहती हूं। मेरी समझ में नहीं आता कि मैं क्या करूं?

बी. के., नागपुर

लोगों और शहरों के नाम चाहे कुछ भी हों लेकिन ऐसी समस्याओं से हमारे आसपास का हर दूसरा व्यक्ति परेशान होता है। किसी भी पत्र-पत्रिका के मनोवैज्ञानिक समस्याओं वाले स्तंभ में अकसर पाठक-पाठिकाओं की ऐसी समस्याएं देखने को मिलती हैं।

ऐसी समस्याओं की खास वजह भावनात्मक संतुलन की कमी होती है। आजकल बडी संख्या में सुशिक्षित और सफल लोग भी ऐसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं से जूझते देखे जा सकते हैं, जिन्हें इमोशनल क्राइसिस का नाम दिया जाता है। इनमें वे लोग जिनकी भावनात्मक बुद्धिमत्ता का स्तर ऊंचा होता है, ऐसी समस्याओं का हल आसानी से ढूंढ निकालते हैं, लेकिन जिनकी इमोशनल इंटेलिजेंस कम होती है, उन्हें ऐसी समस्याओं से बाहर निकलने में बहुत परेशानी होती है। इसीलिए आज के मनोवैज्ञानिक आईक्यू के साथ ईक्यू को भी बहुत ज्यादा महत्व देने लगे हैं। उनका मानना है कि जीवन में सफल होने के लिए केवल मेहनत करके तकनीकी कौशल सीखना और जानकारियां हासिल करना ही काफी नहीं है, बल्कि इंसान को अपनी भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करना भी आना चाहिए।

क्या है ईक्यू

जिस तरह मनोवैज्ञानिकों ने बौद्धिक क्षमता को मापने के लिए आईक्यू के सिद्धांत का प्रतिपादन किया उसी तरह भावनात्मक विवेक को मापने के लिए ईक्यू का सिद्धांत है। इसके तहत प्रश्नावली और मनोवैज्ञानिक परीक्षण के जरिये व्यक्ति के भावनात्मक विवेक की जांच की जाती है। आजकल मनोवैज्ञानिक भावनात्मक विवेक को बहुत ज्यादा महत्व देने लगे हैं, क्योंकि इसके बिना कोई भी इंसान अपने अर्जित ज्ञान का सही इस्तेमाल नहीं कर सकता। भावनात्मक विवेक के सिद्धांत के प्रतिपादकों का ऐसा मानना है कि पारंपरिक रूप से जिसे हम आईक्यू कहते हैं, उसका क्षेत्र बहुत सीमित है। लेकिन इमोशनल इंटेलिजेंस का दायरा बहुत विस्तृत है। इसके अंतर्गत समस्त मानवीय व्यवहार समाहित होते हैं। बौद्धिक रूप से कोई भी इंसान चाहे कितना ही सक्षम क्यों न हो लेकिन भावनात्मक परिपक्वता के अभाव में वह असफल हो सकता है। यहां सफलता का अभिप्राय सिर्फ करियर की सफलता या प्रसिद्धि से नहीं है। बल्कि इस शब्द को व्यापक अर्थो में देखना चाहिए क्योंकि हर इंसान के लिए सफलता के अलग मायने हो सकते हैं।

अभिभावकों की भूमिका

अपनी भावनाओं को संतुलित और नियंत्रित करने का प्रशिक्षण हमें बचपन से ही घर और स्कूल के माध्यम से मिलता रहता है। बच्चा जब किसी बात के लिए रोता है या छोटी-छोटी बातों पर अपने गुस्से का इजहार करता है तो उसे यही समझाया जाता है कि ऐसा करना अच्छी बात नहीं है। इस तरह बचपन से ही धीरे-धीरे हमारे व्यक्तित्व का निर्माण कुछ इस ढंग से हो रहा होता है कि उसमें नकारात्मक भावनाओं के लिए बहुत कम जगह होती है। हालांकि इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि भारतीय समाज में भावनात्मक बुद्धिमत्ता के प्रति अभी भी उतनी जागरूकता नहीं है। ज्यादातर अभिभावकों का यह सपना होता है कि उनका बच्चा बडा होकर डॉक्टर, इंजीनियर या वैज्ञानिक बने। इसलिए वे अपने बच्चों को सिर्फ पढने के लिए प्रेरित करते हैं। पढाई-लिखाई के क्षेत्र में कडी मेहनत कर के कोई बच्चा भविष्य में आईएएस अधिकारी तो बन सकता है, लेकिन एक कुशल प्रशासनिक अधिकारी के रूप में वह कितना सफल होगा, इसका निर्धारण केवल इस बात से होता है कि बचपन में उसे भावनात्मक प्रशिक्षण किस तरह से दिया गया है। आगे चलकर बच्चे का करियर क्या होगा, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वह बडा होकर कैसा इंसान बनेगा? बच्चे को अच्छा इंसान बनाने का काम सिर्फ उसके माता-पिता ही कर सकते हैं।

फर्क भावनाओं का

मनोवैज्ञानिक डॉ. जयंती दत्ता के अनुसार, अब तक किए गए शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि भारतीय समाज में पुरुषों की तुलना में स्त्रियां भावनात्मक रूप से ज्यादा संतुलित होती हैं और उनका भावनात्मक स्तर बहुआयामी होता है। वे भावनात्मक उतार-चढाव को झेलने में ज्यादा सक्षम होती हैं। बचपन से ही उन्हें अलग-अलग तरह की भावनाओं को समझना और उनके अनुरूप व्यवहार करना सिखाया जाता है। उनकी भावनाओं में बहुत लचीलापन होता है और वे उन्हें अपनी मर्जी से नियंत्रित कर सकती हैं। उनमें सहनशक्ति ज्यादा होती है। इसी के परिणामस्वरूप शादी के बाद बिलकुल नए माहौल के साथ सामंजस्य स्थापित करने में उन्हें कोई ज्यादा दिक्कत नहीं आती। स्त्रियां जीवन में आने वाली बडी-से-बडी मुश्किलों का हिम्मत के साथ मुकाबला करती हैं। अगर कुछ अपवादों को छोड दिया जाए तो उन्हें अपना मानसिक तनाव दूर करने के लिए शराब, सिगरेट जैसे दु‌र्व्यसनों का सहारा लेने की जरूरत नहीं पडती। जबकि पुरुषों की भावाभिव्यक्ति का तरीका बिलकुल अलग होता है। स्त्री और पुरुष के बीच का यह फर्क उनके व्यक्तित्व की बुनियादी बनावट के कारण होता है। स्त्रियां मूल रूप से अंतर्मुखी और पुरुष बहिर्मुखी होते हैं। इसलिए जहां स्त्रियां अपने मन में उठने वाली भावनाओं को दबा-छिपाकर अपने भीतर समेटे रहती हैं, वहीं पुरुषों में सहनशक्ति कम होती है और वे अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति पर कोई नियंत्रण नहीं रखते और आक्रामक हो उठते हैं। इसी के कारण स्त्रियों को डिप्रेशन, माइग्रेन जैसी समस्याएं होती हैं और पुरुषों में हृदय रोग और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती हैं।

