जिनके बिना जिंदगी है अधूरी

      
जिनके बिना जिंदगी है अधूरी

यह उक्ति बहुत पुरानी है कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है। लेकिन कोई भी इंसान अपने जीवन में यूं ही सफल नहीं हो जाता। सफलता की कहानी बहुत लंबी और मुश्किलों से भरी होती है। भारतीय समाज की यह मान्यता है कि जीवन के हर मोड पर आने वाली मुश्किलों को आसान करने के लिए ही प्रकृति ने स्त्री की रचना की। वह जीवनदायिनी मां बन कर उसे अपने आंचल की छांव तले बारिश की बूंदों और धूप की तपिश से बचाती है। इंसान पहली बार मां की उंगली थामकर ही चलना सीखता है। चलते हुए जब भी उसके कदम लडखडाते हैं, मां आगे बढकर उसे थाम लेती है। इसी तरह स्नेह वत्सला बहन के रूप में वह अपने हिस्से की सारी खुशियां भाई पर कुर्बान करने को तैयार रहती है। इसके बाद जब वह युवावस्था में प्रवेश करता है तो स्त्री जीवन के सफर में न केवल उसकी हमकदम बन कर साथ चलती है, बल्कि उसे जिंदगी जीने का सलीका भी सिखाती है। कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहीं लिखा है कि अगर स्त्री न होती तो पुरुष का जीवन किसी हिंसक पशु की तरह होता।

इस संबंध में अपराध मनोविज्ञान पर काफी काम कर चुकी मनोवैज्ञानिक डॉ. जयंती दत्ता का निष्कर्ष है, मैंने पाया है कि जितने भी हिंसक अपराधी थे, उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि में कहीं न कहीं स्त्री की अनुपस्थिति जरूर थी। जिसके कारण उनका जीवन दिशाहीन हो गया और सही मार्गदर्शन के अभाव में उन्होंने अपराध की दुनिया की ओर कदम बढाया।

जीना सिखाया मां ने

पुरुष की जिंदगी को संवार कर स्त्री उसे सुव्यवस्थित बनाती है। स्त्री की जिजीविषा और उसकी संघर्ष करने की शक्ति जीवन के हर कदम पर पुरुष को संबल देती है। पेशे से आर्किटेक्ट दिवाकर घोष कहते हैं, हम पांच भाई-बहन हैं और मैं उनमें सबसे बडा हूं। जब मैं मात्र दस वर्ष का था तब कैंसर से मेरे पिता की मृत्यु हो गई थी। मेरी मां एक स्कूल में टीचर थीं और पिता एक निजी कंपनी में नौकरी करते थे। बचत की सारी जमा पूंजी पिता जी के इलाज में खर्च हो गई। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भी मां ने हिम्मत नहीं हारी। हमारी परवरिश के लिए उन्होंने कभी किसी रिश्तेदार के आगे हाथ नहीं फैलाया, बल्किअकेले अपने बलबूते पर हमें अच्छी से अच्छी शिक्षा और संस्कार दिए। हमें आत्मसम्मान के साथ सिर उठा कर जीना सिखाया। आज हम सब अपने करियर और जीवन में सुव्यवस्थित हैं तो ऐसा सिर्फ मां की वजह से ही संभव हो पाया। कभी-कभी मेरे मन में यह सवाल उठता है कि अगर मेरी मां अपने पांच छोटे बच्चों को छोड कर दुनिया से चली जाती तो क्या मेरे पिता नौकरी करते हुए इतनी अच्छी तरह अकेले हमारा पालन-पोषण कर पाते?

