बोझ बन गया है जीवन

      
बोझ बन गया है जीवन

अपने जीवन में जब मैं पीछे मुडकर देखती हूं तो मुझे ऐसा लगता है अब तक हम इसी उम्मीद पर जी रहे थे कि जब बच्चे पढ-लिखकर बडे हो जाएंगे तो हमारे सारे दुख दूर हो जाएंगे। मेरे पति प्राइमरी स्कूल में अध्यापक थे। घर की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी फिर भी हमने बडी मुश्किलें झेलकर अपने तीनों बेटों की अच्छी परवरिश की। उन्हें अच्छे स्कूल-कॉलेज में पढाया। अब तीनों उच्च पदों पर कार्यरत और अपने परिवार के साथ खुश हैं। लेकिन हम बुजर्गो का उन्हें जरा भी खयाल नहीं रहता। बेटों की पढाई के लिए हमने अपनी एकमात्र संपत्ति जमीन भी बेच दी। अब हमारे पास रहने के लिए अपना मकान भी नहीं है। तीनों बेटे अलग-अलग शहरों में रहते हैं। हमें बारी-बारी से तीनों के घर जाकर रहना पडता है, क्योंकि तीनों में से कोई भी हमें अपने घर लगातार रखने को तैयार नहीं है। हमारा खानपान और रहन-सहन उन्हें पसंद नहीं आता। हमें गंवार समझकर बहुएं हमारा मजाक उडाती हैं और बेटे भी उन्हीं का साथ देते हैं। जिसके भी घर पर हम रहते हैं वही हमें दूसरे के घर भेजने की कोशिश में जुटा रहता है। जब जिस बेटे के घर पर हम रहते हैं, उन्हें हर महीने मेरे पति के पेंशन के रुपये लेना तो याद रहता है, लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि पिताजी की ब्लड प्रेशर की दवाएं ख्ात्म हो गई हैं, मां का चश्मा टूट गया है, पिताजी के पास ढंग के कपडे नहीं हैं। जब कभी मैं उन्हें अपनी जरूरतें याद दिलाती हूं तो वे इन्हें फालतू खर्च मानकर टाल जाते हैं। घर में कोई भी हमसे सीधे मुंह बात नहीं करता। किसी को हमारी परवाह नहीं होती। इस उम्र में भी मैं घर का सारा काम करने की कोशिश करती हूं फिर भी बहुओं को मुझसे कोई न कोई शिकायत हमेशा ही रहती है। अगर हम बीमार होते हैं तो भी कोई हमारा हाल पूछने वाला नहीं होता।

मुझे यह सोचकर बहुत दुख होता है कि हमने जिंदगी में कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया लेकिन आज हम अपने बच्चों पर बोझ बन गए हैं। रहने की कोई जगह नहीं है, समझ में नहीं आता कि क्या करें, कहां जाएं?

विशेषज्ञ की राय

आपकी स्थिति वाकई दुखद है लेकिन आपने वह कहावत जरूर सुनी होगी कि अब पछताए का होत है, जब चिडिया चुग गई खेत। यहां आपकी स्थिति कुछ ऐसी ही हो गई है। अब परिस्थितियों पर आपका बहुत ज्यादा नियंत्रण नहीं रह गया है। यह हर इंसान के लिए एक नसीहत है कि अपने बच्चों को अच्छी सुख-सुविधाएं जरूर देनी चाहिए, लेकिन साथ ही बुढापे में सिर छिपाने के लिए घर और जीवन गुजारने के लिए पैसों का इंतजाम भी जरूर कर लेना चाहिए। खैर, जब जागो तभी सवेरा, इस कहावत पर अमल करते हुए अब भी आप अपने जीवन को पहले से बेहतर बना सकते हैं। आप इन सुझावों पर अमल करने की कोशिश करें, इससे जीवन में बदलाव महसूस करेंगे:

1. अपने पति को समझाएं कि वे पेंशन की सारी रकम बेटे के हाथों में न सौंपे। उसका छोटा हिस्सा आप बेटे को दें बाकी अपनी दवा और दूसरी जरूरतों के लिए अपने पास रखें। ताकि आपको उनके आगे हाथ न फैलाना पडे।

2. अपने तीनों बेटों से इस मुद्दे पर स्पष्ट रूप से बात करें और उनसे कहें कि आपने अपनी सारी जमा पूंजी उनके पालन-पोषण में लगा दी। इसलिए अब उनका भी आपके प्रति कुछ फर्ज बनता है। आप उनसे कहें कि तीनों प्रतिमाह एक निश्चित रकम आपके खर्च के लिए दिया करें।

3. अगर बहुओं का व्यवहार आपको पसंद नहीं है तो आप उनकी ओर ध्यान न दें। पूजा-पाठ और भजन-कीर्तन में अपना मन लगाने की कोशिश करें। इससे आपको मानसिक शांति मिलेगी।

4. आप दोनों एक-दूसरे का खयाल रखें और पास-पडोस के हमउम्र लोगों से मित्रता बढाएं, इससे बहुत अच्छा महसूस करेंगे।

(मनोविश्लेषक डॉ. जयंती दत्ता से की गई बातचीत पर आधारित)

सखी प्रतिनिधि
 
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