एक ही परिवार में जब बेटी और बेटे दोनों का जन्म होता है तो माता-पिता बडे प्यार से अपने बच्चों के लिए नाम का चुनाव करते हैं। फिर ताउम्र वही नाम बच्चे के लिए उसकी पहचान बन जाता है। फर्क सिर्फ इतना होता है कि शादी के बाद लडकी को अपने पिता का सरनेम छोडकर अपने नाम के साथ पति का नाम या उपनाम लगाना पडता है, जबकि लडके के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती। पहले किसी स्त्री ने इस परंपरा पर कोई सवाल नहीं उठाया कि ऐसी परंपरा केवल स्त्रियों के लिए ही क्यों है? लेकिन अब भारतीय स्त्री के मन में यह सवाल सुगबुगाने लगा है। उसके मन में इस बात को लेकर बहुत व्याकुलता है कि उसके साथ ही यह भेदभाव क्यों किया जाता है? इन सवालों के जवाब ढूंढने के लिए हमें एक बार भारतीय समाज के अतीत में झांक कर देखना होगा कि स्त्री के साथ इस भेदभाव के लिए कौन से कारण जिम्मेदार हैं।
पितृसत्तात्मक समाज
हमारे पितृसत्तात्मक समाज में शुरू से ही बेटी को पराया धन माना जाता है और ऐसी धारणा है कि वंश का नाम बेटों से ही आगे बढता है। इसी मान्यता को दृढ करने के लिए लडके के नाम के आगे कुलनाम नाम जरूर लगाया जाता है। विवाह के बाद लडकी का जीवन पूर्णत: पति को समर्पित होता है। अत: अपनी पहचान के लिए वह अपने नाम के साथ पति का सरनेम जरूर लगाती है। इस संबंध में दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से संबद्ध समाजशास्त्री डॉ. रेणुका सिंह कहती हैं, ऐसी परंपरा पितृसत्तात्मक समाज की देन है और यह परंपरा सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के सभी देशों में रही है। सिर्फ यहूदी समाज दुनिया का एकमात्र ऐसा मातृसत्तात्मक समाज है, जहां बच्चे अपने नाम के साथ पिता का नहीं बल्कि मां का सरनेम लिखते हैं और स्त्रियों के नाम से ही खानदान का नाम पीढी-दर-पीढी आगे बढता है।
समाजशास्त्रीय विश्लेषण
इस मुद्दे का समाजशास्त्रीय दृष्टि से विश्लेषण करती हुई डॉ. रेणुका सिंह आगे कहती हैं,
दरअसल साठ के दशक में जब भारत में स्त्रीवादी आंदोलन ने जोर पकडना शुरू किया तो भारतीय स्त्रियों ने शादी के बाद सरनेम न बदलने के इस मुद्दे को प्रतीकात्मक संघर्ष के रूप में इस्तेमाल किया और धीरे-धीरे महानगरीय उच्च मध्यवर्ग की शिक्षित कामकाजी स्त्रियों में शादी के बाद अपना सरनेम न बदलने की प्रवृत्ति विकसित होने लगी। नाम का यह मुद्दा शक्ति और प्रभाव से भी जुडा हुआ है। इसका एक पहलू यह भी है कि आज की लडकियां बहुत ज्यादा व्यावहारिक हो गई हैं। वे इस बात को अच्छी तरह जानती हैं कि हर नाम अपने आपमें एक ब्रैंड होता है और उसकी मार्केट वैल्यू भी होती है। इसीलिए अगर लडके की आर्थिक और पारिवारिक हैसियत लडकी की तुलना में ज्यादा ऊंची होती है तो उससे शादी करने के बाद लडकी सहर्ष अपना सेकंड नेम बदल लेती है, लेकिन जहां स्तर बराबरी का होता है या लडके की स्थिति थोडी कमजोर होती है तब शादी के बाद वह अपना सरनेम बदलना जरूरी नहीं समझती।
असुरक्षा की भावना
शिक्षित होने के बावजूद ज्यादातर स्त्रियां असुरक्षा की भावना से ग्रस्त होती हैं। अपने नाम के साथ पति का नाम या सरनेम जोड कर वे पूरे समाज के सामने अपने शादीशुदा होने का ऐलान कर रही होती हैं। पति का नाम उन्हें हर पल इस बात की याद दिला रहा होता है कि अब वे अकेली नहीं, बल्कि कोई उनके साथ है। अनुराग बसु द्वारा निर्देशित फिल्म लाइफ इन ए मेट्रो में एक बडा ही खूबसूरत दृश्य है। अपने तनावपूर्ण वैवाहिक जीवन से असंतुष्ट नायिका (शिल्पा शेट्टी) की मुलाकात नायक (शाइनी आहूजा) से होती है तो वह अपना परिचय देते हुए वह कहती हैं, मैं मिसेज रंजीत हूं। इसके जवाब में नायक हंसते हुए कहता है, आप मिसेज शब्द पर इतना अधिक जोर क्यों दे रही हैं, आपके माता-पिता ने भी तो आपका कोई नाम रखा होगा? दरअसल इस दृश्य के बहाने निर्देशक ने यह बताने की कोशिश की है कि लडकी चाहे अपने वैवाहिक जीवन से कितनी ही नाखुश क्यों न हो, लेकिन पति का नाम समाज में उसके लिए सुरक्षा कवच का काम करता है और वह उस नाम को छोड नहीं पाती।
