यू बदल गई जिंदगी

      
यू बदल गई जिंदगी

चार्ली चैप्लिन की जीवनी का असर

सतीश कौशिक, निर्देशक-कलाकार

जब भी कभी मैं पीछे मुड कर देखता हूं तो पाता हूं कि मेरे अंदर बदलाव बहुत आया है। जब मैं फिल्मी दुनिया में आया तो यहां मेरा अपना कोई नहीं था। मुझे अपनी बात लोगों तक पहुंचाने और अपने को साबित करने में समय लगा। उस समय नादिरा बब्बर, जावेद अख्तर, बोनी कपूर, शेखर कपूर, अनिल कपूर जैसे लोग न मिलते तो मैं अपनी बात कैसे किसी के आगे रख पाता? मैंने जब 1980 में फिल्मी दुनिया में कदम रखा तो रास्ता आसान नहीं था। अब मेरे अंदर इतना आत्मविश्वास है कि मैं अपनी बात किसी से मनवा सकूं। यह पहले संभव नहीं था। कोई कुछ सुनने को तैयार ही नहीं होता था। यह स्थिति बनने में कई साल लगे। अगर आपमें प्रतिभा है और खुद को साबित करना चाहते हैं तो मौका जरूर मिलेगा। ऐसा ही मेरे साथ हुआ। मैं एक साधारण व्यक्ति से कामयाब और मजबूत व्यक्तित्व बन सका। इससे ये समझ में आया कि व्यक्ति को हमेशा अपने आपको सिद्ध करते रहना चाहिए। मनुष्य हमेशा नई-नई चीजें सीखता रहता है। इसकी कोई समय सीमा नहीं है। बदलाव की वजह कुछ भी हो सकती है, पर एक बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी। वह यह कि किसी के भी व्यक्तित्व को आप ओढ नहीं सकते। आपको अपनी जगह खुद बनानी पडती है। किसी से प्रेरणा भले ही लें, पर वैसे ही बनें यह जरूरी नहीं है।

हर व्यक्ति का अलग-अलग व्यक्तित्व होता है और उसके लिए वही उपयुक्त होता है। अगर व्यक्ति सीधा-सादा और सरल है तो उसे बेवकूफ न समझें। असल में वही उसकी शख्सीयत है। यह फैसला आपको खुद करना होता है कि आप कैसा व्यक्तित्व अपनाएं। जीवन में आपका अपना तजुर्बा ही सही दिशा में ले जाता है। जब मैं लोगों से मिलता हूं तो उनके अच्छे गुणों को समझने की कोशिश करता हूं। मैं राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म बनाने के लिए सूरज बडजात्या या राजकुमार बडजात्या से बात करता हूं। उनकी कहानी सुनता हूं, तो कहीं न कहीं मैं उनके अच्छे विचारों से सहमत होता हूं। इस मामले में मैं जावेद अख्तर से काफी प्रभावित हूं। अपनी बात कहने का उनका ढंग बिलकुल अलग है। मेरे जीवन में बदलाव सही मायने में तब आया जब मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में था। उन्हीं दिनों मैंने चार्ली चैप्लिन की जीवनी पढी। उसे पढकर मेरे अंदर बहुत बदलाव आया। इसके पहले मैं विज्ञान का छात्र था। वहां मैंने कई बडे लेखकों की किताबें पढीं और अनुभव प्राप्त किए।

इसके साथ-साथ सन् 2006 में ब्रुकलिन पर आधारित एक अंग्रेजी फिल्म में काम करने का अवसर मिला। असल में यही मेरे जीवन का टर्निग पॉइंट था। इसके लिए मैं तीन महीने तक अमेरिका में रहा। वहां उस फिल्म की शूटिंग, रिहर्सल, डायलॉग याद करना मेरे लिए काफी मुश्किल था। पर मैंने यह सब किया और वह सफल रहा। मैंने अपने जीवन में कभी नकारात्मक सोच नहीं रखी। किसी भी रचनात्मक क्षेत्र में हमेशा सकारात्मक सोच ही रखनी पडती है। अगर मेरी सोच नकारात्मक होती तो शायद मैं इस मुकाम तक पहुंच नहीं पाता।