गहरा भावनात्मक लगाव

यह मशहूर मनोवैज्ञानिक सिग्मंड फ्रायड का निष्कर्ष है कि बेटे भावनात्मक रूप से पिता की तुलना में अपनी मां के ज्यादा करीब होते हैं। इसलिए उनके जीवन पर मां की शिक्षा और संस्कारों का बहुत गहरा प्रभाव रहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने एक इंटरव्यू में कहा था, अपनी मां से मुझे हमेशा दूसरों का खयाल रखने और सच्चाई पर अडिग रहने की शिक्षा मिली। आज मैं जो कुछ भी हूं सिर्फ मां की वजह से ही हूं। परिवार में स्त्री की उपस्थिति और भागीदारी ज्यादा होती है। इसलिए बच्चों पर उसका प्रभाव निश्चित रूप से ज्यादा पडता है। इस संबंध में मशहूर कोरियोग्राफर शामक दावर कहते हैं, मैं बचपन से ही अपनी दादी नादिया जी के व्यक्तित्व से सबसे ज्यादा प्रभावित था। मेरी दादी पुरानी फिल्मों की अभिनेत्री थीं और बहुत अच्छा डांस करती थीं। उस जमाने में भी वह स्टंट दृश्य स्वयं किया करती थीं। इसीलिए वह फीयरलेस नादिया और नादिया हंटरवाली के नाम से मशहूर थीं। उन्हीं के कारण मेरे मन में डांस के प्रति रुचि पैदा हुई और आज मैं कोरियोग्राफर बन पाया। मम्मी का भी मेरे व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पडा।

साथ जीवनसंगिनी का

अगर मेरे जीवन में कविता (काल्पनिक नाम) न आती तो मैं शायद आज जीवित न होता। ऐसा कहना है कि एक वरिष्ठ साहित्यकार का, जो युवावस्था के दिनों वामपंथी आंदोलन में सक्रिय भागीदार थे। अव्यवस्थित जीवनशैली और शराब की लत के कारण उनकी शारीरिक और मानसिक दशा बहुत दयनीय हो गई थी। लेकिन तभी उनकी मुलाकात कविता नाम की एक ऐसी लडकी से हुई, जिसने उनकी अस्त-व्यस्त जिंदगी को संवार कर खुशियों से भर दिया। आज वह अपनी पत्नी और बच्चों के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। किसी स्त्री में ही इतनी कूवत होती है कि वह अपने पति की भटकी हुई जिंदगी को नई दिशा दे सके।

भावनात्मक संबल देती है स्त्री

प्रकृति ने जहां पुरुष को शारीरिक रूप से मजबूत बनाया है, वहीं उसने स्त्री को भावनात्मक बल प्रदान किया है। कुछ तो कुदरती तौर पर स्त्रियों में सहनशक्ति ज्यादा होती है और कुछ हद तक बचपन से ही उनकी परवरिश इस तरह की जाती है कि वे हर आघात को न केवल आसानी से सहन कर लेती हैं बल्कि उसके सदमे से बहुत जल्दी उबर भी जाती हैं। अगर देश में प्रतिवर्ष होने वाले आत्महत्या के आंकडों को देखा जाए तो सन 2006 में कराए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश में प्रतिवर्ष कुल 10.5 प्रतिशत लोग आत्महत्या करते हैं और इसमें सिर्फ 4 प्रतिशत स्त्रियां होती हैं। आपने शायद ही कभी सुना होगा कि जीवन की असफलताओं से निराश होकर कोई स्त्री नशे जैसे किसी दु‌र्व्यसन का सहारा लेती है। स्त्री का व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा होता है कि जैसे-जैसे उसके सामने मुश्किलें आती हैं, उनका सामना करके उसका आत्मविश्वास बढता जाता है। फिर इससे उसका व्यक्तित्व पहले की तुलना में ज्यादा मजबूत हो जाता है। तभी तो वह न केवल स्वयं डटकर मुसीबतों का सामना करती है बल्कि मां, बहन, पत्नी और बेटी के रूप में पुरुष को भी भावनात्मक सहारा देती है।

