कितने रियल है रिअलिटी शोज

      
कितने रियल है रिअलिटी शोज

लाखों दर्शकों के दिलों पर राज करने वाले छोटे परदे पर जो कुछ भी दिखाया जाता है, दर्शकों का उनसे गहरा जुडाव होता है। अब तक टीवी पर दिखाए जाने वाले सोप ऑपेरा (लंबे धारावाहिक) दर्शकों को अपने साथ बांधे रखते थे। दर्शक इन्हीं धारावाहिकों के साथ सोते-जागते थे। प्रतिदिन उनके मन में यह जिज्ञासा बनी रहती थी कि किस धारावाहिक में आगे क्या होगा? हम लोग, बुनियाद और शांति के साथ शुरू होने वाला यह सफर क्योंकि सास भी कभी बहू थी और कहानी घर-घर की तक पहुंच गया। चमकीली साडियों, बैकलेस ब्लाउज और गहनों से सजी-धजी स्त्रियां, पारिवारिक षड्यंत्र, पुनर्जन्म, चेहरे की प्लास्टिक सर्जरी, दुर्घटना के बाद याददाश्त जाना और फिर याददाश्त की वापसी, नायक-नायिकाओं के विवाहेतर संबंध, सास की तनी भृकुटियां, ननद की कुटिल मुसकान और सुबकती बहू.. लगातार यही सब देखते हुए दर्शकों को उबासी आने लगी। फिर टीवी के दर्शक को चैनल बदलने में पल भर की भी देर नहीं लगती। वह कुछ अलग और नया तलाशने लगा।

रास आया बदलाव

तभी रिअलिटी शोज का सिलसिला शुरू हुआ। वैसे तो कुछ म्यूजिकल टैलेंट हंट वाले रिअलिटी शोज जैसे-बुगी-वुगी, सारेगामा पहले से ही टीवी पर दिखाए जा रहे थे। उसके बाद 2006 में सोनी इंटरटेनमेंट चैनल पर पहली बार बिग बॉस आया। जिसमें जहां एक ओर दर्शकों को छोटी सेलिब्रिटीज और सोशलाइट्स के निजी जीवन में ताक-झांक करने का मौका मिला, वहीं दूसरी ओर इनके माध्यम से दोयम दर्जे के कलाकारों को अपनी पहचान बनाने का भी मौका मिला। ऐसे कार्यक्रमों का नयापन ही इनकी लोकप्रियता का मुख्य आधार बना, क्योंकि दर्शक हमेशा कुछ नया देखने को आतुर होता है। ऐसे शोज के साथ एक अच्छी बात यह भी है कि ये बहुत ज्यादा लंबे समय तक नहीं चलते और इसमें भाग लेने वाले चेहरे भी हमेशा नए होते हैं। इसलिए दर्शक इनसे बोर नहीं होते। साथ ही इनमें काफी विविधता होती है और दर्शकों का हर वर्ग इनमें से अपनी पसंद के कार्यक्रम का चुनाव कर सकता है। संगीत और नृत्य प्रेमियों के लिए कई टैलेंट हंट रिअलिटी शोज हैं, तो कॉमेडी पसंद करने वालों के लिए द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज और कॉमेडी सर्कस जैसे शोज हैं वहीं गंभीर सामाजिक मुद्दों में रुचि रखने वाले दर्शकों के लिए आपकी कचहरी किरन के साथ जैसे शो भी चल रहे हैं।

शुरू हुआ सिलसिला

इसके बाद तो टीवी चैनलों के बीच रिअलिटी शोज बनाने और दिखाने की होड-सी लग गई। आज कोई ऐसा मनोरंजन चैनल नहीं है, जिस पर कोई रिअलिटी शो न चल रहा हो। स्टार प्लस पर अमूल वॉयस ऑफ इंडिया हो या फिर कलर्स पर डांसिंग क्वीन या छोटे बच्चों का कॉमेडी शो छोटे मियां। ऐसे अनगिनत शो हर चैनल पर दिखाए जा रहे हैं। इसके अलावा दुस्साहसिक कारनामों पर आधारित रिअलिटी शो फीयर फैक्टर भी दर्शकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ। नया चैनल बिंदास भी इन दिनों अपने कुछ ऐसे ही शोज के कारण देखा जा रहा है।

