फिर छाएगा पौराणिक फिल्मों का दौर

      
फिर छाएगा पौराणिक फिल्मों का दौर

क्या आप जानते हैं कि दो साल की उम्र में ही मेरे फिल्मी सफर की शुरुआत हो गई थी? मैंने पौराणिक फिल्म वीर बबरुवाहन में काम किया था। इस फिल्म का निर्देशन मेरे पिता नानाभाई भट्ट ने किया था। उन्होंने ढेर सारी पौराणिक फिल्मों का निर्देशन किया। इस ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म की वह क्लिपिंग मेरी बेटी पूजा की कीमती धरोहर है। वह अपने दोस्तों को यह क्लिपिंग बडे उत्साह से दिखाती है। उसके दोस्त धोती पहने दो साल के बच्चे को देखकर विस्मित हो जाते हैं। उस क्लिपिंग में मैं एक चीते को छडी से मार रहा हूं। उनका विस्मय समझा जा सकता है। उनके लिए यह कल्पना भी करना मुश्किल है कि सारांश से दर्शकों को चौंका देने वाले निर्देशक ने कभी पौराणिक फिल्मों में स्वयं काम किया होगा, क्योंकि सारांश में पुनर्जन्म और देवी-देवता की धारणा की आलोचना की गई है। जबकि मेरे पिता पौराणिक फिल्में ही बनाकर आजीविका चलाते थे।

सिनेमाहॉल में चढता था चढावा

मेरे बचपन की यादों में हनुमान, भीम, रावण, सीता, राम और दूसरे देवी-देवताओं के बिंब हैं। अपने पिताजी के सेट पर मैं इन देवताओं से साक्षात मिल चुका हूं। उन दिनों भारतीय दर्शक सिनेमाघरों में पौराणिक और धार्मिक फिल्में उसी श्रद्धा और भक्ति से देखने जाते थे, जैसे मंदिर में जाते हैं।

मुझे अपने नेपाली नौकर बादल की अच्छी तरह याद है। रामायण रंगीन होकर आई थी तो वह मुझे साथ ले गया था। सिनेमाघर में दूसरे दर्शकों के साथ वह भी जय श्रीराम का उद्घोष करता रहा और जब सीता लक्ष्मण-रेखा पार करने वाली थीं तो वह दर्शकों के साथ सीता को सावधान कर रहा था। जब हनुमान ने अपनी जलती पूंछ से लंका में आग लगा दी तो वह भी खुशी से चिल्लाने लगा था। सिनेमाघर के बाहर धूप-अगरबत्ती जलाना और जूते-चप्पल बाहर उतार कर हॉल में जाने की बातें मैं पहले से सुनता रहा था। देहातों और कस्बों में पौराणिक फिल्मों का इतना गहरा असर था।

पौराणिक फिल्मों का दौर

क्या आप जानते हैं कि पहली भारतीय फिल्म पौराणिक ही थी। दादा साहब फालके ने 1913 में राजा हरिश्चंद्र का निर्माण किया था। फिल्मों केइतिहासकार बताते हैं कि दादा साहबने ज्यादातर पौराणिक फिल्में ही बनाई। उनकी प्रमुख फिल्मों में सत्यवान सावित्री, श्रीकृष्ण जन्म, लंका दहन और कालिया मर्दन का उल्लेख किया जाता है।

उस समय के दूसरे फिल्मकारों की तरह दादा साहब फालके इस तथ्य को अच्छी तरह समझते थे कि भारत धार्मिक और धर्मभीरु देश है। अपने देश में देवी-देवताओं की केवल पूजा ही नहीं होती, हम उन्हें मानव जीवन के आदर्श और गुणों के रूप में देखते हैं। हमारे पूर्वजों ने समझ लिया था कि भारत में पौराणिक फिल्में विफल नहीं हो सकतीं। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि भारतीय सिनेमा में ध्वनि आ जाने के बाद ऐसे लेखकों की मांग बढने लगी, जो धार्मिक और पौराणिक पुस्तकों की जानकारी रखते थे।

उनके बारे में अच्छी भाषा में लिख सकते थे। इन लेखकों के संवादों पर दर्शकों की उत्साहजनक प्रतिक्रियाएं मिलती थीं। शहरों के दर्शक पौराणिक फिल्में देखकर चकित रहते थे। इन फिल्मों में ही वे कलाकारों को पौराणिक वेशभूषा में संस्कृतनिष्ठ हिंदी बोलते सुन पाते थे।

जब गांधी ने राम राज्य देखी

अतीत के पन्नों में झांकते हुए एक वरिष्ठ फिल्म इतिहासकार ने बताया, पिछली सदी के आरंभ में ही फिल्म निर्माताओं ने समझ लिया था कि पौराणिक फिल्में सोने की खान हैं, जिसकी वे चाहे जितनी खुदाई कर लें, सोना खत्म नहीं होगा। उन्होंने आगे कहा, क्या आपको पता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अपने जीवन में एक ही फिल्म देखी थी, राम राज्य। राम राज्य का निर्माण विजय भट्ट ने किया था। वे तीसरे दशक के आरंभ में गुजरात से मुंबई आए थे।

इस फिल्म में काजोल की नानी शोभना समर्थ ने सीता की भूमिका निभाई थी। राम राज्य ने रिलीज होने के बाद देश भर में तहलका मचा दिया था। मुंबई के सुपर सिनेमा में यह फिल्म पूरे सौ हफ्ते चली थी।

पिछले लोकसभा चुनावों के लिए जब मैं एक राजनीतिक दल के प्रचार के लिए उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में था तो वहां एक बुजुर्ग ने मुझे विजय भट्ट का बेटा समझ लिया। उन्होंने आकर मुझसे कहा, मैंने तुम्हारे पिता की फिल्म राम राज्य बचपन में देखी थी। तुम वैसी फिल्में क्यों नहीं बनाते? तुम क्यों वाहियात सेक्सी फिल्में बनाते रहते हो? उस बुजुर्ग की मासूम सहजता ने मुझे भीतर तक छू लिया और मैंने महसूस किया कि मुंबई के फिल्मकार अपने देश के दर्शकों की जरूरतों से कितने दूर हैं?