झांकें अपने अंतर्मन में

अपनी भावनाओं को अच्छी तरह समझना भी भावनात्मक विवेक का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह तभी संभव होगा जब आप अपनी अंतरात्मा में झांक कर देखेंगे। आपको यह मालूम होना चाहिए कि आप किन बातों से खुश होते हैं, कौन सी बातें आपको नापसंद हैं, अगर कभी आपका मूड खराब है तो आपको यह मालूम होना चाहिए कि किस वजह से आपका मूड खराब है। किन बातों को लेकर आप चिंतित और परेशान होते हैं, आपके मन में किन बातों को लेकर असुरक्षा है, यह आपको स्पष्ट रूप से मालूम होना चाहिए। जब कभी आप शांतिपूर्वक अकेले बैठे हों तो तटस्थ हो कर दूसरों की नजर से आत्मविश्लेषण करें। जब आप ईमानदारी के साथ अपने व्यक्तित्व का मूल्यांकन करेंगे, तब आप अपनी भावनाओं को अच्छी तरह समझने में सक्षम होंगे। इससे अपने मनोभावों को नियंत्रित और संतुलित करना आपके लिए सहज होगा। एक विज्ञापन एजेंसी में कार्यरत 32 वर्षीया कविता शेट्टी कहती हैं, पहले छोटी-छोटी बातों पर मेरा मूड बहुत जल्दी खराब होता था। कई बार तो यह भी मालूम नहीं चल पाता था कि मुझे इतनी झुंझलाहट क्यों हो रही है? कभी मैं ऑफिस में बेवजह किसी सहकर्मी से उलझ पडती तो कभी जरा सी बात पर घर में बच्चे को बुरी तरह डांट देती। फिर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि मुझे आत्मविश्लेषण करना चाहिए कि मेरे ही साथ अकसर ऐसा क्यों होता है? उसके बाद से जिस किसी रोज मेरा व्यवहार असामान्य होता उस रात सोने से पहले मैं अपने आपसे यह सवाल जरूर पूछती कि आज मुझे गुस्सा क्यों आया? आज मेरा मन उदास क्यों था? आदि। फिर कारण ढूंढ कर मैं उसे ही दूर करने की कोशिश करती। अगर वह कारण दूर नहीं हो सकता तो मैं अपना ध्यान दूसरी ओर बंटाने और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने की कोशिश करती। ऐसा करने के बाद अब मैं अपने भीतर सकारात्मक बदलाव महसूस करती हूं।

भावनाओं पर कसें लगाम

अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना कोई आसान काम नहीं है लेकिन ऐसा कर पाने में जो इंसान सक्षम होता है, उसे लगभग जीवन की आधी समस्याओं से छुटकारा मिल ही जाता है। इस संबंध में प्रबंधन गुरु प्रमोद बत्रा कहते हैं, जीवन में अनुशासन लाकर भावनाओं को एक सीमा तक नियंत्रित किया जा सकता है। अगर आप अच्छी प्रेरणादायक किताबें पढेंगे और जीवन के लिए यह दिशा-निर्देश तय करेंगे कि मन में नकारात्मक भावनाओं को आने नहीं देना है तो क्रोध, ईष्र्या-द्वेष जैसी भावनाओं से आप काफी हद तक ऊपर उठ सकते हैं। अंग्रेजी की एक उक्ति है, रिस्पांड, डॉन्ट रिएक्ट। अर्थात दूसरों की बात चाहे वह अच्छी हो या बुरी ध्यान से सुनें, लेकिन उस पर सोच-समझकर प्रतिक्रिया व्यक्त करें। अगर कोई क्रोध में आकर आपके साथ बुरा व्यवहार करता है तो उसकी प्रतिक्रिया में आपका नाराज होना उचित नहीं है बल्कि उस वक्त आप शांत रहें और बाद में जब उस व्यक्ति का गुस्सा शांत हो जाए तब आप उसे उसकी गलती का एहसास कराएं।

कोई भी निर्णय लेते समय इंसान को अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए, क्योंकि अकसर भावावेश में आकर जल्दबाजी में लिया गया निर्णय गलत साबित होता है। बचपन में वह कहानी तो आपने भी जरूर सुनी होगी कि नेवले के मुंह में खून लगा देखकर किसान की पत्नी ने यह सोचा कि इसी ने मेरे बच्चे को काटा है और गुस्से में आकर उसने नेवले को मार डाला। बाद में उसे यह देखकर बहुत अफसोस हुआ कि नेवले ने उसके बच्चे को नहीं मारा था बल्कि उसने तो सांप को मार कर उससे बच्चे की रक्षा की थी।

यह बात उस स्थिति के लिए और महत्वपूर्ण हो जाती है, जब आप किसी जिम्मेदार पद पर कार्यरत होते हैं और आपके निर्णय से कई लोगों का जीवन प्रभावित होता है। इतिहास कई ऐसे राजाओं और शासकों के उदाहरणों से भरा पडा है, जिन्होंने भावनात्मक आवेश में आकर देश को युद्ध की आग में झोंक दिया और इसका खामियाजा जनता को भुगतना पडा।

