मेरा+तुम्हारा =हमारा पैसा

      
मेरा+तुम्हारा =हमारा पैसा

भारतीय समाज में अब तक यह परंपरावादी धारणा चली आ रही थी कि धन अर्जित करना पति की जिम्मेदारी है और घर को सुव्यवस्थित रूप से चलाने का दायित्व पत्नी का होता है। लेकिन समय के साथ भारतीय स्त्री ने रोटी बनाने के साथ रोटी कमाने की कला में भी महारत हासिल कर ली।

पुराने समय में यह कहा जाता था कि आदमी सिर्फ पैसे कमाना जानता है, जोडना नहीं। तोल-मोल कर पैसे खर्च करने और एक-एक पैसा जोड कर गृहस्थी चलाने की कला सिर्फ स्त्रियों को ही आती है। अगर आज के संदर्भ में देखा जाए तो अब कहा जा सकता है कि स्त्री सिर्फ सोच-समझकर खर्च करना ही नहीं, बल्कि कमाना भी जानती है।

आज के शहरी मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों का यह फील गुड फैक्टर है कि परिवार में एक की जगह दो लोगों की कमाई आने लगी, डिनर के लिए वीकेंड में बाहर जाने, शो विंडो पर हाथ रखते ही बच्चे को उसका मनपसंद खिलौना दिलाने, अपने लिए मोबाइल का लेटेस्ट मॉडल खरीदने जैसी छोटी-छोटी खुशियों के लिए अब लोगों को मन मसोस कर नहीं रहना पडता। जाहिर सी बात है, दो लोगों की आमदनी का मतलब है, दोगुनी सुख-सुविधाएं और ज्यादा आरामदायक जिंदगी। लेकिन इस फील गुड फैक्टर में सब कुछ अच्छा-अच्छा ही नहीं है बल्कि इसका एक स्याह पहलू भी है। आज परिवार में स्त्री की परंपरागत भूमिका बदल गई है और वह दोहरी जिम्मेदारियां निभा रही है। उसे नौकरी के साथ-साथ घर के कामकाज और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारियां भी पहले की ही तरह निभानी पडती हैं। आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद परंपरागत जिम्मेदारियों के मामले में उसे कोई रियायत नहीं मिली है। आज की स्त्री तो समय के साथ चलना सीख गई है, लेकिन भारतीय पुरुष आज भी अपनी पारंपरिक मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है। उसे पत्नी से यही अपेक्षा होती है कि वह नौकरी के साथ-साथ आज भी पुराने जमाने की पत्नी की तरह घर के सारे काम खुद करे।

दांपत्य का अर्थशास्त्र

अब तक पारंपरिक भारतीय परिवारों में जब केवल पति कमाता था तो घर में उसी का सिक्का चलता था। लेकिन जब पत्नी भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो गई तब परिवार में उसका भी आर्थिक योगदान महत्वपूर्ण हो गया। इससे उसके भीतर आत्मविश्वास का विकास हुआ है और अब वह अपनी मनपसंद चीजों के लिए पति से दबी जुबान में फरमाइश करने वाली परंपरागत पत्नी नहीं रह गई है, बल्कि वह अपने शौक और जरूरतों पर खुल कर खर्च करती है। इस संबंध में मनोवैज्ञानिक डॉ.अशुम गुप्ता कहती हैं, पति-पत्नी के आपसी रिश्ते पर आर्थिक मुद्दों का बहुत गहरा प्रभाव पडता है। परिवार में जो व्यक्ति आर्थिक रूप से ज्यादा सक्षम होता है, उसकी स्थिति ज्यादा मजबूत होती है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे पॉवर रिलेशन कहा जाता है। पहले पति निर्विवाद रूप से परिवार का मुखिया होता था, पत्नी और बच्चे उसकी हर बात सिर झुका कर मानते थे, लेकिन आज स्थिति बदल गई है। अपना आर्थिक सहयोग देकर पत्नी भी परिवार को चलाने में समान रूप से भागीदार है। इससे परिवार और समाज में उसकी स्थिति सुदृढ हुई है। आज के बच्चों की नजरों में मां का सम्मान पहले से कहीं ज्यादा बढ गया है, क्योंकि आज की मां बच्चे के लिए खाना बनाने, उसका होमवर्क करवाने से लेकर उसके स्कूल की फीस जुटाने तक सारे काम खुद करती है।