स्थितियां बदलीं तो मैं बदली

डॉ. चंदा कोचर, अध्यक्ष, आईसीआईसीआई बैंक

एक बच्चा जब मां की गोद में आता है, तो उसके जन्म से पहले ही उसके व्यक्तित्व में जाने कितने बदलाव आ चुके होते हैं। बच्चे के गर्भ में आने के बाद से जन्म लेने के बाद तक उसके शारीरिक-मानसिक विकास की प्रक्रिया जारी रहती है। वयस्कों का मामला भी कुछ ऐसा ही है। शिशुओं का शारीरिक विकास जितना जरूरी होता है, उतना ही जरूरी है वयस्कों का मानसिक विकास। जिस दिन हमारा मानसिक विकास न हो, समझें कि कहीं कुछ कमी रह गई। वक्त के साथ हर तरह के बदलाव लाजमी हैं। कभी स्थितियां हमारी सोच को बदलती हैं, तो कभी हमारी सोच ही वक्त को बदल देती है। मुझे लगता है, हम सभी को पीछे मुडकर जरूर देखना चाहिए कि हमारी सोच और मानसिकता में कितने बदलाव आते रहे हैं। यदि लगे कि हम कहीं भूल कर रहे हैं, या चूक गए हैं, तो हम अपनी सोच में कुछ बदलाव कर सकते हैं। आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद 1993 में बैंकिंग का क्षेत्र प्राइवेट सेक्टर के लिए खोला गया। उस समय आईसीआईसीआई जानी-मानी फाइनेंस कंपनी थी। जब प्राइवेट सेक्टर को बैंकिंग की इजाजत मिली तब हमारे बोर्ड रूम में यह चर्चा काफी जोर-शोर से हुई कि बैंक शुरू करने की दिशा में कदम बढाए जाएं। तब हमें यह भी तय करना था इस नए प्राइवेट बैंक की कार्यप्रणाली सरकारी बैंकों से कैसे अलग होगी? इस नए बैंक के बारे में हर नए कदम को लेकर मैं काफी रोमांचित थी। मेरे लिए आईसीआईसीआई बैंक का विजन स्टेटमेंट बनाना एक चुनौती थी। हम नए बैंक का निर्माण करने जा रहे थे.. ग्लोबल इंडिया की बैंक।

देखते ही देखते आईसीआईसीआई बैंक देश की एक सबसे बडी बैंकों की श्रृंखला बन गई। समय के साथ उसमें कई बदलाव आए। बैंक के कमर्शियल, इन्फ्रास्ट्रक्चर इंडस्ट्री ग्रुप, रिटेल मार्केट, ई-कॉमर्स, इंटरनेशनल बैंकिंग जैसे कई विभागों में वक्त के साथ कई तरह के बदलाव होते गए। इस क्रम में मेरी अपनी सोच भी बहुत बदली और यह बदलाव केवल व्यावसायिक सोच में ही नहीं, बल्कि निजी संदर्भो में भी थी। मैंने अपने बैंक को विकास करते देखा। मुझे इस बैंक में काम करते 24 वर्ष हो गए। यह 24 वर्षो का समय किसी भी चीज, या व्यक्ति के बारे में सोच कायम करने या बदलने के लिए काफी मायने रखता है।

बैंक की कार्यप्रणाली में हमने कई सकारात्मक बदलाव किए। नेट बैंकिंग, एनी टाइम मनी, पोर्टफोलियो मैनेजमेंट, बैंकिंग ट्रांजेक्शन थ्रू एसएमएस जैसी कई बातों का जिक्र किया जा सकता है। अपने कामकाज के संदंर्भ में मुझे काफी सोच, अध्ययन करना पडा। इससे देश का आर्थिक विकास भी जुडा होता है और मेरा निजी विकास तो इससे जुडा ही है। अभी तक मैंने जो बदलाव देखें लगभग सभी सकारात्मक ही हैं। हां, बदलाव के इस दौर में भारतीय मूल्यों को बचाए रखना और उनका आदर करना मुझे बहुत जरूरी लगता है। क्योंकि मूल्यों का असर हमारे कामकाज पर भी होता है और समाज पर भी।