व्यक्तित्व को नई पहचान
भारतीय संस्कृति में ऐसा माना जाता है कि विवाह के बाद लडकियों का दूसरा जन्म होता है। दरअसल पुराने जमाने में बहुत कम उम्र में ही लडकियों का विवाह हो जाता था। उसके बाद लडकी के व्यक्तित्व को पूरी तरह मिटा कर उसे नए सिरे से अपने मनचाहे आकार में गढने की कोशिश की जाती थी। ताकि वह अपने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों के अनुकूल अपना व्यवहार और आचरण बना सके। इसी प्रक्रिया के तहत महाराष्ट्र, गुजरात आदि प्रांतों में शादी के बाद ससुराल में नववधू का दोबारा नामकरण संस्कार करके, उसे ससुराल की ओर से एक नया नाम देने की परंपरा आज भी जीवित है। इस तरह वहां हर लडकी के दो नाम होते हैं-एक मायके का और दूसरा ससुराल का। जब ससुराल के सभी लोग उसे उसके नए नाम से बुलाने लगते हैं तो वह धीरे-धीरे अपना पुराना नाम ही नहीं बल्कि अपने व्यक्तित्व को भी भूल जाती है।
तसवीर का दूसरा रुख
आज बदलते समय के साथ लडकियां स्व को लेकर सचेत हो गई हैं। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ. जयंती दत्ता कहती हैं, आधुनिक समाज में ज्यादातर लडकियां शादी के पहले ही करियर के क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुकी होती हैं। इसलिए वे अपने नाम को लेकर बहुत पजेसिव होने लगी हैं। साथ ही इसके पीछे असुरक्षा का मनोविज्ञान भी काम कर रहा होता है। दरअसल अब लडकियां अपनी शर्तो पर जीना सीख रही हैं। शादी के पहले से ही उनके मन में इस बात को लेकर संशय होता है कि अगर पति के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं हुआ तो तलाक भी हो सकता है। जिन लडकियों के मन में ऐसी भावना होती है वे शादी के बाद अपना सरनेम बदलने में हिचकिचाती हैं। अन्यथा भारतीय संस्कृति में तो शादी को जन्म-जन्मांतर का बंधन माना जाता है। जब आप किसी पुरुष के साथ अपना पूरा जीवन बिताने को तैयार होती हैं तो ऐसे में अगर आपके नाम के साथ उसका नाम जुड जाए तो इसमें क्या बुराई है? मेरे खयाल से अपने नाम के साथ पति का सरनेम लिखने से स्त्री की स्वतंत्रता पर कोई आंच नहीं आती, बल्कि इससे दांपत्य जीवन में प्यार बढता है।
अब बदला है बहुत कुछ
भारतीय स्त्रियों का जीवन तेजी से बेहतरी की दिशा में आगे बढ रहा है। अब ज्यादातर लडकियां अपने पैरों पर खडी होने के बाद ही शादी के बारे में सोचती हैं। इसलिए शादी से पहले ही समाज में उनके व्यक्तित्व की पहचान बन चुकी होती है। साथ ही वे यह भी सोचती हैं कि अगर शादी के बाद सरनेम बदला जाए तो इस नए नाम के साथ उन्हें करियर के क्षेत्र में कई व्यावहारिक दिक्कतें आएंगी (हालांकि वास्तव में ऐसा नहीं है)। साथ ही कहीं न कहीं उन्हें अपने वजूद की पहचान की भी तलाश है और उनके मन में यह भावना जरूर होती है कि मुझे मेरे ही नाम से पहचाना जाए। इसीलिए ज्यादातर लडकियां अब शादी के बाद अपना सरनेम बदलना जरूरी नहीं समझतीं। साथ ही अब समाज में स्त्री के प्रति पुरुष का दृष्टिकोण पहले की तुलना में काफी उदार हो गया है और अब किसी भारतीय पुरुष के लिए यह बात कोई खास मायने नहीं रखती कि उसकी पत्नी अपने नाम के आगे उसका नाम लगाती है या नहीं। अब यह किसी भी स्त्री के लिए व्यक्तिगत आजादी का मामला है और धीरे-धीरे समाज भी स्त्री की इस भावना का सम्मान करना सीख रहा है। अपने नाम की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो हर इंसान को होनी ही चाहिए। यहां प्रस्तुत है इसी मुद्दे पर विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के शीर्ष पर विराजमान स्त्रियों के विचार...