बात सिर्फ पैसों की नहीं

आर्थिक आजादी का यह मामला सिर्फ पैसे कमाने और मनचाहे ढंग से खर्च करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे स्त्री का आत्मविश्वास बढा है और अब वह स्वयं या अपने परिवार से जुडे बडे निर्णय खुद लेने का हौसला रखती है। इस संबंध में बैंक में कार्यरत मंजूषा अग्रवाल कहती हैं, मेरी मां अल्प शिक्षित गृहिणी थीं, उनका सपना था कि उनकी बेटी डॉक्टर बने। पीएमटी में मेरा चुनाव भी हो गया था, लेकिन मेरे पिता मुझे पढने के लिए हॉस्टल भेजने को तैयार नहीं थे। उनकी मर्जी के आगे मां कुछ बोल नहीं पाई। लेकिन जब मेरी बेटी ने एमबीए करने की इच्छा जाहिर कि तो पति की आपत्ति के बावजूद मैंने उसका साथ दिया और आज वह अहमदाबाद स्थित आईआईएम से एमबीए कर रही है। ऐसा इसलिए संभव हुआ क्योंकि अपनी बेटी की पढाई का खर्च उठाने में मैं सक्षम हूं। आर्थिक आत्मनिर्भरता स्त्री की बहुत बडी ताकत है। इससे परिवार और समाज उसे सम्मानजनक दर्जा देता है। अगर पत्नी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो तो पति चाह कर भी हर मामले में अपनी मनमर्जी नहीं चला सकता।

असली मुद्दा है अहं का

समाज चाहे कितना ही आधुनिक क्यों न हो जाए, लेकिन स्त्रियों के प्रति पुरुषों के दृष्टिकोण में अभी भी ज्यादा बदलाव नहीं आया है। अगर परिवार में पति-पत्नी दोनों ही बराबर कमाते हों तब भी अपने पुरुषवादी अहं के कारण पति यही मानता है कि मेरा परिवार मेरी मर्जी से चलना चाहिए।

इस संबंध में इंटर कॉलेज की शिक्षिका संगीता (परिवर्तित नाम) कहती हैं, मेरे पति वैसे तो बहुत के अरिंग स्वभाव के हैं, लेकिन आर्थिक मामलों में उनका व्यवहार बडा ही अजीब है। मेरी शादी के आठ साल हो चुके हैं, लेकिन वह मुझे बैंक से मेरी तनख्वाह निकालने ही नहीं देते। उनका कहना है कि तुम मुझे बताया करो कि तुम्हें क्या चाहिए। मैं तुम्हारी और बच्चों की सारी जरूरतें पूरी करूंगा। अपने पैसों को तुम बचत मान लो। हालांकि वह मेरी सारी जरूरतें पूरी करते हैं, लेकिन खुद कमाने के बावजूद इस तरह उन पर निर्भर रहना मुझे अच्छा नहीं लगता। अगर मुझे अपने लिए मनपसंद ज्यूलरी खरीदनी हो या छोटी बहन के बर्थडे में उसे कोई उपहार देना हो तो मैं संकोचवश उनसे नहीं कह पाती। इन आठ वर्षो में मैंने अपने पति के व्यक्तित्व को जितना समझा है, उससे तो यही लगता है कि वह केवल अपने अहं की संतुष्टि के लिए ऐसा करते हैं।

डॉ. अशुम गुप्ता के अनुसार, पुरुष के लिए उसका अहं बहुत अधिक मायने रखता है। पत्नी के नौकरी करने से परिवार के जीवन स्तर में होने वाला सुधार तो पति को पसंद है, लेकिन उसे यह बात हर्गिज गवारा नहीं कि करियर की सफलता की दौड में पत्नी उससे आगे निकल जाए या उससे अधिक पैसे कमाए। सच तो यह है कि आज भी आम भारतीय परिवारों के लिए सुखद और संतुलित स्थिति वही है- जिसमें पत्नी कमाए तो जरूर लेकिन उसकी आय पति से कम हो। कुछ दिनों पहले मेरे पास एक दंपती का मामला आया था, जिसमें पत्नी एक एमएनसी में काम करती थी और प्रमोशन के बाद उसकी आय पति से ज्यादा हो गई थी। इस बात को लेकर पति का व्यवहार बहुत चिडचिडा हो गया था और वह अपनी नाराजगी का असली कारण बताने के बजाय मुझसे यह शिकायत कर रहा था कि मेरी पत्नी अब घर को जयादा समय नहीं दे पाएगी। इसलिए उसे अपनी नौकरी छोड देनी चाहिए।