जरूरी है भावनात्मक परिपक्वता

जब इंसान अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना सीख लेता है तो वह स्वत: भावनात्मक परिपक्वता की ओर बढने लगता है। बीजिंग ओलंपिक में गोल्ड मेडल प्राप्त करने वाले भारतीय निशानेबाज अभिनव बिंद्रा का व्यक्तित्व भावनात्मक परिपक्वता का जीवंत उदाहरण है। इतना बडा अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करते समय भी उनके चेहरे पर जिस तरह की शांति का भाव था, वह पूरी दुनिया में चर्चा का विषय रहा क्योंकि उन्होंने न तो उछलते-कूदते और चीखते हुए अपनी खुशी का इजहार किया और न उनकी आंखों में खुशी के आंसू ही आए। उन्होंने सिर्फ यही कहा कि संयोगवश आज का दिन मेरा था, कल किसी और का होगा। गीता में कृष्ण के उपदेश में भी यही कहा गया है कि मनुष्य को स्थितप्रज्ञ बनना चाहिए। स्थितप्रज्ञ से अभिप्राय यह है कि जो इंसान अपनी भावनाओं पर काबू पा लेता है, चाहे अपार हर्ष हो या विषाद, दोनों ही परिस्थितियों में उसका व्यवहार संतुलित रहता है। अपने आसपास हम अकसर ऐसे लोगों को देखते हैं जो अल्प शिक्षित होने के बावजूद जीवन की कठिन परिस्थितियों का हिम्मत के साथ डट कर मुकाबला करते हैं और राह में आने वाली बाधाओं से जरा भी नहीं घबराते। जबकि कभी-कभी कुछ लोग उच्च शिक्षित और साधन संपन्न होने के बावजूद छोटी-छोटी परेशानियों से भी विचलित हो उठते हैं। दोनों तरह के लोगों के व्यक्तित्व में यह अंतर भावनात्मक परिपक्वता के आधार पर होता है। जीवन में सफलता और सच्ची प्रसन्नता हासिल करने के लिए किसी भी व्यक्ति का भावनात्मक रूप से परिपक्व होना बहुत जरूरी है। इस संदर्भ में डॉ. जयंती दत्ता कहती हैं, कोई भी इंसान भावनात्मक रूप से कितना परिपक्व होगा, यह इस बात पर निर्भर है कि वह अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति के प्रति कितना सचेत है।

पश्चिमी देशों में मनोवैज्ञानिक आज जिस भावनात्मक संतुलन की बात कर रहे हैं, हमारी भारतीय संस्कृति में सदियों पहले महात्मा बुद्ध के उपदेशों में आठ सम्यक सूत्रों का उल्लेख मिलता है, जिनके माध्यम से जीवन के हर क्षेत्र में संतुलित आचरण अपनाने की शिक्षा दी गई है। गौतम बुद्ध ने एक बार अपने शिष्यों से कहा था, तुम वीणा के तारों को इतना न कसो कि वे टूट जाएं और न इतना ढीला ही छोडो कि उनसे स्वर ही न निकले। कहने का अर्थ यह है कि भावनाओं की अभिव्यक्ति के मामले में संतुलन हमेशा बना रहना चाहिए।

इस बात की पुष्टि साहित्य में भी देखने को मिलती है। तभी तो किसी कवि ने इस दोहे की रचना की होगी-

- अति का भला न बोलना,

अति की भली न चूप

अति की भली न बदरी,

अति की भली न धूप।

इस संबंध में प्रमोद बत्रा आगे कहते हैं, रामायण में राम और लक्ष्मण का चरित्र भावनात्मक संतुलन और असंतुलन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। बडी से बडी मुश्किल सामने आने पर राम का व्यवहार हमेशा संयत रहता था, जबकि लक्ष्मण छोटी-छोटी बातों पर भी नाराज हो उठते थे।

समझें दूसरों की भावनाएं

भावनात्मक रूप से संतुलित होने के लिए अपने आपको समझने के साथ दूसरों की भावनाओं को भी समझने और उनके अनुरूप व्यवहार करने की कोशिश करनी चाहिए। जिन व्यक्तियों का ईक्यू लेवल अच्छा होता है, उनका सामाजिक व्यवहार भी संतुलित होता है। दूसरों के व्यक्तित्व की खूबियों-खामियों को पहचानने और उनके मन की बात को पढ पाने का गुर जीवन के हर क्षेत्र में आपके काम आता है। चाहे वह आपका व्यक्तिगत जीवन हो या सार्वजनिक। अगर आप दूसरों को समझते हैं, तो यह आपके लिए भी अच्छा होगा। इस संबंध में प्रमोद बत्रा कहते हैं, दूसरों की भावनाओं को बारीकी से समझ पाना भावनात्मक विवेक का एक महत्वपूर्ण पहलू है। दफ्तर में जो व्यक्ति अपने साथियों के व्यक्तित्व को अच्छी तरह समझने में सक्षम होता है, उसे अपने व्यावसायिक जीवन में तालमेल बनाने में कोई परेशानी नहीं होती। अगर कभी उसके सामने कोई मुश्किल आती भी है तो वह आसानी से उसका हल ढूंढ लेता है। पारिवारिक और सामाजिक जीवन में भी भावनात्मक रूप से संतुलित लोग अपने सभी संबंधों का निर्वाह अच्छी तरह कर पाते हैं। क्योंकि वे अपने जीवनसाथी, दोस्तों और रिश्तेदारों के व्यवहार को बहुत ध्यान से देखते हुए उनके व्यक्तित्व के सकारात्मक-नकारात्मक पक्षों को समझने की कोशिश करते हैं। लोगों के साथ उनका व्यवहार भी बहुत संयत होता है। उन्हें मालूम होता है कि अगर किसी से अपनी बात मनवानी भी है तो उसके सामने किस ढंग से पेश आना चाहिए। बच्चों की परवरिश के मामले में भावनात्मक संतुलन की भूमिका काफी अहम होती है।

बच्चों का व्यवहार कई बार ऐसा होता है कि माता-पिता को उन पर क्रोध आ जाता है और वे उन्हें डांट-फटकार कर अपने गुस्से का इजहार करते हैं। अकसर बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार उनके व्यक्तित्व के विकास में बाधक सिद्ध होता है। अगर बच्चे से कोई भूल हो भी जाए तो उस पर क्रोध करने के बजाय प्यार से उसे उसकी गलती का एहसास दिलाना ज्यादा कारगर उपाय साबित होता है।

सामाजिक व्यवहारकुशलता

समाज में लोगों के साथ आपके व्यवहार के आधार पर भी आपके भावनात्मक विवेक को आंका जाता है। अपने समान विचार वाले लोगों के साथ तो सभी का तालमेल अच्छा होता है। लेकिन तारीफ की बात तो तब है जब आप हर तरह के लोगों के साथ सामाजिक व्यवहार निभाने में कुशल हों। भले ही किसी व्यक्ति से आपके वैचारिक मतभेद हों या आप उसे किसी भी कारण से नापसंद करते हों लेकिन जब वह सामने मिले तो उसके साथ आपका व्यवहार हमेशा सहज और संयत होना चाहिए।