नाम बदलने से नहीं मिटती पहचान
माधुरी दीक्षित नेने, अभिनेत्री
मेरे पति श्रीराम नेने ने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि मैं अपने नाम के साथ उनका सरनेम लगाऊं। मैंने फिल्मों में काम करना भी अपनी मर्जी से छोडा। मेरे पति ने बतौर अभिनेत्री मेरे वजूद को स्वीकारा है। वह बेहद सीधे-सादे इंसान हैं। आपको यकीन नहीं होगा कि शादी से पहले उन्होंने मेरी कोई फिल्म नहीं देखी थी। शादी तय हो जाने के बाद उन्होंने मेरी फिल्म देखने की इच्छा जाहिर की। तब मेरी बडी बहन रूपा ने उन्हें इंग्लिश सबटाइटल्स के साथ मेरी फिल्म हम आपके हैं कौन दिखाई, जिसमें उन्होंने मेरे डांस के कुछ हिस्से भी देखे। उन्होंने कभी भी मुझ पर कोई बंदिश नहीं लगाई। मैंने हाल ही में बच्चन परिवार के साथ स्टेज शो किया, जिसके लिए मुझे पूरी टीम के साथ अमेरिका में कई जगहों पर घूमना पडा। आपको यह जानकर अचरज होगा कि फिल्मों में जरा भी दिलचस्पी नहीं रखने वाले मेरे पति मेरी हौसलाआफजाई के लिए उस दौरान हर जगह मेरे साथ गए। वह मेरी भावनाओं का बहुत सम्मान करते हैं। सिर्फ मेरी खुशी की खातिर वह ज्यादातर फिल्मी समारोहों में शामिल होते हैं। जब भी हम मुंबई आते हैं, वह मेरे साथ मेरी फिल्मों के प्रीमियर और अवॉर्ड समारोहों में जरूर जाते हैं। एक अच्छे इंसान, पति और पिता के रूप में मुझे श्रीराम में ऐसे कई गुण नजर आए जिसके कारण मैं उनका बहुत सम्मान करती हूं। सरनेम बदलने की बात मेरे लिए कोई मायने नहीं रखती। इसलिए शादी के बाद मैं अपना पूरा नाम माधुरी दीक्षित नेने लिखती हूं। अमेरिका में मेरी पहचान मिसेज माधुरी नेने के रूप में ही है। वहां काफी लोग मुझे सिर्फ मिसेज श्रीराम नेने के नाम से जानते हैं। लेकिन मुझे इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है। मेरे प्रशंसक मुझे हमेशा धक-धक गर्ल माधुरी दीक्षित के नाम से याद रखेंगे। शादी के बाद मेरा सरनेम नेने हो जाने से न तो मेरी पुरानी पहचान मिटेगी और न ही मेरी लोकप्रियता में कोई कमी आएगी। मेरी दोनों बहनें भी अपनी ससुराल का सरनेम ही लिखती हैं। फिर भी बतौर डॉक्टर उनकी स्वतंत्र पहचान है।
भूलने लगी थी अपना नाम
मैत्रेयी पुष्पा, साहित्यकार
शादी के बाद सरनेम बदलने का यह मामला आधुनिक शहरी संस्कृति की देन है। मैं स्वयं गांव की रहने वाली हूं और गांव में मैंने किसी भी स्त्री को शादी के बाद अपने नाम के आगे पति का उपनाम लगाते नहीं देखा। वहां अविवाहिता लडकियां अपने नाम के आगे कुमारी लिखती हैं और विवाहिताओं के नाम के आगे सम्मान सूचक शब्द देवी लगा दिया जाता है। प्राचीनकाल में भी चाहे वह सीता, सावित्री, अहिल्या, कुंती.