उम्मीद की किरण

पारिवारिक किस्से-कहानियों वाले धारावाहिकों की शुरुआत में ही यह घोषणा की जाती है कि इस धारावाहिक की सभी घटनाएं और पात्र काल्पनिकहैं, इनसे किसी व्यक्ति के जीवन से समानता होना महज संयोग हो सकता है। जबकि इसके विपरीत रिअलिटी शो में यह दावा किया जाता है कि यह शो जीवन की स"ाइयों पर आधारित है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि किसी भी व्यक्ति को दूसरों के जीवन में झांकने में अलग ही किस्म का आनंद आता है। भले ही ऐसे शोज में वास्तविकता के साथ थोडी कल्पना और नाटकीयता का भी समावेश होता है। फिर भी मूलत: ये कार्यक्रम आम जीवन की स"ाइयों से जुडे होते हैं। इसलिए दर्शक इन्हें देखना ज्यादा पसंद करते हैं। इनके प्रतिभागियों में वे अपना चेहरा ढूंढते हैं। उनकी खुशियों और गम को वे खुद शिद्दत के साथ महसूस करते हैं।

खास तौर से टैलेट हंट वाले रिअलिटी शोज के माध्यम से आम भारतीय युवाओं को ऐसा मंच मिला है,जिसके माध्यम से वे अपने सपनों को साकार कर सकते हैं। प्रतिभावान और बेरोजगार युवाओं को आशा की नई किरण नजर आई कि वे भी इंडियन आइडल के अभिजीत सावंत या एम टीवी रोडीज और बिस बॉस पार्ट-2 के आशुतोष कौशिक की तरह विजेता बन कर नाम और पैसा दोनों कमा सकते हैं। उनकी यह आशा किसी हद तक सच भी साबित हुई।

सवालों के जवाब

फिर भी सच्चाई यह है कि रिअलिटी शोज विवादों से अछूते नहीं हैं। समय-समय पर लोगों द्वारा इनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। कभी प्रतिभागी और निर्णायक एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हैं तो कभी इनमें दिखाए जाने वाले किसी दृश्य को लेकर ही विवाद हो जाता है। इन विवादों में कितनी स"ाई है, ऐसे कार्यक्रमों में कितनी असलियत और कितनी नाटकीयता है, प्रतिभागियों के क्या अनुभव रहे, जजों द्वारा निर्णय लेने में कितनी ईमानदारी बरती जाती है, इत्यादि। दर्शकों के मन में उठने वाले ऐसे ही कई सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश की गई है- रिअलिटी शोज के निर्माताओं, प्रतिभागियों, निर्णायकों और इनसे जुडे कई अन्य लोगों के विचारों के माध्यम से।

युवाओं के लिए बेहतर मौका

निरेत अल्वा, रिअलिटी शो प्रोड्यूसर

जब मैंने इंडियन आइडल की शुरुआत की तो लोगों ने इसे काफी पसंद किया। इसने प्रतिभावान युवाओं एक ऐसा मंच दिया, जिसके माध्यम से वे लोगों को अपनी प्रतिभा दिखा सकें। ऐसे शोज में शामिल होने वाले युवाओं को लगभग तीन-चार महीने तक घर से दूर रहना पडता है। उनके ऊपर किसी तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव न हो, इसलिए उन्हें फोन से घर पर बात करने की सुविधा भी दी जाती है। लेकिन हम उन पर थोडा नियंत्रण भी रखते हैं। ताकिवे अपना ध्यान सिर्फलक्ष्य पर ही केंद्रित कर सकें। हालांकि आज की युवा पीढी बहुत ज्यादा जागरूक है और प्रतिभागी पूरी तैयारी के साथ शो में आते हैं। फिर भी हमारे पास कई अच्छे ट्रेनर मौजूद हैं, जो उन्हें संगीत सिखाने के अलावा कैमरे के सामने बोलने, फिटनेस और पर्सनालिटी ग्रूमिंग की ट्रेनिंग देते हैं। अपने प्रतिभागियों को हम उनके व्यक्तित्व की मौलिकता बरकरार रखने की सलाह देते हैं। उन्हें यह बताया जाता है कि शुरुआत में वे जैसी वेशभूषा में दर्शकों के सामने उपस्थित होते हैं, उन्हें आगे भी अपना पहनावा और मेकअप वैसा ही रखना चाहिए। तभी दर्शकों के बीच उनकी अलग पहचान कायम होगी।