बिजनेस मैनेजमेंट के पाठ्यक्रम में अब इंप्रेशन मैनेजमेंट को भी शामिल कर लिया गया है। जिसके अनुसार छात्रों को यह सिखाया जाता है कि व्यक्तिगत रूप से चाहे आप कितने ही परेशान या तनावग्रस्त क्यों न हों, लेकिन सार्वजनिक जीवन में लोगों के साथ बातचीत करते समय आपके चेहरे पर तनाव बिलकुल भी नहीं होना चाहिए। क्योंकि सामने वाले व्यक्ति पर इसका नकारात्मक प्रभाव पडता है। कुछ लोग अकसर यह शिकायत करते सुने जाते हैं कि हमारे आसपास के लोग अच्छे नहीं हैं या कार्यस्थल पर स्थितियां अनुकूल नहीं हैं। पर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि समाज और माहौल को बदलना बहुत मुश्किल है लेकिन खुद को काफी हद तक माहौल के अनुकूल बनाया जा सकता है।

सामंजस्य की कला

किसी इंसान के ईक्यू लेवल को इस आधार पर भी आंका जाता है कि वह समाज और अपनी जीवन स्थितियों के साथ कितनी अच्छी तरह सामंजस्य स्थापित कर सकता है। ऐसा करने के लिए के लिए दृढ निश्चय, स्थितियों को समझ पाने की क्षमता और सतत अभ्यास की जरूरत होती है।

आभा एक छोटे से कस्बे में रहने वाली मध्यवर्गीय परिवार की लडकी थी। विवाह के छह माह बाद ही उसके पति को अमेरिका की एक अच्छी कंपनी में नौकरी का प्रस्ताव मिला और वह पति के साथ अमेरिका चली गई। उसके माता-पिता समेत सभी रिश्तेदार इस बात को लेकर बहुत चिंतित थे कि वहां के अजनबी माहौल में एक ऐसी लडकी कैसे एडजस्ट करेगी, जिसे अंग्रेजी बोलना भी नहीं आता। लेकिन तीन वर्ष बाद जब वह अपने पति के साथ भारत आई तो लोग यह जानकर चकित रह गए कि आभा वहां एक कंपनी के अकाउंट्स डिपार्टमेंट में काम करती है। खुद कार ड्राइव करके ऑफिस जाती है और घर-बाहर का हर काम मुस्तैदी से संभालती है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ. भागरानी कालरा कहती हैं, जीवन की बदलती चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के साथ अच्छी तरह सामंजस्य स्थापित करने वाला व्यक्ति ही बुद्धिमान होता है और सही मायने में उसे जीने की कला आती है।

भावनात्मक आत्मनिर्भरता

यह सहज मानवीय प्रवृत्ति है कि अपने करीबी लोगों के साथ हम अपने सुख-दुख बांटते हैं। दरअसल ऐसा करके हम काफी हद तक खुद को तनावमुक्त महसूस करते हैं। लेकिन अकसर ऐसा भी होता है कि इंसान दिल से जिसके ज्यादा करीब होता है, भावनात्मक रूप से उस पर पूरी तरह निर्भर हो जाता है। एमबीए की छात्रा शिल्पी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। अपनी सीनियर ऋतु के व्यक्तित्व से वह इतनी प्रभावित थी कि अपने दिल की हर बात उसके साथ शेयर करती। छोटे से छोटा निर्णय लेने से पहले वह ऋतु से सलाह जरूर लेती। सीनियर होने के नाते ऋतु दो साल पहले ही कॉलेज से पास आउट हो गई और उसकी जॉब भी दूसरे शहर में लग गई। इसके बाद शिल्पी स्वयं को बिलकुल असहाय महसूस करने लगी। जरा-जरा सी बात पर वह दिल्ली से बैंगलोर फोन घुमा देती, जैसे-कल की पार्टी में मुझे कौन से कलर की ड्रेस पहननी चाहिए? मेरा ब्वॉय फ्रेंड आजकल दूसरी लडकियों में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगा है, मुझे अपने करियर के लिए किस तरह प्लानिंग करनी चाहिए? वगैरह-वगैरह। लेकिन दूरी और नई नौकरी की व्यस्तता की वजह से ऋतु उसे ज्यादा फोन नहीं कर पाती। नतीजा यह हुआ कि शिल्पी खुद को बहुत अकेली और उदास महसूस करने लगी। जरूरत से अधिक भावनात्मक निर्भरता इंसान के व्यक्तित्व को कमजोर बना देती है। चाहे कोई आपका कितना ही करीबी क्यों न हो, उस पर इतने निर्भर कभी न हों कि आपमें अपने निर्णय स्वयं लेने की क्षमता ही समाप्त हो जाए। हर रिश्ते में निजी भावनाओं के लिए थोडा स्पेस बहुत जरूरी है। तभी आपमें भावनात्मक आत्मनिर्भरता आएगी और जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए आपको किसी का सहारा लेने की जरूरत नहीं पडेगी।

करियर में भावनाओं की रस्साकशी

सामान्यत: ऐसा माना जाता है कि इंसान की निजी और कारोबारी जिंदगी अलग-अलग होती है और दोनों को एक-दूसरे से बिल्कुल अलग रखना चाहिए। एक ही व्यक्ति जब घर और दफ्तर में दो अलग-अलग भूमिकाओं में जी रहा होता है तो ऐसी स्थिति में स्विच ऑफ, स्विच ऑन के सिद्धांत पर काम करना फायदेमंद साबित होता है। पर व्यावहारिक रूप से इस पर पूरी तरह अमल करना सभी के लिए संभव नहीं हो पाता। नतीजतन पारिवारिक समस्याओं से करियर और व्यावसायिक तनाव से पारिवारिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है। खास तौर से स्त्रियों के लिए निजी भावनाओं और करियर के बीच संतुलन स्थापित कर पाना बहुत कठिन होता है। पुरुष पर घर की सीमित जिम्मेदारियां होती हैं लेकिन जब कोई स्त्री नौकरी करती है तो उसके लिए घर और दफ्तर दोनों ही समान रूप से महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसी स्थिति में उसकी दशा तनी हुई रस्सी पर चलने वाले बाजीगर की तरह होती है, जिसे अपना हर कदम बहुत सोच-समझकर उठाना पडता है। इसलिए जहां तक संभव हो स्त्रियों को कोशिश यही करनी चाहिए कि वे घर की परेशानियों को ऑफिस और वहां के तनाव को घर लेकर न जाएं। ऐसा करने से उन्हें अपना भावनात्मक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी। इस सबंध में प्रमोद बत्रा आगे कहते हैं, आजकल बडी कंपनियां अपने यहां लोगों की नियुक्ति करते समय न केवल उनकी तकनीकी कुशलता की जांच करती हैं बल्कि उनके भावनात्मक विवेक का भी परीक्षण करती हैं, ताकि वह व्यक्ति कंपनी के लिए हर दृष्टि से उपयुक्त साबित हो। ऐसा करना इसलिए जरूरी होता है क्योंकि किसी भी क्षेत्र में काम करने के लिए केवल तकनीकी दक्षता ही काफी नहीं होती। बल्कि व्यक्ति को कार्यस्थल पर अधीनस्थ कर्मचारियों का नेतृत्व और सहकर्मियों के बीच समन्वय भी स्थापित करना होता है। उदाहरण के लिए अगर कोई इंजीनियर अपने काम में चाहे कितना ही काबिल क्यों न हो, लेकिन अगर वह गुस्सैल और चिडचिडा हो तो उसकी यह योग्यता बेकार है। क्योंकि उसकी वजह से कार्यस्थल का माहौल तनावपूर्ण होगा और इसका असर उसके सहकर्मियों की कार्यक्षमता पर भी पडेगा।