नर में नारायण की अनुभूति

पूनम आजाद, भाजपा नेता

साई बाबा में मेरी आस्था शुरू से ही बहुत दृढ थी। मेरे परिवार में तो कभी किसी ने बाबा के मंदिर जाने या पूजा करने से मुझे नहीं रोका, लेकिन शादी के बाद जब मैं कीर्ति के साथ आई तो मेरी सास को यह बात अच्छी नहीं लगती थी। उन्हें लगता था कि किसी आदमी की पूजा क्यों की जाए! उनकी और सभी बातें बहुत अच्छी होने के बावजूद यह बात मुझे अखरती थी। कुछ दिनों बाद कीर्ति को एक टूर्नामेंट के सिलसिले में फिरोजाबाद जाना था। उनके साथ-साथ मुझे भी जाना था। जब हम लोग घर से चलने लगे तो हमने चाभियां माताजी को दीं। चाभियों के गुच्छे में भी साई बाबा का चित्र था। यह देखकर वह फिर मेरा मजाक उडाने लगीं और यह मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने मन ही मन कहा कि बाबा अगर आप हैं तो इन्हें अपने होने का एहसास कराएं। उस समय तो मैं चुपचाप चली गई, पर जब लौट कर आई तो मेरी सास दौड कर मुझसे लिपट गई। मैं कुछ समझती इसके पहले ही वह रोने लगीं। मालूम हुआ कि उन्हें बाबा ने सपने में दर्शन दिया और जैसे एक शिक्षक क्लास में पढाता है वैसे ही उन्हें बहुत कुछ समझाया भी। इसके बाद से वह तो बाबा को मानने ही लगीं, पर मुझे बडी ग्लानि हुई। यह सोचकर कि मैंने अपने स्वार्थ या अहंकार के लिए बाबा को और अपनी सास को भी तकलीफ दी। पर इस घटना ने मेरे सोचने की दिशा भी बदली। मैंने बाबा की मूल सीख नर में नारायण देखने की बात पर अमल करना शुरू किया और जहां तक मुझसे हो सकती है, अब मैं सबकी भलाई के लिए ही सोचती हूं। अपने आन-बान के लिए कभी किसी का बुरा नहीं सोचती।

बदला है हालात ने

सुदेश बेरी, अभिनेता

मेरे जीवन में बहुत बदलाव आया है और हर बदलाव को मैंने सकारात्मक ही पाया है। मेरा जीवन संघर्षो से भरा हुआ था, पर आज मैं खुश हूं कि मुझे कामयाबी मिली और इसे मैं भगवान श्रीकृष्ण की कृपा मानता हूं। मैं बहुत ही साधारण इंसान हूं। आज जिस मंजिल पर मैं हूं, वहां तक पहुंचने में मुझे काफी समय लगा है। वैसे मैं इसे ठीक ही समझता हूं। पहले व्यक्ति अपनी हैसियत जानता था और उसका व्यवहार भी वैसा ही रहता था, पर आज की युवा पीढी अलग है। अब हर काम शॉर्टकट तरीके से होने लगा है। जबकि आज से 10-15 साल पहले हर आदमी अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए लंबे समय तक श्रम और संघर्ष करने को तैयार रहता था। वह काम में तब तक जुटा रहता था, जब तक कि लक्ष्य न पा ले।

घटनाएं तो अनेक हैं और मेरे जीवन में कई बातें ऐसी हुई जो हमेशा याद रहेंगी। मेरे जीवन को किसी व्यक्ति ने नहीं बदला। ऐसा भी कोई नहीं है जिससे मैं प्रभावित हुआ हूं। हालात ने मुझे बदला है। और यही वजह है कि मैं एक ऐसा प्लेटफॉर्म बनाना चाहता हूं जहां नई पीढी को अपने आपको समझने का मौका मिले। उनके पैर धरती पर टिकें और हकीकत में जीना सीखें। वैसे दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन से मैं प्रभावित जरूर रहा हूं। अमिताभ जी हमेशा सफल रहे और उन्होंने अपने जीवन में हर किरदार को बखूबी निभाया। आज सफल व्यक्ति के रूप में वह सबके लिए एक जीवंत उदाहरण हैं। मेरे लिए जिंदगी ही एक किताब है जिसका हर पन्ना अलग-अलग अनुभवों से लिखा हुआ है। मैंने दुनिया की सभी अच्छाइयों और बुराइयों को अपने निजी अनुभवों से समझा है और आज भी इसी तरह समझता हूं। व्यक्ति को हमेशा सकारात्मक सोचना चाहिए। इसका सबसे बडा लाभ यह होता है कि किसी खराब बात या घटना का भी असर उस पर खराब नहीं होता।