आजकल रिअलिटी शोज की रिअलिटी पर अकसर सवाल उठाए जाते हैं तो इस संबंध में मैं दूसरे कार्यक्रमों के बारे में तो कुछ नहीं कह सकता, लेकिन जहां तक मेरे शो इंडियन आइडल की बात है, हमारी पूरी कोशिश होती है कि इसमें किसी भी तरह का बनावटीपन हो। हमारे यहां सिर्फ एंकर के लिए स्क्रिप्ट तैयार की जाती है, लेकिन निर्णायकों और प्रतिभागियों के लिए कोई स्क्रिप्ट नहीं होती। हां, कार्यक्रम शुरू होने से पहले उन्हें संक्षेप में यह जरूर समझाया जाता है कि उन्हें कैमरे के सामने क्या और कैसे बोलना चाहिए। पर बोलने पर बंदिश नहीं लगाई जाती।

जहां तक निर्णायकों के बीच बहस-मुबाहिसे का सवाल है तो उनके बीच जो भी बहस होती है वह व्यक्तिगत नहीं, बल्कि वैचारिक संदर्भ में स्वाभाविक होती है। कभी-कभी जब यह बहस ज्यादा हो जाती है तो हमें उसकी थोडी-बहुत एडिटिंग भी करनी पडती है। पर जहां तक संभव हो हमारी कोशिश यही होती है कि हम कम से कम एडिटिंग करें ताकि दर्शकों के सामने रिअलिटी शो अपने रिअल रूप में नजर आए।

निर्णायक को होना चाहिए निष्पक्ष

हेमा मालिनी, अभिनेत्री

बहरहाल पिछले दो-तीन वर्षो से छोटे पर्दे पर रिअलिटी शोज की जो बाढ सी आ गई है, उसे देखकर मुझे ताज्जुब भी हुआ कि एक साथ एक जैसे कितने कार्यक्रम आ जाते हैं। डांसिंग क्वीन में जज बनने के लिए भी मुझे काफी सोचना पडा। क्योंकि जिस तरह का डांस कलर्स चैनल के डांसिंग क्वीन शो में हो रहा है, जाहिर-सी बात है कि वह न तो क्लासिकल डांस है और न ही फोक। पर मुझसे कहा गया कि मैं डांस के किसी भी रूप पर अधिकार रखती हूं। इसलिए मुझे इस कार्यक्रम में निर्णायक की भूमिका निभानी चाहिए।

मैं अपने रिअलिटी शो डांसिंग क्वीन के बारे में कह सकती हूं कि जो भी इस शो में दिखाया गया है, वह टीआरपी बढाने का फॉर्मूला कभी नहीं, बल्कि शो का ही हिस्सा होता है। डांसिंग क्वीन में मेरे साथ जितेंद्र भी जज की भूमिका में हैं। मेरी राय में जो भी जज की कुर्सी पर विराजमान होगा, वह अपने काम में काबिल तो होता ही है। तभी तो उसे जज बनाया जाता है। पर यह भी जरूरी नहीं कि निर्णायक किसी भी प्रतिभागी पर कुछ ऐसी टिप्पणी करें जिससे वह हमेशा के लिए हताश हो जाए। जब वांछित परिणाम नहीं मिलता तो प्रतिभागी का निराश होना स्वाभाविक होता है। ऐसे में जज का काम होता है कि वह उसके परफॉर्मेस के बारे में उसे सही सुझाव दे। लेकिन उन्हें अपने पद की प्रतिष्ठा और शिष्टाचार का भी ध्यान रखना चाहिए और मैं भी इसका हमेशा खयाल रखती हूं। मैं इस मुद्दे पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहती कि किसी रिअलिटी शो में जज किसी प्रतिभागी के प्रति जरूरत से ज्यादा उदार या कठोर क्यों हो जाते हैं? फिर भी इतना जरूर कहूंगी कि निर्णायक को हमेशा निष्पक्ष होना चाहिए।