फर्क मानसिकता का

दांपत्य जीवन के आर्थिक मुद्दों के संबंध में स्त्री और पुरुष का मनोविज्ञान अलग-अलग ढंग से काम करता है। डॉ.अशुम गुप्ता के मुताबिक, अध्ययनों से यह साबित होता है कि भारतीय पुरुष अपनी व्यक्तिगत जरूरतों पर खर्च करना ज्यादा पसंद करते हैं और इसके बारे में वे पत्नी को बताना नहीं चाहते। जबकि स्त्रियों का स्वभाव बहुत केअरिंग होता है। इसलिए वे पति, बच्चों, रिश्तेदारों और दोस्तों पर खर्च करना ज्यादा पसंद करती हैं। साथ ही स्त्रियों में मोल-भाव करके सामान खरीदने, कम पैसे में घर का खर्च चलाने जैसे स्वाभाविक गुण जन्मजात रूप से पाए जाते हैं। स्त्री के मन में एक तरह की स्थायी असुरक्षा की भावना भी होती है। वह हमेशा परिवार की आकस्मिक जरूरतों के बारे में सोचती है और उनके लिए वह कुछ न कुछ बचाती भी है। वैसे भी, भारतीय स्त्रियों में पति से छिपाकर बचत करने की आदत बहुत पुरानी रही है।

स्त्री-पुरुष की मानसिकता के इसी फर्क के कारण हर दंपती के बीच आर्थिक मुद्दों को लेकर थोडा-बहुत मतभेद स्वाभाविक है। कुछ अलग-अलग क्षेत्रों में सफलता के शीर्ष पर विराजमान मशहूर हस्तियां अपने दांपत्य जीवन के आर्थिक पहलू से जुडे अनुभवों को बांट रही हैं, सखी के साथ...

माना से लेता हूं पॉकेटमनी- सुनील शेट्टी, अभिनेता

मेरी पत्नी माना एक सफल ड्रेस डिजाइनर है और वह अपनी बुटीक भी चलाती है। उसने मेरी कई फिल्मों के लिए ड्रेस डिजाइनिंग का काम किया है। वह मेरे लिए कुछ स्टेज शोज भी आर्गेनाइज कर चुकी है। माना मल्टी टास्किंग वुमन है। मैंने अब तक जितना भी कमाया, सब माना को ही सौंपा है। एक वक्त ऐसा भी था, जब मेरे पास बहुत ज्यादा फिल्में होती थीं। तब मैं अति व्यस्त रहता था और मेरे पास घर के लिए जरा भी वक्त नहीं होता था। ऐसी स्थिति में गृहस्थी चलाने और पैसे खर्च करने की पूरी जिम्मेदारी माना पर होती थी।

पहले मेरे पिता परिवार के सारे खर्चे उठाते थे और पैसों का हिसाब-किताब भी वही रखते थे। शादी के बाद माना ने खुद-ब-खुद यह जिम्मेदारी उठाई। पैसों के मामले में हमारे बीच कोई दुराव-छिपाव नहीं है। मेरे सारे पैसे माना के ही पास होते हैं। जहां तक संभव हो हम दोनों क्रेडिट कार्ड और एटीएम के झंझट से दूर रहने की कोशिश करते हैं। घर के खर्च से जुडे सभी मामले, चाहे वह बच्चों की स्कूल फीस हो या घर के अन्य खर्च, यह सब कुछ माना ही देखती है। यहां तक कि मैं भी अपनी पॉकेटमनी माना से ही मांगता हूं लेकिन जब मैं अपने दोनों बच्चों आतिया और आहान को पॉकेटमनी देना चाहता हूं तो माना मुझे ऐसा करने से रोक देती है। उसका कहना है कि बच्चों को पॉकेटमनी देकर उनकी आदतें नहीं बिगाडनी चाहिए। उन्हें इस बात का एहसास होना चाहिए कि कडी मेहनत करने के बाद ही पैसा मिलता है और पैसे की कद्र करनी चाहिए।

माना तो इतनी अनुशासित है कि प्यास लगने पर वह कोल्डड्रिंक खरीदकर पीने के खिलाफहै। उसका कहना है कि पानी की जगह कोल्डड्रिंक पीना पैसे और सेहत दोनों की बर्बादी है। इन मुद्दों के लेकर कभी-कभी हमारे बीच हल्की झडप हो जाती है। बच्चों की पढाई उसकी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे ऊपर है। इसकेलिए वह दूसरे खर्चो में कटौती करने को भी तैयार रहती है।