या कोई भी स्त्री चरित्र हो। सबके नाम का अपना स्वतंत्र अस्तित्व था। दरअसल आधुनिक समाज में लडकियां अपने नाम के साथ पति का नाम लगाकर स्वयं को सुरक्षित महसूस करती हैं। हालांकि हमारे देश के कुछ प्रांतों में तो शादी के बाद लडकी का सरनेम ही नहीं बल्कि उसका पहला नाम ही बदल देने की परंपरा है। हमारे बुंदेलखंड क्षेत्र पर महाराष्ट्र की संस्कृति का गहरा प्रभाव है इसलिए वहां विवाह के बाद जब घर में बहू आती है तो दूसरे दिन रोटी छुआई की रस्म होती है, जिसमें बहू परिवार के सदस्यों को रोटी बनाकर खिलाती है। इस दिन बहू जब अपने कमरे में बैठी होती है तो सास उसे अलग-अलग नए नामों से पुकारती है और बहू को जो नाम पसंद आता है, उसे सुनकर वह कमरे से बाहर निकल आती है। इस तरह शादी के बाद बहू का नया नामकरण हो जाता है। हालांकि धीरे-धीरे यह परंपरा खत्म हो रही है क्योंकि अब वहां भी पढी-लिखी लडकियां शादी के बाद अपना नाम बदलने को तैयार नहीं होतीं। जहां तक मेरे नाम का प्रश्न है तो मैं अब भी अपनी शादी के पहले वाला नाम लिखती हूं और इस पर मेरे पति और ससुराल के अन्य सदस्यों को कभी कोई एतराज नहीं था। लेकिन शादी के बाद मैं पच्चीस वर्षो तक गुमनामी के अंधेरे में रही। तब मुझे ऐसा लगता था कि जैसे मैं अपना असली नाम ही भूल गई हूं। मेरे पति डॉ.आर.सी.शर्मा के घर का नाम मंटी है तो मैं ससुराल और वहां के रिश्तेदारों में मंटी की बहू के नाम से जानी जाती थी और दिल्ली आने के बाद लोग मुझे मिसेज शर्मा बुलाने लगे। जब कभी मेरे मायके से कोई आता और मुझे मैत्रेयी कहकर पुकारता, तब मुझे अपना नाम याद आता था। उस वक्त मुझे अपने होने का एहसास होता था। शादी के पच्चीस वर्षो के बाद जब मेरी तीनों बेटियां बडी हो गई तब घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों से आंशिक निवृत्ति के बाद मैंने लिखना शुरू किया। लेकिन मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि मेरी पहचान उसी नाम से बनी, जो मेरे माता-पिता ने मुझे दिया था।
गलत है पुरानी पहचान बदलना
रेणुका शहाणे, अभिनेत्री
मेरी राय में यह पूरी तरह से व्यक्तिगत मामला है। यह स्त्री की अपनी पसंद से तय होना चाहिए कि शादी के बाद वह कौन सा सरनेम लगाए। लेकिन परंपरागत रूप से स्त्रियां शादी के बाद अपने नाम के साथ पति का कुलनाम लिखती आ रही हैं। लेकिन अब वक्त तेजी से बदल रहा है और
नए जमाने की स्त्रियां अपने मायके का सरनेम बदलना नहीं चाहतीं। मेरी मां शांता गोखले अंग्रेजी साहित्य की जानी-मानी लेखिका हैं। पिछली पीढी की होने के बावजूद शादी के बाद उन्होंने अपना सरनेम नहीं बदला था और जहां तक मेरे नाम का सवाल है तो मैं शादी के पहले से ही अभिनय के क्षेत्र में रेणुका शाहणे के नाम से जानी जाती थी। इसलिए मैंने शादी के बाद अपना सरनेम बदलना जरूरी नहीं समझा। मेरे पति आशुतोष राणा या उनके परिवार के सदस्यों ने भी मुझ पर इसके लिए कोई दबाव नहीं डाला। हां, मेरे दोनों बेटों शौर्यमान और सत्येंद्र के नाम के साथ उनके पिता का उपनाम जरूर जुडा हुआ है।
मेरे विचार से यह आजादी हर स्त्री को होनी चाहिए कि शादी के बाद भी वह अपनी जिंदगी अपने ढंग से जीए। शादी के बाद लडकी की पुरानी पहचान को बदलना सरासर गलत है। कोई भी लडकी ससुराल के नए तौर-तरीके और वहां के सारे नए रिश्तों को सहर्ष अपना लेती है। इतना ही नहीं, उसे हर कदम पर न जाने कितने समझौते करने पडते हैं। इसके बाद भी अगर उससे उसकी पुरानी पहचान बदलने को कहा जाए तो यह कहां का न्याय है?