स्त्री ही संजोती है रिश्तों को

परिवार के भीतर सभी रिश्तों को संभालने-संजोने, बच्चों की अच्छी परवरिश, पति और परिवार के सभी सदस्यों की देखभाल की जिम्मेदारी स्त्री ही निभाती है। स्त्री रिश्तों की बारीकियां अच्छी तरह समझती और उन्हें निभाना भी जानती है। इस संबंध में डॉ. जयंती दत्ता आगे कहती हैं, बच्चों के समाजीकरण में भी मां की अहम भूमिका होती है। किसी भी बच्चे को पहली बार सही और गलत की पहचान करना मां ही सिखाती है। इसलिए मां के व्यक्तित्व का बच्चे पर सबसे ज्यादा प्रभाव पडता है। बहन के रूप में वह अपने भाई के लिए फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड की भूमिका निभाती है। स्त्री का व्यक्तित्व बहुआयामी होता है। वह कुक, मैनेजर, नर्स, सलाहकार, दोस्त, पत्नी, मां और बेटी के रूप में अलग-अलग परिस्थितियों में अपनी सक्रिय भागीदारी से पुरुष के जीवन को सहारा देती है। स्त्री में जन्मजात रूप से एक अच्छे मनोवैज्ञानिक के गुण मौजूद होते हैं। इन्हीं गुणों के कारण वह जीवन के हर मोड पर पति, बेटे या भाई को भावनात्मक संबल दे पाती है। कोई भी स्त्री पति का चेहरा देखकर पल भर में ही यह जान लेती है कि आज उनका मूड ठीक नहीं है। पुरुष को अपने बाहरी जीवन में जो भी तनाव झेलना पडता है अपने सकारात्मक दृष्टिकोण से स्त्री उस तनाव के असर को कम कर देती है।

स्त्री अलग-अलग रूपों में पुरुष का जीवन संवारती रहती है। चाहे आम इंसान हो या मशहूर हस्तियां, सभी के जीवन को सफल बनाने में उनके परिवार की किसी न किसी स्त्री का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता के शीर्ष पर विराजमान पुरुष स्वयं बता रहे हैं, उन स्त्रियों के बारे में जिन्होंने उनके जीवन को सफल बनाया।

जीवनसंगिनी ने दिया हमेशा साथ

उदित नारायण, गायक

मेरी मां भुवनेश्वरी देवी गांव की बहुत सीधी-सरल स्त्री थीं। मेरा मानना है कि आज मैं जो कुछ भी हूं, उन्हीं के आशीर्वाद से हूं। मां के बाद मैं विशेष रूप से अपनी बडी बहन इंदिरा दीदी का जिक्र करना चाहूंगा, जिनकी आज से अठारह साल पहले कैंसर से मृत्यु हो चुकी है। मेरी एक ही बहन थी और उसे खोने का मुझे बेहद दुख है। दीदी की शादी के वक्त मैं पांच वर्ष का था। मेरे पिता श्री हरिकृष्ण झा पेशे से किसान थे, उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वह मुझे पढा सकें। मेरी दीदी की शादी बिहार के एक संपन्न परिवार में हुई थी। इसलिए उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर, वहीं स्कूल में मेरा एडमिशन करवा दिया और दस वर्षो तक मेरी पढाई का सारा खर्च खुद उठाया। वह मुझसे बेहद प्यार करती थीं और मेरे लिए तो मां समान थीं। मुझे याद है कि वह गांव में सबकी मदद के लिए हमेशा तैयार रहती थीं।

इसके बाद मेरी जिंदगी में जीवनसंगिनी दीपा का आगमन हुआ। अकसर ऐसा कहा जाता है सुख में हर कोई साथ देता है मगर असली साथी वही है जो दुख और संघर्ष के दिनों में भी साथ निभाए। आज मैं सफलता के जिस मुकाम पर हूं मुझे वहां तक पहुंचाने में सबसे बडा योगदान मेरी पत्नी दीपा का है। मुझे याद है संघर्ष के दिनों में एक बार उसने मुझसे कहा था, अगर तुम जीवन में सफल नहीं भी हुए तब भी मैं तुम्हारा साथ कभी नहीं छोडूंगी। जब भी मैं उन दिनों के बारे में सोचता हूं तो न चाहते हुए भी मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं। जीवन में यूं तो हर किसी का सहारा होता है लेकिन पत्नी का सहारा सबसे अधिक होता है। अगर अच्छी पत्नी मिल जाए तो जिंदगी खुशियों से भर जाती है। इनके अलावा मैं आदर्श स्त्री के रूप में लता दीदी का नाम जरूर लेना चाहूंगा। भले ही उनके साथ मेरा खून का रिश्ता नहीं है, लेकिन वह मेरी आदर्श हैं। उनकी सुरीली आवाज ने ही मुझे गायक बनने के लिए प्रेरित किया। हमारे गांव में जब भी शादी होती थी बारात बैलगाडी में आती थी। मुझे याद है कि एक बार मेरे गांव में बारात आई थी, जिसमें बैलगाडी पर लता दीदी का गाया गीत नगरी-नगरी द्वारे-द्वारे ढूंढो रे सांवरिया चल रहा था। तब मैं मात्र चार वर्ष का था पर उस गाने को सुनकर मुझे न जाने क्या हुआ कि मैं उस बैलगाडी के पीछे दौड पडा। जब तक वह गाना चला मैं उस बैलगाडी के पीछे भागता रहा। उसी समय से मेरे भीतर संगीत के प्रति रुचि पैदा हुई और लता दीदी मेरी प्रेरणास्त्रोत बन गई। मेरा मानना है कि स्त्री के भावनात्मक सहयोग के बिना किसी भी पुरुष का जीवन अधूरा है। इतना ही नहीं परिवार और समाज की खुशहाली भी स्त्रियों के अमूल्य योगदान के बिना असंभव है।

