रिश्ते रहें जीवंत

      
रिश्ते रहें जीवंत

किसी करीबी से झगडा हो जाए तो केवल एक चीज रिश्ते को बनाती या नष्ट करती है, वह है-दृष्टिकोण। परिवार, मित्रों, पडोसी या सहकर्मियों के साथ मधुर संबंध बनाए बगैर जीवन अच्छा नहीं हो सकता। शुरुआत परिवार से होती है। घरेलू रिश्ते अच्छे हैं तो सामाजिक रिश्ते भी बेहतर होंगे। संबंधों का प्रभाव करियर, सामाजिक-मानसिक एवं आर्थिक स्थितियों पर पडता है। 10 टिप्स रिश्तों की बेहतरी के।

71. माता-पिता याद रखें कि कोई दूसरा उनके बच्चों की जिंदगी में उनकी जगह नहीं ले सकता, भले ही वह उनका जीवनसाथी क्यों न हो। युवा-विवाहित बच्चों की जिंदगी में वहीं तक हस्तक्षेप करें, जहां तक उनकी जिंदगी न प्रभावित हो। उनके विचारों को भी अहमियत दें और जरूरत पडने पर उनसे सलाह भी लें।

72. सामंजस्य की समस्या वैचारिक मतभेदों के कारण होती है। नए विचारों की अहमियत भी समझें। बुजुर्ग युवाओं को व्यावहारिक सहयोग दें। यह न केवल उन्हें ऊर्जावान बनाए रखेगा, बच्चों को भी उनके प्रति संवेदनशील बनाएगा। युवा भी जरूरी मसलों पर बडों को प्राथमिकता दें। उनसे मदद लेने में न हिचकें।

73. बिना समय दिए संबंध अच्छे नहीं हो सकते। परिवार के साथ महीने में एकाध बार घूमने जाएं, दिन में एक वक्त का खाना अवश्य साथ खाएं, खेलें, मूवी देखें, गपशप करें..।

74. शब्द बहुत-कुछ कहते हैं। जब तक मुंह नहीं खोलेंगे, दूसरा कैसे समझेगा। जो कुछ मन में है, उसे साझा करें। रिश्तों में संवादहीनता की स्थिति न आने दें। इससे गलतफहमियां पैदा होती हैं और रिश्तों में दरार पडती है।

75. तारीफ करें। इसका अर्थ है कि आप दूसरे के गुणों का सम्मान कर रहे हैं। लेकिन प्रशंसा या चाटुकारिता में फर्क होता है। इस महीन रेखा को लांघने से बचें।

76. पक्षपात न करें। घर में हैं तो दो बच्चों के बीच तुलना न करें या किसी एक का पक्ष न लें। ऑफिस में भी खयाल रखें कि किसी के प्रति अति-अनुराग कहीं आपको पक्षपात के लिए तो नहीं उकसा रहा है। सच के साथ खडे हों। गलत को बढावा न दें।

77. करीबी रिश्ते में भी थोडी औपचारिकता जरूरी है, अन्यथा रिश्तों में सम्मान-भावना कम होती है। घनिष्ठ मित्र से भी कभी उसकी निजी जिंदगी के बारे में ऐसे प्रश्न न करें, जिनमें वह असहज महसूस करे। लेकिन यदि वह अपनी समस्या बताना चाहे तो जरूर साझा करें। जरूरी हो तो मदद दें, हल भी सुझाएं।

78. परनिंदा से बचें। वास्तव में किसी के शुभचिंतक हैं तो उसकी गलतियां उसे ही बताएं, दूसरे को नहीं। ऑफिस में भी ध्यान रखें कि वहां बातों के केंद्र में कार्य हो। दूसरों की निजी बातों को चर्चा का विषय न बनाएं।

79. संबंधों में सबसे हानिकारक है अहं। विवाद की स्थिति में मैं उसे क्यों मनाऊं, मैं पहल क्यों करूं?, मैं ही क्यों झुकूं? जैसी स्थिति न आने दें। दूसरा पक्ष भी ऐसे ही सोचे तो निबाह कैसे होगा! किसी एक को तो अहं का त्याग करना होगा। यह संबंधों को जीवंत बनाए रखने की कुंजी है, इसे गांठ बांध लें।

80. कहते हैं दोस्ती का रिश्ता सबसे पवित्र होता है। ऐसा दोस्त जिसके साथ आप हंसें, रोएं, बातें कर सकें, जो आपको समझे, बुरे दिनों में साथ दे, किस्मत से ही मिलता है। अगर ऐसा दोस्त आपके पास है तो उसे न खोएं। उसे भी अपना प्यार, स्नेह, सहयोग, मदद दें। उसकी खुशियों और दुख में उसके साथ खडे हों।

इंदिरा राठौर
 
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