थोडी परंपरावादी हूं मैं
डॉ. नंदिता पालशेतकर गायनिकोलॉजिस्ट एवं इन्फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट
जब मैंने डायमंड मर्चेट प्रदीप पालशेतकर से मुंबई में शादी की थी तब मेरी उम्र 22 साल थी और अब मेरी शादी को 22 साल हो चुके हैं। मेरा बेटा रोहन पालशेतकर अब 21 वर्ष का है और वह मेडिकल कॉलेज में पढ रहा है। डॉक्टर होने के बावजूद मैं थोडे परंपरागत विचार रखती हूं। शादी से पहले मैं एम.बी.बी.एस. कर चुकी थी, मेरे सारे जरूरी सर्टिफिकेट्स पर मेरा नाम नंदिता पाटिल दर्ज है। शादी के बाद जब मैं हनीमून के लिए पहली बार विदेश गई तब भी मेरे पासपोर्ट पर मेरा नाम नंदिता पाटिल ही था। शादी के पहले से ही डॉक्टर के रूप में मेरी पहचान थी। मेरे पिताजी पद्मश्री डॉ. डी. वॉय. पाटिल का बडा रुतबा था। वह महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रह चुके हैं। मेरी ससुराल में भी लोग इस बात को स्वीकारते थे कि मैं एक बडे घराने की बेटी हूं। लेकिन मेरे मन में कभी इस बात का खयाल नहीं आया कि शादी के बाद मुझे अपना सरनेम नहीं बदलना चाहिए। अगर मैं अपनी नई जिंदगी पुराने नाम के साथ शुरू करती तो यह बात मेरे पिताजी को भी नागवार गुजरती। उन्होंने हम भाई-बहनों के पालन-पोषण में कभी कोई भेदभाव नहीं किया। लेकिन उनका मानना है कि इंसान अपने कर्म से बडा होता है, नाम से नहीं। वह चाहते थे कि शादी के बाद मैं अपनी ससुराल के सरनेम से जानी जाऊं। उनकी इसी इच्छा का सम्मान करते हुए शादी के बाद मैंने अपना नाम नंदिता पालशेतकर लिखना शुरू किया और मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि मैं इसी नाम से अपने देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी जानी जाती हूं। फिर मुझे यह भी लगता है कि शादी के बाद जब मैंने अपने पति के कुलनाम का इस्तेमाल किया तो इससे मेरी ससुराल वालों को भी अच्छा लगा होगा। मेरा मानना है कि अगर कोई घरेलू स्त्री अपने नाम केआगे पति का सरनेम लिखे या न भी लिखे तो इससे किसी को कोई फर्क नहीं पडता। लेकिन जब कोई सफल विवाहिता स्त्री अपनी ससुराल के सरनेम का इस्तेमाल करती है तो इससे उसकीससुराल के लोग अपनी बहू पर गर्व महसूस करते हैं। मुझे ऐसा नहीं लगता कि शादी के बाद अपना सरनेम बदलने से मेरी स्वतंत्रता में कोई कमी आई है। मेरा मानना है कि अगर किसी स्त्री का व्यक्तित्व प्रभावशाली हो और वह अपने विचारों से भी परिपक्व हो तो इस बात से कोई फर्क नहीं पडता कि शादी के बाद वह अपना नाम कैसे लिखती है।
मैं तो नहीं बनी अल्वा
अनुजा चौहान, वाइस प्रेसीडेंट एवं एग्जीक्यूटिव क्रिएटिव डायरेक्टर, जे. डब्लू. टी.
मेरे मन में अकसर यह सवाल उठता है कि शादी के बाद सरनेम बदलने की बाध्यता सिर्फ लडकियों के लिए ही क्यों होती है? शादी के बाद कोई लडका अपना सरनेम क्यों नहीं बदलता? जिस नाम के साथ हम पले-बढे हाते हैं, उससे हमें एक जुडाव महसूस होता है और शादी के बाद एक झटके में उसे बदल देना किसी भी लडकी के लिए बहुत मुश्किल होता है। मुझे तो ऐसा लगता है कि बच्चों को भी अपने नाम के साथ पिता के बजाय मां का नाम ही लगाना चाहिए क्योंकि पिता की तुलना में मां के साथ बच्चे का ज्यादा जुडाव होता है। मुझे ऐसा लगता है कि शादी के बाद अपने नाम के साथ पति का सरनेम लगाना किसी भी लडकी के लिए उसकी व्यक्तिगत पसंद का मामला होना चाहिए। शादी के बाद भी मैं अनुजा अल्वा नहीं बनी बल्कि आज भी अनुजा चौहान ही हूं, क्योंकि मुझे अपना यही नाम सुनने की आदत रही है और अनुजा अल्वा सुनने में मुझे बहुत अटपटा लगता है। हालांकि राजनीति के क्षेत्र में मेरी सास मार्गरेट अल्वा का नाम सभी के लिए परिचित है। अपने नाम के आगे अल्वा लिखने से कहीं न कहीं मुझे इसका फायदा ही मिलता, पर पता नहीं क्यों इस नए नाम के साथ मैं खुद को सहज महसूस नहीं कर पा रही थी। इसलिए मैंने