परंपरागत धारणा बदल दी सास ने

      
परंपरागत धारणा बदल दी सास ने

मेरी परवरिश सामान्य मध्यवर्गीय परिवार में हुई है। मेरे माता-पिता मेरी शादी को लेकर बहुत चिंतित रहते थे। उसी दौरान संयोगवश मेरी सास मेरे विवाह का प्रस्ताव लेकर हमारे घर आई। इस विवाह प्रस्ताव के बारे में सुनकर मेरी मां असमंजस में पड गई, क्योंकि हमारे माता-पिता की तुलना में ससुराल वालों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी थी। मेरी मां ने यह जानने के बाद सोचा कि इतने अच्छे घर में रिश्ता करने पर लडके वाले ज्यादा दहेज भी तो मांगेंगे। मेरे माता-पिता के पास दहेज की रकम जुटाने के लिए पैसा नहीं था। सासू जी मेरी मां की मनोदशा भांप गई और उन्होंने मां को आश्वस्त करते हुए कहा, अगर आप एक जोडे में ही बेटी को विदा करेंगी तो भी हम स्वयं को धन्य समझेंगे। इतना कह कर उन्होंने रिश्ता तय कर दिया।

मेरे माता-पिता ने अपनी साम‌र्थ्य से बढकर बारात का स्वागत किया और दहेज भी दिया, लेकिन यह सब मेरी ससुराल पक्ष की पद-प्रतिष्ठा और आर्थिक स्तर को देखते हुए न के बराबर था। देखते ही देखते रिश्तेदारों की छींटाकशी शुरू हो गई। रिश्ते के एक मामा ने यह कह कर मेरे पति को बुरी तरह भडका दिया कि तुम्हारी ससुराल से तो तुम्हें एक घडी तक नहीं मिली। परिस्थिति विकट थी लेकिन मेरी सास ने बडी कुशलता से उसे संभाल लिया। उन्होंने सबके सामने दहेज का बैग खोलते हुए एक मखमली डिबिया में से एक घडी निकाली, फिर मेरे पति की कलाई पर बांधते हुए बोली, कौन कहता है कि लडके को घडी नहीं मिली? घडी तो मिली है और साथ में रिश्तेदारों को शगुन के तौर पर 21,000 रुपये नकद भी मिले हैं।

यह सुनकर मेरे मायके की बुराइयां करने वाले सभी रिश्तेदार चुप हो गए। मुझे बाद में पता चला कि सासू जी ने अपनी प्रिय सहेली के पति को 5,000 रुपये देकर एक अच्छी बै्रंड की घडी मंगवाकर बैग में बंद कर दी थी। 21,000 रुपये का लिफाफा भी उन्होंने अपनी तरफ से रख दिया था। अपनी सास का बडप्पन देखकर मेरी आंखें भर आई। मेरे माता-पिता का मान रखकर उन्होंने मेरे हृदय में अपना स्थान इतना ऊंचा बना लिया है कि आज भी वह मेरी सास नहीं, मां हैं और मैं उनकी बेटी हूं।

कैसे स्थापित करें सामंजस्य

सास-बहू का रिश्ता बेहद नाजुक होता है। इस रिश्ते में प्यार बरकरार रखने के लिए यह बहुत जरूरी है कि सास और बहू दोनों ही इसे बेहतर बनाने के लिए सकारात्मक ढंग से प्रयासरत हों। अगर आप अपने इस रिश्ते में मधुरता लाना चाहती हैं तो इन बातों का ध्यान जरूर रखें: 1. सास को बेटी और बहू के बीच भेदभाव नहीं करना चाहिए और न ही उसके मायके वालों की बुराई करनी चाहिए। बल्कि बहू को भी बेटी के समान प्यार करना चाहिए।

2. बहू को भी अपनी ससुराल और वहां के लोगों के मान-सम्मान का खयाल रखना चाहिए और मायके से ससुराल की तुलना कभी नहीं करनी चाहिए।

3. सास-बहू के बीच दो पीढियों का अंतर होने के कारण उनके बीच वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है लेकिन दोनों को एक-दूसरे को इतनी स्वतंत्रता जरूर देनी चाहिए कि वे अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें।

4. बहू की गलतियों पर ज्यादा रोक-टोककरने के बजाय उसे प्यार से समझाना चाहिए।

5. अगर सास-बहू दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करें और मिल-जुलकर रहें तो निश्चय ही वे एक-दूसरे के दिलों पर राज कर सकेंगी और उनका जीवन खुशियों से भर जाएगा।

सखी प्रतिनिधि
 
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