पापा ने बदली मेरी सोच

नील भट्ट, टीवी कलाकार मेरे पिता जी ने मुझे हमेशा यही कहा है कि बेटा कभी भी पीछे मुडकर मत देखना। सिर्फ बीते हुए क्षणों के अनुभव से नसीहत लेना और वर्तमान में जीना। ताकि जो गलतियां पहले हो चुकी हैं, दोबारा न होने पाएं। पिछले दस सालों में मेरी सोच में काफी बदलाव आया है। पहले मैं बच्चा था, तो मेरी सोच भी बच्चों जैसी ही थी। लेकिन आज मैं परिपक्व तरीके से सोचता और समझता हूं। अब मैं हर चीज के सभी पक्षों पर विचार करता हूं। पहले कभी अपनी मनमानी कर लेता था, लेकिन अब स्थिति को ठीक से समझ कर ही कोई निर्णय लेता हूं। मेरी सोच में सकारात्मक बदलाव लाने का श्रेय मेरे पिताजी को जाता है। वह पेशे से वकील हैं। पिताजी ने मुझे समझाया कि चाहे मैं अभिनय करूं या कुछ और, पढाई सबसे जरूरी है। दूसरी बात उन्होंने यह कही कि जो काम करो पूरी शिद्दत और ईमानदारी से करो। अभिनय करना चाहते हो तो पूरी लगन और मेहनत से सफलता हासिल करो। जिस काम में हाथ डालो उसे पूरा करके ही दम लेना चाहिए। मुझमें जो बदलाव आया है वह सकारात्मक है। अगर मैं कई काम एक साथ करता तो शायद किसी काम के साथ ईमानदारी न बरत पाता। अब मैं अभिनय के साथ इंसाफ कर पा रहा हूं। अगर यह बदलाव मेरे जीवन में न आता तो शायद आज की तारीख में मैं एक कनफ्यूज इंसान होता। कब, किस समय क्या करना है इसी ऊहापोह में मेरी जिंदगी खत्म हो जाती और मुझे पता भी नहीं चलता। लेकिन पिताजी ने मेरा मार्गदर्शन किया। वे हमेशा कहते हैं कि लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। हमें किस दिशा में जाना है, यह तय होना चाहिए और इसके लिए इरादे बुलंद होने चाहिए। आत्मविश्वास होना चाहिए। पहले की तुलना में अब देखता हूं तो मेरे भीतर आत्मविश्वास सौ गुना अधिक हो गया है। स्कूल के वक्त मैं इंट्रोवर्ट था। पर जब कॉलेज आया तो बहुत बदल गया। अपने आप अकेले घूमते-फिरते मुझमें आत्मविश्वास विकसित हुआ। जब से बाहर निकला हूं, तबसे वाकई मुझमें बहुत अंतर आया है। अब एकदम बदल गया हूं। मैं हर स्थिति में सकारात्मक सोचता हूं। यह सीख भी मुझे पिताजी से ही मिली है।