परिवार की लक्ष्मी होती है स्त्री

सुनील शास्त्री, पूर्व राज्यमंत्री

मेरा मानना है कि स्त्री परिवार की लक्ष्मी होती है। उसके बिना परिवार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। बचपन से आज तक परिवार में मुझे जिन स्त्रियों को करीब से जानने का अवसर मिला उनमें पहली मेरी मां श्रीमती ललिता शास्त्री और दूसरी मेरी पत्नी मीरा हैं। मेरी मां का व्यक्तित्व बहुत ही सरल और सादगी भरा था। वह आदर्श भारतीय नारी की साक्षात प्रतिमूर्ति थीं। उन्होंने अपनी जमीन और संस्कृति से जुडे रहने के जो संस्कार बचपन से ही हमारे भीतर विकसित किए वे आज भी हमारे अंदर जीवित हैं। हमारे घर में सभी त्योहार बडे धूमधाम से मनाए जाते थे, जिसमें बाबूजी के सभी परिचित चाहे वे किसी भी जाति या धर्म के हों बिना किसी भेदभाव के सम्मिलित होते थे। मां उन सबकी बडी प्रसन्नता से आवभगत करती थीं। बाबूजी के प्रधानमंत्री जैसे पद पर रहते हुए मैंने मां में कभी कोई अभिमान का भाव नहीं देखा। घर में बीसियों नौकर-चाकर होने के बावजूद वह नियमित रूप से रसोई अपने हाथों से ही बनाती थीं बाबूजी और हम भाइयों की छोटी-छोटी जरूरतों का खयाल वे उसी तरह रखती थीं जैसे कोई आम गृहिणी अपने परिवार का खयाल रखती है। यह मेरा सौभाग्य है कि विवाह के बाद मुझे जीवनसंगिनी के रूप में मीरा का साथ मिला। उनके साथ होने से मेरे जीवन का सफर आसान हो गया। जब बैंक के मुख्य विकास प्रबंधक पद से इस्तीफा दे कर मैं सक्रिय राजनीति में आया तब से आज तक मीरा घर-परिवार की सारी जिम्मेदारियां अकेली संभालती आ रही हैं और कभी कोई शिकायत नहीं की। अगर उन्होंने मेरा साथ न दिया होता तो मेरे लिए यह काम असंभव था। मुझे सक्रिय राजनीति में आए हुए लगभग 30 वर्ष हो चुके हैं लेकिन आज तक याद नहीं कि कभी भी उन्होंने घर की कोई परेशानी मेरे सामने रखी हो। बच्चों की परवरिश और उनमें अच्छे संस्कार विकसित करने का सारा श्रेय मीरा को ही जाता है।