अब तक मैंने जितने भी रिअलिटी शो देखे हैं, उनमें मुझे इंडियन आइडल के जावेद साहब सबसे ज्यादा निष्पक्ष लगे। उन्होंने किसी भी प्रतिभागी को बहुत बुरा नहीं कहा और न ही किसी को अपमानित किया।

जहां तक जज के रूप में मेरी भूमिका का सवाल है तो इस बारे में कोई दूसरा ही बता सकता है। लेकिन इतना जरूर है कि मैं लोकप्रियता पाने के लिए किसी भी तरह के हथकंडे अपनाने के सख्त खिलाफ हूं।

एक नजर मनोवैज्ञानिक की

रिअलिटी शोज में भाग लेने वाले लोगों को यह मालूम होता है कि उनके आसपास कैमरा लगा है। इसलिए अनजाने में ही सही वे अपना असली व्यक्तित्व छिपा ले जाते हैं। दरअसल उनका रिअल सेल्फ सूडो सेल्फ में तब्दील हो जाता है। वे कैमरे के सामने अपना सूडो सेल्फ ही प्रकट करते हैं और अपना असली व्यक्तित्व भूल जाते हैं। वे इस झूठ को ही सच्चाई मान लेते हैं। शो से बाहर आने के बाद जब उनका सूडो सेल्फ रिअल सेल्फको नकारने लगता है तो उनके जीवन में अस्थिरता आ जाती है। बिग बॉस पार्ट-2 के प्रतिभागी राजा चौधरी भी ऐसी ही समस्या के शिकार हुए हैं। पिछले दिनों कोलकाता के एक रिअलिटी शो में जज द्वारा बुरी तरह फटकारे जाने के कारण एक बच्ची को ऐसा गहरा सदमा लगा कि उसकी आवाज बंद हो गई और उसके हाथ-पैरों ने भी काम करना बंद कर दिया। इस मनोवैज्ञानिक समस्या को हिस्टेरिक आउट ब्रेक कनवर्जन रिएक्शन कहा जाता है। रिअलिटी शो में भाग लेने वाले बच्चों के परिवार वाले भी बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं। मैं कई ऐसे परिवारों को जानती हूं, जिनके बच्चों ने रिअलिटी शोज में भाग लिए थे और जब वे असफल हुए तो पडोसियों के सवालों से परेशान होकर उन्होंने अपने मकान बदल लिए और रहने के लिए किसी ऐसी जगह चले गए जहां पहले से उन्हें कोई नहीं जानता था। इसलिए ऐसे शोज में बच्चों के भाग लेने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। साथ ही शो में भाग लेने वाले हर प्रतिभागी का किसी अच्छे क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से साइको-डाइग्नॉस्टिक इवैल्यू एशन जरूर करवाना चाहिए ताकि उसके व्यक्तित्व की खूबियों-खामियों का पता लगाने के बाद ही उसे शो में शामिल किया जाए।

डॉ. जयंती दत्ता, मनोवैज्ञानिक सलाहकार, दिल्ली

(लेखिका कई रिअलिटी शोज के प्रतिभागियों के लिए काउंसलिंग कर चुकी हैं।)

पारदर्शिता नहीं है इनमें

सुधीश पचौरी, मीडिया विश्लेषक

रिअलिटी शोज की अवधारणा पश्चिमी देशों से आयातित है और यह भारतीय संस्कृति के फ्रेम में फिट नहीं बैठती। पश्चिम की नजर से देखने वाले लोग ऐसा समझते हैं कि भारतीय दर्शकों को कुछ भी दिखा दो, कोई फर्क नहीं पडता। लेकिन ऐसा नहीं है। कार्यक्रम हो या सरकार, पसंद नहीं आने पर यहां की जनता उसे सिरे से नकार भी देती है। टीवी पर जितने भी शोज चलाए जाते हैं, उनमें कहीं कोई पारदर्शिता नहीं है। कार्यक्रम बनाने वाले लोग सिर्फ अपना फायदा देखते हैं। किसी टीवी चैनल ने कभी यह सर्वेक्षण कराने की जरूरत नहीं समझी कि दर्शक वास्तव में क्या देखना चाहते हैं? ऐसे शोज के एसएमएस का अपना अलग अर्थशास्त्र है। इनके माध्यम से ऐसे लोगों को पहचान बनाने माका दिया जाता है, जिन्हें न तो कोई जानता है और न ही जिनमें कोई काबिलीयत है। बिग बॉस पार्ट-2 इसका सबसे बडा उदाहरण है। कुछ शोज में प्रतिभागियों को जिस तरह डांटा-फटकारा जाता है, वह सर्वथा अनुचित है। इससे उनके व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव पडता है।