कला का खास नजरिया

जूही बब्बर, अभिनेत्री

कलाकार चाहे रंगमंच का हो, छोटे पर्दे का हो, या फिर बडे पर्दे का, मेरे खयाल से हर किसी का कला के प्रति अपना अलग नजरिया होता है। ज्यादातर कलाकार अपनी कला से दर्शकों को बखूबी रिझाना जानते हैं, पर मुझे लगता है कि वक्त के साथ कलाकार को भी अपनी कला में बदलाव की जरूरत होती है। वक्त के साथ हर कलाकार को अपनी कला के प्रस्तुतीकरण में बदलाव लाना चाहिए। मुझमें जो भी प्रतिभा है, वह मेरे माता-पिता की देन है। मुझे लगता है कि मां के कारण ही मैंने थिएटर अधिक किया है। रंगमंच ने मुझे बहुत विविधतापूर्ण भूमिकाएं करने का मौका दिया। मैंने रंगमंच के लिए काफी चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं कीं। इधर मेरे नजरिये में बदलाव आया और मुझे ऐसा लगने लगा कि कुछ अलग करना चाहिए। ताकि बतौर अभिनेत्री मेरी कला का विस्तार हो। मुझे जब रेड चिलीज कंपनी ने हास्य धारावाहिक घर की बात के लिए ऑफर दी और मैंने स्वीकार किया। यह मेरे लिए एक चुनौती है। क्योंकि मैंने कभी भी हास्य धारावाहिक के लिए अभिनय नहीं किया। मैंने व्यावसायिक जीवन में एक कदम आगे चलने की बात सोची। मेरी पहली फिल्म काश आप हमारे होते सफल नहीं हुई। इसके बाद भी मैंने एक-दो फिल्में कीं, पर वे नहीं चलीं। मैं मानती हूं कि धरती पर आने वाला हर इंसान अपनी किस्मत लेकर आता है। मेहनत करना, अपने हाथ में है, पर सफलता देना ईश्वर के हाथ में। बहरहाल, नाटकों में चुनौतीपूर्ण भूमिकाएं करना मैंने जारी रखा। फिर वक्त के साथ मेरी सोच में मैंने अपने आप बदलाव पाया और अपनी प्रतिभा को हास्य धारावाहिक में आजमाना चाहा। जो रंगमंच पर काम करते हैं, वे अभिनय में एक्सपर्ट हो जाते है। स्टेज कलाकारों की प्रतिभा का लोहा मनवाने की सबसे बेहतरीन जगह है। जहां तक मेरे निजी जीवन का प्रश्न है, दो साल पहले मेरी शादी बिजॉय नांबियार से हुई थी। बिजॉय मेरे अच्छे दोस्त रह चुके हैं। हमने दोस्त के रूप में एक-दूसरे को ठीक से समझा, फिर शादी का निर्णय लिया। माता-पिता ने मेरे निर्णय का स्वागत किया। अब वजह जो भी हो, पर शादी के बाद बिजॉय और मेरे रिश्तों में बदलाव आए। शादी के बाद हम न तो अच्छे दोस्त रहे और न अच्छे पति-पत्नी बन सके। पता नहीं, कहां-क्या चूक हो गई। शादी का टूटना जीवन में काफी कुछ सिखा देता है। पर मैंने इस स्थिति को भी सकारात्मक रूप में लिया है.. बगैर किसी कडवाहट के।

दुनिया के पहले कवि हैं रामकथा के प्रणेता वाल्मीकि, पर अगर किंवदंतियों पर भरोसा करें तो वह मूल रूप से एक लुटेरे थे। जंगल से गुजरने वाले राहगीरों को लूटते और इसी तरह अपने परिवार का पेट पालते थे। इसी क्रम में उन्होंने ऋषियों को रोका तो लूटने के लिए ही था, पर ऋषियों के एक प्रश्न ने जगत के सत्य से अचानक उनका सामना करा दिया। नतीजा यह हुआ कि जिस भगवान राम के नाम का उलटा जप करते हुए वह पहले ऋषि, फिर आदिकवि बने, उन्हीं की पत्नी सीता ने बाद में वाल्मीकि के आश्रम में शरण लिया और ऋषिवर ने उनके कुमारों लव एवं कुश का पालन किया और उन्हें शिक्षा भी दी। रामायण जैसा आदर्श महाकाव्य इस घटना का ही परिणाम है, जिसके कारण हम वाल्मीकि को साक्षात भगवान ही मानते हैं। राजकुमार सिद्धार्थ के बारे में ज्योतिषियों ने पहले ही बता दिया था कि यह या तो चक्रवर्ती सम्राट होंगे या फिर विश्वविख्यात संन्यासी और संन्यासी होने की संभावना ज्यादा है। अत: किसी को संसारी बनाने के जितने उपाय किए जा सकते थे, सिद्धार्थ के लिए महाराज शुद्धोदन ने उसमें कोई कसर नहीं छोडी। फिर भी एक दिन नगर भ्रमण पर निकले राजकुमार ने राजा के तमाम एहतियात के बावजूद जीवन का जो सच देखा, उसके बाद वह महल में ठहर नहीं सके। निकल पडे तप करने और उपलब्ध हुए बुद्धत्व को। आज भगवान बुद्ध मनुष्यता की एक उपलब्धि हैं और इसके मूल में हैं वही घटनाएं जिन्होंने उन्हें बदलाव के लिए प्रेरित किया।