अपना सरनेम नहीं बदला। हालांकि इसके लिए मेरी सास या पति ने मुझे कभी बाध्य नहीं किया कि शादी के बाद मुझे अपना सरनेम बदलना चाहिए। लेकिन शुरुआत में अकसर पति और ससुराल के सभी लोग मजाक में इस बात का जिक्र जरूर करते थे कि तुमने शादी के बाद अपना नाम नहीं बदला। हां, मेरे बच्चे अपने नाम के साथ पिता का ही सरनेम लिखते हैं। दरअसल मैं चार बहनों में सबसे छोटी हूं और मेरी बडी बहनों ने शादी के बाद अपना सरनेम बदल लिया तो मुझे ऐसा लगा कि कम से कम मेरे नाम के साथ तो पापा का नाम होना ही चाहिए। हम पति-पत्नी दोनों के सरनेम अलग होने का मुझे सबसे बडा फायदा यह नजर आता है कि इससे जीवन में प्यार और रोमांस बना रहता है, क्योंकि जो हमें नहीं जानते वे हमें पति-पत्नी के बजाय प्रेमी-प्रेमिका समझते हैं। इस बात की कल्पना हमारे प्यार को और भी जवां बनाए रखती है। सबसे मजेदार स्थिति तो तब होती है, जब मैं ऑफिशियल टूर पर दिल्ली से कहीं बाहर होती हूं। अगर मेरे पति नीरेत को अपनी व्यस्त दिनचर्या में से थोडा समय मिल जाता है तो वे मुझसे मिलने सीधे उसी होटल में पहुंच जाते हैं, जहां मैं रुकी होती हूं। फिर वहां रिशेप्सनिस्ट को यह समझाना मुश्किल हो जाता है कि हम वास्तव में पति-पत्नी हैं। हम दोनों की अपने-अपने क्षेत्र में अलग पहचान है। अकसर लोग हम दोनों को अलग-अलग पहचानते हैं और कभी किसी पार्टी में हमें साथ देखकर चौंक जाते हैं कि अरे! हमें नहीं मालूम था कि आप पति-पत्नी हैं। हमें लोगों को इस तरह चौंकाने में बडा मजा आता है।
अहमियत है आपसी समझ की
मधुश्री, गायिका
मेरा मानना है कि अगर कोई लडकी शादी के पहले से ही किसी खास क्षेत्र में अपनी पहचान बना चुकी हो तो शादी के बाद सरनेम बदलने पर उसे व्यावहारिक रूप से परेशानी आ सकती है।
शादी के बाद अगर लडकी अपनी जिम्मेदारियां अच्छी तरह निभाए और पति के लिए उसके दिल में सच्चा प्यार हो तो उसका सरनेम बदलना या न बदलना कोई मायने नहीं रखता। लेकिन यह पूरी तरह लडकी की मर्जी पर निर्भर होना चाहिए। इसके लिए उस पर किसी प्रकार का दबाव नहीं होना चाहिए। मुझे कामयाबी शादी से पहले मिली थी इसलिए जब शादी हुई तो मैंने अपना नाम नहीं बदला। वैसे तो मैं मधुश्री भट्टाचार्य हूं लेकिन मैं ज्यादातर केवल मधुश्री ही लिखती हूं।
शादी के बाद जब मैंने अपने पति रवि बादल चौधरी को बताया कि मैं सरनेम नहीं बदलूंगी तब उन्होंने और मेरे ससुराल वालों ने इसके लिए मुझ पर कोई दबाव नहीं डाला। हां, शुरुआत में जब कभी फोन पर मेरे पति का कोई परिचित मुझे मिसेज बादल चौधरी कह कर संबोधित करता था तो मैं जरूर चौंक जाती थी, क्योंकि तब मुझे इस नए नाम की आदत नहीं थी। मेरा मानना है कि अगर पति-पत्नी के बीच आपसी प्यार और समझदारी हो तो नाम बदलने या न बदलने से कोई फर्क नहीं पडता।
पति का सरनेम भी अजीज है
नफीसा अली सोढी, अभिनेत्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता
जहां तक मेरे नाम का सवाल है तो शादी के पहले ही मैं नफीसा अली के नाम से पूरे देश में जानी जाती थी। मैं स्विमिंग की नेशनल चैंपियन और मिस इंडिया रह चुकी थी। इसलिए सभी मुझे इसी नाम से जानते थे। आज से 29 वर्ष पहले किसी सिख परिवार में मुस्लिम बहू का आना बहुत बडी बात थी। शादी से पहले मेरी सास इस बात को लेकर बहुत चिंतित थीं कि पता नहीं मुस्लिम लडकी कैसी होगी? उन्होंने मुझसे कहा था कि शादी के बाद तुम अपना नाम बदल लेना। तब मैंने हंसते हुए जवाब दिया था कि अगर नाम बदलना पडा तो मैं शादी ही नहीं करूंगी क्योंकि मेरे माता-पिता ने बडे प्यार से मुझे जो नाम दिया है, जिस नाम के साथ मैं पली-बढी, जिसके साथ मेरी पहचान जुडी है, उसे मैं अचानक कैसे बदल दूं? हां, मैंने प्रेम विवाह किया है और मेरे लिए अपने पति रवीन्द्र सोढी का सरनेम भी बेहद अजीज है। इसलिए शादी के बाद मैंने अपने नाम के साथ नफीसा अली सोढी लिखना शुरू कर दिया। खैर, शादी के बाद जब मेरी सास को मुझे करीब से जानने का अवसर मिला तो उनकी सारी शिकायतें दूर हो गई।