शुक्रगुजार हूं अरुणा दीदी का

इंद्र कुमार, फिल्म निर्देशक

मेरे जीवन में मेरी मां सगुना ईरानी, बडी बहन अरुणा ईरानी, पत्नी बीना और मेरी दोनों बेटियां श्वेता और तान्या हमेशा मेरे करीब रही हैं। यही वजह है कि आज अपनी सफलता का श्रेय मैं एक नहीं बल्कि तीन स्त्रियों-अपनी मां, बहन और पत्नी को देता हूं। उन्होंने बचपन से आज तक मेरे जीवन को सफल बनाने में अपना अमूल्य योगदान दिया है। यह सच है कि ईश्वर इंसान को इस धरती पर भेजता है लेकिन उसे लाने का माध्यम मां है और मेरे लिए वही सर्वोच्च शक्ति है। लेकिन मां के बाद मेरी बडी बहन अरुणा ईरानी मेरे लिए माता-पिता दोनों हैं। 1969 में जब हमारे पिता फरदून ईरानी की मृत्यु हो गई तब अचानक सारी जिम्मेदारी हमारी बडी बहन अरुणा पर आ गई। हम आठ भाई-बहनों में वह सबसे बडी हैं। उस वक्त मेरी उम्र लगभग बारह-तेरह वर्ष थी और दीदी बाईस साल की थीं। फिल्मों को अपना करियर बनाकर उन्होंने न केवल हम सात भाई-बहनों का पालन-पोषण किया, बल्कि हमें काबिल इंसान भी बनाया। अपने तीन बच्चों को देखकर कई बार मैं सोचता हूं कि इतना संपन्न होने के बावजूद अपने तीन बच्चों के पालन-पोषण में ही मैं बेहाल हो गया तो अरुणा दीदी ने कैसे हम सात भाई-बहनों की परवरिश की होगी? इसके लिए मैं ताउम्र दीदी का शुक्रगुजार रहूंगा।

उसके बाद बाद मेरी पत्नी बीना ने भी जीवनसंगिनी के रूप में हर स्थिति में मेरा साथ दिया। मुझे यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है कि वह मेरी शक्ति हैं। वह बेहद पारंपरिक स्त्री हैं। आज मैं करियर में उन्हीं के कारण सफल हूं, क्योंकि घर और बच्चों की सारी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा कर उन्होंने कामयाबी के रास्ते पर चलने में मेरी हमेशा मदद की है।

खुशकिस्मत हूं मैं

डॉ. कर्ण सिंह, राजनीतिज्ञ

मेर पिता राजा हरी सिंह जम्मू-कश्मीर के पांच सौ से भी ज्यादा रियासतों के शासक थे और मां तारा सिंह कांगडा के गांव की सीधी-सादी स्त्री थीं। दरअसल मां पिताजी की चौथी पत्नी थीं और पिता जी ने अपना वंश चलाने के लिए पुत्र की आकांक्षा में उनसे शादी की थी। लेकिन दोनों के बीच वर्ग का बहुत बडा फासला था। इसलिए उनका दांपत्य जीवन सुखी नहीं था। वह बहुत लंबे समय से पिता से अलग रह रही थीं और मैं राजमहल में पिताजी के साथ रहता था। मुझे सप्ताह में केवल एक बार उनसे मिलने की इजाजत थी। मैंने अपनी मां की वेदना को बहुत करीब से देखा है और उनकी याद में कई रातें रोकर गुजारी हैं। जैसा कि अकसर राजघरानों में होता है, मात्र ग्यारह वर्ष की उम्र में ही मुझे पढाई के लिए बोर्रि्डग स्कूल भेज दिया गया। फिर भी अपनी मां से मेरा खास तरह का जुडाव था। वह बहुत धर्मिक संस्कारों वाली स्त्री थीं और उन्हें संगीत से बेहद लगाव था। उन्हीं के कारण बचपन से ही मेरे भीतर संगीत के प्रति गहरी रुचि पैदा हुई और बाद में मैंने डोगरी भाषा के कुछ गीतों का कैसेट भी तैयार किया। सभी धर्मो में समान रूप से श्रद्धा रखने का संस्कार भी मुझे अपनी मां से ही मिला है। मेरा मानना है कि मां इस संसार में ईश्वर का दूसरा रूप है और उसकी जगह कोई नहीं ले सकता।