जहां तक निवेश का सवाल है, हम दोनों ही इस मामले में रिस्क लेने के बजाय सेफ इनवेस्टमेंट में यकीन रखते हैं। माना इतना सोच-समझकर खर्च करती है कि उसकी वजह से मुझे कभी भी आर्थिक तंगी महसूस नहीं हुई।

सोच-समझकर खर्च करते हैं हम- संजीव कपूर, शेफ

यदि मैं कुकिंग एक्सपर्ट हूं तो मेरी पत्नी अल्यूना गृहस्थी चलाने में माहिर है। आज वह प्रकाशक केरूप में अपनी पहचान बना चुकी है। उसने रेसिपीज पर आधारित कई किताबों का प्रकाशन किया है। आम तौर पर हर महीने की शुरुआत में मेरी पत्नी परिवार का बजट बनाती है। घर के सारे खर्च वही करती है। मैंने कभी यह जानने की कोशिश नहीं की कि इस बढती महंगाई में वह किस तरह घर का खर्च चला रही है। एटीएम कार्ड के मामले में हम दोनों का यह मानना है कि इसका सीमित इस्तेमाल करना चाहिए वरना पैसे की बर्बादी होती है। स्टाफ की सेलरी से लेकर ऑफिस की मेंटेनेंस तक सभी खचरें की जिम्मेदारी अल्यूना की है और वह इस काम को कई बरसों से बहुत अच्छी तरह संभाल रही है। एक साथ ऑफिस और घर संभालना कोई आसान काम नहीं है। हमारे घर में हर तरह के बिल भरने का जिम्मा भी अल्यूना का ही है। इनवेस्ट्मेंटस का सारा काम वही देखती है। आर्थिक मामलों से जुडे कुछ बडे निर्णय हम दोनों मिलकर ले लेते हैं। वह बच्चों के स्कूल की फीस हमेशा साल की शुरुआत में ही एडवांस में जमा करा देती है, ताकि अचानक बीच में कोई दूसरा खर्च आ भी जाए तो उसकी वजह से उनकी पढाई का नुकसान न हो। मुझे बचपन से यही सिखाया गया था कि अपनी चादर देखकर ही पैर फैलाओ और अल्यूना भी इसी बात पर विश्वास करती है। इसलिए हमें कभी भी आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पडा। छुट्टियों के दौरान हम अकसर सपरिवार घूमने के लिए विदेश जाते हैं, पर मेरी पत्नी को आम औरतों की तरह अनाप-शनाप शॉपिंग करना बिलकुल पसंद नहीं है। हम खर्चे को अपना स्टेटस सिंबल नहीं मानते। विदेश जाने के बाद वहां हम थ्री स्टार होटलों में ठहरते हैं। हमने अपने बच्चों को भी यही सिखाया है कि वे पैसे बर्बाद न करें। किसी भी अनावश्यक खरीदारी की जिद न करें। यहां तक कि मैं अन्न की बर्बादी को भी पाप समझता हूं और अगर किसी कारण से हमारे घर में खाना बच भी जाता है तो दूसरे दिन उसे खाने में मुझे या मेरे परिवार को कभी कोई परेशानी नहीं होती।