मेरे मतदाता पहचान पत्र, बैंक एकाउंट और पासपोर्ट में मेरा नाम नफीसा अली सोढी ही है। मैं अपने सभी जरूरी दस्तावेजों में अपना पूरा नाम सोढी सरनेम के साथ ही लिखती हूं। चुनाव का नामांकन पत्र भी मैंने इसी नाम से भरा है। लेकिन व्यावहारिक दिक्कत यह है कि लोगों की जुबान पर मेरा नाम नफीसा अली ऐसा चढा हुआ कि उन्हें मेरे नाम के आगे सोढी लगाना याद नहीं रहता। सभी धर्मो में मेरी समान रूप से आस्था है। इसीलिए मेरी दोनों बेटियों के दो-दो नाम हैं। बडी बेटी अरमाना को हम घर पर रवीना नाम से बुलाते हैं, उसका यह नाम हमने रवीन्द्र और नफीसा के शुरुआती अक्षरों को मिलाकर रखा है। इसी तरह दूसरी बेटी का जराना का एक नाम टिया भी है। मेरे भाई के कोई बेटा नहीं है। इसलिए मैंने अपने बेटे अजीत के नाम के आगे उसके नाना का सरनेम लगाया है। वह अपना नाम अजीत अहमद अली लिखता है। मेरा मानना है कि सिर्फ बेटा ही नहीं, बल्कि बेटियां भी अपने खानदान का नाम आगे बढा सकती हैं। मेरी बडी बेटी अरमाना की शादी सिख परिवार में हुई है और वह भी अब अपना नाम अरमाना सोढी अकोई लिखती है। मेरे विचार से शादी के बाद अपने नाम के साथ पति का सरनेम लगाना या नहीं लगाना किसी भी स्त्री का नितांत व्यक्तिगत मामला है। किसी भी दूसरे व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह स्त्री को सरनेम बदलने के लिए बाध्य करे। नाम से किसी भी इंसान के व्यक्तित्व की पहचान बनती है। इसलिए लडकियों के लिए शादी के बाद अपना नाम बदलने की बाध्यता नहीं होनी चाहिए।
विश्वास रखती हूं जोडने में
राजेश्वरी सचदेव बडोला, टीवी कलाकार
यह तो लडकियों पर ही निर्भर करता है कि शादी के बाद वे अपना सरनेम बदलना चाहती हैं या नहीं। मैं तो अपने नाम के आगे सचदेव और बडोला दोनों ही लिखती हूं। जिस सरनेम को मैंने इतने दिनों तक अपने साथ रखा, उसे अचानक छोडना मेरे लिए बहुत मुश्किल था, फिर मेरे लिए अब मेरे पति वरुण का सरनेम भी बहुत खास है। इसलिए मैं दोनों ही कुलनाम लिखती हूं। मैं बदलने में नहीं, बल्कि जोडने में विश्वास रखती हूं। हां, शादी के बाद शुरुआत में कभी-कभी मैं राजेश्वरी सचदेव के आगे बडोला लिखना भूल जाती थी लेकिन बाद में धीरे-धीरे इसकी आदत पड गई। मेरा मानना है कि अगर किसी लडकी ने शादी के बाद अपना सरनेम नहीं बदला तो उसके पति या ससुराल पक्ष को इस पर कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मेरे ससुराल वाले तो खुले विचारों के हैं और उन्होंने मुझसे मेरा पुराना सरनेम छोडने के लिए कभी भी नहीं कहा। हां, परेशानी वहां होती है, जहां लोग रूढिवादी हों और लोग इसे बेवजह अहं का मुद्दा बनाएं। दरअसल ऐसे नियम बनाने का मकसद यह है कि शादी के बाद कोई भी लडकी नए परिवार की सदस्य बनती है। ऐसे में उस परिवार का सरनेम अपना कर वह उनके साथ जुडाव महसूस करती है। सबसे बडी बात यह है कि परिवार के सभी सदस्यों का एक ही सरनेम पारिवारिक एकता की भावना को भी दर्शाता है। इसलिए मैं इसे गलत नहीं मानती। हालांकि मैंने ऑफिशियली अपना सरनेम नहीं बदला, लेकिन अब लोग मुझे मेरे नए नाम से भी जानते हैं।
कोई बडा मुद्दा नहीं है नाम
शोभना नारायण, कथक नृत्यांगना