मां के बाद अगर किसी स्त्री का मेरे जीवन पर प्रभाव रहा है तो वह है मेरी धर्मपत्नी- यशोराज्यलक्ष्मी का। जब हमारा विवाह हुआ था तब मेरी उम्र 18 वर्ष थी और यशोराज्य मात्र 13 वर्ष की थीं। मेरी धर्मपत्नी मेरे जीवन में खुशियां और नई आशाएं लेकर आई। इसलिए मैं उन्हें अपने जीवन की आशा कहता हूं। हालांकि हमने जीवन में कई उतार-चढाव भी देखे, लेकिन उन्होंने हर कदम पर मेरा साथ निभाया। उनमें स्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करने और सही निर्णय लेने की अद्भुत क्षमता है। उनके निर्णय हमेशा सही होते हैं। इसलिए कोई भी बडा निर्णय लेने से पहले मैं उनकी राय जरूर लेता हूं। उनका बहुआयामी व्यक्तित्व देखकर मुझे ताज्जुब होता है। उन्होंने हर कदम पर मेरा साथ निभाया। मैं अकसर सोचता हूं कि मेरे लिए इनसे अच्छी जीवनसंगिनी कोई और हो ही नहीं सकती थी। सच, मैं बहुत खुशकिस्मत हूं।

मां ने बढाया मनोबल

सोनू सूद, अभिनेता

मेरी मां सरोज सूद बचपन से अब तक मेरी प्रेरणास्त्रोत रही हैं। उनका जीवन बडा ही संघर्षमय था। लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और वही बात मुझे भी सिखाई। जब मैं शुरू-शुरू में मुंबई आया तो बहुत परेशानियों से गुजर रहा था पर वह हमेशा फोन पर मुझे उत्साह दिलाती थीं। अपने जीवन के बारे में बतातीं, मुझे पत्र लिखतीं, जिसमें बहुत सुंदर-सुंदर कविताएं होती थीं। वह अपने पत्रों के माध्यम से मेरा आत्मविश्वास जगातीं। जो मुझे बहुत अच्छा लगता था। मुझे उनके पत्रों से बहुत प्रेरणा मिलती थी। वह कहा करती थीं कि मुश्किलों से कभी भी घबराना नहीं चाहिए बल्कि हिम्मत के साथ उनका मुकाबला करना चाहिए, तभी जीवन में सफलता मिलती है।

उनके साथ बिताया हुआ बचपन मैं हमेशा याद करता हूं। अब वह इस संसार में नहीं हैं पर उनकी सारी बातें मुझे याद आती हैं। उनकी एक डायरी मेरे पास है। जिसमें उन्होंने अपने जीवन के सारे अनुभवों को लिखा है। आज भी जब मैं मायूस होता हूं तो उनकी डायरी में लिखी बातें पढता हूं। ऐसा लगता है कि आज भी मां मेरे पास हैं और मुझे दिलासा दे रही हैं। वह जीवन के प्रति हमेशा सकारात्मक दृष्टिकोण रखती थीं। जब मुझे फिल्मों में काम नहीं मिल रहा था तो वह मेरा मनोबल बढाने के लिए यहां मेरे पास मुंबई आ गई। उन्होंने हमेशा मुझे दिलासा दिया कि तुम्हें काम अवश्य मिलेगा। अपनी कोशिश जारी रखो। जब मेरी पहली तमिल फिल्म रिलीज हुई तो वह मुझे अपने साथ मंदिर लेकर गई और भगवान को धन्यवाद दिया। मेरी बडी बहन मालविका का स्वभाव भी मां की ही तरह है। आज मेरी मां नहीं है पर मुझे अपनी दीदी में उनकी छवि दिखाई देती है और जब मेरा मन किसी कारण से उदास या तनावग्रस्त होता है तो मैं अपनी दीदी से बातें करता हूं। वह मेरे लिए फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड की तरह हैं। उनसे बातें करके मेरी उदासी दूर हो जाती है।

मेरा मानना है कि पुरुष बाहर से भले ही शक्तिशाली दिखता है लेकिन जिंदगी को अच्छी तरह जीने के लिए मन की जिस शक्ति की जरूरत होती है, वह ताकत स्त्री के ही भीतर होती है। तभी तो लाखों दुख सहते हुए भी वह अपने पति और बच्चों की खातिर अपनी सारी खुशियां हंसते-हंसते कुर्बान कर देती है।