कार्यभार से दबी भावनाएं

आज की प्रोफेशनल दुनिया में अच्छा काम करना, सही समय पर लक्ष्य पूरा करना, अपने प्रतिद्वंद्वी से खुद को बेहतर साबित करना, जैसी कई चुनौतियों को स्वीकारना पडता है। इसके अलावा कुछ कार्यक्षेत्र ऐसे भी होते हैं, जहां के सख्त अनुशासन और कार्य की जटिल प्रकृति के कारण इन चुनौतियों का सामना करना और भी कठिन हो जाता है। जैसे-पुलिस, सेना, पत्रकारिता आदि। ऐसे लोगों को अपनी पेशेगत अपेक्षाएं पूरी करने के लिए कई ऐसे कार्य करने पडते हैं, जिनके लिए वे भावनात्मक रूप से तैयार नहीं होते। इसका नतीजा यह होता है कि वे डिप्रेशन, व्यवहार में चिडचिडेपन और अनिद्रा जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याओं के शिकार हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप सैनिकों द्वारा आत्महत्या या छुट्टी न मिलने पर गुस्से में आकर सर्विस रिवाल्वर से ड्यूटी के दौरान अपने सीनियर ऑफिसर की हत्या की खबरें देखने-सुनने को मिलती हैं। दक्षिण अफ्रीकी फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर ने सूडान के अकाल के दौरान एक ऐसे बच्चे की तस्वीर खींची, जो भूख से इतना दुर्बल हो चुका था कि उसमें हेलीकॉप्टर से नीचे गिराई जाने वाली राहत सामग्री तक पहुंचने की शक्ति भी नहीं थी। वहीं थोडी दूरी पर बैठा गिद्ध उस बच्चे पर निशाना साधते हुए उसके करीब आ रहा था। इस फोटो के लिए केविन कार्टर को पुल्ति्जर पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जिसे पत्रकारिता का सर्वोच्च पुरस्कार माना जाता है। लेकिन यह फोटोग्राफर गहरे डिप्रेशन में चला गया और पुरस्कार मिलने के तीन महीने बाद ही 34 वर्ष की उम्र में उसने नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली।

ऐसी विपरीत स्थितियों में काम करने वाले लोगों के लिए भावनात्मक संतुलन बनाए रखना बहुत जरूरी होता है।

इस संबंध में मनोवैज्ञानिक

डॉ. जयंती दत्ता आगे कहती हैं, अगर कोई व्यक्ति अपने काम के दबाव की वजह से तनावग्रस्त होगा तो इसका असर उसके स्वास्थ्य और कार्यक्षमता दोनों पर पडेगा। अकसर पुलिस या सेना में काम करने वालों के मन में हमेशा बेचैनी सी रहती है क्योंकि अंदर से वे किसी को चोट पहुंचाना नहीं चाहते, लेकिन उन्हें प्रशिक्षण देकर आक्रामक बनाया जाता है। मेरे सामने कुछ ऐसे मामले आए, जिनमें पुलिस में कार्यरत कई लोगों को अनिद्रा, नींद में हिंसक सपने आने और उच्च रक्तचाप जैसी समस्याएं थीं। ऐसे लोगों को और उनकी पत्नियों को भी काउंसलिंग दी जाती है। ताकि वे इस मन:स्थिति से बाहर निकलने में पति को सहयोग दें।

आजकल कारपोरेट कंपनियां इस बात को लेकर बहुत जागरूक हैं कि उनके कर्मचारी भावनात्मक स्तर पर प्रसन्न और संतुष्ट रहें। इसी कारण आजकल बडी कंपनियां समय-समय पर अपने कर्मचारियों के लिए स्ट्रेस मैनेजमेंट, रिलैक्सेशन ट्रेनिंग, लीडरशिप ट्रेनिंग और मोटिवेशन ट्रेनिंग के वर्कशॉप आयोजित करती रहती हैं। ऐसे वर्कशॉप में कई बार मैं भी जा चुकी हूं और मेरा अनुभव यह रहा है कि ज्यादातर लोग डेड लाइन या टारगेट के दबाव के कारण तनावग्रस्त रहते हैं। मैं पहले उन्हें सलाह देती हूं कि वे अपने कार्य के प्रति रुचि पैदा करें। अपने ऊपर काम का दबाव महसूस न करें और छुट्टियों में आराम करें, क्योंकि अच्छा काम करने के लिए तनावमुक्त होना बहुत जरूरी है।

हमारे जीवन में ज्यादातर समस्याएं भावनात्मक असंतुलन के कारण होती हैं। यह बात हममें से कम ही लोग समझ पाते हैं। जिंदगी में सफलता और सुकून पाने के लिए भावनात्मक परिपक्वता बहुत जरूरी है। अगर इंसान अपनी भावनाओं को संतुलित और नियंत्रित करना सीख ले तो उसके जीवन से बहुत सारी समस्याएं स्वत: दूर हो जाएंगी।

नृत्य देता है भावनात्मक संबल

गीता चंद्रन, नृत्यांगना

शुरू से ही मैं इंट्रोवर्ट पर्सनाल्टी की थी। पर अब धीरे-धीरे थोडी एक्सट्रोर्वट हो गई हूं। मुझे ऐसा लगता है कि किसी भी इंसान की जिंदगी में इमोशनल इंटेलिजेंस की खास जगह होती है। मैं अपनी भावनाओं पर पूरा नियंत्रण रखती हूं। अगर कभी मेरे जीवन में कोई मुश्किल परिस्थिति भी आती है तो बिना घबराहट के शांतिपूर्वक उसका हल निकालने की कोशिश करती हूं। अपने गुस्से पर भी मेरा पूरा नियंत्रण है। अगर कभी मेरे सामने कोई बुरी स्थिति भी आती है तो मैं उसके अंतिम परिणाम के बारे में सोच लेती हूं। फिर सकारात्मक रूप से उस स्थिति से बाहर निकलने की सोचती हूं। अगर उसके बाद भी कोई हल नहीं निकले तो भगवान में मेरी पूरी आस्था है और मैं उन्हीं से प्रार्थना करती हूं कि वही मेरे लिए सही रास्ता दिखाएं। मेरा मानना है कि ईश्वर के प्रति मेरी आस्था मुझे भावनात्मक रूप से अधिक मजबूत बनाती है।