जहां तक विवाह के बाद अपने नाम के साथ पति का सरनेम लगाने की बात है तो इस मामले में लडकी को पूरी आजादी होनी चाहिए कि अगर वह चाहे अपने नाम के साथ पति का सरनेम लिखे या न लिखे। यह उसकी पसंद या सहूलियत पर निर्भर करता है। हर समाज में समय के अनुसार परंपराएं बदलती रहती हैं। जहां तक मुझे याद है, भारतीय समाज में भी पुराने समय में विवाहिता स्त्रियां शादी के बाद अपना पुराना नाम ही लिखती थीं। मिसाल के तौर पर मेरे नाना जी का नाम बाबू श्यामाचरण शरण था लेकिन मेरी नानी मिसेज शरण नहीं बल्कि अन्नपूर्णा देवी के नाम से जानी जाती थीं। मुझे भी अपना नाम बहुत पसंद है और शादी के पहले से ही मैं आईएएस अधिकारी थी और नृत्य के क्षेत्र में भी इसी नाम से मेरी पहचान थी। इसलिए शादी के बाद मैंने अपना नाम नहीं बदला। मेरे पति मूलत: ऑस्ट्रिया के रहने वाले हैं और उनका नाम हर्बट ट्रैक्सल है, लेकिन शादी के बाद मैंने अपना सरनेम नहीं बदला। शादी के बाद शुरुआत में जब मैं अपनी ससुराल ऑस्ट्रिया जाती थी और वहां के लोग मुझे मिसेज ट्रैक्सल कहकर बुलाते थे तो कई बार ऐसा भी होता था कि अपने इस नए नाम से परिचित नहीं होने के कारण अपना नया नाम सुनकर मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करती थी। तब मेरे पति मेरा खूब मजाक बनाया करते थे। लेकिन कभी भी मेरे पति या सास ने इस बात को लेकर कोई असहमति नहीं जाहिर की कि मैं अपने नाम के आगे उनका कुलनाम क्यों नहीं लगाती? हमारा एक ही बेटा है, मैंने उसका नाम एर्विन ईशान नारायण ट्रैक्सल रखा है। अभी 24 वर्ष की उम्र तक ऑफिशियली उसका यही नाम चल रहा है। बाद में अगर वह अपने इस नाम को छोटा करना चाहे तो यह उसकी मर्जी पर निर्भर करता है। वैसे जब वह भारत में होता है तो यहां उसके दोस्त उसे ईशान ट्रैक्सल के नाम से बुलाते हैं लेकिन ऑस्ट्रिया में परिवार के सदस्य और रिश्तेदार उसे एर्विन ट्रैक्सल के नाम से बुलाते हैं।
ऑस्ट्रिया में तो ऐसी दिलचस्प प्रथा है कि वहां के कुछ पुरुष भी शादी के बाद अपने नाम के साथ पत्नी का नाम या कुलनाम लगाते हैं। मेरे विचार से पति-पत्नी के बीच आपसी समझ और प्यार होना चाहिए नाम कोई बडा मुद्दा नहीं है। लेकिन इतना जरूर है कि यह किसी भी इंसान का नितांत व्यक्तिगत मामला है। इसलिए किसी भी लडकी को इस बात के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता कि शादी के बाद वह अपने नाम के साथ पति का सरनेम लगाए ही। साथ ही मेरे खयाल से पति-पत्नी के संबंध अच्छे होने चाहिए नाम कोई बडा मुद्दा नहीं है।
कानून की नजर में
शादी के बाद सरनेम बदलने के मुद्दे को लेकर लोगों के मन में कई तरह की भ्रांतियां हैं। ज्यादातर लडकियां ऐसा समझती हैं कि अगर उन्होंने शादी के बाद अपना पुराना कुलनाम नहीं बदला तो भविष्य में कानूनी रूप से उन्हें व्यावहारिक दिक्कतें आएंगी, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। आइए देखें इस मुद्दे पर कानून क्या कहता है :
1. शादी के बाद लडकी के लिए अपना सरनेम बदलने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है। भारत में हिंदू, मुस्लिम या ईसाई किसी भी वैवाहिक अधिनियम में शादी के बाद लडकी के लिए अपना कुलनाम बदलने की कोई बाध्यता नहीं है।
2.सामान्यत: शादी के बाद लडकियां अपना सरनेम या मिडिल नेम किसी कानूनी बाध्यता के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक रीति-रिवाजों और मान्यताओं की वजह से बदलती हैं।
ह्नशादी के बाद पुराने पासपोर्ट में भी लडकी को अपना सरनेम बदलने की कोई आवश्यकता नहीं होती। हां, पासपोर्ट में उसे अपनी वैवाहिक स्थिति का स्पष्टीकरण देना होता है और विवाह प्रमाण पत्र द्वारा यह प्रक्रिया पूरी हो जाती है।
3. शादी के बाद लडकियों को न तो ज्वॉइंट बैंक एकाउंट खोलने और न ही ज्वॉइंट प्रॉपर्टी खरीदने के लिए अपना सरनेम बदलने की कोई वैधानिक आवश्यकता है।
4. अंतरधार्मिक या विदेशी लडकी से विवाह करने पर भी नाम बदलने की कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है।
5. संपत्ति, जीवन बीमा या ऐसे किसी भी कार्य के लिए कुलनाम न बदलने की स्थिति में कोई भी कानूनी अडचन नहीं आती है।
6. निष्कर्ष के रूप में शादी के बाद भी अगर कोई लडकी अपना पैतृक कुलनाम ही चलने दे तो इससे उसके जीवन में कोई व्यावहारिक समस्या नहीं आएगी।
(गौतम अवस्थी, अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय ) |