भगवान का दूसरा रूप हैं मां

संजय लीला भंसाली, फिल्म निर्माता

मेरे लिए मेरी मां ही सब कुछ हैं। वैसे तो सभी को अपनी मां अच्छी लगती है। पर मेरी मां मेरे लिए भगवान से भी बढकर हैं और इसीलिए मैं अपने नाम के साथ सरनेम के रूप में उनका नाम लगाता हूं।

मेरे पिता गुजराती फिल्मों के बहुत बडे निर्माता थे और हमारा बचपन बडे शानो-शौकत के साथ बीत रहा था। लेकिन अचानक किस्मत ने ऐसी करवट ली की पिताजी को बिजनेस में भारी नुकसान हुआ और उसके कुछ दिनों के बाद ही उनकी मृत्यु हो गई। तब हमने बहुत बुरे दिन देखे। छोटी-छोटी चीजों के लिए हम मोहताज हो गए। अब न तो हमारे पास पहनने को अच्छे कपडे थे और न ही खाने को अच्छा खाना। ऐसी मुश्किल परिस्थिति में अगर मेरी मां लीला भंसाली और बडी बहन बेला का साथ न होता तो आज मैं जिस मकाम पर खडा हूं शायद यहां नहीं होता। मां मुझे हमेशा समझातीं कि जिस तरह अच्छा वक्त गुजर जाता है, वैसे ही बुरा समय भी हमेशा नहीं रहेगा। बस, हमें मेहनत करनी चाहिए और आशाओं का दामन नहीं छोडना चाहिए। मां मेरे लिए सिर्फ मां ही नहीं, बल्कि मेरी सबसे अच्छी दोस्त भी हैं। आज भी मैं जितनी सहजता के साथ अपने दिल की बातें उनके साथ शेयर कर लेता हूं उतना किसी के साथ नहीं कर पाता। मुझे याद है कि पिता जी के गुजरने के बाद मैं जब कभी अकेला उदास बैठा रहता तो वह मुझे समझातीं कि तुम्हें ही पिताजी के अधूरे सपनों को पूरा करना है। उनकी इन बातों का मेरे ऊपर इतना गहरा प्रभाव पडा कि मैंने बचपन से ही अपने मन में ठान लिया था कि मुझे अपने पिता के अधूरे सपनों को पूरा करना है और बहुत कम उम्र से ही मैंने काम करना शुरू कर दिया था। मेरी बहन बेला जो मुझसे पांच साल बडी है, वह भी मेरे दिल के बहुत करीब है। बचपन से ही जीवन के उतार-चढाव को देखते हुए हम साथ पले-बढे हैं और हमारे बीच इतनी अच्छी अंडरस्टैंडिंग है कि हम बिना कहे ही एक-दूसरे के दिल की बात समझ जाते हैं। वह बहुत मजबूत इरादों वाली और समझदार लडकी है। आजकल फिल्मों की एडिटिंग का काम रही है और देश की पहली महिला फिल्म एडिटर है। वह मेरे साथ ब्लैक और देवदास की एडिटिंग कर चुकी है।

मेरा मानना है कि किसी भी इंसान की जिंदगी में स्त्री का एक खास स्थान होता है, चाहे वह मां, बहन या पत्नी या फिर कोई और ही क्यों न हो। स्त्री ही पुरुष को जीना सिखाती है और उसे भावनात्मक संबल देती है।

मां हैं मेरी मार्गदर्शक

सिकंदर खेर, अभिनेता

हर बच्चे के लिए मां ईश्वर का दूसरा रूप होती है और मैं भी इसका अपवाद नहीं हूं। मेरी मां किरण खेर जितनी अच्छी अभिनेत्री हैं, उतनी ही अच्छी इंसान भी हैं। मां मेरी बेस्ट फ्रेंड हैं। मैं उनसे अपने निजी जीवन के साथ-साथ करियर से जुडी बातें भी शेयर करता हूं। बचपन में मैं शीशे में देखकर एक्टिंग किया करता था। जब आठ साल का हुआ तब मां को पता चला कि मैं बडा होकर एक्टर बनना चाहता हूं। यह सुनकर मां बहुत अधिक उत्साहित तो नहीं हुई लेकिन उन्होंने मेरी हौसलाआफजाई जरूर की। यश अंकल और संजय लीला भंसाली के साथ बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम करने के बाद जब मैंने एक्टर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की तो सबसे अधिक सहयोग मां का मिला। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम अपनी प्रतिभा और मेहनत पर भरोसा रखो। मां ने मुझसे कहा, अपनी पसंद का काम ढूंढो इसमें शर्म की बात नहीं है। काम मांगने में कभी भी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। मां की प्रेरणा से ही मैं आज फिल्म इंडस्ट्री में अपने पांव जमाने की दिशा में अग्रसर हूं।