बालक मूलशंकर का जन्म एक कर्मकांडी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। महाशिवरात्रि पर उन्हें मंदिर ले जाया गया था मूर्तिपूजा के लिए ही, पर वहां शिवलिंग पर चढाए चावल चूहे को खाते देख कर उनके मन में जो प्रश्न उठे उन्होंने एक नए व्यक्ति को जन्म दिया, जिसे आज हम महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती के नाम से जानते हैं। लुप्तप्राय वेदों और वैदिक वांग्मय की पुन: उपलब्धि और विश्व भर में इसकी प्रतिष्ठा इस एक घटना का ही असर है। मोहनदास करमचंद गांधी दक्षिण अफ्रीका कोई आंदोलन करने नहीं गए थे। वह वहां गए थे रोजी-रोटी की तलाश में, पर जुट गए नागरिक अधिकारों के लिए आंदोलन में। जीवन की दिशा ही नहीं बदली, ध्येय तक बदल गया। इसके मूल में कोई व्यवस्थित प्रक्रिया नहीं, सिर्फ एक घटना थी। वैध टिकट होने के बावजूद उन्हें रेल के फ‌र्स्ट क्लास डिब्बे से बेइज्जत करके उतार दिया गया था। सिर्फ इसलिए कि वह अंग्रेज नहीं थे। इस घटना ने पहले तो मोहनदास करमचंद गांधी और बाद में उस अंग्रेजी साम्राज्य को झकझोर कर रख दिया, जिसके राज में कभी सूरज नहीं डूबता था। मोहनदास करमचंद गांधी से वह महात्मा और भारत के राष्ट्रपिता तो बन ही गए, आज शांति के संदर्भ में वह एक विश्वमानव हैं।

बालक भगत सिंह बडे शांतिपूर्वक अहिंसा के मार्ग पर चल रहे थे। उन्हें पूरा विश्वास था कि गांधी जी का अहिंसक आंदोलन देश को स्वतंत्रता दिला देगा। पर चौरीचौरा कांड के बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन को वापस लिए जाने की घटना ने उनके संवेदनशील किशोर मन को झकझोर कर रख दिया। यहीं से उनका रास्ता ही बदल गया। देश को आजाद कराने का सपना उन्होंने नहीं छोडा, पर इसके लिए रास्ता सशस्त्र क्रांति का अपनाया और आज वह न केवल भारत, बल्कि दुनिया भर के युवाओं के प्रेरणास्रोत हैं। ये कुछ घटनाएं पूरा विवरण नहीं हैं। मनुष्यता के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण परिवर्तनों का कारण जो महान घटनाएं बनी हैं, यह उनकी सिर्फ एक बानगी भर है। लाखों वर्षो के विश्व मानवता के इतिहास में घटनाएं ऐसी हजारों हैं। उन सबका विवरण दे पाना भला किसके लिए संभव है! पर वानर से नर बनने और जंगलों से महानगरों तक की यात्रा अगर संभव हो सकी है तो उसके मूल में कारण ऐसी छोटी-छोटी घटनाएं ही हैं। इनमें ज्यादातर तो ऐसी घटनाएं हैं, जिन पर आम तौर हम ध्यान तक देना जरूरी नहीं समझते। उन पर चर्चा करना समय की फिजूलर्खी मानते हैं और इससे बचते हैं। हालांकि यही निहायत मामूली घटनाएं जब किसी संवेदनशील व्यक्ति के साथ होती हैं तो उसके लिए इतना बडा प्रश्न बन जाती हैं कि उत्तर की तलाश में वह जीवन के सारे सुख और संसार की सारी सुविधाएं छोड कर निकल पडता है दुनिया की खाक छानने। मनुष्यता को अपने विकास क्रम के लिए ऐसे संवेदनशील लोगों का ऋणी होना चाहिए। चाहे फ्लोरेंस नाइटेंगल द्वारा रेडक्रॉस की स्थापना की बात हो या एंड्रयूज द्वारा दीन-दुखियों की सेवा का संकल्प, जॉन मिल्टन जैसे महान रचनाकार की रचनाधर्मिता हो या फ्योदोर मिखाइल दोस्तोयेव्स्की की अंतिम दिनों की आध्यात्मिकता, या फिर महाकवि कालिदास या गोस्वामी तुलसीदास के जीवन में आए मोड ही क्यों न हों.. इन सबके मूल में कुछ बहुत छोटी-छोटी घटनाएं ही बताई जाती हैं। कुछ ऐसी घटनाएं जो अचानक घट गई। सामान्य मनुष्य की नजर में बिना किसी योजना, बिना किसी उद्देश्य के।