घर की फाइनेंस मिनिस्टर हूं मैं- पायल कपूर, इंटीरियर डिजाइनर

मेरे घर की सारी अर्थव्यवस्था के संचालन की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है। मेरे पति अजय कपूर नार्थ दिल्ली पॉवर लिमिटेड के वाइस प्रेसीडेंट और चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर हैं। वह अपनी प्रोफेशनल लाइफ में बहुत ज्यादा व्यस्त रहते हैं। मेरा अपना बिजनेस है। इसलिए मैं अपने काम और घर को अपनी सहूलियत से खुद एक साथ मैनेज कर लेती हूं। घर का बजट भी मैं ही बनाती हूं। ऑफिस और घर के स्टाफ की सैलरी, महीने का राशन, दूध, फल-सब्जियां और इसके अलावा गृहस्थी को चलाने के लिए रोजमर्रा के जितने भी खर्चे होते हैं, उन्हें उठाने की जिम्मेदारी मेरी होती है। यूं कहा जा सकता है कि मैं घर की फाइनेंस मिनिस्टर हूं। किचन की जरूरत की चीजें और राशन महीने में एक ही बार खरीदती हूं, क्योंकि इससे बचत होती है। मैं फिजूलखर्ची में विश्वास नहीं करती। शॉपिंग के लिए कभी भी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल नहीं करती। जहां तक संभव होता है चेक से पेमेंट करने की कोशिश करती हूं। अपने पास बहुत ज्यादा कैश भी नहीं रखती। मैं बहुत सोच-समझकर खर्च करती हूं और जितना संभव हो आकस्मिक जरूरतों के लिए थोडी-बहुत बचत भी कर लेती हूं। मैं बिजनेस के क्षेत्र में हूं। इसमें हर महीने की आमदनी निश्चित नहीं होती। इसलिए मैं हमेशा इस बात का ध्यान रखती हूं कि जहां जरूरी हो वहीं खर्च किया जाए। मेरी तुलना में मेरे पति का हाथ खुला है और कई बार वह बिना सोचे-समझे बहुत ज्यादा खर्च कर देते हैं। हम दोनों अपने पैसे अलग-अलग रखते हैं और खुद अपनी जरूरतों पर खर्च करते हैं। हम अपनी बचत भी अलग करते हैं। मेरे पति को मेरी आमदनी के बारे में जानकारी होती है लेकिन मुझे उनकी सेलरी के बारे में ज्यादा पता नहीं होता और न ही मुझे आम पत्नियों की तरह पूछताछ करने की आदत है।

जहां तक इनवेस्टमेंट का सवाल है तो टैक्स की बचत के लिहाज से ज्यादातर निवेश मेरे पति ही करते हैं। मुझे घर की सजावट की चीजें खरीदने और घर सजाने का शौक है तो मेरे पति को इलेक्ट्रॉनिक्स की चीजें ज्यादा पसंद हैं। हम दोनों अपने पैसों से अपने शौक पूरे करते हैं। आर्थिक मामलों में हम स्वतंत्र होते हुए भी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। मेरे पति को एकाउंट्स की बहुत जानकारी है। इसलिए कोई भी बडा निवेश मैं उन्हीं की सलाह पर करती हूं।

बचाती हूं आकस्मिक जरूरतों के लिए- इशी खोसला, डाइटीशियन

आर्थिक मामलों में हमारे संबंध बेहद सुलझे हुए हैं। मेरे पति गगन खोसला अपनी फाइनेंस कंपनी चलाते हैं। गृहस्थी की जिम्मेदारियां हम दोनों मिलकर उठाते हैं। परिवार का बजट बनाने में भी हम दोनों का योगदान होता है। लेकिन प्रॉपर्टी, लोन, टैक्स, गाडी, इनवेस्टमेंट जैसे मामलों में मैं अपना सिर नहीं खपा सकती। इसलिए इनके बारे में मेरे पति ही निर्णय लेते हैं। खर्च के मामले में हम दोनों का हाथ बेहद खुला है। लेकिन पैसों केमामले में मैं अपने पति की तुलना में ज्यादा लापरवाह हूं अपने पैसे गिन कर कभी नहीं रखती पर मेरे पति थोडा सोच-समझकर खर्च करते हैं। हाथ खुला होने के बावजूद मैं आकस्मिक जरूरतों के लिए कुछ पैसे बचाकर जरूर रखती हूं। खुद कमाने के बाद भी आम स्त्रियों की तरह मुझे अपने पति से ज्यूलरी की फरमाइश करना बहुत अच्छा लगता है। मैं अपने पैसे अपने पास जरूर रखती हूं, लेकिन साधिकार भाव से पति से गिफ्ट या पैसे लेना मुझे बहुत अच्छा लगता है। पैसों को लेकर हमारे बीच हल्की-फुल्की नोक-झोंक भी चलती रहती है। जब हम सपरिवार कहीं घूमने जाने की तैयारी कर रहे होते हैं तो पैसे कौन खर्च करेगा इस बात को लेकर हमारे बीच हल्की-फुल्की बहस होती है। अगर पति कोई चीज दिलाने में आनाकानी करते हैं तो मुझे गुस्सा आ जाता है और मैं खुद अपने पैसों से अपनी पसंद की सारी चीजें खरीद लेती हूं। मेरा मानना है कि पति-पत्नी के बीच होने वाली हल्की-फुल्की नोक-झोंक दांपत्य जीवन को जीवंत बनाए रखती है।