स्वाभाविक है विवाद

शान, गायक एवं एंकर

रिअलिटी शो अमूल वॉयस ऑॅफ इंडिया के लिए एंकरिंग करते हुए मैं बहुत गर्व महसूस करता हूं । लेकिन कुछ अरसे से ऐसे शोज में जिस तरह से नई फिल्म के प्रमोशन के लिए मंच पर फिल्मी सितारों के आने का सिलसिला शुरू हुआ है, उसकी वजह से सबका ध्यान कलाकारों के बजाय उनकी तरफ रहता है। जब तक वे मंच पर होते हैं शो की टीआरपी अच्छी चलती है और उनके जाते ही शो की टीआरपी कम हो जाती है। सेलिब्रिटीज की उपस्थिति में परफॉर्म कर रहे प्रतिभागियों का सही ढंग से आकलन नहीं हो पाता।

हर शो का एक कॉन्सेप्ट होता है। हम उसी के तहत काम करते हैं। दो निर्णायकों के बीच जब मत नहीं मिलते तो उनके बीच वाद-विवाद होना स्वाभाविक है। अगर हम उस हिस्से को संपादित कर देंगे तब शो ज्यादा बनावटी नजर आएगा। आदेश श्रीवास्तव, इस्माइल दरबार, अनु मलिक, अभिजीत और जावेद साहब ऐसे जज हैं, जो अपनी प्रतिक्रिया बेहद तीखे अंदाज में व्यक्त करते हैं। दरअसल उनका स्वभाव ही ऐसा है कि वे गलत बातों को बर्दाश्त नहीं कर सकते।

किसी प्रतिभागी को शो से बाहर जाने का आदेश देते हुए मेरी आंखें भर आती हैं। मगर क्या करूं? यह मेरे प्रोफेशन का हिस्सा है। अब तो आदत सी पड गई है।

मुझे यह देखकर बहुत खुशी होती है, जब असम, उत्तर प्रदेश या बिहार के छोटे गांव और कस्बों से बेहद प्रतिभाशाली लोग इस मंच पर परफॉर्म करते हैं। शुरुआत में ऐसे प्रतिभागी थोडे संकोची और सहमे हुए से रहते हैं। पर ज्यों-ज्यों वे प्रतियोगिता में आगे बढते जाते हैं, उनकी झिझक खत्म होती जाती है। गाने के अभ्यास के साथ वे अपने पहनावे और लुक पर भी ध्यान देते हैं। लेकिन मैं चैनल के लोगों से यह कहना चाहूंगा कि शो के प्रमोशन के लिए जिस तरह से प्रतिभागियों को शहर-शहर में घुमाकर भीड जुटाई जाती है, वह भी सही नहीं है। अपने चारों ओर इतनी भीड की उन्होंने कभी कल्पना नहीं की होती है। वे समझते हैं कि अब तो हम स्टार बन गए हैं। इससे उनमें अहंकार आ जाता है और वे अपने अभ्यास पर ध्यान देना बंद कर देते हैं। अमूल वॉयस ऑफ इंडिया मेंएकमात्र प्रतिभागी इश्मित ही ऐसा था, जो हमेशा संतुलित बना रहा। लेकिन अफसोस कि जब कुछ हासिल करने का अवसर आया तो ईश्वर ने उसे अपने पास बुला लिया।