बचपन से ही अपने पिता के साथ मेरा गहरा भावनात्मक लगाव रहा है। पर वृद्धावस्था में पहुंचने के बाद जब वह अकसर बीमार रहने लगे तो उस स्थिति का सामना करना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। उन्हें इस तरह धीरे-धीरे कमजोर होते देखना मेरे लिए बहुत दुखद था। पर मैंने अपने मन को समझाया कि यह तो जीवन की सच्चाई है। यह बहुत अच्छी बात है कि मैं नृत्य से जुडी हूं और नृत्य मुझे तनाव और जीवन की परेशानियों से लडने की ऊर्जा देता है। नृत्य के दौरान मैं अपनी सारी परेशानियां भूल जाती हूं। जब कभी मैं तनावग्रस्त होती हूं तो नृत्य करके अपने आपको इतना थका देती हूं कि उसके बाद मुझे बहुत अच्छी नींद आ जाती है। मेरा मानना है कि मानसिक शांति के लिए शारीरिक रूप से स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मैं नियमित रूप से योगाभ्यास और प्राणायाम करती हूं। मानसिक शांति के लिए ध्यान करती हूं। मुझे ऐसा लगता है कि आज की युवा पीढी आत्मकेंद्रित होती जा रही है और उसका ईक्यू लेवल भी बहुत कम है। इस पीढी के बच्चे खुल कर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त नहीं करते। उन्हें लोगों से बातें करना भी अच्छा नहीं लगता। संयुक्त परिवारों के टूटने के बाद एकल परिवारों में बच्चे और भी अकेले हो गए हैं। इन बातों के मद्देनजर चाहे कितनी ही व्यस्तता क्यों न हो मैं अपनी टीनएजर बेटी के लिए समय जरूर निकालती हूं। उसके साथ मैंने ऐसा रिश्ता बनाकर रखा है कि वह खुलकर मुझसे अपने दिल की बातें शेयर करती है। मेरा मानना है कि जब कोई मां भावनात्मक रूप से संतुलित होती तो बच्चे के व्यक्तित्व पर भी निश्चित रूप से उसका सकारात्मक प्रभाव पडता है।

संगीत देता है मन को सुकून

कविता कृष्णमूर्ति, गायिका

मैं संयुक्त परिवार में जन्मी और पली-बढी हूं। शादी भी एक बडे परिवार में हुई। फलस्वरूप मुझे रिश्तों के साथ सामंजस्य स्थापित करना आता है। मुश्किलों से डर तो लगता है पर मैं ऐसी परिस्थितियों में बडों की राय अवश्य लेती हूं। ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कि समस्या का हल जल्दी निकल आए। भावनात्मक संतुलन से व्यक्ति हमेशा ही कामयाब होता है। मैं न तो छोटी-छोटी बातों पर उग्र प्रतिक्रिया व्यक्त करती हूं और न ही असफल होने पर ज्यादा उदास होती हूं। जीवन में उतार-चढाव तो आते ही रहते हैं। उन्हें भी सहजता से स्वीकार लेना अच्छा होता है। अगर मैं किसी कारणवश परेशान होती हूं और उस दौरान मुझे कोई गाना रिकॉर्ड करना होता है तब भी गाते वक्त सब कुछ भूल कर मेरा पूरा ध्यान सिर्फ अपने गाने पर होता है। उसमें मैं अपनी किसी परेशानी को आडे नहीं आने देती। किसी भी काम में मेरे परिवार का सपोर्ट अधिक होता है। जब से मैंने इस इंडस्ट्री में कदम रखा है, मेरे घर वाले किसी भी मुश्किल परिस्थिति में हमेशा मेरे साथ रहते हैं। यह मेरे लिए बहुत बडा इमोशनल सपोर्ट है। मुझे ऐसा लगता है कि संगीत आपकी हर मुश्किल की दवा है। अगर मेरा मन परेशान होता है तो खुद गाती हूं या शास्त्रीय संगीत सुनती हूं। इससे मुझे बहुत सुकून मिलता है। ईश्वर के प्रति भक्ति और समर्पण का भाव हर मुश्किल से बाहर निकलने का रास्ता देता है। इससे आपको आत्मबल मिलता है और आप किसी भी संकट से उबर सकते हैं। अच्छे लोगों की संगत और आध्यात्मिक विचारों को अपनाने से तनाव हमेशा कम होता है। नकारात्मक बातों को अपने मन में जगह नहीं देती, क्योंकि इससे मन खराब होता है और किसी भी क्षेत्र में आगे बढने की हिम्मत खत्म हो जाती है। पहले मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आता था, पर अब मैंने अपने गुस्से पर काबू पा लिया है।

अध्यात्म मुझे देता है भावनात्मक दृढता

किरण बेदी, अवकाश प्राप्त आई. पी. एस. अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता

मेरा मानना है कि इंसान को भावनात्मक रूप से संतुलित बनाए रखने में आध्यात्मिकता की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होती है। आज लोग हर जगह ई क्यू की चर्चा कर रहे हैं लेकिन मेरा मानना है कि आध्यात्मिक समझ यानी स्पिरिचुअल कोशिएंट (एसक्यू) व्यक्ति की बुद्धिमत्ता और भावनाओं के बीच संतुलन बनाए रखने का काम करती है। ईमानदारी से आत्म मूल्यांकन करना और अपने आपको समझना ही एसक्यू है। जिसने इसे समझ लिया उसे भावनात्मक रूप से किसी भी तरह की समस्या का सामना नहीं करना पडता। दरअसल आध्यात्मिकता भावनाओं को सही दिशा देती है। जब व्यक्ति अपने जीवन में आध्यात्मिकता की ओर बढता है तो वह अपनी भावनाओं पर नियंत्रण पा लेता है। सत्संग, योग, ध्यान, भक्ति, दुर्बलों की सेवा, परोपकार और त्याग से व्यक्ति के मन में आध्यात्मिकता की भावना विकसित होती है। भावनाएं कभी-कभी आपको गुमराह भी कर सकती हैं लेकिन अध्यात्म इंसान के जीवन को सही दिशा देता है और उसे गलत रास्ते पर जाने से रोकता है। ऐसा सोचना गलत है कि रिटायरमेंट के बाद व्यक्ति को ईश्वर में ध्यान लगाना चाहिए। जीवन में जितनी जल्दी अध्यात्म का प्रवेश होगा व्यक्ति के लिए उतना ही अच्छा होगा।