उद्दीपन विचार का

इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इनमें से कुछ घटनाओं के पीछे सोच-विचार की लंबी प्रक्रिया काफी पहले से चलती चली आई रही होगी। यह अलग बात है कि यह पूरी प्रक्रिया संबंधित व्यक्ति के मस्तिष्क के अवचेतन भाग में चलती रही हो और वह स्वयं उसमें शामिल रहते हुए भी उसके प्रति सजग न रहा हो। तब उसके चेतन मन के मर्मस्थल पर वह चोट किसी अत्यंत मामूली घटना ने ही किया, जो महान परिवर्तन का कारण बनी। इस तरह मनोवैज्ञानिकों की बात मानें तो इन घटनाओं ने पहले से अवचेतन मन में चल रही विचार प्रक्रिया को ही सतह पर लाने और उसका बोध कराने का कार्य किया। यह बात भी बिलकुल वैसे ही है जैसे प्रागैतिहासिक काल में बिना सोचे-समझे और बिना किसी पूर्व नियोजन के दो पत्थरों के रगडने से अचानक निकली चिंगारी और परिणामस्वरूप आग से मनुष्य का परिचय। दुनिया का सबसे जटिल तत्व माने जाने वाले मानवमन पर घटनाएं भी इसी तरह असर करती हैं। आधुनिक मनोविज्ञान इस बात को स्वीकार करने में आज भी हिचकिचाता है कि किसी व्यक्ति का पूरा नजरिया, उसके सोचने-समझने और व्यवहार का ढंग और व्यक्ति के जीवन की दिशा सिर्फ एक घटना बदल सकती है। सिग्मंड फ्रायड भी कहते हैं कि हम अचानक जो भी परिवर्तन देखते हैं उसके मूल में पहले से चली आ रही एक पूरी प्रक्रिया होती है।

व्यक्ति से विश्व

ऐसा भी नहीं है ये घटनाएं सिर्फ उन्हीं लोगों के जीवन में होती हैं जो युग परिवर्तन के कारण बनते हैं। ऐसी घटनाएं उन लोगों के जीवन में भी होती हैं जो जमाने और दुनिया को न सही, पर खुद को बहुत बडे पैमाने पर बदलते हैं। यह बदलाव ही उन्हें ऐसी दिशा देता है जो उनके जीवन की धारा ही बदल देता है। यह बदलाव कभी घर-परिवार की स्थितियों के संदर्भ में हो सकता है, तो कभी व्यवसाय, कार्यक्षेत्र या जगह के संदर्भ में भी संभव है। पर इन सबके मूल में एक बात अनिवार्य रूप से होती है और यह है नजरिये और सोच के ढंग का बदलाव। नई दिल्ली स्थित इंद्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. संदीप वोहरा कहते हैं, जब कोई अति संवेदनशील व्यक्ति किसी मुश्किल में फंसता है तो वह उस मुश्किल को सिर्फ अपने तक सीमित नहीं मानता है। वह यह देख रहा होता है कि इस संकट में फंसा वह अकेला व्यक्ति नहीं है। उसके जैसे बहुत लोग ऐसी मुश्किल में फंसे हैं और अकेले उसका उबरना समस्या का कोई प्रभावी समाधान नहीं होगा। समस्या का समाधान वस्तुत: उसे जड से मिटाने में है और यह तभी संभव है जब उसमें फंसे अधिकतम लोग एक साथ साझा प्रयास इस दिशा में करें।