कोई प्रतिबंध नहीं प्रतिभागियों पर

रघु-राजीव, संचालक एम टीवी रोडीज

सबसे पहले तो मैं सभी को यह स्पष्ट रूप से बता देना चाहूंगा कि हमारा यह प्रोग्राम किसी विदेशी शो का रिमेक नहीं है। यह हमारे दिमाग की उपज है, जिसमें मनोरंजन के साथ कुछ रोमांच भी है। यह एकदम अलग तरह का शो है। इसके लिए हमें ऐसे प्रतिभागी की जरूरत होती है जो हर चुनौती को स्वीकारने का साहस रखता हो। हम आम लोगों के बीच से ही मनोरंजन निकालने की कोशिश करते हैं। हम अपने शो में किसी सेलिब्रिटी को नहीं लेते। जहां तक एम टीवी रोडीज में अपशब्दों से भरी भाषा के इस्तेमाल का सवाल है तो मैं इससे इंकार नहीं करता। दरअसल शो में जिस असभ्य भाषा का प्रयोग होता है वह हमारे कॉन्सेप्ट का हिस्सा नहीं होता। हम किसी प्रतिभागी से यह नहीं कहते कि वह किसी को गालियां दे या किसी के साथ गलत व्यवहार करे। लेकिन हम ऐसे हालात जरूर बनाते हैं, जिनमें प्रतिभागी के व्यक्तित्व का असली रूप बाहर निकलकर सामने आ सके और वह अपनी स्वाभाविक प्रतिक्रिया जाहिर कर सके। इस दौरान अगर कोई चाहे गालियां देया हाथापाई करे हम उन पर किसी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाते। हां, यह एक ऐसा लोकप्रिय शो है, जिसे परिवार के सभी सदस्य देखना पसंद करते हैं, इसलिए हम प्रतिभागियों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले अपशब्दों की जगह बीप बजाते हैं। इससे दृश्य की वस्तुस्थिति भी दर्शकों से छिपी नहीं रहती और साथ ही परिवार के सभी सदस्य एक साथ बेझिझक होकर शो का लुत्फ उठा पाते हैं। हर आयु वर्ग के लोगों के बीच यह शो समान रूप से लोकप्रिय है।

हम दोनों भाइयों के साथ मिलकर एंकरिंग करने पर भी कई तरह के सवाल उठाए जाते हैं। दरअसल जुडवां होने के नाते हमारे विचारों में काफी सामानता है। हम दोनों मिलकर प्रोडक्शन हाउस चला रहे हैं। कार्यक्रम को बेहतरीन बनाने के लिए हम अकसर सलाह-मशविरा करते हैं। हमने यह महसूस किया है कि जिस काम को साथ मिलकर करते हैं, उसका रिजल्ट हमेशा अच्छा होता है। हमारी शक्लें इतनी ज्यादा मिलती हैं कि प्रतिभागी भी हमसे सवाल कर बैठते हैं कि हममें से कौन रघु है और कौन राजीव? सेलेक्शन के समय अकसर प्रतिभागी सवालों का जवाब देते समय हम पर नजर गडाए रहते हैं कि हम नजरें बचाकर कहीं एक-दूसरे से अपनी जगह न बदल लें। यही देखते हुए हमने साथ संचालन करने का निर्णय लिया।