आर्थिक संकट से उबारा पत्नी ने- डॉ. केकी मेहता, नेत्र रोग विशेषज्ञ

मेरी अपनी आई क्लीनिक है। मेरी पत्नी झेनोबिया कॉन्टेक्ट लेंस स्पेशलिस्ट है। अपनी व्यस्तता के बावजूद मेरी पत्नी घर-गृहस्थी और अस्पताल के आर्थिक मामलों को बडी कुशलता से संभालती है। हमारा पेशा ऐसा है कि कभी मेरी आय उससे ज्यादा होती है तो कभी उसकी आमदनी मुझसे ज्यादा हो जाती है, पर इस मुद्दे को लेकर कभी भी हमारे बीच अहं का टकराव नहीं होता। हम बजट बनाने से लेकर, खर्च का हिसाब तक सब कुछ कंप्यूटर पर करते हैं, जिससे हमारा काम व्यवस्थित रहता है और जब चाहें अपने खर्च का हिसाब देख सकते हैं। शादी के शुरुआती दिनों में जब पैसों की कमी रहती थी तब एक-एक पैसे की बडी कीमत थी। तब मेरी पत्नी ने बडी कुशलता से खर्च में कटौती करके मुझे आर्थिक संकट से उबारा। उसने शुरू से ही इस बात का खास ध्यान रखा कि बेवजह खर्चो को कैसे टाला जाए।

छोटे इनवेस्टमेंट हम अलग-अलग करते हैं लेकिन बडे इनवेस्टमेंट हम मिल-जुलकर करते हैं। हम दोनों अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग विदेश जाने पर ही करते हैं।

बराबर की भागीदारी है हमारी- अपर्णा भारद्वाज, अधिवक्ता सर्वोच्च न्यायालय

हम पति-पत्नी दोनों वकील हैं। हर महीने हमारी आमदनी निश्चित नहीं होती। इसलिए हम आर्थिक मामलों में किसी खास नियम से बंधे नहीं होते। मेरे पति राजेश त्यागी भी मेरी ही तरह आर्थिक मामलों में बेहद उदार हैं। घर का बजट बनाने में हम दोनों की बराबर की भागीदारी होती है।

परिवार का बजट बनाते समय हमारी प्राथमिकता सूची में सबसे ऊपर किताबें होती हैं, क्योंकि हम दोनों को पढने का बहुत शौक है। फिर हमारा काम भी कुछ ऐसा है कि हमें किताबों की बहुत जरूरत होती है। हम दोनों का अलग बैंक एकाउंट है, लेकिन पैसों के मामले में हमारे बीच पूरी पारदर्शिता है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा था किहर महीने हमारी आमदनी निश्चित नहीं होती, इसलिए जिस महीने, जिसके एकाउंट में ज्यादा पैसे होते हैं, बडे पेमेंट जैसे- बिजली का बिल, एलआईसी का प्रीमियम आदि उसी के एकाउंट से दिया जाता है।

आमतौर पर किचन और घर से जुडे अन्य छोटे-छोटे खर्च मैं खुद अपने पैसों से पूरा कर लेती हूं। अगर कभी मेरे पास पैसे कम पड जाते हैं तो पति से मांग लेती हूं। कहने का अर्थ यह है कि वित्तीय मामलों में बराबर की भागीदारी है हमारी। मेरी बेटी दसवीं क्लास में पढती है। मैं उसे कोई पॉकेटमनी नहीं देती। उसे जब पैसों की जरूरत होती है, वह मुझसे मांग लेती है। हम दोनों बहुत ज्यादा बचत या इनवेस्टमेंट में यकीन नहीं करते, लेकिन जब भी घर के लिए कोई बडा सामान खरीदना होता है तो उसके पहले हम आपस में सलाह-मशविरा जरूर कर लेते हैं।

मुझे ऐसा महसूस होता है कि स्त्रियों की आर्थिकस्वतंत्रता का स्पष्ट प्रभाव उनके दांपत्य जीवन पर भी देखने को मिलता है। पहले परिवार से संबंधित सभी निर्णय पुरुष ही लिया करते थे और निर्णय प्रक्रिया में (खास तौर से वित्तीय मामलों में) स्त्रियों की भागीदारी नहीं के बराबर होती थी। लेकिन आज की स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है। इसलिए परिवार से जुडे हर छोटे-बडे निर्णय पर उसकी राय बहुत मायने रखती है और पैसे खर्च करने के मामले में वह पति के बराबर की भागीदार होती है।