संवेदना है महत्वपूर्ण

इस तरह देखें तो किसी व्यक्ति के बडे बनने में सिर्फ घटना ही नहीं, उसकी संवेदना की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण होती है। वरना सच तो यह है कि किसी व्यक्ति के साथ कोई घटना पहली बार नहीं हो रही होती है। उसके पहले बहुत सारे लोगों के साथ वैसी ही घटनाएं घट चुकी हैं, पर वे दूसरों को तो क्या खुद को भी बदलने की कोई कोशिश करते नहीं दिखते हैं। डॉ. वोहरा के अनुसार, किसी व्यक्ति, घटना या स्थिति का किसी पर कैसा प्रभाव होता है यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर है कि उसकी परवरिश कैसी हुई है और पहले से ही उसका व्यक्तित्व कैसा है। किसी समस्या के समाधान की क्षमता भी हर व्यक्ति में अलग-अलग होती है। इसी तरह किसी स्थिति या संकट से निपटने के तरीके भी दो होते हैं - या तो जूझें या फिर भाग चलें। इरादों से मजबूत लोग किसी भी तरह की कठिन स्थिति आने पर आम तौर पर जूझने के लिए तैयार होते हैं, जबकि कमजोर लोग पलायन के बारे में सोचने लगते हैं। नकारात्मक सोच रखने वाले पलायनवादी लोग उन्हीं घटनाओं के चलते भयावह डिप्रेशन तक के शिकार हो सकते हैं, जो सकारात्मक सोच वालों को दुनिया बदलने के लिए प्रेरित कर सकती हैं। आत्महत्या जैसा घातककदम जब व्यक्ति उठाता है तो उसके मूल में वस्तुत: नकारात्मक सोच ही होती है। हालांकि ऐसी स्थितियों से उबरना उतना मुश्किल है नहीं, जितना कि नकारात्मक सोच से ग्रस्त लोग कभी-कभी कल्पना कर लेते हैं।

परिवार-समाज की भूमिका

अगर परिवार और समाज का समुचित सहयोग मिल सके तो कमजोर लोगों को भी ऐसी स्थितियों से उबारा जा सकता है। उन्हें न केवल सामान्य जीवन में वापस लौटाया जा सकता है, बल्कि व्यापक बदलाव की दिशा में प्रेरित भी किया जा सकता है। नई दिल्ली के ही मैक्स हॉस्पिटल में वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारेख का खयाल है, ऐसी स्थितियों में व्यक्ति की अपनी सोच बहुत महत्वपूर्ण होती है। साथ ही बहुत कुछ घटनाओं या स्थितियों के प्रति प्रतिक्रिया करने के उसके ढंग और उसके व्यवहार पर भी निर्भर होता है। फिर भी परिवार और समाज ऐसी स्थितियों में बडी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। डॉ. पारेख के अनुसार चीजों को समझने का हमारा तरीका बहुत महत्वपूर्ण है। अगर हम स्थितियों को सही तरीके से समझने लगें तो बहुत सारी समस्याएं स्वयं हल हो जाएंगी। आज जो आर्थिक मंदी तमाम लोगों के लिए चिंता और मुश्किल का कारण बनी हुई है, वही कुछ लोगों के लिए स्थितियों को नए ढंग से समझने और नए रास्ते निकालने का माध्यम भी बन रही है। इसके पहले भारत में जब आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत हुई थी, तब भी ऐसा ही हुआ था। एक बडा तबका इसके विरोध के लिए खडा हो गया था। कुछ लोग इस बात के सख्त खिलाफ थे कि विदेशी पूंजी को भारत में आने की अनुमति दी जाए। जबकि कुछ लोगों ने इसका खुले मन से स्वागत किया। उन्होंने विरोध करने के बजाय आत्मनिरीक्षण किया। अपनी कमियों पर भी गौर किया और अंतत: इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि दुनिया एक न एक दिन तो एक गांव के रूप में सिमटनी ही है, तो क्यों न उसके लिए तैयारी अभी से शुरू की जाए। उन्होंने ऐसी स्थितियों में खुद को सुधारते हुए व्यवस्था के साथ सहयोग का रवैया अपनाया और परिणाम आज सबके सामने है।

बना रहे हौसला

इससे जाहिर है कि निरंतर बदलती दुनिया में जीतते वही लोग हैं जो जीवन, समय और समाज की स्थितियों के प्रति खुली सोच रखते हुए स्वयं लगातार बदलने के लिए तैयार होते हैं। साथ ही, किसी भी हार को अंतिम नहीं मानते हैं। कठिन स्थितियों में भी व्यक्ति का हौसला बना रहे इसके लिए जरूरी है कि परिवार और समाज में ऐसा माहौल बनाए रखा जाए कि हर व्यक्ति हमेशा सकारात्मक सोच ही बनाए रखे।

इंटरव्यू : दिल्ली से इष्ट देव, इला श्रीवास्तव, मुंबई से पूजा सामंत व सोमा घोष

इष्ट देव सांकृत्यायन
 
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