एक सशक्त अभिनेत्री होने के बावजूद मां ने करियर के बजाय घर-परिवार को ज्यादा प्राथमिकता दी। उनके लिए मेरा पालन-पोषण ज्यादा महत्वपूर्ण था, जब मैं छोटा था तब उन्होंने सिर्फ मेरी खातिर कई बेहतरीन ऑफर्स ठुकराए और फिल्मी दुनिया में बहुत देर से अभिनय शुरू किया। खामोश पानी, सरदारी बेगम में तो मां का अभिनय शानदार था लेकिन मुझे रंग दे बसंती में उनका अभिनय सबसे अधिक पसंद आया। उन्होंने अपनी हर फिल्म में अभिनय की नई ऊंचाइयों को छुआ है। किसी भी फिल्म को स्वीकार करने से पूर्व मैं मां की सलाह लेना नहीं भूलता हूं। वैसे, मेरी पहली दो फिल्मों में मेरी एक्टिंग से मां बहुत अधिक प्रभावित नहीं हुई। उन्होंने कहा,बेहद साधारण एक्टिंग है। अभी तुम्हें और मेहनत करनी होगी। वह चाहती हैं कि मैं बहुत अच्छा करूं। निश्चित रूप से मां का मार्गदर्शन मेरे लिए बहुत मायने रखता है।

बहन है सबसे अच्छी दोस्त

कैलाश खेर, गायक

मेरी मां श्रीमती चंद्रकांता खेर का मेरे जीवन पर बहुत गहरा प्रभाव पडा है। उन्होंने हमेशा मुझे अच्छे और बुरे के बीच फर्क करना सिखाया। शिक्षा को उन्होंने हमेशा महत्व दिया है। वह कहती हैं कि शिक्षित व्यक्ति हर परेशानी का हल ढूंढ सकता है। वह बहुत अच्छी गायिका हैं लेकिन उन्होंने मंच पर कभी नहीं गाया। पर जन्मजात रूप से उनका यह गुण मेरे अंदर आया है। मेरी मां बहुतअनुशासन प्रिय हैं और गलती होने पर आज भी मुझे डांट देती हैं। उन्हें दिखावा करना बिलकुल नहीं आता। बहुत ही सीधी-सच्ची स्त्री हैं। मां के साथ बिताया हर पल प्यारा होता है। पहले जब घर पर था तो मां का प्यार-दुलार सब मिलता था। लेकिन अब जब घर से दूर हूं तो मुझे मां की कमी बहुत महसूस होती है।

मेरी छोटी बहन नूतन, जो पुरातत्व विज्ञान में पी-एच. डी. कर रही है। मेरे जीवन पर उसका भी बहुत गहरा प्रभाव है। वैसे तो वह मुझसे छोटी है लेकि न बहुत समझदार है। वह मां की तरह मेरा खयाल रखती है। उसके साथ मैं अपने दिल की सारी बातें शेयर करता हूं। वह मेरे लिए सिर्फ मेरी बहन ही नहीं, बल्कि सबसे अच्छी दोस्त भी है। उसे संगीत की बहुत अच्छी समझ है। अपने हर एलबम के गाने पहले मैं उसे सुनाता हूं फिर रिकॉर्डिग करवाता हूं।

आज मैंने जो सफलता हासिल की है,उसमें मेरी मां और छोटी बहन नूतन का बहुत बडा योगदान है। मेरा मानना है कि स्त्री के साथ और सहयोग के बिना कोई भी पुरुष अपने जीवन में सफल नहीं हो सकता।

विनीता
 
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