मौलिकता की कमी है इनमें

सिद्धार्थ बसु, प्रमुख, सिनर्जी एडलैब्स मीडिया लिमिटेड

मेरे विचार से फिक्शन के अलावा जितने भी टीवी प्रोग्राम हैं उन्हें रिअलिटी शो कहना अनुचित है। दरअसल इस शब्द की गलत व्याख्या की जाती है। कोई क्विज, गेम शो, टैलेंट शो या टॉक शो असल में रिअलिटी शो नहीं होता। अंतरराष्ट्रीय रूप से आम मनोरंजन के उन कार्यक्रमों को रिअलिटी शो कहा जाता है, जिन्हें बनाने के लिए डॉक्यूमेंट्री तकनीक प्रयोग में लाई जाती है। जैसे-ब्रिटेन और अमेरिका में दिखाया जाने वाला शो बिग ब्रदर्स सही मायने में रिअलिटी शो था। इसी तरह अपने देश में झलक दिखला जा और इंडियन आइडल जैसे शो में कुछ डॉक्यूमेंट्री की तकनीकों का प्रयोग करके, जिस तरह प्रतिभागियों के जीवन की असली कहानियां दिखाई जाती हैं, वे इन टैलेंट शोज की रिअलिटी सेगमेंट होती हैं। परदे पर जज या प्रतिभागियों केबीच झगडे दिखाए जाने भर से कोई भी कार्यक्रम रिअलिटी शो नहीं बन जाता। आज भारत में टीवी पर बडी तादाद में ऐसे शोज दिखाए जाते हैं। फिर भी इनमें नएपन और मौलिकता की कमी दिखाई देती है। इसके बावजूद रिअलिटी पर आधारित शो इसलिए पसंद किए जाते हैं क्योंकि असलियत बनावटीपन से कहीं ज्यादा आकर्षक होती है। साथ ही इनमें जिंदगी की सच्चाई को उसकी बारीकियों के साथ बहुत करीब से दर्शाया जाता है।

लोकप्रियता के नजरिये से अगर देखें तो सच्चाई यह है कि इस साल भारत में किसी भी नॉन फिक्शन शो ने कहानियों वाले धारावाहिक जितनी लोकप्रियता की रेटिंग हासिल नहीं की। इस वर्ष सबसे ज्यादा देखे जाने वाले कार्यक्रमों में एकमात्र कार्यक्रम, जो औसत संख्या में दर्शक जुटाने में सफल रहा- वह है हमारे द्वारा तैयार आपकी कचहरी किरन के साथ। इस वर्ष इस शो की टीआरपी किसी भी फिल्म स्टार द्वारा संचालित किए गए प्रोग्राम या किसी नाच-गाने वाले शो से ज्यादा रही है। मैं समझता हूं कि दुनिया में जो भी सबसे अच्छा है उसे पाने का हकदार हर भारतीय दर्शक है। वैसे भी रिअलिटी शोज के विदेशी प्रारूप यहां तभी सफल हो सकते हैं, जब इनका ठीक ढंग से भारतीयकरण किया जाए। लेकिन सही ढंग से तैयार नहीं किए जाने पर ऐसे शोज ज्यादातर विफल होते हैं।

नुकसान छोटे शहर की होने का

प्रियंका नेगी, प्रतिभागी इंडियन आइडल

मुझे लगता है कि रिअलिटी शोज में इंडियन आइडल सबसे रिअल है। इसमें जो होता है वही दिखाया जाता है। इसके लिए प्रतिभागियों या निर्णायकों को कोई स्क्रिप्ट नहीं दी जाती। परदे पर जो कुछ भी दिखाया जाता है। काफी हद तक वैसा ही घटता है। हां, खराब कमेंट मिलते हैं तो बुरा जरूर लगता है।

मुझे इंडियन आइडल में दोबारा भाग लेने का माका मिला यह मेरा सौभाग्य है। मुझे बहुत ही अच्छा लगा। पिछले साल मैं अनट्रेंड थी। अब मुझमें काफी बदलाव आ गया है। पिछले साल मैं थियेटर राउंड से ही आउट हो गई थी। इस बार भी मुझे पूरी उम्मीद थी कि मैं निर्णायकों की कसौटी पर खरी उतरूंगी पर इस बार भी आउट हो गई। लेकिन मैं निर्णायकों की आलोचना को सकारात्मक रूप से लेती हूं। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि उनमें से किसी ने भी मेरे लिए कोई ऐसा कमेंट किया हो जिससे मेरा आत्मविश्वास कमजोर पडा हो। मुझे लगता है कि निर्णायक गुरु की तरह हमें गाइड करते हैं। शो खत्म होने के बाद निर्णायक हमें बताते हैं कि हमें कहां-कहां पर सुधार करने की जरूरत है। वे सीखने में हमारी मदद भी करते हैं। दूसरी बार भी इस शो से आउट होने पर शुरू में मुझे ऐसा जरूर लगा कि मेरे साथ बहुत गलत और बुरा हुआ है। लेकिन अब लगता है कि मुझे और अधिक अभ्यास की जरूरत है।