भगवान बन गए थे कलाकार

मेरे पिता नाना भाई भट्ट की सबसे सफल फिल्म मीरा थी। देश के बंटवारे के तुरंत बाद बनी इस फिल्म की नायिका नीना थीं। पौराणिक फिल्मों केकलाकार मेरे घर आया करते थे। उन्हें वास्तविक जिंदगी में साधारण वेशभूषा में देख कर हम दंग रह जाते थे। उनमें से कुछ तो आज भी याद हैं। त्रिलोक कपूर हमेशा भगवान शिव की भूमिका निभाते थे। कलाकार जीवन हमेशा नारद की भूमिका में ही रहे। निरुपा राय और अनीता गुहा सीता की भूमिकाएं निभाती थीं।

असल जीवन में आधुनिक कपडों में इन देवी-देवताओं को देखकर हमें धोखा होता था। उन्हें पर्दे पर देवी-देवताओं के रूप में देखना ही हमें अच्छा लगता था। उनकी पहचान ही भगवान के रूप में बन गई थी।

मेरी सबसे प्रिय धुन एक पौराणिक फिल्म की है। जनम जनम के फेरे का गीत जरा सामने तो आओ छलिये, छुप-छुप छिपने में क्या राज है.. बिनाका गीत माला में हमेशा ऊंची पायदान पर रहा करता था। इसका संगीत एस.एन. त्रिपाठी ने तैयार किया था। ज्यादातर लोग नहीं जानते कि यह फिल्म मनमोहन देसाई ने लिखी और निर्देशित की थी। बाद में वे लोकप्रिय निर्देशक बने और अमिताभ बच्चन के साथ अमर अकबर एंथनी जैसी हिट फिल्म निर्देशित की।

सुपरहिट रही जय संतोषी मां

यादों के कई बुलबुले मचल रहे हैं। 1975 का साल है। मैं जय संतोषी मां के निर्माता के साथ घूम रहा हूं। मैंने अभी-अभी फिल्म इंडस्ट्री में कदम ही रखा है।

जय संतोषी मां एक ऐसी दुखी औरत की कहानी है, जिसे उसकी ननद बहुत परेशान करती है। संतोषी मां ही उसे उसके कष्टों से मुक्त करती हैं। यह फिल्म सुपर-सुपरहिट रही थी। फिल्म शोले के टक्कर की कमाई की थी इस फिल्म ने।

आज भी स्त्रियां इस फिल्म की कहानी और भक्ति-गीतों को याद करती हैं। हमारी कार को अचानक मनमोहन देसाई ने रोका। अपनी कार से उतर कर वे हमारी तरफ आए। उन्होंने जय संतोषी मां के निर्माता को गले से लगा लिया और उनसे कहा कि थोडी सी अपनी किस्मत दे दो। आगे फिर वह बोले, मैंने इतनी सारी फिल्में बनाई, लेकिन उनमें से कोई भी जय संतोषी मां जैसी कमाई नहीं कर सकी।

छोटे पर्दे पर धर्म

आठवें दशक में पौराणिक फिल्म की ताकत को निर्माताओं ने फिर से महसूस किया था। न जाने क्यों हिंदी फिल्मों की यह विधा अचानक लुप्त हो गई? क्या भारत में सभी नास्तिक हो गए हैं? ऐसा नहीं है। पौराणिक विषयों में दर्शकों की रुचि कम नहीं हुई है। एक विश्लेषक ने बताया, दर्शक अब छोटे पर्दे पर पौराणिक धारावाहिक देखते हैं।

याद करें कि रामानंद सागर के रामायण और बी. आर. चोपडा के महाभारत ने किस तरह देश भर के दर्शकों को एक सूत्र में बांध लिया था। सभी जानते हैं कि इन सीरियलों के प्रसारण के समय सडकें खाली हो जाती थीं। इससे पता चलता है कि सभी परिवर्तनों के बावजूद भारत अभी तक धार्मिक देश है।

फिर बनेगी रामायण

21वीं सदी में एनीमेशन फिल्मों में फिर से पौराणिक चरित्रों को विषय बनाया जा रहा है। हनुमान पर बनी एनीमेशन फिल्म दर्शकों ने पसंद की थी। एनीमेशन में और भी देवी-देवताओं पर फिल्में बनी हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि राज कुमार संतोषी 100 करोड की लागत से रामायण की योजना बना रहे हैं। इसमें अजय देवगन राम और काजोल सीता बनेंगी। आप देखें कि शोभना समर्थ से लेकर काजोल तक अभिनेत्रियों द्वारा सीता की भूमिका निभाने की परंपरा का निर्वाह होगा।

2013 में भारतीय फिल्म इंडस्ट्री 100 सालों की हो जाएगी। दादा साहब फालके ने 1913 में राजा हरिश्चंद्र बनाई थी। तबसे अधिक परिवर्तन नहीं हुआ है।

निस्संदेह ऋषियों, मुनियों और देवी-देवताओं के इस देश में जब भी कोई हिंदी फिल्मों का फिल्मकार पौराणिक विषयों पर आधारित फिल्में बनाएगा, वह जरूर कामयाब होगा। आखिरकार भारत धार्मिक देश है और हमारे पास विशाल पौराणिक साहित्य है। एक बडा दर्शक वर्ग है ऐसी फिल्मों का।

अजय ब्रह्मात्मज
 
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