पसंद नहीं, पैसों को लेकर बहस- शक्ति आनंद, टीवी कलाकार

मेरे घर में पैसों का हिसाब मैं नहीं मेरी पत्नी सई रखती है। मेरा मानना है कि भारतीय समाज में सदियों से चली आ रही यह परंपरा अपने आपमें सही भी है। क्योंकि एक स्त्री ही घर को अच्छी तरह संभाल सकती है। पुरुष के लिए यह काम बहुत मुश्किल होता है। लिहाजा मेरी पत्नी भी अपना यह फर्ज बखूबी अदा करती है।

वैसे घर के खर्च की जिम्मेदारी हम दोनों की ही है। लेकिन मैं इन बातों पर अधिक ध्यान नहीं दे पाता। पैसों को लेकर मैं ज्यादा चिक-चिक पसंद नहीं करता।

मुझे पता है कि सई बहुत समझदार है। वह उतना ही खर्च करेगी, जितनी उसकी जरूरत होगी। अगर वह कभी घर के खर्च के बारे में मुझे कुछ बताने की कोशिश भी करती है तो मेरे पास सुनने का समय नहीं होता।

पैसों के मामले में हमारे बीच बेहद खुलापन है। जब भी जरूरत होती है, हम दोनों एक-दूसरे का एटीएम कार्ड इस्तेमाल कर लेते हैं। घर का बजट सई ही बनाती है। हम दोनों का ज्वाइंट एकाउंट है। जिसको जब जरूरत होती है, वह पैसे निकाल लेता है।

सई बहुत व्यवहार कुशल है और घर आने वाले मेहमानों की बहुत अच्छी तरह आवभगत करती है। रिश्तेदार चाहे मेरी तरफ के हों या उसके मायके के , वहसबका बहुत अच्छी तरह खयाल रखती है। पैसों को लेकर मैं अधिक बहस नहीं करता, क्योंकि जब हमारी शादी हुई थी तभी हमने यह निश्चय कर लिया था कि हम पैसों को हम बहुत ज्यादा अहमियत नहीं देंगे। इससे रिश्ते में कडवाहट आती है। इस मामले में सई भी बहुत उदार है।

जहां तक बडी इनवेस्टमेंट का सवाल है, इस पर हम दोनों की ही सहमति होती है। लेकिन मैं किसी भी इनवेस्टमेंट पर थोडी जांच-परख करता हूं, ताकि बाद में कोई नुकसान न हो। फलस्वरूप मुझे अधिक परेशानी नहीं होती। हमारे क्षेत्र में कभी भी किसी की आय निश्चित नहीं होती।

इसलिए जब कभी सई की आमदनी मुझसे अधिक होती है तो इससे मेरे अहं को कोई ठेस नहीं पहुंचती क्योंकि हमारे संबंधों में बहुत खुलापन है।

लिखकर रखती हूं हिसाब- डॉ. सोमा घोष, शास्त्रीय गायिका

मैं पैसों के मामले में शुरु से ही थोडी लापरवाह किस्म की रही हूं। हिसाब नहीं रख पाती। जहां जैसी जरूरत होती है, खर्च करती हूं। पहले मैं खर्च का हिसाब लिखकर नहीं रखती थी। फलस्वरूप किसे कितना देना है या किसने कितना दिया है, यह भूल जाती थी। एक रोज मेरे ससुर जी ने मुझे समझाया कि खर्च का हिसाब लिखकर रखना हमेशा फायदेमंद होता है। उसके बाद से मैं खर्च का हिसाब लिखकर रखती हूं और इससे मुझे बहुत आसानी होती है। घर के खर्चे की जिम्मेदारी हम दोनों की ही होती है।

मेरे पति शुभंकर घोष संगीतकार हैं और हम दोनों को एक-दूसरे की आमदनी के बारे में पता होता है। मेरे पास एटीएम कार्ड है पर मैं ज्यादा टेक्नोलॉजी फ्रेंड्ली नहीं हूं इसलिए मैं उसका ज्यादा इस्तेमाल नहीं कर पाती। परिवार का बजट बनाने में पति की मुख्य भूमिका होती है। हम दोनों का ज्वाइंट एकाउंट है और जब जिसे जरूरत होती है, वह पैसे निकाल लेता है। रिश्तेदारों की आवभगत की पूरी जिम्मेदारी मेरी होती है। क्योंकि कहां क्या खर्च करना है, यह मुझे पता होता है।