महाभारत में अर्जुन के सामने जब सारे सगे-संबंधी खडे थे तो भगवान कृष्ण ने अर्जुन की अंतरात्मा को जगाया था। अर्जुन के पास आईक्यू और ईक्यू दोनों था, लेकिन इन दोनों को संतुलित करने के लिए उनके पास एसक्यू नहीं था और श्रीकृष्ण ने उन्हें आध्यात्मिकता का ज्ञान दिया। मुझे भी गुस्सा आता है। लेकिन मेरा मानना है कि गुस्सा भी सकारात्मक होना चाहिए। हर समंदर में लहरें आती हैं, लेकिन यह समझना जरूरी है कि हम लहरों को तूफान न बना लें। कहने का मतलब यह है कि गुस्सा किसी के भले के लिए भी किया जा सकता है। क्रोध भी एक ऊर्जा है जो व्यक्ति में सकारात्मक भावना जगाता है। स्त्रियों को अपने ऊपर थोडा समय जरूर देना चाहिए। अगर आपकी नजर आपकी सोच पर रहे तो आपका जीवन सफल हो जाएगा। फिर आपको जीवन के किसी भी मोड पर निर्णय लेने में कोई समस्या नहीं आएगी। मेरे भीतर सही समय पर आध्यात्मिक रुझान आ गया था। माता-पिता की शिक्षा और अच्छी किताबें पढने से मुझमें यह भावना विकसित हुई। कोई व्यक्ति अपने आपमें संपूर्ण नहीं होता है। बस, यह सोचना चाहिए कि कल से आज को अच्छा और आज से आने वाले कल को बेहतर कैसे बनाया जाए।

भावनात्मक विवेक ने जीना सिखाया

शिव खेडा, संस्थापक एवं निदेशक क्वालिफाइड

लर्निग सिस्टम अपने जीवन में कभी न कभी हर इंसान को इमोशनल क्राइसिस से गुजरना पडता है और उससे बाहर निकलने का रास्ता भी ढूंढना पडता है। मैं भी इसका अपवाद नहीं हूं। मुझे याद है, मैं आठवीं कक्षा में फेल हो गया था। मेरे जीवन का वह सबसे मुश्किल और तनावपूर्ण दौर था। अपने से जूनियर बच्चों के साथ क्लास रूम में बैठना, सहपाठियों के मजाक का पात्र बनना मेरे लिए बहुत अपमानजनक था। मुश्किल में हर इंसान आसान रास्ता ढूंढता है। मैंने भी अपनी मां से कहा कि वह प्रिंसिपल से आग्रह करके मेरा प्रमोशन अगले क्लास में करवा दें या किसी दूसरे स्कूल में मेरा एडमिशन करवा दें। क्योंकि मुझसे अपना अपमान सहन नहीं हो पा रहा था। तब मेरी मां ने मुझसे यही कहा कि बेटा अगर तुमने गलती की है तो सजा तुम्हें ही भुगतनी होगी। अपनी इस गलती को मैंने अपने लिए सबक बना लिया और खूब मन लगाकर पढाई करने लगा। मेरी इसी मेहनत का नतीजा यह हुआ कि हायर सेकंडरी की परीक्षा में मैं फ‌र्स्ट डिवीजन से पास हुआ। उसके बाद से यह मेरे जीवन की सफलता का सूत्र बन गया कि मेहनत से कुछ भी कर पाना असंभव नहीं है। अब मुझे ऐसा लगता है कि अगर मैं भावनात्मक रूप से मजबूत नहीं होता तो इतनी आसानी से इस समस्या से बाहर नहीं निकल पाता। सही मायने में भावनात्मक विवेक ही इंसान को जीने की कला सिखाता है।

कोई इंसान कम समय में कितना सही निर्णय ले सकता है, अपनी भावनाओं और व्यवहार पर उसका कितना नियंत्रण है, इत्यादि बातों से उसकी बौद्धिक क्षमता निर्धारित होती है। किसी व्यक्ति के पूरे चरित्र का संचालन उसके भावनात्मक विवेक से ही होता है। आज देश की ज्यादातर समस्याओं की जड भावनात्मक समस्याएं हैं। चाहे वह आतंकवाद हो या नशाखोरी, ये सभी समस्याएं तभी जन्म लेती हैं, जब व्यक्ति की भावनाएं दिशाहीन हो जाती हैं। अत: मेरे विचार से हर इंसान को अपनी भावनाओं को सकारात्मक दिशा देनी चाहिए। मेरा मानना है कि अभ्यास और शिक्षा से ईक्यू को बढाया जा सकता है। सभी के मन में नकारात्मक विचार आते हैं और इस पृथ्वी पर कोई ऐसा मनुष्य नहीं है, जिसे परेशानियों का सामना न करना पडा हो।

भावनात्मक विवेक के इस्तेमाल से हर समस्या का हल ढूंढा जा सकता है। अगर हम अपने अंधेरे जीवन में उजाला नहीं ला सकते तो हमें अंधेरे को पीछे धकेलने की कोशिश करनी चाहिए, इससे उजाला अपने आप सामने आ जाएगा।

जरूरी है अहं का त्याग

अशोक पंडित, फिल्म निर्माता

मैं खुद को बहुत संतुलित इंसान मानता हूं। अगर मेरे जीवन में कोई मुश्किल आती है तो मैं घबराता नहीं। उसे हल करने के उपाय सोचता हूं या किसी बडे बुजुर्ग की राय लेता हूं। फिर भी जीवन की कुछ स्थितियों पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता। जैसे-मैं कोई फिल्म बनाऊं और अगर वह सफल हो जाए तो अच्छी बात होती है, पर यदि वह सफल न भी हो तो भी दूसरी फिल्म और अच्छे तरीके से बनाने की सोचता हूं। मैं किसी बात को लेकर उसके बारे में बहुत देर तक नहीं सोचता। अपनी असफलता को भूलकर आगे की योजना बनाने में जुट जाता हूं।

यह सही है कि भावनात्मक रूप से मजबूत और संतुलित इंसान ही कामयाबी हासिल करता है। इस दिशा में मैं बहुत ही व्यावहारिक इंसान हूं। मैंने अपने जीवन में वही काम किया जिसे दिल ने चाहा। इसके अलावा जो भी काम करता हूं उस पर पूरा विश्वास रखता हूं। मेरे घर का माहौल आध्यात्मिकता से परिपूर्ण है। मेरी मां भी बहुत ही आध्यात्मिक विचार रखती हैं। इसलिए मुझे अपने घर से बहुत भावनात्मक सहयोग मिलता है।