दरअसल इस बार मुझे दर्शकों के कम वोट मिले इसलिए मुझे शो से बाहर होना पडा। ऐसे शोज में बडे शहरों में रहने वाले प्रतिभागियों को ज्यादा वोट मिलते हैं, क्योंकि वहां मोबाइल फोन का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या ज्यादा होती है। मैं देहरादून जैसे छोटे शहर से थी, इसलिए मेरा नुकसान हो गया। मेरा मानना है कि प्रतिभागी के चुनाव में जनता के वोटों और निर्णायकों के मत दोनों को समान रूप से महत्व दिया जाना चाहिए।

मुझे पूरा विश्वास था कि इस बारइंडियन आयडल-4 का खिताब मुझे ही मिलेगा। लेकिन अब तो मैं प्रतियोगिता से बाहर हो चुकी हूं। इसकेबाद मैं अपना ग्रेजुएशन पूरा करूंगी। इसके अलावा चैनल के साथ एग्रीमेंट होने के नाते उसके द्वारा बुलाने पर मुझे शोज में भी शामिल होना पडेगा। इसके अलावा मेरे लिए टी सीरीज कंपनी के साथ एक म्यूजिकल एलबम का भी कांट्रेक्ट है।

रिअलिटी नहीं, रणनीति शो

आशुतोष कौशिक, विजेता बिग बॉस पार्ट 2

बिग बॉस पार्ट-2 का शुरुआती शांत माहौल देखकर लगा था कि यहां वक्त गुजारना बहुत मुश्किल नहीं होगा। लेकिन समय के साथ बिग बॉस के हाउस के सदस्यों के शातिर दिमाग की पोल खुलती गई। किस तरह मुझसे प्यार-मोहब्बत से बातें करने वाले लोग कॉन्फ्रेंस रूम में मेरे ही खिलाफ वोट करते और मेरी कमियों का ब्योरा देते। धीरे-धीरे मैंने भी खुद को बदलना शुरू किया। मैं कहता कुछ, करता कुछ और सोचता कुछ और। उस पूरे घर में एक मात्र डायना जी थीं, जिन पर मैं भरोसा करता था। हालांकि घर के शेष सदस्यों को यह गलतफहमी थी कि हमारे बीच कुछ चक्कर है। वह मिस व‌र्ल्ड थीं और मैं ढाबे वाला, इस फर्क को मैं हमेशा ध्यान में रखता था। पहले मैं वहां ऐसी गॉसिप पर नाराजगी जाहिर करता था, लेकिन जब मैंने हर किसी को अपनी रणनीति में रमे हुए देखा तो मैंने भी डायना जी केसाथ अफेयर का नाटक शुरू कर दिया। सच कहें तो इसे रिअलिटी शो नहीं रणनीति शो कहा जाना चाहिए। शो के दौरान मैंने देबोजित से संयम में रहना सीखा और जुल्फी से खामोश रहकर अपनी रणनीति पर चलने की प्रेरणा ली। सुर्खियों में रहने के लिए कैमरे के सामने कुछ न कुछ नाटक करने की बात मैंने राहुल भैया से सीखी। बिग बॉस पार्ट-2 से पहले मैं एम टीवी रोडीज का भी विजेता रह चुका हूं। मैंने जब रोडीज का खिताब जीता था तब मुझे ऐसा लगा था कि मेरे पास बहुत सारे काम आएंगे। लेकिन लंबे समय तक मुझे कोई काम नहीं मिला। यहां तक कि मेरे पास रहने के लिए भी जगह नहीं थी। दोस्तों की मेहरबानी से मुझे सर छिपाने की जगह मिल गई थी। हां, रोडीज का विजेता होने के नाते मुझे बिग बास पार्ट-2 में एंट्री जरूर मिल गई। लेकिन संघर्ष के उन पलों को मैं भूला नहीं था। मैं इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार था कि अगर मैं बिग बास पार्ट-2 का खिताब जीतूंगा तो भी काम पाने के लिए मुझे संघर्ष करना ही पडेगा। इन दिनों मैं वही कर रहा हूं।

प्रस्तुति : मुंबई से राजेश श्रीवास्तव एवं पूजा सामंत, दिल्ली से इला श्रीवास्तव एवं विनीता

विनीता
 
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