मैं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर जरूर हूं, लेकिन घर का खर्च चलाने के लिए पैसे देने की जिम्मेदारी मेरे पति की होती है। मेरे विचार से हमारी यह भारतीय परंपरा अपने आपमें बहुत अच्छी है, जिससे स्त्री को घर में पूरा सम्मान मिलता है। जब हमारे सामने खर्च बहुत ज्यादा होता है और पैसे कम होते हैं तो हमारे बीच हल्की-फुल्की नोक-झोंक हो ही जाती है। जैसा कि अकसर हम कलाकारों के साथ होता है। हमारे जीवन में भी कई बार ऐसा दौर आया जब हमें आर्थिक तंगी के दौर से गुजरना पडा। हम दोनों ने बडी मुश्किल से अपने जरूरी खर्चो में कटौती की, तब जाकर संकट से बाहर निकल पाए। जहां तक इनवेस्टमेंट का सवाल है तो बडी इनवेस्टमेंट पर हम दोनों मिलकर खर्च करते हैं। बच्चों की पॉकेटमनी का हिसाब मेरे पति ही रखते हैं।

मुझे ऐसा नहीं लगता कि मेरी आमदनी ज्यादा होने के कारण मेरे पति के अहं को ठेस पहुंचती है, बल्कि इससे उन्हें खुशी मिलती है कि उनकी पत्नी घर में आर्थिक सहयोग दे रही है।

अच्छा नहीं लगता पति से मांगना- जरीना वहाब, अभिनेत्री

मेरी अम्मी बहुत अच्छी तरह गृहस्थी चलाती थीं। उन्हें देखकर ही मैंने भी अपना घर संभालना सीखा है। जहां तक मेरी गृहस्थी का सवाल है, मेरे पति आदित्य पंचोली वैसे तो बहुत अच्छे इंसान हैं लेकिन घर-गृहस्थी के काम वह बिलकुल नहीं कर पाते। सब कुछ मुझे ही संभालना पडता है। जहां तक मेरे और आदित्य दोनों के पारिश्रमिक की बात है, आदित्य मुझे घर चलाने के लिए एक निश्चित रकम दे देते हैं। बचत की कोशिश मेरी ही तरफ से होती है। हम दोनों का जॉइंट एकाउंट है। मैं एटीएम पर ज्यादा विश्वास नहीं करती। आदित्य अपने रोज के खर्चे किस तरह मैनेज करते हैं, इस बारे में मुझे ज्यादा जानकारी नहीं होती। पैसों के मामले में हम दोनों के बीच पूरी पारदर्शिता है। पर मुझे लगता है कि पैसों को लेकर एक-दूसरे से ज्यादा पूछताछ करना ठीक नहीं है। हम दोनों एक-दूसरे पर पूरा विश्वास करते हैं। अकसर मैं हर तीन महीने में एक बार सुपर मार्केट जाती हूं और रोजमर्रा जरूरत की चीजें खरीद लाती हूं। हर महीने के यूटीलिटी बिल्स का ध्यान मैं ही रखती हूं। हां, एक बार हम दोनों शूटिंग के सिलसिले में मुंबई से बाहर थे और आदित्य इलेक्ट्रिक बिल जमा कराना भूल गए, जिसके कारण हमारे घर से बिजली का कनेक्शन काट दिया गया। इसके बाद से ये सारे काम मैं खुद करती हूं। मैंने 17 साल की उम्र से मॉडलिंग शुरू की और बहुत जल्दी अपने पैरों पर खडी हो गई। इसलिए मुझे अपने खर्चो के लिए कभी भी किसी से कुछ मांगने की आदत नहीं रही। मैंने कुछ इनवेस्टमेंट रिअल एस्टेट में किया है तो आदित्य ने स्टॉक मार्केट में। बडी इनवेस्टमेंट के लिए हम एक-दूसरे से सलाह-मशविरा जरूर करते हैं।

मुझे ऐसा लगता है कि पति की आमदनी चाहे कितनी ही अधिक क्यों न हो लेकिन हर स्त्री को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर जरूर होना चाहिए ताकि उसे अपने रोजमर्रा खर्च के लिए पति से पैसे मांगने की जरूरत न पडे।

साक्षात्कार: मुंबई से पूजा सामंत, सोमा घोष, एस. सुशीला एवं दिल्ली से विनीता

विनीता
 
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