मैं इस बात पर विश्वास करता हूं कि व्यक्ति को अपने अंदर छिपे अहं भाव को त्यागना पडेगा। तभी वह किसी भी प्रकार के तनाव से मुक्त हो सकता है। किसी भी व्यक्ति को यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि वही सब कुछ है। गलती अगर मैंने की है तो उसका एहसास करता हूं अपने आपसे माफी भी मांगता हूं और अपने मन में यह प्रतिज्ञा करता हूं कि आगे से ऐसा नहीं करूंगा।

सकारात्मक दृष्टिकोण ने बनाया संतुलित

डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी, फिल्म निर्माता-निर्देशक

मैं इस बात से पूर्णत: सहमत हूं कि दुनिया में कुछ भी स्थायी नहीं है। इसी तरह मनुष्य का व्यक्तित्व भी परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है और उनके अनुरूप ही वह कभी अंतर्मुखी तो कभी बहिर्मुखी होता है। हालात के साथ सभी को बदलना पडता है। मूलत: मैं एकांत प्रिय हूं और अल्पभाषी हूं। मुझे अपने बारे में ऐसा लगता है कि मैं भावनात्मक रूप से संतुलित इंसान हूं लेकिन औरों की राय इससे अलग भी हो सकती है। हालांकि पहले मैं किसी भी बात पर तुरंत अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता था। पर धीरे-धीरे समय के साथ मैं बदलता गया। मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा था कि किसी भी बात पर तुरंत अपनी असहमति या नाराजगी जाहिर नहीं करनी चाहिए। अगर आपको अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करनी जरूरी ही लगे तो थोडा समय लेकर अच्छी तरह सोच-समझकर ही व्यक्त करनी चाहिए। अब मैं अपने अभ्यास से ऐसा ही करता हूं और इसीलिए मैं अपने आपको भावनात्मक रूप से संतुलित मानता हूं। जीवन की हर घटना से हमें कुछ न कुछ सीखने को मिलता है। उम्र के अनुभवों से अब मैं काफी शांत और संतुलित हो गया हूं। अगर कभी मेरी शूटिंग कैंसल भी हो जाती है तो उसकी वजह से मुझे तनाव नहीं होता। ऐसी स्थिति में मैं धैर्य से काम लेता हूं। अगर कभी स्थितियां बिगड भी जाएं तो मैं घबराता नहीं। ऐसी आदतें अब मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी हैं। कोई मुश्किल भी आ जाए तो मैं उससे नहीं घबराता। जहां तक प्रोफेशनल लाइफ में इमोशनल मैनेजमेंट का सवाल है तो वहां मैं हमेशा अपने दिल की बात सुनता हूं। पिछले दिनों मैंने इसी आधार पर धारावाहिक महाभारत छोडने का निर्णय लिया। इतना बडा धारावाहिक खोना मेरे ही नहीं, किसी के लिए भी बडा अवसर खोने जैसी बात है। जहां तक मेरी बात है तो इतिहास में मेरी बहुत ज्यादा रुचि है और मैं इतिहास का गहन अध्ययन करता हूं। पर इस धारावाहिक के साथ बतौर क्रिएटिव डायरेक्टर जुडने के बाद जब उसूलों के साथ समझौता करने की बात आई तो मैं वह नहीं कर पाया। मैंने पल भर में ही निर्णय लिया कि यह धारावाहिक मुझे नहीं करना। जो निर्णय मैंने ले लिया, उस पर मेरी पत्नी भी खुश हुई। जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण ने मुझे हमेशा भावनात्मक रूप से संतुलित और संतुष्ट रखा।

याद रखें यह भी

अगर आप स्वयं को भावनात्मक रूप से संतुलित रखना चाहते हैं तो विशेषज्ञों द्वारा बताए गए इन सुझावों को अपना कर देखें :

1. अपने व्यवहार पर हमेशा गौर करें किकहीं आपका व्यवहार असंतुलित तो नहीं है? अगर आपको ऐसा महसूस हो तो सहजता से अपने व्यवहार में बदलाव लाने की कोशिश करें।

2. समस्याओं से दुखी होने के बजाय उन्हें हल करने की आदत डालें।

3. घर और बाहर दोनों जगहों पर लोगों के साथ अच्छे संबंध बनाने और बिगडे हुए संबंध को सुधारने की कोशिश करें।

4. अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति पर हमेशा नियंत्रण रखें। अगर कोई आपके साथ बुरा व्यवहार भी करता है तो उस वक्त उससे कुछ न कहें, बाद में जब उसका गुस्सा शांत हो जाए तब उसे उसकी गलती का एहसास कराएं।

5. ऐसे लोगों से दोस्ती बढाएं, जिनसे बातें करके आपको खुशी मिलती है। अच्छे सामाजिक संबंध भावनात्मक संतुलन बनाने में मददगार साबित होते हैं।

6. करियर के क्षेत्र में मिलने वाली छोटी-छोटी असफलताओं को पहले से ही अपने जीवन का जरूरी हिस्सा मानकर चलें। अपनी नाकामी से निराश होने के बजाय यह संकल्प लें कि दोबारा आपके साथ ऐसा नहीं होगा।

7. अगर आप छात्र हैं या करियर बनाने की दिशा में प्रयासरत हैं तो अपनी क्षमताओं का सही मूल्यांकन करना सीखें।

8. अपनी क्षमता के अनुरूप ही परिणाम की आशा रखें। अति महत्वाकांक्षा और उसके पूर्ण न होने की स्थिति में कोई भी व्यक्ति भावनात्मक रूप से असंतुलित हो जाता है।

9. सीखने की कोई उम्र नहीं होती। अपने व्यवसाय के संबंध में निरंतर नई जानकारियां हासिल करें और काम की नई तकनीकें सीखते रहें। इससे आप स्वयं को हमेशा युवा और ऊर्जावान महसूस करेंगे।

10. अगर आपको ऐसा लगता है कि वाकई आपका भावनात्मक संतुलन बिगड रहा है तो अपने ऊपर पूरा ध्यान दें। पर्याप्त नींद लें, योगाभ्यास और ध्यान करें।

11. अपने परिवार के साथ पर्याप्त समय बिताएं। छुट्टियों में कहीं घूमने जाएं। हमेशा अच्छा सोचें। इससे आपको बहुत अच्छा महसूस होगा।

(मनोवैज्ञानिक सलाहकार डॉ.अशुम गुप्ता और करियर काउंसलर उषा एल्बुकर्क से की गई बातचीत पर आधारित)

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